Saturday, March 31, 2012

साहित्य की अग्रणी पत्रिका ‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: मार्च 2012, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, मूल्य: 20रू(वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakihi.in , वेबसाईट:www.pakhi.in , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनीशियेटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएड़ा 201303 उ.प्र.
पाखी के इस अंक में मुशर्रफ आलम जौकी, विजय तथा निखिल आनंद गिरि की कहानियां सामाजिक धरातल पर रची बुनी गई है। राकेश कुमार सिंह का उपन्यास अंश इस उपन्यास को पढ़ने की इच्छा जाग्रत करता है। ख्यात कथाकार शैलेन्द्र सागर तथा संदीप मील की रचनाएं वर्तमान शताब्दी में हिंदी कथा साहित्य में नया प्रयोग है जिसमें कथा की सरसता के साथ साथ आलेखों के समान बात को बिना लाग लपेट के कहने का नया तरीका है। संजय कुंदन, प्रत्यक्षा, नीलेश रघुवंशी, असलम हसन, रमेश कुमार वर्णवाल, पावस नीर एवं निशांत भारद्वाज की कविताएं अनेक बार पढ़ने योग्य हैं। ओम राज, रवि वर्मन, मृत्यंुजय प्रभाकर एवं ख्यात समीक्षक, आलोचक विजय बहादुर सिंह के आलेख पत्रिका की विविधता दर्शाते हंै। राजीव रंजन गिरि, भारत भारद्वाज के स्थायी स्तंभ तथा डाॅ. रामप्रकाश एवं डाॅ. रश्मि की लघुकथाएं प्रभावित करती है। ख्यात ग़ज़लकार शहरयार को याद करते हुए ज्ञानप्रकाश विवेक, शेखर जोशी, साधना अग्रवाल तथा रूपसिंह चंदेल ने शहरयार की जीवन शैली को जानने समझने का एक अवसर साहित्य के नए पाठकों व लेखकों को दिया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती है।

‘शुभ तारिका’ पत्रिका का नया अंक


पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: मार्च 2012, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 64, मूल्य: 12रू (वार्षिक: 120रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133001 हरियाणा
पत्रिका का समीक्षित अंक व्यंग्य विनोद विशेषांक है। अंक में हास्य व्यंग्य युक्त कुछ अच्छी रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। जगवीर शर्मा, श्लेष चन्द्राकर, हसमुख रामदेपुत्रा, बानों सरताज, नीता श्रीवास्तव, इंदिरा किसलय, प्रदीप शर्मा एवं गुडविन मसीह की लघुकथाओं का प्रकाशन किया गया है। वीणा श्रीवास्तव, अशोक अंजुम, गोपीनाथ पारीक, रामस्नेहीलाल, लालता प्रसाद एवं ऋषिवंश की कविताओं में नवीन समाज के दर्शन होते हैं। पंकज शर्मा को लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत पढ़कर सुखद अनुभूति होती है। दीप्ति मित्तल, सुरेश गर्ग, लोक सेतिया, रमेश चंद्र, गोपाल नारायण आवटे के व्यंग्य व रामगोपाल वर्मा की कहानियां प्रभावित करती है। देवेन्द्र कुमार मिश्रा की विनोदी रचना हास्य व्यंग्य युक्त है। डाॅ. महाराज कृष्ण जैन का हास्य पर लिखा गया आलेख संग्रह योग्य है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व स्थायी स्तंभ भी प्रभावित करते हैं।

Friday, March 30, 2012

साक्षात्कार का मार्च 2012 अंक

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: फरवरी 2012,स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2554782, सम्पर्क: म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल म.प्र.
पत्रिका के इस अंक में अच्छी व संग्रह योग्य रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में गोविंद प्रसाद शर्मा, श्रीधर पराड़कर, लक्ष्मीकांत शर्मा, डाॅ. बलजीत जानी एवं श्रीराम तिवारी के आलेख शुभारंभ सत्र के अंतर्गत प्रकाशित किए गए हैं। साहित्य के वर्तमान एवं भविष्य को लेकर कार्यक्रम के वक्तव्य तथा प्रथम सत्र में प्रो. त्रिभुवन नारायण शुक्ल, मिथिला प्रसाद तिवारी, एस. शेषारत्नम, व्यासमणि त्रिपाठी, शंकर शरण एवं प्रो. एन. सुंदरम के आलेख विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। द्वितीय सत्र में दिए गए वक्तव्यों में क्षमा कौल, प्रो. अरूण होता, नंद किशोर पाण्डे एवं बलजीत जानी के विचार साहित्य के साथ साथ साहित्येत्तर विषयों को भी सामने लाकर अपना मंतव्य प्रस्तुत करते प्रतीत होत हैं। तृतीय सत्र के अंतर्गत प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज, शत्रुध्नप्रसाद, प्रो. नीरजा माधव, प्रो. यतीन्द्र तिवारी, श्री रमेश पतंगे, अभी सुवेदी, कुसुमलता केडिया, कन्हैया सिंह, डाॅ. मोहनलाल एवं प्रो. एन.जी. देवकी के वक्तव्य विशेष हैं। प्रत्येक सत्र में साक्षात्कार के संपादक प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल का योगदान विशेष रहा है जिसके कारण से यह आयोजन सफल हो सका है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती है।

