Sunday, February 27, 2011

लेखक से बड़ा दलित कोई नहीं-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: www.pakhi.in , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इडिपेंडेंट मीडिया इनीशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएडा 201303 उ.प्र.
साहित्य जगत की अग्रणी पत्रिका पाखी के समीक्षित अंक में ख्यात कथाकार कवि उदयप्रकाश जी से साक्षात्कार इस अंक की विशेष रचना है। प्रकाशित कहानियों में फोटो वाला दफ्तर(महेश राठी), रेसक्यू(नीलम कुलश्रेष्ठ), उस दिन आसमान में कितने .....(अचला शर्मा) तथा सट्टे वाली सड़क(नगेन्द्र नागदेव) समयसापेक्ष कहानियां हैं। वाद-विवाद-संवाद के अंतर्गत महावीर राजी तथा मदन मोहन पाण्डेय के विचार उपयुक्त लगते हैं। दिनेश कुशवाह, सुरेन्द्र स्निग्ध तथा प्रीति सिंह परिहार की कविताएं दैनिक जीवन में किसी तरह से घिसटते मनुष्य को राहत देती दिखाई पड़ती है। शभु गुप्त का लेख उदयप्रकाश जी की कहानियों पर अति संक्ष्ज्ञिप्तता के साथ प्रकाश डालता है। इस लेख को कम से कम तीन या चार भागों में विस्तृत रूप से लिखकर प्रकाशित किया जाना चाहिए था। क्योंकि उदय प्रकाश जी पर इतने कम शब्दों में कुछ नहीं कहा जा सकता है। सुरेश पंडित, रमेश प्रजापति तथा विज्ञान भूषण के मीमांसा स्तंभ के अंतर्गत लेखों में कोई नई बात नहीं पढने समझने में आती है। पुण्य प्रसून वाजपेयी तथा विनोद अनुपम के कालम भी ठीक ठाक लगे। अशोक कुमार मिश्र का स्तंभालेख जानकारीपरक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं तथा समीक्षाएं भी प्रभावित करती है।

पत्रिका "व्यंग्य यात्रा"

पत्रिका: व्यंग्य यात्रा, अंक: अक्टूबर दिसम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. प्रेमजनमेजय, पृष्ठ: 108, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 100), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25264227, सम्पर्क: 73, साक्षर अपार्टमेंटस, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063
व्यंग्य विधा की समर्पित पत्रिका व्यंग्य यात्रा का यह अंक आंशिक रूप से ख्यात व्यंग्यकार व लेखक हरिजोशी जी पर एकाग्र है। अंक में पाथेय के अंतर्गत नवनीत सेवक, सुरेश सोमपुरा, आबिद सुर्ती एंव निरंजन त्रिवेदी के लेख प्रभावित करते हैं। चिंतन के अंतर्गत गुजराती भाषा में व्यंग्य-हास्य पर अच्छी सामग्री प्रकाशित की गई है। ख्यात व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल से साक्षात्कार के लिए प्रश्न निर्माण करने में लगता है अधिक ध्यान नहीं दिया गया है। इस कारण से साक्षात्कार बिखरा सा व अपूर्ण लगता है। हरि जोशी जी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर सामग्री उन्हें नजदीक से जानने समझने मंे उपयोगी है। ज्ञान चतुर्वेदी, डाॅ. भागीरथ बडौले के लेख प्रभावित करते हैं। अन्य व्यंग्य रचनाओं में कृष्ण चराटे, रूचि श्रीवास्तव, के.एल. गर्ग एवं राकेश चैरसिया को छोड़कर अन्य व्यंग्यकारों की व्यंग्य रचनाएं प्रभावित नहीं कर सकी हैं। गिरीश पंकज, प्रहलाद श्रीमाली एवं हरदयाल की व्यंग्य कविताएं उल्लेखनीय हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व जानकारियां भी कुछ नया देने में सक्षम हैं।

Saturday, February 26, 2011

ग्वालों के काव्य की जमीनी सांस्कृतिकता-‘प्रचार परिषद पत्रिका’

