Wednesday, December 30, 2009

आप भी करें साहित्य से ‘साक्षात्कार’

पत्रिका-साक्षात्कार, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-देवेन्द्र दीपक, संपादक-आनंद सिन्हा, पृष्ठ-120, मूल्य-15रू.(वार्षिक 150रू.), सम्पर्क-साहित्य अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन वाण गंगा, भोपाल म.प्र., फोनः (0755)2554782, ईमेलः sahitya_academy@yahoo.com
साक्षात्कार भले ही अपने समय के काफी बाद प्रकाशित हो रही हो लेकिन इसकी रचनाओं का स्तर पाठकों को आकर्षित करता है तथा पाठक भी इस पत्रिका का इंतजार करते हैं। समीक्षित अंक में ख्यात तथा प्रतिष्ठित साहित्यकार वल्लभ डोभाल से बलदेव बंशी की बातचीत उनके रचनात्मक योगदान के साथ साथ आम पाठक को सृजन के अनेक रास्ते भी बताती है। रामेश्वर मिश्र पंकज, चन्द्रकांता, शहंशाह आलम, अशोक वाजपेयी तथा हेमंत देवलेकर की कविताएं किसी भी विचारधारा की भल भुलैया में न डालकर पाठक से सीधे ही संवाद स्थापित करती है। क्षमा कौल की डायरी तथा अमृतलाल वेगड़ का यात्रा वर्णन दिल को छू लेने वाली रचना है। देवेन्द्र आर्य, अनिरूद्ध नीरव तथा जया चक्रवर्ती के गीत भी विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। बटुक चतुर्वेदी जी की आंचलिक रचना ‘खूब भरौ है जमकै मेला’ म.प्र. के ग्रामीण अंचलों से होती हुई महानगरों तक अपनी स्पष्टवादिता से बाजारवाद को चुनौति देती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी संकलन के योग्य हैं। काश यह पत्रिका प्रतिमाह प्रकाशित हो जाए तथा पाठक को समय पर मिलने लगे?

Monday, December 28, 2009

साहित्य के लिए कितना नया है- ‘नया ज्ञानोदय’

पत्रिका-नया ज्ञानोदय, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रवीन्द्र कालिया, पृष्ठ-120, मूल्य-30रू.(वार्षिक 300रू.), सम्पर्क-भारतीय ज्ञानपीठ, 16, इन्स्टीट्यूशनल ऐरिया, लोदी रोड़, नई दिल्ली 110.003, फोनः(011)24626467, ईमेलः nayagyanoday@gmail.com , वेबासाईटः http://www.jnapith.net/
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित नया ज्ञानोदय वास्तव में हिंदी साहित्य ही नहीं भारतीय भाषाओं तथा साहित्य में अपना प्रमुख स्थान रखना है। पत्रिका का स्वरूप विशुद्ध रूप से साहित्यिक है। इसके अंक सहेज कर रखने योग्य होते हैं। समीक्षित अंक में हिंद स्वराज की 101 वीं वर्षगांठ पर महत्वपूर्ण आलेखों को सम्मलित किया गया है। स्मृति खण्ड के अंतर्गत विश्वनाथ त्रिपाठी, विभूतिनारायण राय, भारत भारद्वाज एवं प्रकाश कांत के आलेख क्रमशः श्री प्रभाष जोशी, कंुवरपाल सिंह, हरीश भदानी एवं प्रमोेद उपाध्याय की यादों को सहेज कर रखे हुए हैं। विजय मोहन सिंह ने तुर्गनेव के उपन्यास ‘पहला प्यार’ आज के वातावरण को ध्यान में रखकर विचार किया है। स्व. श्री प्रभाष जोशी जी ने हिंदी स्वराज को मोहनजोदड़ों के काल से जोड़कर उसे अपने विशिष्ठ ढंग से प्रस्तुत किया है। गांधी जी का आलेख स्वराज पर उनके विचारों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। अंक में प्रकाशित कहानियों में मनोज रूपड़ा, ह्दयेश, महेश दर्पण, जया जादवानी, बलराम तथा ज्योति चावला की रचनाएं अपनी अपनी शैली तथा विषय वस्तु के द्वारा वर्तमान समय जांच परख करती हुई प्रतीत होती है। रणजीत शाहा का यात्रा वृतांत, प्रांजल धर का ‘मीडिया हिंदी तकनीक तथा बाजार’ एवं सुरेश सेठ का आलेख ‘जालंधर खोया हुआ शहर’ आम पाठक जिसे साहित्य की समझ अधिक नहीं है अनुपयोगी ही लगेंगे। हरिओम राजोरिया तथा विमल कुमार की कविताएं अपनी पुरानी लीक पर चलती दिखाई देती हैं, इनमें विषय की नवीनता जैसा कुछ नहीं है सिवाए भाषा केे लटकों झटकों के? सुनील गंगोपाध्याय ने उत्पल बनर्जी की कविता का बंग्ला से अनुवाद इतने संुदर ढंग से किया है कि ये हिंदी में लिखी गई लगती हैं।

Sunday, December 27, 2009

अग्रिम पंक्ति की स्थापित पत्रिका-‘पाखी’