समावर्तन का नया अंक

पत्रिका: समावर्तन, अंक: मार्च 2012, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, आवरण/रेखाचित्र: अक्षय आमेरिया, , पृष्ठ: 64, मूल्य: 25 रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान उज्जैन म.प्र.
समावर्तन ने अल्प समय में साहित्य जगत में विशिष्ठ स्थान प्राप्त किया है। यह अन्य पत्रिकाओं के लिए पे्ररणास्पद है। पत्रिका के समीक्षित अंक में ख्यात साहित्यकार रमेश दत्त दुबे के समग्र व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। उनका आत्मकथ्य, जनसत्ता की टिप्पणियां तथा लेख आदि साहित्य के विद्यार्थियों का ध्यान आकर्षित करते हंै। उषा भटनागर तथा मुकेश वर्मा से उनकी बातचीत साहित्य की वर्तमान दशा व उसकी परिनियति पर गंभीर विमर्श है। दूसरे भाग में ख्यात संस्मरणकार कांतिकुमार जैन जी की साहित्यिक यात्रा का लेखा जोखा है। उनकी तमाम रचनाएं नवीन ही नहीं साहित्य से जुड़े अन्य लेखकों के लिए मार्गदर्शक रही है। साधना अग्रवाल की उनसे बातचीत साहित्य के वर्तमान स्वरूप को कटघरे में खड़ा करती है। धनंजय वर्मा, हसन जमाल, इला भटट, श्रीराम दवे तथा मुकेश वर्मा के आलेख तथा स्तंभ पत्रिका के अन्य अंकों के समान स्तरीय व पठनीय है।