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: जनवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. वि.रामसंजीवैया, डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 5रू.यह अंक(वार्षिक 50), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजीनगर, बेंगलूर कर्नाटक
कर्नाटक से प्रकाशित हिंदी साहित्य की इस महत्वपूर्ण पत्रिका में जन-उपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। अंक में राज सक्सेना, विजय प्रकाश बेरी, विद्याश्री, डाॅ. मित्रेश कुमार गुप्त, गणेश गुप्त, सोनवणे राजेन्द्र अक्षत, डाॅ. राठोड एम.डी., विलास सालुके, डाॅ. परमानंद पांचाल, पटेल शर्मिला जी तथा दुर्गाशंकर त्रिवेदी के विचारपूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है। देवेन्द्र कुमार मिश्रा, किशन लाल शर्मा एवं रमाकांत श्रीवास्तव की कविताएं प्रभावशली हैं। पत्रिका की विश्लेषणात्मक विचारणीय रचना प्रो. बी.वै. ललिताम्बा का आलेख ‘ग्वालों के काव्य की ज़मीनी सांस्कृतिकता’ है।

Thursday, February 24, 2011

सुमन सागर का नया अंक

पत्रिका: सुमन सागर, अंक: जनवरी-मार्च2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: संजीव कुमार आलोक, पृष्ठ: 22, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 10(वार्षिक 40), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 9835053651, सम्पर्क: विनीता भवन, सवेरा सिनेमा चैक, काजीचक्र, बाड़ 803213 बिहार
साहित्य पत्रिका सुमन सागर के समीक्षित अंक में बच्चों के सर्वागीण विकास के लिए अच्छी व पठनीय सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में पुष्पेश कुमार पुष्प, डाॅ. राकेश कुमार सिन्हा, सिद्धार्थ शंकर, चेतन, सुरेश, जमुआर, बच्चन, जीवने जितेन्द्र, प्रकाश, किशन, नौशाद, डाॅ. रमेश तथा अन्य लेखकों की रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई है। आकांक्षा यादव, रोहित यादव, देवेन्द्र मिश्रा, शामलाल कौशल, वासुदेवन, सुरेश प्रसाद, उषा किरण, कृष्णा भटनागर की रचनाएं प्रभावित करती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व बच्चों के लिए उपयोगी पहेलियां तथा जानकारियां प्रशंसनीय है।

Wednesday, February 23, 2011

‘साहित्य अमृत’ का जन्मशती अंक

पत्रिका: साहित्य अमृत, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, पृष्ठ: 154, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 50रू.यह अंक(वार्षिक 200), ई मेल: info@sahityaamrit.in , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.23289777, सम्पर्क: 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली 110002
ख्यात पत्रिका साहित्य अमृत का समीक्षित अंक जन्मशती अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक को दिवंगत साहित्यकारों बाबा नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, गोपाल सिंह नेपाली तथा उपेन्द्र नाथ अश्क पर एकाग्र किया गया है। पत्रिका ने इन प्रतिष्ठित साहित्यकारों पर संस्मरण, आलेख तथा उनकी प्रतिनिधि रचनाएं प्रकाशित कर नए पाठकों को हिंदी के अतीत तथा वैभव के संबंध में जानने समझने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है। प्रकाशित संस्मरणों में ‘मेरे आत्मीय बाबा नागार्जुन(महेन्द्र भटनागर), ‘बाबा नागार्जुन मेरी सरकारी धर्मशाल में मेरे अतिथि(बालकवि बैरागी), नागार्जुन ने मित्र से मुलाकात के लिए टिकिट लिया(राधा कांत भारती), नेपाली जी तीन प्रेरक प्रसंग(नरेन्द्र गोयल), गोपाल सिंह नेपाली(श्रीरामनाथ सुमन), लौट आ ओ पांखुरीःशमशेरबहादुर सिंह(केशव चंद्र शर्मा) विशेष रूप से संग्रह योग्य हैं। शोभाकांत, लीला मोदी, सी.आर.राजश्री, प्रिया ए., भगवती प्रसाद द्विवेदी, क्षेमचंद्र सुमन, बालकवि बैरागी, सुरेश गौतम, शिवकुमार गोयल, गोविंद कुमार गंुजन, रमानाथ अवस्थी, कृष्णदत्त पालीवाल, हरदयाल, शंभु बादल, दीपक प्रकाश त्यागी, अरूण कुमार वर्मा, रीतारानी पालीवाल, श्रीकृष्णकुमार द्विवेदी, भवानीलाल भारतीय तथा राजकरण सिंह के संबंधित रचनाकारों-साहित्यकारों पर लेख उत्कृष्ट व गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल से रामशंकर द्विवेदी की बातचीत हिंदी साहित्य के अतीत से लेकर उसके भविष्य के प्रति आकर्षक चिंतन है। उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी ‘चारा काटने की मशीन’ तथा नाटक ‘अधिकार का रक्षक’ पुनः पढ़कर पिछली सदी के उस समय की याद दिला देती है जब हिंदी वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय होने के लिए छटपटा रही थी। शैलेष मटियानी का उपन्यास अंश ‘सीढ़ियां’ इसे पढ़ने की उत्कट इच्छा जाग्रत करता है। नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, बलबीर सिंह करूण तथा केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं प्रत्येक साहित्यप्रेमी को इन कविताओं के संबंध में वर्तमान समय के आधार पर व्याख्या करने के लिए प्रेरित करेगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी उपयोगी व पठनीय है। पत्रिका के संपादक श्री चतुर्वेदी जी ने बिलकुल ठीक लिखा है कि, ‘पांच दिवंगत रचनाकारों के व्यक्तित्व और अवदान के विभिन्न आयामों को एक अंक में सम्मिलित करने का सीमित प्रयास करना खतरे से खाली नहीं है।’ लेकिन साहित्य अमृत ने इसे खतरे की अपेक्षा चुनौती मानकर उठाया और यह प्रयास सफल रहा है। संपादक के साथ साथ साहित्य अमृत की पूरी टीम इस पुनीत कार्य के लिए बधाई की पात्र है।