पत्रिका-पाखी, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-अपूर्व जोशी, पृष्ठ-168, मूल्य-20रू.(वार्षिक 240रू.), सम्पर्क-इंडिपेन्डेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी.107, सेक्टर.63, नोएडा 201303 उ.प्र., फोनः(0120)4070300, ईमेलः pakhi@pakhi.in , pakhi@thesundaypost.in ,
Read online pakhi hindi literature magazine
वेबसाईटः http://www.pakhi.in/
साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अल्प समय में पाखी ने राष्ट्रीय स्तर पर अपने आप को स्थापित किया है। पत्रिका का स्वरूप विचारात्मक, विश्लेषणात्मक है। पत्रिका के अंकों में वर्तमान समय और उसकी चुनौतियों के लिए साहित्य की भूमिका व उपयोगिता के संबंध में समझा जाना जा सकता है। समीक्षित अंक को ख्यात पत्रकार साहित्यकार व जनसत्ता के पूर्व संपादक स्व. श्री प्रभाष जोशी को श्रद्धांजलि के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। स्व. प्रभाष जी पर प्रकाशित संस्मरणों में प्रत्येक संस्मरणकार ने उनकी मिलनसारिता, विषय का गहन ज्ञान तथा अध्ययन व प्रत्येक को साथ लेकर चलनेे की उनकी योग्यता पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। विशेष रूप से ख्यात आलोचक साहित्यकार डाॅ. नामवर सिंह,पुण्य प्रसून वाजपेयी, प्रियदर्शन, अपूर्व जोशी, गोपाल जोशी, कुलदीप नैयर, गुरदयाल सिंह, राजेन्द्र यादव एवं रवीन्द्र त्रिपाठी के आलेख उनके बारे में और अधिक जानने की इच्छा जाग्रत करते हैं। इस अंक मंे अम्लता(संतोष दीक्षित), कनचोदा(अरूण कुमार), कपाल क्रिया(माधव नागदा), घासफूस का घोड़ा(शंशांक घोष) एवं नन्हें मुन्नें प्रचार के सितारे(अंबल्ला जनार्दन) कहानियां प्रकाशित की गई हैं। कपाल क्रिया तथा घासफूस का घोड़ा कहानियां आम जन के आसपास के घटनाक्रम को अपने आप में समेटते हुए उसे विश्व से जोड़ने का प्रयास करती दिखाई देती है। इमरोज, डाॅ. अंजना संधीर तथा नरेश कुमार टांक की कविताएं तथा ओम प्रकाश अडिग, दिनेश सिंदल एवं प्रभु त्रिवेदी के गीत ग़ज़ल बहते हुए जल के किनारे से टकराने उत्पन्न स्वर का अहसास कराते हैं। रजनी गुप्त तथा विजय शर्मा का आलेख एवं आंधी के आम गरीब के राम(उपन्यास अंश-अरूण आदित्य) भी अच्छी रचनाएं हैं। राजीव रंजन गिरि की रचना प्रदीप पंत का व्यंग्य, विनोद अनुपम का आलेख इंटरनेट बनाम अभिनेता तथा रवीन्द्र त्रिपाठी का आलेख ओबामा को साहित्य का नोबल पुरस्कार विचारणीय रचनाएं हैं। प्रतिभा कुशवाह के आलेख ‘और अब नामवर सिंह का ब्लाग’ ने मुझे चैका दिया। आलेख पढ़कर रोचक तथा उपयोगी जानकाीर प्राप्त हुई। तोल्स्तोय पर रूपसिंह चंदेल का आलेख अधिक जानकारी देने में असमर्थ लगा। खेमकरण सोमन, प्रमोद कुमार चमोली तथा योगेन्द्र शर्मा की लघुकथाएं ठीक ठाक हैं इनमें अभी वह पैनापन नहीं आया है जो लघुकथाओं की विशेषता है। साहित्यिक पुस्तकों/संग्रह की समीक्षा में केवल प्रतिभा कुशवाह ने पुस्तक पढ़कर समीक्षा की है। लगता है अन्य ने केवल सरसरी तौर पर देखकर ही अपने विचार व्यक्त कर दिए हैं। पत्रिका का कलेवर साज सज्जा तथा समयानुकूल प्रस्तुति आकर्षित करती है। एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

Saturday, December 26, 2009

क्यों न आप भी अपने पास ही रखें ‘आसपास’?

पत्रिका-आसपास, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, पृष्ठ-24, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), सम्पर्क-एच.03, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल म.प्र., फोनः(0755)2772051, ईमेलः shabdashilpi@yahoo.com
समाचार प्रधान यह पत्रिका विगत 12 वर्ष से निरंतर प्रकाशित हो रही है। समीक्षित अंक में ख्यात पत्रकार स्व. श्री प्रभाष जोशी जी पर संक्षिप्त किंतु उपयोगी जानकारी प्रकाशित की गई है। विशेष के अंतर्गत प्रकाशित प्रमुख समाचारों में 7 ‘कवि सम्मेलनों को प्रोत्साहित करेंगे अमिताभ’, जर्मनी से लाया जाएगा बिस्मिल का साहित्य, मास्को पुस्तक मेले में सम्मानित भारतीय अतिथि, आबिद सुरती से जाने लेखन के गुर तथा लिख भी सकेंगे गोड़ी बोली प्रमुख हैं। हलचल के अंतर्गत एनएसजी कमांडों में जोश भरेगा गुलजार का गीत, आलोचना का स्वपक्ष, जलेस का ब्लाग लोकार्पित, मंै हिंदोस्तां बोल रहा हूं तथा अनुरागी के नाम पर सड़क उल्लेखनीय हैं। अन्य समाचार तथा सूचनापरक जानकारी साहित्यकारों के मध्य सेतु का कार्य करते हैं। पत्रिका एक तरह का पिं्रट ब्लाग है जो साहित्यकारों के मध्य सूचनाओं जानकारियों तथा उनके सुख दुख का विनिमय करता है।

Friday, December 25, 2009

ख्यात कथाकार मृदुला गर्ग पर एकाग्र ‘समावर्तन’ का दिसम्बर.09 अंक

पत्रिका-समावर्तन, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक मंडल अध्यक्ष-रमेश दवे, प्रधान संपादक-मुकेश वर्मा, पृष्ठ-90, मूल्य-20 रू.(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र., फोनः(0734)2524457, ईमेलः samavartan@yahoo.com
पत्रिका समावर्तन का यह अंक ख्यात कथाकार मृदुला गर्ग पर एकाग्र है। अंक में उन पर प्रकाशित आलेखों से उनके लेखन की बारीकियों तथा विचारधारा की जानकारी मिलती है। पत्रिका के संपादक मंडल अध्यक्ष रमेश दवे का आलेख तथा उनसे ख्यात साहित्यकार दिनेश द्विवेदी जी की बातचीत पाठक अवश्य ही पसंद करेंगे। रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, राजकुमार कुम्भज, अनिल माधव दवे, सतीश राठी, सत्येन्द्र तिवारी तथा राहुल झा की कविताएं वर्तमान से वार्तालाप करती हुई रचनाएं हैं। सुदर्शन प्रियदर्शनी की कहानी ‘मरीचिका’ एवं राजेश श्रीवास्तव की कहानी ‘इच्छाधारी लड़की’ सामाजिक चेतना जाग्रत करने वाली रचनाएं हैं लेकिन इन्हंे और भी गंभीरता पूर्वक लिखा जाना था जिससे सामाजिक चेतना का स्वर और भी मुखरित होता। देवांशु पाल, प्रभु त्रिवेदी तथा साबिर हुसैन की लघुकथाएं भी अच्छी बन पड़ी हैं। ख्यात रंगकर्मी सत्यव्रत सिन्हा जी पर प्रकाशित रचनाओं में गिरिराज किशोर तथा अनुपम आनंद के आलेख अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी स्तरीय व पसंद किए जाने योग्य हैं।