Thursday, March 29, 2012

कनाड़ा से प्रकाशित हिंदी चेतना

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: 53, वर्ष: 2012, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 84, मूल्य: प्रकाशित नहीं, ई मेल: hindichetna@yahoo.ca ,वेबसाईट: http://hindi-chetna.blogspot.com/ , फोन/मोबाईल: (905) 4757165 , सम्पर्क : 6 Larksmere Court, Markham, Ontario, L3R 3R1
कनाड़ा से प्रकाशित हिंदी चेतना ने उत्कृष्ट व सुरूचिपूर्ण रचनाओं का प्रकाशन कर साहित्य जगत में विशिष्ठ पहचान बनाई है। पत्रिका का प्रत्येक अंक साज सज्जा, कलेवर व प्रस्तुतिकरण के दृष्टिकोण से हिंदी प्रेमियों व साहित्य मर्मज्ञों के लिए सहेजकर रखने है। हिंदी चेतना की दूसरी प्रमुख विशेषता इसका इंटरनेट पर पाठकों के लिए मुफ्त उपलब्ध होना है। इसकी वजह से पत्रिका ने दुनिया भर में हिंदी जानने समझने वालों की संख्या के प्रचार प्रसार में अहम योगदान दिया है। पत्रिका का समीक्षित अंक हिंदी साहित्य की भारत से प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं से कहीं से भी कम नहीं है। यह वड़े हर्ष का विषय है कि इसमें किसी मत-मतांतर, विचारधारा, दृष्टिकोण अथवा हस्ती की अपेक्षा रचना की श्रेष्ठता, मौलिकता व समाज पर पड़ने वाले उसके प्रभाव को ध्यान में रखकर प्रकाशित किया जाता है। इस अंक में ख्यात साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज से पत्रिका की संपादक सुधा आंेम ढीगरा की बातचीत विचार योग्य है। एक प्रश्न के उत्तर में उनका कहना है, ‘‘लेकिन एक बात मुझे खटकती है कि कभी कभी प्रवासी श्रेणी में रखकर बहुत से अच्छे रचनाकारों को दरकिनार कर दिया जाता है।’’ यह हिंदी को वैश्विक व स्वीकार्य भाषा बनानें की राह में एक प्रमुख बाधा है। शीघ्र ही हमें जुगाड़धर्म से मुक्ति पा लेना चाहिए अन्यथा हम दुनिया से पिछड़ जाएंगे। शैल अग्रवाल की कहानी ‘‘आम आदमी’’ अपनी पारी आने के इंतजार में पंक्ति में खड़े अंतिम आदमी की कहानी है। यह वही आदमी है जो वर्षो से अपने उत्थान की बाट जोह रहा है। वहीं दूसरी ओर सुमन सारस्वत ‘‘डोंट टेल टू आंद्रे’’ में बहुत कुछ कह देती है, जिसे समझने के लिए दुनिया बेचैन है। गुल्ली डंडा और सियासतदारी’’ में मनोज श्रीवास्तव मनुष्य के बदलाव व इस बदलाव के लिए जिम्मेदार तत्वों की खबर लेते हैं। भावना सक्सेना ‘‘उसका पत्र’’ पढ़कर लगता है अधिक भावुक हो उठीं हैं। रवीन्द्र अग्निहोत्री ने हिबू्र भाषा से प्रेरणा लेने की आवश्यकता पर बल दिया है, अन्यथा हिंदी भाषा व साहित्य को भविष्य में कोई पूछने वाला भी नहीं रहेगा। कहानी संग्रह ‘‘कौन सी जमीन अपनी’’ परन मो. आसिफ व भानु चैहान का शोधपत्र इस संग्रह की बारीक पड़ताल करता दिखाई देता है। देवी नागरानी, नीरज गोस्वामी, राजीव भरोल की ग़ज़लें सिद्ध करती हैं कि हिंदी ग़ज़लें अब पूरी तरह से परिपक्व हो चुकी है, जिनकेे विषय आमजन से जुडे़ हुए हैं। दीपका मशाल की लघुकथा ‘‘जिजीविषा’’, सुमन घई(विवशता) तथा श्याम सुंदर दीप्ति(बूढ़ा रिक्शेवाला) में दैनिक जीवन की कश्मकश तथा आकांक्षा व्यक्त करते हैं। अनीता कपूर, रमेश मित्तल, पूर्णिमा वर्मन, पंकज त्रिवेदी, प्रतिभा सक्सेना, दिपाली सांगवान, जितेन्द्र जौहर, रश्मि प्रभा, स्वर्ण ज्योति, भावना कुंअर तथा हरदीप कौर संधु की कविताएं जीवन की समस्याओं तथा रोजमर्रा के विषयों से जुड़ी हुई कविताएं हैं। इनमें जहां एक ओर भारतीय पंरपरा, संस्कृति व समाज है वहीं दूसरी ओर इस समाज को आकाश के अनंत छोर तक ले जाने का दृढ़ संकल्प भी है। ख्यात कथाकार डाॅ. अचला शर्मा की कहानियों पर विजय शर्मा का आलेख उन्हें और अधिक पढ़ने केे लिए प्रेरित करता है। विजय सती की समीक्षा पुस्तक ‘‘वेयर डू आई बिलांग’’ के उद्देश्यों से अवगत कराती है। रमेश शौनक का काव्यानुवाद तथा नवांकुर अमित लव की रचनाएं स्तरीय हैं। अमिता रानी, राजकुमारी सिन्हा, सुरेन्द्र पाठक, सुधा मिश्रा, प्रेम मलिक, अदिति मजुमदार, राज माहेश्वरी ने बहुत सुंदर ढंग से कविता को अन्य कलाओं से जोड़ने का प्रशंसनीय कार्य किया है। पत्रिका के प्रमुख संपादक श्याम त्रिपाठी की हिंदी के भविष्य के प्रति चिंता आज आम हिंदी प्रेमी की चिंता है। संपादक सुधा ओंम ढीगरा रचनाकारों से आग्रह करती हैं कि वे इंटरनेट अथवा अन्य माध्यमों में अपने प्रकाशित होने की जल्दबाजी में न रहें। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Monday, March 26, 2012