Tuesday, February 22, 2011

पाण्डुलिपि का नया अंक

पत्रिका: पाण्डुलिपि, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: अशोेक सिंघई, जयप्रकाश मानस, पृष्ठ: 448, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल: pandulipatrika@gmail.com , वेबसाईट: http://www.pramodverma.com/ , फोन/मो. 94241.82664, सम्पर्क: एफ-3, छगमाशिमं आवासीय परिसर, पेंसनवाड़ा रायपुर 492001
पत्रिका का समीक्षित अंक केवल दूसरा ही अंक है। इस पत्रिका ने प्रथम अंक के प्रकाशन के पश्चात मेटर, कलेवर तथा साज सज्जा में अत्यधिक सुधार किया है। पत्रिका की रचनात्मकता प्रभावित करती है। क्रमशः --------------

Sunday, February 20, 2011

साहित्य सागर का नया अंक

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 200), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.42602783, सम्पर्क: 161 बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
साहित्य सागर का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार यतीन्द्रनाथ ‘राही’ पर एकाग्र है। अंक मंे उनके व्यक्तित्व पर देवेन्द्र शर्मा, राधेश्याम शुक्ल, मयंक श्रीवास्तव, मृदुल शर्मा, शिवशंकर शर्मा, जयजयराम आनंद, उषा यादव एवं अजय पाठक के लेख अच्छे व जानकारीपरक हैं। अन्य रचनाओं में महेश श्रीवास्तव, मुकेश अनुरागी की कविताएं तथा शरदनारायण खरे का लेख अच्छा है।

आप सभी के ‘आसपास’

पत्रिका: आसपास, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 32, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 0755.2775129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.
रचनाकारों की संवाद पत्रिका के इस अंक में आपसी संवाद के लिए उपयोगी जानकारी का प्रकाशन किया गया है। अंक में भारत भवन भोपाल में नाटक का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। दूसरा प्रमुख समाचार पांच दिवसीय प्रतिष्ठा समारोह ‘पुस्तक पर्व’ का समाचार है। यह समाचार पुस्तक पर्व के अवसर पर आयोजित विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी देता है। नक्श लायलपुरी पर एकाग्र लेख आज तक बाकी है बीस रूपये का कर्ज अच्छा व जानकारी परक है। पत्रिका के अन्य समाचार संवाद स्थापित करने में पूरी तरह से समर्थ हैं।