Thursday, December 24, 2009

नारी चेतना के लिए-‘नारी अस्मिता’

पत्रिका-नारी अस्मिता, अंक-सितम्बर-फरवरी.10, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. रचना निगम, पृष्ठ-52, मूल्य-20 रू.(वार्षिक 80रू.), सम्पर्क-15 गोयागेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी. ब्लाक, द्वितीय तल, एस/3 , प्रतापनगर, वडोदरा 390004 गुजरात, स्त्री विषय प्रधान इस पत्रिका का स्वरूप साहित्यिक सांस्कृतिक है। इस अंक में डाॅ. सरला अग्रवाल, ाजशेखर व्यास, डाॅ. राम तिवारी एवं डाॅ. नीरजा माधव के पाठकोपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका में प्रकाशित कहानियों में से मां का आंचल(विनोदिनी गोयनका), मोक्ष(डाॅ. रानु मुखर्जी) एवं दुनिया तो है(श्रीमती चमेली जुगरान) अच्छी कहानियां है। प्रणवकुमार, अरूण कुमार भट्ट एवं मीनाक्षी अवस्थी की कविताएं आज के संदर्भ से जुड़ी हुई है। महाश्वेता चतुर्वेदी एवं उमाश्री के गीत गुनगुनाने के योग्य हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र समीक्षाएं व रचनाएं भी साहित्य जगत के लिए उपयोगी हैं।

Tuesday, December 22, 2009

एक चिंगारी कहीं से ढूढ लाओ दोस्तों(दुष्यंत कुमार)--संदर्भ ‘वागर्थ’ संपादकीय

पत्रिका-वागर्थ, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-138, मूल्य-20 रू.(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-भारतीय भाषा परिषद्, 36 ए, शेक्सपियर सरणि, कोलकाता 700017, फोनः(033)22817476, ईमेलः bbparishad@yahoo.co.in
पत्रिका के दिसम्बर .09 अंक में दस्तावेज स्तंभ के अंतर्गत एक पठनीय तथा जानकारीपरक आलेख मौलवी और डाॅ. नजफ़ का मुकदमा(सुधीर विद्यार्थी) प्रकाशित हुआ है। ख्यात कवि कंुवरनारायण जी से लता जी की बातचीत उनके कई रचनात्मक पहलुओं पर प्रकाश डालती है। ए. असफल की लम्बी कहानी संदेश, दो औ र दो चार नहीं(शशि जैन) तथा क़ब्रखोदवा(नसीम साकेती) नए जमाने के नए ढंग की कहानियां हैं। कविताओं में तेजराम शर्मा, सत्येन्द्र श्रीवास्तव तथा सूर्यकुमार पाण्डेय ने साहित्य के आईने से समाज को देखते हएु रचना की है। ख्यात आलोचक, संपादक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी का आलेख ‘हिंदी भाषा और साहित्यः दृश्य व दृष्टि’ एक पाठकोपयोगी रचना है। अमृतलाल वेगड़, भवदेव पाण्डेय तथा नवेन्द्रु घोष के आलेख भी अपनी विविधता के कारण अवश्य ही पसंद किए जाएंगे। पत्रिका की अन्य रचनाएं व सामग्री संग्रह योग्य व पठ्नीय है।
विशेषः ..... उनकी ग़ज़लें- जिन्हें अब नामवर सिंह कालजयी कह रहे हैं- इस धुंधुआती पीडा की अचानक भभक उठीं अभिव्यक्तियां हैं। ...(वागर्थ के संपादकीय से साभार) आगे पढ़ें पत्रिका वागर्थ में

Monday, December 21, 2009

गीतों की जानकारी के लिये ‘साहित्य सागर’ का यह अंक

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल 462043 म.प्र., फोनः 0755.4260116, ईमेलः kksaxenasahityasagar@rediffmail.com
पत्रिका के इस अंक में प्रेम गीतों को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। इस विधा पर प्रकाशित प्रमुख रचनाओं में - जगदीश श्रीवास्तव, मनोज जैन, डाॅ गोपाल दास नीरज, चंद्रसेन विराट, हरिवल्लभ श्रीवास्तव तथा डाॅ. प्रेमलता नीलम की रचनाएं प्रभावित करती हैं। डाॅ. कुअंर बेचैन, डाॅ. मालती शर्मा के आलेख अपनी शिल्पगत विशेषता के कारण अच्छे बन पड़े हैं। जंगबहादुर श्रीवास्तव पर एकाग्र खण्ड भी अच्छा है तथा उससे उपयोगी जानकारी मिलती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व स्थायी स्तंभ भी आकर्षित करते हैं।