साहित्य सागर और हिंदी साहित्य

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: मार्च 2012, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, , पृष्ठ: 64, मूल्य: 20 15रू.(वार्षिक 240 रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0755.4260116, सम्पर्क: 161 बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल .प्र.
साहित्य सागर के इस अंक में अच्छी व समसामयिक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में अनेक रचनाएं दोहा विधा के साधक जयजयराम आनंद पर एका्रग हैं। आशा सक्सेना, प्रभुदयाल मिश्र, सुरेन्द्र भारद्वाज, शरदनारायण खरे, हर्षवर्धन पाठक की रचनाएं भारतीय समाज को प्रतिबिम्बित करती है। हरिकृष्ण तैलंग, सतीश श्रोत्रिय, एवं साधन वलवटे के व्यंग्यों में अच्छा कटाक्ष निहित है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी उपयोगी व जानकारीपरक है।

Sunday, March 25, 2012

साहित्य परिक्रमा का नया अंक

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जनवरी-मार्च 2012, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मुरारीलाल गुप्त गीतेश, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, , पृष्ठ: 64, मूल्य: 25 15रू.(वार्षिक 60 रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 09425407471, सम्पर्क: राष्ट्रोस्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क ग्वालियर .प्र.
साहित्य की स्थापित पत्रिका साहित्य परिक्रमा के इस अंक में संग्रह योग्य सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में आशुतोष कुमार, श्रीधर पराड़कर, रामेश्वर मिश्र पंकज, शिव कुमार शर्मा, साहेबलाल दशरिए सरल, प्रणव शास्त्री, सरोज गुप्ता एवं सुखबीर आर्य के जानकारीपरक व रोचक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। सुभाषिनी रायजादा की कहानी तथा संजय जनागल की लघुकथाएं प्रभावित करती है। अनुपमणि त्रिपाठी का व्यंग्य, व्यंग्य न होकर सरस निबंध के अधिक समीप है। रमेश चंद्र शाह, गोपीकुमार दास, देवेन्द्र दीपक, उमेश कुमार सिंह, द्वारका लाल गुप्त, रामनारायण त्रिपाठी, श्रीमती मृणालिनी घुले की कविताएं, गीत समसामयिक व आधुनिक समाज का दिशा निर्देशन करने में सहायक हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती है।

शब्दशिल्पियों के आसपास

पत्रिका: शब्दसिल्पियों के आसपास, अंक: मार्च 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, , पृष्ठ: 22, मूल्य: 5 रू.(वार्षिक 60 रू.), मेल: shabdashilpi@yahoo.com ,वेबसाईट: www.dharohar.com , फोन/मोबाईल: 0755.2775129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल .प्र.
समाचार प्रधान पत्रिका के इस अंक में ख्यात ग़ज़लकार शहरयार को याद किया गया है। संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा का राष्ट्रगौरव सम्मान का समाचार जानकारीपरक है। पत्रिका का विचार है कि विद्यासागर नौटियाल बेजोड़ और प्रतिबद्ध कथाकार थे। अलखनंदन के संबंध में आलोक चटर्जी ने लिखा है कि वह खुद उपजा नाटककार था। चर्चा में के अंतर्गत गुम चीज है फेज की आखिरी फिल्मःसलीमा, रश्दी के एक और उपन्यास पर फिल्म, विष्णु प्रभाकर मार्ग, हिंदी विश्वविद्यालय दिनकर के गांव में समाचार प्रकाशित किए गए हैं। ख्यात कथाकार रामदरश मिश्र को व्यास सम्मान, साहित्य अकादमी के अनुवाद पुरस्कार घोषित, ममता तिवारी को मिलेगा माहेश्वरी पुरस्कार, भारतीय कलाओं के लेखक सम्मानित समाचार विशिष्ठ व जानकारीपरक हैं।

हिमप्रस्थ का नया अंक

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणवीर सिंह राणा, आवरण/रेखाचित्र: सर्वजीत सिंह, , पृष्ठ: 64, मूल्य: 5 रू.(वार्षिक 60 रू.), मेल: himprasthahp@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0177.2633145, सम्पर्क: हिं.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला 5
हिमप्रस्थ का समीक्षित अंक साहित्य के साथ साथ समाज से जुड़े अन्य विषयांे की रचनाओं से युक्त है। अंक में सुदर्शन वशिष्ठ, योगेशचंद्र शर्मा, राजीव कुमार, शशि भूषण शलभ, रमाकांत, मनोज शर्मा, अमरीका सिंह, एवं मुख्यमंत्री जी के आलेख रोचक व ज्ञानवर्धक हैं। कहानियों में पद्म भूषण अमिताभ, सरला अग्रवाल, श्याम सिंह सुना ने कुछ नवीन प्रयोग किए हैं जिन्हें पाठक अवश्य पसंद करेंगे। बनवारी लाल वैश्य का ललित निबंध साहित्यिकता के साथ साथ मार्धुय युक्त है। राजेन्द्र परदेसी की लघुकथा मृग तृष्णा अच्छा संदेश देती है, लीला मोदी ने भी लघुकथा विधा की ‘जिम्मेदारी’ कुशलता से निभाई है। श्याम नारायण श्रीवास्तव, प्रभात एवं सत्यनारायण स्नेही की कविताएं पत्रिका का विशिष्ठ भाग है। जसविंदर शर्मा का व्यंग्य निंदक नियरे राखिए प्रभावित करता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी पठनीय है।