Saturday, February 19, 2011

साहित्य परिक्रमा का नया अंक

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जनवरी-मार्च2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संरक्षक: डाॅ. बलवत जानी, प्रबंध संपादक: जीत सिंह जीत, संपादक: मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 128, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 15रू.(द्विवार्षिक 100), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09425407471, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर म.प्र.
ख्यात साहित्यिक पत्रिका साहित्य परिक्रमा का समीक्षित अंक उसमें प्रकाशित आलेखों के कारण महत्वपूर्ण है। अंक में मानव जीवन की आस्था, साहित्य एवं संस्कृति से संबंधित आलेखांे का प्रकाशन किया गय है। प्रकाशित प्रमुख लेखों में डाॅ. नंदलाल मेहता, आचार्य मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, प्रो. धर्मपाल मैनी, डाॅ. बद्री प्रसाद पंचोली, दयाकृष्ण विजयवर्गीय, रामेश्वर मिश्र पंकज, एन. सुदरम, उमेश कुमार सिंह, विश्वमोहन तिवारी, डाॅ. देवेन्द्र दीपक, भुवनेश्वर प्रसाद गुरूमैना, यतीन्द्र तिवारी, हदयनारायण दीक्षित, मिथलेश दीक्षित, नीरजा माधव, कमलकांत झा, अजित गुप्त, श्रीमती संपत देवी मुरारका, डाॅ. श्रीराम परिहार, वासुदेवन शेष, कृष्णचंद्र गोस्वामी, मृत्यंुजय उपाध्याय, कन्हैया सिंह, शिवकुमार पाण्डेय, डाॅ. कृष्ण मुरारी शर्मा, निर्झरी महेता, संजय पंकज, रामप्रकाश अनुरागी, शशि प्रभा क्रांति कनाटे, रवीन्द्र कुमार उपाध्याय, ज्वाला प्रसाद कौशिक के लेख उल्लेखनीय हैं। अन्य रचनाओं में रानू मुखर्जी, कुसुम शर्मा प्रभावित करते हैं। पत्रिका का संपादकीय आस्था तत्व और भारतीय साहित्य प्रभावित करता है।

Thursday, February 17, 2011

साहित्य के लिए ‘शुभ तारिका’

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: जनवरी2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 38, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 12रू.(वार्षिक 120), ई मेल: urmi.klm@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालानी अंबाला छावनी 133001 हरियाणा
लगातार 39 वर्ष से प्रकाशित पत्रिका शुभ तारिका के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में पंकज शर्मा, सुरेश चंद्र वर्मा, किशोर श्रीवास्तव, कालीचरण प्रेमी, अशफका कादरी, शैल वर्मा तथा अनिल कुमार जैन की लघुकथाएं प्रकाशित की गई है। पत्रिका में प्रकाशित कविताओं में महेश चंद्र श्रीवास्तव, महेन्द्र जैन, पुष्पा सिंधी, प्रद्युम्न श्रेष्ठ, भवानीशंकर, डाॅ. भावना, रेखा शर्मा, डाॅ. अर्पणा चतुर्वेदी, आशा शैली तथा दिनेश प्रसाद प्रभावित करते हंै। कृष्ण कुमार यादव की कहानी अच्छे केनवास पर रची बुनी गई है जिसमें वर्तमान समाज की विसंगतियों के साथ साथ पूर्वजों के लिए आदर का भाव निहित है। संपादकीय का लक्ष्य और उद्देश्य पर डाॅ. महाराज कृष्ण जैन का लेख नवोदित संपादकों के लिए मार्गदर्शक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि अच्छी जानकारी प्रदान करते हैं।