Sunday, December 20, 2009

कब तक बनी रहेगी हिंदी अंगेजी की स्टेपनी-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-नवम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. बि रामसंजीवैया, पृष्ठ-48, मूल्य-5 रू.(वार्षिक 50रू.), सम्पर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद्, 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560.010, फोनः(080)23404892, ईमेलः brsmhpp@yahoo.co.in
पत्रिका के इस अंक में भारतीय साहित्य व संस्कृति से संबंधित उपयोगी आलेखों को स्थान दिया गया है। इनमें प्रमुख हैं-- इंदिरा गांधी एक अभूतपूर्व भरा आत्मविश्वास(प्रेमसिंह चेतन), राजभाषा नीति और वार्षिक कार्यक्रम(श्री कृष्णकुमार ग्रोवर), तुलसी भक्त हिंदी योद्धाः फादर कामिल बुल्के(डाॅ. एम.शेषन), हिंदी सेवी बेलजियन डाॅ. कामिल बुल्के(गणेश गुप्त), रामचरित मानस का उत्तर कांड़(इंद्रराज वैद), कब तक बनी रहेगी हिंदी अंग्रेजी की स्टेपनी(एन.एस. शर्मा) प्रमुख हैं। अन्य रचनाओं में धनसिंह खोबा, डाॅ. मोहन आनंद, देवेन्द्र कुमार मिश्रा प्रभावित करते हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं पत्र आदि भी पाठकोपयोगी व जानकारीप्रद हैं।

विष्णु जी के बेटे अतुल की डायरी पढ़ते हुए- कथादेश

पत्रिका-कथादेश, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण, पृष्ठ-98, मूल्य-20 रू.(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. सी.52, जेड़.3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110095
ईमेलः kathadeshnew@gmail.com
कथाप्रधान पत्रिका कथादेश का दिसम्बर.09 अंक कई मायने में श्रेष्ठ है। इस अंक की कहानियां तो विचार योग्य हैं ही अन्य रचनाएं व संस्मरण आदि भी बहुत दिन तक याद रखे जाएंगे। पत्रिका में चार कहानियां प्रकाशित की गई हैं। ये चारों कहानियां रचनात्मकता के साथ साथ रसास्मकता भी लिए हुए है। विशेष रूप से ‘हजारों साल का हिसाब(सीतेश आलोक), स्खलन(मनोज रूपड़ा) ऐसी कहानियां हैं जो आज के बदलते समाज व उसके भविष्य तथा संभावनाओं पर दृष्टिपात करती हैं। गिरिराज किशोर जी का आलेख ‘विष्णु जी के बेटे अतुल की डायरी पढ़ते हुए’ हिंदी साहित्य ही नहीं विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य के लिए उपलब्धि है। अनिल सिन्हा व वीरेन्द्र कुमार वरनवाल के आलेखों में विषय की विविधता का गहराई से अंकन किया गया है। ख्यात कवि ओम प्रकाश वाल्मिकी ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने कठोर तप से साहित्य में अपना स्थान बनाया है। बजरंग विहारी तिवारी ने उनकी रचनात्मकता पर संुदर ढंग से लिखा है। श्यौरसिंह बेचैन, संृजय, हषीकेश सुलभ एवं देवेन्द्रराज अंकुर अपने अपने ढंग से रचना प्रक्रिया, रंगमंच आदि विषयों पर अपनी बात रखते हैं। ब्रजेश, विभांशु दिव्याल, अनिल चमडिया, विश्वनाथ त्रिपाठी एवं रवीन्द्र त्रिपाठी लगातार लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं। लेकिन कभी कभी उनके आलेखों को पढ़कर लगता है कि इस कहीं पढ़ा है। यह भाषा एवं विषयों की दुहराव की वजह से है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, पत्र, समीक्षाएं भी इसे स्तरीय बनाती है।
विशेषः इस संवाद में खुलेपन का आव्हान है, जनतंत्रात्मकता है, वैचारिक श्रेष्ठता के अहंकार का विरोध, समन्वय का स्वागत है। वे परंपरागत सोच को नई सोच में बदलने के पक्ष में हैं.....(विष्णु जी के बेटे अतुल की डायरी पढ़ते हुए) कथादेश से साभार

Saturday, December 19, 2009

‘क्या अब वंदेमातरम् गीत के समान राष्ट्रभाषा भी भीख की पंक्ति में खड़ी होगी?’-‘समय के साखी’

पत्रिका-समय के साखी, अंक-नवम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. आरती, पृष्ठ-60, मूल्य-20 रू.(वार्षिक 220रू.), सम्पर्क-बी 308 सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल 462003 म.प्र., मो. 9713035330, ईमेलः samaysakhi@gmail.com
पत्रिका समय के साखी ने अल्प समय में ही हिंदी साहित्य जगत में अपना स्थान बनाया है। समीक्षित अंक में दो महत्वपूर्ण आलेख सम्मलित हैं। इन आलेखों का स्वर मानवतावादी है। भूमण्डलीय यथार्थवाद और उससे आगे(विनोद शाही) तथा भीष्म साहनी के नाटकों मेे समसामयिक समस्या(नंदलाल जोशी) अपनी अपनी तरह से साहित्य के मूल तत्व की व्याख्या करते हैं। कहानियों में ‘मुंकुदी-मेरे पुरूष मेरे पति’(मंजु अरूण), लाॅस वेगस की रात(कमल कपूर) तथा विश्वास(अखिलेश शुक्ल) आज के समय तथा उससे जुड़े हुए सरोकारों पर गहन गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। प्रभा दीक्षित, राग तेलंग, कुमार विश्वबंधु की कविता तथा भगवत पठारिया की ग़ज़ल भी सहज ही ध्यान आकर्षित करती है। समीक्षा, गतिविधियां, पत्र साखी तथा अन्य स्तंभ भी पत्रिका को व्यापक बनाते हैं।
विशेषः ‘क्या अब वंदेमातरम् गीत के समान राष्ट्रभाषा भी भीख की पंक्ति में खड़ी होगी?’.......शेष भाग पत्रिका में पढ़िए(समय के साखी से साभार)