साहित्य में सुख़नवर

पत्रिका: सुख़नवर, अंक: जनवरी-फरवरी 2011, स्वरूप: द्वैमासिक, संपादक: अनवारे इस्लाम, आवरण/रेखाचित्र: पारस दासोत, , पृष्ठ: 48, मूल्य: 25 रू.(वार्षिक 170 रू.), मेल:sukhanwar12@gmail.com ,वेबसाईट: www.patrikasukhanwar.blogspot.com , फोन/मोबाईल: 09893663536, सम्पर्क: सी 16, सम्राट कालोनी, अशोका गार्डन, भोपाल 462023 .प्र.
हिंदी व उर्दू ज़बानों के लिए समान रूप से समर्पित पत्रिका सुख़नवर का समीक्षित अंक रचनात्मकता ये युक्त है। अंक में सुरेश पंड़ित, का लेख कितनी रामायण कैसी रामायण अलग ढंग का विचार है। ग़ज़लों में ओमप्रकाश यति, मलिक जादा जावेद, जिया फारूकी, सईद रहमानी, अकबार जबलपुरी, महबूब राही, एस. ए. जैदी, विजय तिवारी, इश्क सुलतानपुरी महावीर सिंह दुखी प्रभावित करते हैं। अल्ताफ़ सीरोज, सुरेन्द्र प्रकाश, पारस दासोत, विजय कुमार सम्पती, निरंजना जैन मंे नवीन दृष्टिकोण व विचारधारा समाहित है। अंक की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती है।

Wednesday, March 21, 2012

स्त्री विषयक पत्रिका नारी अस्मिता

पत्रिका: नारी अस्मिता, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: रचना निगम, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, , पृष्ठ: 44, मूल्य: 15 रू.(वार्षिक 100 रू.), मेल: nari_asmia1994@rediffmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0265.6545817, सम्पर्क: 15, गोयागेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी ब्लाक, द्वितीय तल, एस 3, प्रतापनगर बड़ोदरा, गुजरात
स्त्री विषयक पत्रिका नारी अस्मिता का प्रत्येक अंक नवीनतम रचनाआंे से युक्त होता है। समीक्षित अंक मंे अनेक रचनाएं स्त्री मन की भावनाओं को व्यक्त करती हैं। अंक में सरिता गुप्ता, के.पी. देशमुख, मधु शर्मा, के आलेख समसामयिक विषयों की अच्छी प्रस्तुति कही जा सकती है। ख्यात लेखिक साहित्यकार संतोष श्रीवास्तव से सुमीता केशवा की बातचीत साहित्य के साथ साथ समाज के अन्य महत्वपूर्ण विषयों से जुड़ी हुई है। पुष्पा राव, निरूपमा राय, सुधा अग्रवाल एवं सरिता गुप्ता की कहानियां सरसता से युक्त है। विचार मंच के अंतर्गत रश्मि वाजपेयी की परिचर्चा सायबर क्रायम से युवतियों के कैसे बचाया जाए? में अच्छे तथा लागू किए जाने योग्य विचार सामने आए हैं। अंजु दुआ जैमिनी, गुरप्रीत सिंह, अलका मित्तल की लघुकथाएं प्रभावित करती है। देवेन्द्र विमल, गोंविद पाल, गोविंद चावला सरल, किशन स्वरूप, कंचन लता जायसवाल, सदाराम स्नेही एवं ज्ञानेन्द्र साज की कविताएं, ग़ज़लें समसामयिक हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं एवं लेख आदि भी विचार योग्य हैं।

Sunday, March 18, 2012

राजस्थान से प्रकाशित "संबोधन"