Wednesday, February 16, 2011

समावर्तन का फरवरी 2011 अंक

पत्रिका: समावर्तन, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 98, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य एवं कला के लिए समर्पित पत्रिका समावर्तन के समीक्षित अंक में आम पाठक सहित शोर्धियों के लिए उत्कृष्ट सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में ख्यात कवि एवं साहित्यकार नरेश मेहता पर अच्छे व संग्रह योग्य आलेख प्रकाशित किए गए हैं। पत्रिका के संपादक रमेश दवे, तथा डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय व प्रमोद त्रिवेदी से नरेश मेहता की परिसंवाद शोध छात्रों के लिए उपयोगी है। धनंजय वर्मा, ज्योति जैन तथा श्री परमानंद श्रीवास्तव के लेख साहित्य के वर्तमान स्वरूप पर गहन विचार करते हैं। विमल कुमार, वसंत सकरगाए, मुस्तफा खान एवं सुधीर सक्सेना की कविताएं आकर्षक हैं। निरंजन श्रोत्रिय जी द्वारा नीलोत्पल की चुनी हुई कविताएं तथा प्रतापसिंह सोढ़ी की लघुकथा प्रभावित करती है। रंगशीर्ष के अंतर्गत पदश्री वसुंधरा कोमकली पर सभी रचनाएं अद्वितीय हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार, समीक्षाएं व लेख भी प्रभावशाली हैं।

संवाद से पहले और बाद "कथन"

पत्रिका : कथन, अंक : जनवरीमार्च11, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ : 98, रेखा चित्र/छायांकन : जानकारी नहीं, मूल्य : 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल : kathanpatrika@hotmail.com , वेबसाईट : उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25268341, सम्पर्क : 107, अक्षरा अपार्टमेंटस, ए3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली 110063
कथाप्रधान त्रैमासिकी कथन के समीक्षित अंक में कहानियों के साथ साथ कहानी के आंदोलन की जरूरत पर एक संवाद प्रकाशित किया गया है। ख्यात कथाकारसाहित्कार एवं कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय से अशोक कुमार पाण्डेय की बातचीत पर आधारित इस परिचर्चा से कहानी विधा के लिए आंदोलन की आवश्यकता पर विचार किया गया है। इस परिचर्चा में योगेंद्र आहूजा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मनोज कुलकर्णी, प्रियदर्शन, प्रभात रंजन एवं राकेश बिहारी ने भाग लिया है। परिचर्चा के अंत में श्री उपाध्याय जी ने नाम की अपेक्षा आंदोलन की आवश्यकता पर बल दिया है। आज कहानी के साथ साथ समस्त साहित्य पर पुर्नविचार करने व सकारात्मक आंदोलन की जरूरत है। क्योंकि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में आम भारतीय टी.व्ही. पर साहित्य के नाम पर दिखाए जाने वाले सस्ते एवं फूहड़ मनोरंजन को ही साहित्य समझ बैठा है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित कहानियों में जिस मिट्टी से बने हैं हम(इसाबेल अलेन्दे्रअनु. जितेन्द्र भाटिया), समाधि लेख(केन सारोविबा, अनु. रमेश उपाध्याय) तथा इक्कीसवीं सदी के लिए(तौफिक अल हाकिम, अनु. रमेश उपाध्याय) प्रकाशित की गई है। इन अनुदित कहानियों के कारण अंक कुछ बोझिल सा हो गया है। किसी भी पत्रिका में एक से अधिक अनुदित रचनाएं होने पर पाठकों का क्रम भंग होता है। वैसे भी अनुवाद में कितना भी ध्यान रखा जाए वह दुरूह हो ही जाता है। फिर भी समाधि लेख एक अच्छी कहानी है जिसका कथानक प्रभावित करता है। जवरी मल्ल पारख का लेख (स्तंभपरदे पर) ॔॔यह रात भी गुजर जाएगी’’ फिल्मों में उठाए गए विभिन्न मुद्दों जैस भ्रष्टाचार, शिक्षा आदि पर एक अच्छा विश्लेषण है। वरिष्ठ कवि साहित्यकार लीलाधर मंडलोई ने संग्रह ॔अब भी’(चंद्रेश्वरउदभावना प्रकाशन) की समीक्षा इतने अच्छे ंग से की है कि इस संग्रह को पॄने की इच्छा वलवती हो जाती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं। आज हिंदी वैश्विक भाषा का स्वरूप धारण कर चुकी है। इस स्थिति में पत्रिका को भारतीय सीमा से बाहर निकालने की जरूरत है।अमरीका, कनाड़ा, मॉरिशस, फिजी, सूरिनाम तथा दुनिया के अन्य देशों में रचनाकार हिंदी में अच्छा व विश्व स्तरीय लिख रहे हैं। उन्हें भी भारतीय साहित्यिक पत्रिकाओं में पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उम्मीद है संपादक संज्ञा उपाध्याय ध्यान रखेंगी।