Friday, December 18, 2009

‘जिन लाहौर नइ वेख्या ओ जन्माइ नई’-‘हंस’ पत्रिका

पत्रिका-हंस, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, मूल्य-25 रू.(वार्षिक 250रू.), सम्पर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002, फोनः (011)2327077
कथा प्रधान पत्रिका का यह अंक अपनी रचनागत विविधता के कारण उल्लेखनीय है। पत्रिका किसी न किसी वजह से हमेशा चर्चा के केन्द्र मंे रहती है। अंक में प्रकाशित कहानियों में - लूनाटिक(नरेन्द्र नामदेव), वही सच है(डाॅ. प्रमोद कुमार सिंह) एवं सूरज के आसपास(डाॅ .सुशीला टाकभोरे) अपनी विषयगत नवीनता के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। ख्यात पत्रकार एवं विचारक प्रभाष जोशी जी पर रामशरण जोशी का आलेख ‘जाना लोकवृत के एक योद्धा का’ विस्तृत रूप से जोशी जी के व्यक्तित्व से अवगत कराता है। जय श्री राय का आलेख (जिन्होंने मुझे बिगाड़ा कालम के अंतर्गत) उनकी निजता के साथ साथ पाठक का भी ध्यान रखता है तथा उसे साथ लेकर चलता है। बजरंग बिहारी तिवारी ‘सेन्टर तो नामवर जी का है’ के द्वारा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में श्री नामवर जी के योगदान तथा विद्यार्थियों में उनकी लोकप्रियता से अवगत कराता है। अनवर सलीम व सुनील पाठक की ग़ज़लें नवीनता लिए हुए है। जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनमाइ नई’(अजित राय) पत्रिका की सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं, पत्र, समाचार आदि भी अपना महत्व प्रतिपादित करते हैं।
विशेषः ‘जिन लाहौर नइ वेख्या ओ जन्माइ नई’ संभवतः हिंदी का अकेला ऐसा नाटक है जो पिछले बीस वर्षो में हिंदी के साथ साथ विभिन्न भारतीय भाषाओं में तो लगातार हो ही रहा है, वाशिंगटन, सिडनी, करांची, आबूधबी, दुबई आदि विश्व के कई शहरों में भी हो रहा है। इस नाटक के साथ सैकड़ों कहानियां जुड़ी हुई हैं।’(इन कहानियांे व अन्य जानकारी के लिए पढ़िए हंस दिसम्बर .09) (हंस के दिसम्बर .09 अंक से साभार)

एक पाठकोपयोगी पत्रिका-‘अणु कन्या’

पत्रिका-अणु कन्या, अंक-03जून(दूसरा वर्ष).09, स्वरूप-उल्लेख नहीं, संपादक-एम. कृष्णचंद्र राव, पृष्ठ-68, मूल्य-केवल निजी वितरण के लिए, सम्पर्क-कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट, कुडनकुलम पोस्ट, राधापुरम तालुक, तिरूनेलवेली, तमिलनाडू 627.106 (भारत), ईमेलः mkrao@kknpp.com
आकर्षक रंगीन मुद्रण व साज सज्जा से युक्त पत्रिका अणुकन्या सहेज कर रखने योग्य पत्रिका हैै। पत्रिका का स्वरूप हिंदी भाषा के उपयोग व शासकीय संस्थानों में उसके सुनियोजित विस्तार पर केन्द्रित है। इस अंक में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में एम. आई. जाॅय एवं शशांक कुमार नामदेव के आलेख संस्थान की प्रगति को रेखांकित करते हैं। राजभाषा हिंदी और महात्मा गांधी(बालशोरि रेडडी), विदेशी मानसिकता से कैसे मुक्त हों(बद्रीनारायण तिवारी), भारतेन्दु हरिशचंद्र और उन्नीसवीं शताब्दी में हिंदी आंदोलन(एम.आर.आर. नायडू), ाहीम(एम.आर.आर.नायडू), संरक्षा मेरी जिम्मेदारी(एल.के. शर्मा), जतिंदर नाथ दास और शहीद कोच(डाॅ. के.के. खुल्लर, अनुवाद-एम. कृष्णराव), महापुरूष एक ही प्रयत्न में शिखर पर नहीं पहंुचे(भीमसिंह कर्दम) तथा जब शब्द गूंगे हो जाएंगे(डाॅ. प्रसेनजीत चैधरी) अच्छे आलेख हैं। इनमें भारतीय हिंदी साहित्य की समसामयिक धारा के साथ साथ प्राचीन विचारों तथा सिद्धांतों को समाहित कर पत्रिका ने इसे आम जन के लिए भी उपयोगी बना दिया है। अंग्रेजी का प्रयोग बिना अर्थ के(बद्रीनारायण तिवारी), परिश्रम सफलता की कंुजी(संजय गोस्वामी) आलेख आम युवा के साथ साथ सभी पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी हैं। भारत की उन्नति में हिंदी का योगदान(लक्ष्मीनारायण दुबे), राजभाषा वनवास(एम.आर.आर. नायडू) अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करते हंै। पत्रिका सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है। इस अच्छे अंक के लिए पत्रिका के संपादन से जुडे अधिकारी बधाई के पात्र हैं।

Wednesday, December 16, 2009

हिंदी व्यंग्य साहित्य की एकमात्र त्रैमासिकी-‘व्यंग्य यात्रा’

पत्रिका-व्यंग्य यात्रा, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-प्रेम जनमेजय, पृष्ठ-128, मूल्य-20रू. (वार्षिक 80रू.), सम्पर्क-73, साक्षर अपार्टमेंट, ए.3, पश्चिम विहार नई दिल्ली 110063, फोनः(011)25264227, ईमेलः vyangya@yahoo.com
हिंदी व्यंग्य साहित्य की एकमात्र त्रैमासिकी के इस अंक में विविधतापूर्ण व्यंग्य शामिल किए गए हैं। इनमें प्रमुख है - उत्तरदायी सरकार(श्रीकांत चैधरी), पैटरनिटी लीव(बलराम), एक्सीडेंट का रहस्य(राजेन्द्र सहगल), पेशे लायक चेहरा(विलास गुप्ते), गंगा जमुना आख्यान(मनोज श्रीवास्तव), मैंने लड़की देखी(रमाशंकर श्रीवास्तव), डंडा ददाति विन्यम(कैलाश चंद्र जायसवाल)प्रमुख हैं। शेष रचनाओं में व्यंग्य की केवल झलक मात्र ही है। अजय अनुरागी, प्रकाश मनु, कैलाश मण्डलेकर, सूर्यबाला, ज्ञान चतुर्वेदी ने ख्यात कथाकार-व्यंग्यकार सूर्यबाला पर गहन गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया है। ख्यात व्यंग्यकार हरीशंकर परसाई जी पर संज्ञा उपाध्याय का आलेख उनके साहित्य का अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पत्रिका की व्यंग्य कविताएं तथा अन्य रचनाएं भी पाठकोपयोगी व संग्रह योग्य हैं।

Tuesday, December 15, 2009

हिंदी साहित्य में कथा का कथाक्रम

पत्रिका-कथाक्रम, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-शैलेन्द्र सागर, पृष्ठ-104, मूल्य-25रू. (वार्षिक 100रू.), सम्पर्क-3, ट्रांजिट होस्टल, वायरलेस चैराहे के पास, महानगर लखनऊ 226006 , फोनः 2336331, ईमेलः kathakrama@gmail.com
पत्रिका के इस अंक मंे समसामयिक कहानियों व अन्य रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। सभी कहानियां अपने शिल्प के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। इनमें प्रमुख है- रात(ए.असफल), रेत में आंसू(विद्याभूषण), डर है कहीं(विपिन बिहारी) एवं आश्रम(विवेक निझावन)। जय श्री राय का आलेख शनिचरी एवं रवीन्द्र वर्मा की रचना सामाजिक कीचड़ का दलदल पाठक को विचारने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। लघुकथाओं में ज्ञानदेव मुकेश, राधेलाल नवचक्र, कृष्ण शर्मा एवं राज वाल्मीकि ने बहुत ही अच्छी तरह कथा की लघुता के साथ न्याय किया है। मधुरेश जी का कथा नेपथ्य एवं डाॅ. राजकुमार का ‘रफतार के मारे’ पत्रिका की विविधता दर्शाता है। कविताओं में ऋषिवंश, अनूप अशेष, कैलाश दहिया एवं सुशांत सुप्रिय का स्वर प्रगतिवादी है। ख्यात आलोचक श्री परमानंद श्रीवास्तव जी का आलेख ‘अंधेरे समय में साहित्य’ गंभीर पाठकों का अवश्य ही पसंद आएगा। अन्य रचनाएं, समीक्षाएं, व पत्र आदि भी स्तरीय व पत्रिका के पूर्ववर्ती अंकों की जानकारी प्रदान करते हैं।

Monday, December 14, 2009

कनाड़ा से प्रकाशित हिंदी चेतना का अक्टूबर .09 अंक अवश्य पढ़िए (इंटरनेट पर उपलब्ध है।)

पत्रिका-हिंदी चेतना, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रमुख संपादक-श्याम त्रिपाठी, सह संपादक- डाॅ.सुधा ओम ढीगरा, डाॅ. निर्मला आदेश, पृष्ठ-64, मूल्य-अमूल्य, सम्पर्क- 6 Larksmere Court, Markham, Onterio, L3R 3R1, Phone (905) 475 7165 , ईमेलः hindichetna@yahoo.ca , वेबसाइटः http://hindi-chetna.blogspot.com/ , http://vibhom.com/
हिंदी साहित्य के लिए समर्पित कनाड़ा से प्रकाशित इस पत्रिका ने अनेक महत्वपूर्ण अंक दिए हैं। समीक्षित अंक भी अपने पूर्व के अंकों के समान पठनीयता से भरपूर है। प्रकाशित कहानियों में संस्कार शेष(कृष्ण बिहारी), माई बाप(देवी नागरानी) तथा बलराम अग्रवाल एवं प्रेम नारायण गुप्त की लघुकथाएं प्रभावशाली हैं। अक्टूबर.09 अंक में प्रकाशित कविताएं विश्व मानवता तथा शांति का संदेश देती हैं। किरन सिंह, जगदीश चंद्र शारदा, संदीप त्यागी, तेजेन्द्र शर्मा, यशपाल लाम्बा, भगवत शरण श्रीवास्तव, शशि पाधा, शाहनाज़ अब्बास, नीना पाल, कृष्ण कुमार, नरेन्द्र ग्रोवर, महेश नंदा, ब्रजेश श्रीवास्तव एवं डाॅ. सुधा ओम ढीगरा की कविताएं हमारे सुनहरे अतीत को साथ लेकर चलती हुई उज्ज्वल भविष्य की आशा बंधाती है। आत्माराम शर्मा का आलेख ‘हिंदी ब्लाग इन दिनों’ इंटरनेट पर हिंदी की मजबूत होती स्थिति से अवगत कराता है। अमित कुमार सिंह की ‘आपबीती’ पढ़कर हिंदी चेतना के प्रत्येक पाठक को अपनी आपबीती सी महसूस होती है। इन्द्र (धीर) बडेरा का प्रज्ञा परिशोधन विश्व को भारतीय संस्कार एवं संस्कृति से अवगत कराता है। पत्रिका के संुदर संयोजन-आकल्पन एवं कलेवर के लिए संपादक श्री श्याम त्रिपाठी व उनके सहयोगी डाॅ. सुधा ओम ढीगरा, डाॅ. निर्मला आदेश सहित अन्य बधाई के पात्र हैं।

Sunday, December 13, 2009

भारतीय साहित्य आपके लिए--‘नारायणीम्’

पत्रिका-नारायणीम्, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-उमेश सिंह, पृष्ठ-35, मूल्य-12रू. (वार्षिक 120रू.), सम्पर्क-401, नर्मदा, विजय बाग, मुरबाड़ रोड़, कल्याण(प), ठाणे (महाराष्ट्र)
पत्रिका का स्वरूप साहित्यिक सांस्कृतिक तथा सामाजिक है। इस अंक में आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती पर उपयोगी सामग्री का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित आलेखों में ‘राष्ट्रभाषा से जुडे़ कुछ प्रश्न’(श्री नरेश मेहता) अपने विश्लेषणात्मक स्वरूप के कारण पढ़ने योग्य है। कहानियों में पुरस्कार(डाॅ. गणेशदत्त सारस्वत), समाधान(पंकज शर्मा) में नयापन व आज के समाज के संदर्भो का उल्लेख किया गया है। शिवसागर शर्मा तथा ऋषि कुमार मिश्र की कविताएं भी पत्रिका को भारतीयता का स्वर प्रदान करती हैं।