Tuesday, February 15, 2011

साहित्य के समय के साखी

पत्रिका : समय के साखी, अंक : नबम्बरदिसम्बर10, स्वरूप : मासिक, संपादक : डॉ. आरती, पृष्ठ : 56, रेखा चित्र/छायांकन : उपलब्ध नहीं, मूल्य : 20रू.(वार्षिक 220), ई मेल : samaysakhi@gmail.com , वेबसाईट : http://www.samaykesakhi.in/ , फोन/मो. 9713036330, सम्पर्क : बी.308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हॉस्पिटल के पास, भोपाल म.प्र.
प्रगतिशील साहित्य के लिए समर्पित पत्रिका समय के साखी के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण जनोपयोगी रचनाएं प्रकाशित की गई हैं। अंक में वरिष्ठ कवि व रचनाकार भगवत रावत से राजेन्द्र परदेसी जी की बातचीत साहित्य व उसके समय पर विचार करती है। सुरेश पण्डित तथा हरमेन्द्र सिंह बेदी के लेख अपने अपने विषय के विस्तार में जाकर उपयोगी व जानकारीपरक सूचनाएं सामने लाते हैं। पीताबम्बर दास सर्राफ ॔रंक’ तथा भाभी डॉ. पूरन सिंह की कहानियां अच्छी व संदेशपरक हैं। कुमार सुरेश, केशव शरण तथा शैलेन्द्र चौहान की कविताएं प्रभावित करती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समीक्षाएं व अच्छी है।

Monday, February 14, 2011

आप हम सबकी हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका: हिंदुस्तानी जबान, अंक: जनवरी-मार्च10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ: 80, रेखा चित्र/छायांकन: उपलब्ध नहीं, मूल्य: 10रू.(वार्षिक 120), ई मेल: hp.sabha@hotmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 022.22812871, सम्पर्क: महा. गांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महा. गांधी बिल्डिंग, 7 नेताजी सुभाष रोड़ मुम्बई 400002
हिंदी व उर्दू में एकसाथ प्रकाशित गांधीवादी साहित्य के लिए समर्पित पत्रिका के समीक्षित अंक में अन्य उपयोगी रचनाओं को भी समुचित स्थान दिया गया है। अंक में प्रकाशित रचनाओं में समकालीन हिंदी कविता पर भूमंडलीकरण का प्रभाव(मृत्युंजय उपाध्याय), जनकवि नागार्जुन(त्रिभुवन राय), डाॅ. भीमराव अम्बेडकर व उनका सामाजिक चिंतन(डाॅ. सुरेश उजाला), अभिज्ञान शाकुन्तलम के उर्दू अनुवाद(जहां आरा), संस्कृति, साहित्य और समाज की सौगात: लोकगीत(रामचरण यादव), राजभाषा हिंदी के विकास के अवरोधक तत्व(बैजनाथ प्रसाद) एवं रतिलाल शाहीन की लिखी हुई पुस्तक समीक्षा अच्छी रचनाओं में शुमार की जा सकती हैं।