Saturday, December 12, 2009

केरल में हिंदी? जी हां। अब जोर शोर से पढ़ी समझी जा रही है।

पत्रिका-केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका, अंक-अप्रैल.जुलाइ.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. एन. चन्द्रशेखरन नायर, पृष्ठ-34, मूल्य-20रू. (आजीवन 1000रू.), सम्पर्क-श्रीनिकेतन लक्ष्मी नगर, पटटम पालस, पोस्ट तिरूवनन्तपुरम केरल 695.004, फोनः(0471) 2541355,
केरल से हिंदी भाषा एवं साहित्य पर प्रकाशित होने वाली यह प्रमुख पत्रिका है। इसमें देश भर में विशेष रूप से देश के दक्षिण प्रांतों में हिंदी की गतिविधियों तथा उस पर आयोजित कार्ययोजनाओं को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है। इस अंक में बद्रीनारायण तिवारी, डाॅ. रवीन्द्र कुमार, कृष्ण कुमार यादव, डाॅ .अमर सिंह वधान, पी. लता, कविता रायजादास एवं आर. राजपुष्पम जैसे ख्याति प्राप्त रचनाकारों के आलेखों को शामिल किया गया है। डाॅ. गोविंद शैनाय, उर्मि कृष्ण की लघुकथाएं तथा रामस्नेहीलाल यायावर की कविता प्रकाशित की गई है। पैनी मैथ्यूस का भारतेन्दु जी पर लिखा गया आलेख तथा जसविंदर शर्मा की कहानी रिश्ता विशेष रूप से आकर्षित करती है। पत्रिका के संपादक डाॅ. एन. चन्द्रशेखरन नायर का महाकाव्य श्री हनुमान पत्रिका की विशेष उपलब्धि है। पत्रिका का मुद्रण तथा साफ संुदर कलेवर प्रभावित करता है। अच्छी पत्रिका के अनूठे अंक को अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए।

Friday, December 11, 2009

साहित्य की कथा में एक बिंब-‘कथा बिंब’

पत्रिका-कथाबिंब, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-मुजूश्री, पृष्ठ-52, मूल्य-15रू. (वार्षिक 50रू.), सम्पर्क-ए-10, बसेरा आॅफ दिन क्वारी रोड़, देवनार मुम्बई 400088, फोनः(022)25515541, ईमेलः kathabimb@yahoo.com, website http://www.kathabimb.com/
पत्रिका कथासाहित्य के लिए समर्पित है लेकिन अन्य विधाओं को भी समुचित स्थान दिया जाता है। इस अंक में पांच कहानियां प्रकाशित की गई हैं जिनमें से एक्सीडेंट(विजय शंकर विकुज), मुखबिर(प्रमोद भार्गव) एवं लघुकथाओं में दहेज(डाॅ. भारती), महंगाई(पंकज शर्मा) हर दृष्टि से उल्लेखनीय हैं तथा साहित्य में कुछ न कुछ नया जोड़ती है। कविताओं-ग़ज़लों तथा गीतों में - कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’, लक्ष्मीकांत पाण्डेय, मधु प्रसाद तथा रामशंकर चंचल विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। इन कविताओं रचनाओं में नवीनता के साथ साथ समय की मांग व उसका आग्रह दिखाई देता है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं, समीक्षाएं व परिशिष्ट इसे पठ्नीय व संपे्रषणीय बनाते हैं।

Thursday, December 10, 2009

साहित्य के लिए शुभ-‘शुभ तारिका’

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-नवम्बर.09,स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-94, मूल्य-25रू(इस अंक का). (वार्षिक 120रू.), सम्पर्क-कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133001(हरियाणा), फोनः (0171)2610483, ईमेलः urmi.klm@gmail.com
हिंदी साहित्य की ख्यात पत्रिका शुभ तारिका का यह हरियाणा अंक है। पत्रिका हमेशा कुछ न कुछ नया करती है जिससे उसके अंक संग्रहयोग्य हो जाते हैं। इस पत्रिका को साहित्य की दृष्टि से हरियाणा पर केेन्द्रित किया गया है। अंक में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में - डाॅ. उषा लाल, डाॅ. महासिंह पूनिया, प्रो. भीमसिंह, मनीष भल्ला, आनंद प्रकाश आर्टिस्ट, सुनीता गौरा, राजेश बुध, प्रो. पूर्णचंद्र शर्मा, डाॅ. ओम निश्चल, ओमप्रकाश कादयान, सुनीता आनंद, सुमन कादयान, पंकज शर्मा, रामशरण, संदीप कपूर, विजय कुमार के आलेख उल्लेखनीय है। इन आलेखों में हरियाणा की साहित्य व उसकी परंपरा से संबंधित पाठकोपयोगी सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अन्य रचनाओं में रजकिशन नैन की हरियाणवी में रचना ‘दरोपती का तप’, लोककथा ‘कंजूस बनिया’(प्रमीला गुप्ता) पत्रिका के स्तर में वृद्धि करते हैं। पूजा सिसौदिया एवं उर्मिला कौशिक की कहानियां आज के वातावरण व उसके प्रभाव से अपने आप को बचाकर चली है। पृथ्वाीराज अरोड़ा, उर्मि कृष्ण, डाॅ. नरेश गुप्ता एवं विक्की नरूला की लघुकथाएं आज की विद्रूपताओं पर प्रकाश डालती हैं। कविताओं में गौरी, निर्मला जौहरी, घमंडीलाल अग्रवाल, मदनलाल वर्मा, यश खन्ना, ओमीश पारूथी एवं डाॅ. राणाप्रताप गन्नौरी ने नए संदर्भो का अच्छ प्रयोग किया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ व पत्र आदि भी प्रभावोत्पादक व जानकारी परक हैं। एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

Tuesday, December 8, 2009

बालमन की पत्रिका ‘अभिनव बालमन’

पत्रिका-अभिनव बालमन, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर.09,स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-निश्चल, पृष्ठ-48, मूल्य-15रू. (वार्षिक 60रू.), सम्पर्क-शारदायतन, 17/238-जेड़-13/59, पंचनगरी, सासनी गेट, अलीगढ़, 202001, मो. 9719007153, ईमेलः abhinavbalmann@rediffmail.com
बच्चों के लिये उपयोगी साहित्य का प्रकाशन कर रही पत्रिका अभिनव बालमन का यह अंक सारगर्भित रचनाओं की सफल प्रस्तुति है। अंक में रामेश्वर की तमन्ना(उत्कर्ष), सपने की राह(प्रियंका) तथा जादुई टोपी(मुकुल) अच्छी कहानियां हैं। साहित्यकारों की कलम से स्तंभ के अंतर्गत प्रो. शहरयार, दिनेश रस्तोगी, ज्ञानेन्द्र अग्रवाल तथा निश्चल की रचनाएं बालकों को अवश्य ही आकर्षित करेगी। बाल रचनाकारों की कविताओं में पूनम, मुकुल, शुभि, नेहा, देव, उर्वशी, लखन तथा सत्यम की रचनाएं बहुत ही अच्छी हैं तथा संदेशप्रद हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं भी प्रभावशाली व बच्चों में संस्कार डालने योग्य है।

Sunday, December 6, 2009

मानवतावादी स्वर और ‘नव प्रभातम्’

पत्रिका-नव प्रभातम्, अंक-03, वर्ष 2009, स्वरूप-अनियतकालीन, संपादक-डाॅ. उमा पाण्डेय, पृष्ठ-16, मूल्य-उपलब्ध नहीं, सम्पर्क-समन्वय कुटीर, राजाजीपुरम्, लखनऊ उ.प्र., फोनः 0522.2416897
संस्कृत साहित्य की यह पत्रिका देश में प्रकाशित होने वाली प्रमुख लघु पत्रिका है। पत्रिका में स्वाधीनता संग्राम, विदेशातंक नाशार्थम् जैसी उपयोगी व जानकारीपरक रचनाएं प्रकाशित की गई है। विश्व धर्म क्या है तथा उसका स्वरूप कैसा होना चाहिए इसे भी पत्रिका ने स्पष्ट किया है। घर, परिवार, समाज, देश, विदेश, कार्यस्थल, समारोह, पर्यटन एवं तीर्थस्थानों पर मनुष्य के व्यवहार की व्याख्या पत्रिका ने स्लोकों के माध्यम से की है। विशुद्ध साहित्यिक पत्रिका न होते हुए भी इसका मूल स्वर मानवतावादी है।

Saturday, December 5, 2009

साहित्य का ‘शैल सूत्र’

पत्रिका-शैल सूत्र, अंक-जुलाई..सिम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, cheif editor- asha shailly, संपादक-कुहेली भट्टाचार्य, पृष्ठ-44, मूल्य-25रू, (वार्षिक 100रू.), सम्पर्क-कार रोड़, बिंदुखत्तर, पो.लाल कुआं, जिला नैनीताल 262402 उत्तराखण्ड (भारत) email asha_shailly@yahoo.co.in
पाठकोपयोगी साहित्य की यह एक अच्छी पत्रिका है। इस अंक में प्रकाशित प्रमुख रचनाओं में डाॅ. पशुपतिनाथ उपाध्याय, ध्यानसिंह भागटा, डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव एवं संपादिका कुहेली भट्टाचार्य शामिल हैं। प्रो. शामलाल कौशिक का व्यंग्य, प्रमोद काण्डपाल की बाल कथा एवं श्रीमती सविता मिश्रा की कहानी अच्छी है। कविताओं में अक्षय जैन, शैलेन्द्र चैहान, अनारसिंह वर्मा एवं पुष्पा जोशी प्रभावित करते हैं। अन्य रचनाएं भी पठ्नीय की श्रेणी में रखी जा सकती है।

Friday, December 4, 2009

साहित्य के क,ख, ग से ‘अक्षरा’ तक

पत्रिका-अक्षरा, अंक-नवम्बर..दिसम्बर.09, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलाश चंद्र पंत, प्रबंध संपादक-सुशील कुमार केडिया, संपादक-डाॅ. सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-20रू, (वार्षिक 120रू.), सम्पर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स, भोपाल म.प्र. फोनः(0755)2661087,
पत्रिका के इस अंक में लोहिया जी ख्यात आलोचक श्री रमेश चंद्र शाह का आलेख धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय एकताःसंदर्भ लोहिया प्रमुख आलेख के रूप में प्रकाशित किया गया है। अन्य आलेखों में मिशनरी आक्रमण और म्यूनिख भावना(शंकर शरण), हिंदी बाल कविता अभिव्यक्ति के नए रंग और छवियां(प्रकाश मनु), निर्गुण कवियों की सामाजिक दृष्टि(सुधांशु कुमार मालवीय) प्रमुख हैं। स्त्री विमर्श पर करूणाशंकर उपाध्याय का आलेख कुछ अधूरा सा लगता है। इसमें वह गंभीर चिंतन नहीं है जिसकी अपेक्षा की जाती है। बालकवि बैरागी जी का संस्मरण पठ्नीय तथा रोचक बन पड़ा है। नियति सप्रे का यात्रा वृत्तांत ‘मेरी यादों में बसा ईराक’ बहुत हद तक रिपोतार्ज जैसा हो गया है जिससे सामान्य पाठक को इसे पढ़ने में यात्रा सा आनंद प्राप्त नहीं होता। तोलस्ताय की कहानी ‘प्रेम एक पुर्नजन्म’(विश्वप्रसिद्ध उपन्यास युद्ध और शांति का एक अंश) का अनुवाद पढ़कर लगता है लेखक को रूसी भाषा एवं साहित्य की जानकारी नहीं है। यह अनुवाद रूस से अंग्रेजी में अनुवादित उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ से किया गया लगता है। इसकी वजह से अनुवाद दुरूह हो गया है। कला जोशी की कहानी अनुबंध अच्छी है। ख्यात कवि लेखक रामदरश मिश्र, देवव्रत जोशी एवं रामकुमार आत्रेय की कविताएं आज के संदर्भो से जुडी दिखाई देती है। विद्या गुप्ता की कहानी स्वप्न जया... एवं सतीश दुबे की लघुकथा तेल की धार अंक की अच्छी रचनाओं में शामिल की जा सकती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व पत्र आदि भी स्तरीय व समसामयिक हैं।