Sunday, February 13, 2011

मॉरिशस से प्रकाशित विश्व हिंदी पत्रिका का नया अंक

पत्रिका : विश्व हिंदी पत्रिका, अंक : द्वितीय, स्वरूप : वार्षिक, संपादक : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र, पृष्ठ : 205, रेखा चित्र/छायांकन : जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य : प्रकाशित नहीं, ई मेल : whsmauritius@intnet.mu , वेबसाईट : उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 002306761196, सम्पर्क : World Hindi Secretariat, Swift Lane, Forest Side Mauritius
मॉरिशस से प्रकाशित पत्रिका विश्व हिंदी पत्रिका का समीक्षित अंक साहित्यिक रचनाओं से भरपूर है। अंक में विश्व के विभिन्न भागों में निवासरत हिंदी विद्वानों के आलेख प्रकाशित किए गए हैं। प्रकाशित आलेख विश्व में हिंदी भाषा एवं साहित्य की उपयोगिता व वैश्विक स्तर पर स्वीकारता पर प्रकाश डालते हैं। प्रकाशित प्रमुख लेखों में साहित्य पुरूष भारतेंदु(डॉ. रत्नाकर पाण्डेय), हिंदी का सबसे पहला कवि सम्मेलन(श्रीनारायण चतुर्वेदी), अमरीका में हिंदी एक सिंहावलोकन(सुषम बेदी), रोमानिया में हिंदी का स्वर व स्वरूप(रणजीत साहा), फीजी में हिंदी : नए आयाम(शरद कुमार), सूरीनाम में हिंदी : वर्तमान स्थिति(भावना सक्सेना), दक्षिण अफ्रीका में हिंदी का अनोखा सफर(चंपा वशिष्ठमुनि), इटली में हिंदी भाषा शिक्षण(डॉ. घनश्याम शर्मा), दक्षिण कोरिया और हिंदी : हार्दिक मिलन दो देशों का(प्रो.दिविक रमेश), दक्षिण कोरिया में हिंदी शिक्षण(किम ऊ जो), हिंदी उर्दू फ्लेगशिप : संभावनाओं की ओर(विष्णु शंकर), फिनलैंड में हिंदी(डॉ. अनीता गांगुली), नीदरलैंड में हिंदी की स्थिति और विकास(पुष्पिता अवस्थी) के लेखों में विश्व स्तर पर हिंदी के लिए हो रहे विकास व कि्रया कलाप की जानकारी है। इनसे पता चलता है कि आज हिंदी किस तरह से चारों ओर अपना परचम लहरा रही है। अन्य लेखों में मॉरिशस मे ंहिंदी : वर्तमान स्थिति(सत्यदेव सेंगर), मॉरिशस में हिंदी : एक सर्वेक्षण(जयप्रकाश कर्दम), वियतनाम में हिंदी(साधना सक्सेना), न्यूजीलैंड में हिंदी भाषा और संस्कृति(सुनीता नारायण), हिंदी धैर्य की भाषा हैउत्तेजना और हिंसा की नहीं(बालकवि बैरागी), संयुक्त राष्ट्र में हिंदी पृष्ठभूमि, प्रस्ताव एवं पहल(नारायण कुमार) प्रभावित करते हैं। पत्रिका ने हिंदी भाषा, शैली व साहित्य पर विविधतापूर्ण आलेख प्रकाशित किए हैं जो शोध छात्रों सहित आम पाठकों के लिए समान रूप से संग्रह योग्य हैं। इनमें हिंदी की विदेशी शैलियां(विमलेश कांति वर्मा), हिंदी उर्दू और हिंदुस्तानी(रवि श्रीवास्तव), भारतीय समाज में बहुभाषिकता और हिंदी(सदानंद शाही), विस्थापन का दर्द और ॔मानस’ का मरहम(सुरेश ऋतुपर्ण), मॉरिशस का भारतीय आप्रवासी स्वर(अभिमन्यु अनंत), प्रवासी हिंदी कहानियों में वृद्घावस्था(विजय शर्मा), हिंदी का प्रचार प्रसार ही एकमात्र धर्म(जितेंद्र कुमार मित्तल), कम्प्यूटर और हिंदी(लीना मेहदेले), वैश्विक हिंदी की चौतरफा बयार(राकेश पाण्डेय), उपनिवेशवाद की समाप्ति(चरणदास महंत) शामिल है। अंक में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का उद्घाटन भाषण एवं सर शिवसागर रामगुलाम का अध्यक्षीय भाषण भी साहित्यप्रेमियों की जानकारी के लिए प्रकाशित किया गया है। प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल होने वाले विद्वानों के संस्मरण सहेजकर रखने योग्य हैं। इनमें रामदेव धुरंधर, सूर्यदेव सिबोरत, महेश रामजीयावन तथा सुरेरश रामवर्ण के संस्मरण विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। मॉरिशस के हिंदी प्रकाशनों पर महत्वपूर्ण व जानकारीपरक परिशिष्ठ भी जानकारीपरक है। पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र का यह कहना बिलकुल सही है कि "आज की बदलती हुई वैश्विक परिस्थितियों में भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरकर आया है।" संपादक गंगाधर सिंह सुखलाल ने भी स्पष्ट किया है कि "विश्व हिंदी पत्रिका 2010 में शामिल किए गए लेख हिंदी की समृद्धि का अच्छा प्रमाण है।" पत्रिका संग्रह योग्य व उपयोगी है।