पत्रिका: संबोधन, अंक: अक्टूबर दिसम्बर 2011,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कमर मेवाड़ी, पृष्ठ: 92, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09829161342, सम्पर्क: पो. कांकरोली, जिला राजसमंद 313324 राजस्थान
राजस्थान से प्रकाशित ख्यात त्रैमासिकी संबंोधन के इस अंक में विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में ‘स्त्री का अपना घर नहीं होता(राजेन्द्र यादव), सीमोन और सात्र्र के देश में.... (संतोष श्रीवास्तव), एक सहज सरल व्यक्तित्व(श्याम जागिड़) रचनाएं विचार योग्य व पठनीय हैं। विशिष्ठ कवि के अंतर्गत कुमार मिश्र की कविताएं सरल व सहज ग्रहण योग्य हैं। ज्ञानचंद्र मर्मज्ञ, चांद शेरी, खुर्शीद नबाब की ग़ज़लें नवीन विषयों की अच्छी प्रस्तुति कही जा सकती है। स्वाति तिवारी, प्रफुल्ल प्रभाकर व सिराज फारूकी की कहानियां समसमायिक विषयों पर कथा के माध्यम से विचार करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी साहित्यिकता लिए हुए हैं।

Tuesday, March 13, 2012

‘कथन’ एवं समकालीन हिंदी सिनेमा

पत्रिका: कथन, अंक: जनवरी-मार्च11, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ: 98, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100), मेल: kathanpatrika@hotmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25268341, सम्पर्क: 107, अक्षरा अपार्टमेंटस, -3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली 110063
पत्रिका का समीक्षित अंक समकालीन हिंदी सिनेमा पर आंशिक रूप से एकाग्र विशेषांक है। अंक में सिनेमा पर आधारित परिचर्चा ‘भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय सिनेमा’ में वर्तमान समय में फिल्मों की विविधता, निर्माण, विषय वस्तु, पाश्चात्य संस्कृति तथा व्यावसायिकता को समेटने का प्रयास किया गया है। यद्यपि केवल परिचर्चा के माध्यम से भारतीय सिनेमा की विशेषताओं, कमियों तथा उपलब्धियों को प्रकाश में नहीं लाया जा सकता है लेकिन फिर भी पत्रिका ने इस दिशा में नया कुछ करने का प्रयत्न किया है। वह सराहनीय हं त्रिपुरारी शर्मा, अनवर जमाल, अनुषा रिज़वी, जिया उस सलाम तथा मिहिर पंड्या के विचारों से पाठक सहमत होगें या नहीं यह उनपर छोड़ देना चाहिए।
स्पेनिश कथाकार माक्वेज की कथारचना तथा उनकी कहानी दुनिया का सबसे खुबसूरत डूबा हुआ आदमी पत्रिका का विशेष आकर्षण है। विशेष प्रस्तुति के अंतर्गत फिल्मी गीतों पर आधारित आलेख कविराज कविता के कान अब मत मरोड़ो(राजेश जोशी) में स्वतंत्रता के पश्चात देश की सामाजिक स्थिति तथा संरचना को आधार बनाया गया है। आलेख सवाल मुकम्मल कहानी का(रमेश उपाध्याय) में कहानी की संरचना, बनावट, कथ्य, शिल्प के साथ साथ उसमें निहित कहानीपन पर विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त कहानी वास्तव में कहानी कब, क्यों और कैसे है? इस पर भी विचार किया गया है। कुबेर दत्त व सुभाष कुशवाहा की कहानियां अच्छी व साहित्य के नए पाठकों के लिए उपयोगी है। जवरीमल्ल पारख, उत्पल कुमार के स्तंभ तथा प्रज्ञा एवं प्रभात रंजन की समीक्षाएं प्रभावित करती है।

Thursday, March 8, 2012

मारिशस से प्रकाशित पत्रिका ‘विश्व हिंदी पत्रिका’

पत्रिका: विश्व हिंदी पत्रिका, अंक: जनवरी 2011, स्वरूप: वार्षिक, प्रधान संपादक: श्रीमती पूनम जुनेजा, संपादक: गंगाधर सिंह सुखलाल, पृष्ठ: 152, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: whsmauritius@gmail.com, whsmauritius@intnet.mu, वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 00.230.6761196, सम्पर्क: विश्व हिंदी साचिवालय, स्वीफ्ट लेन, फारेस्ट साइट, मारीशस
समूचे विश्व में हिंदी साहित्य व भाषा के क्षेत्र में मारिशस में प्रशंसनीय कार्य किया जा रहा हैं विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा हिंदी के विकास व उत्थान में किए जा रहे प्रयास प्रत्येक हिंदीभाषी के लिए प्रेरणास्पद कहंे जा सकते हैं। इसी कड़ी में सचिवालय द्वारा प्रति वर्ष वार्षिकी का प्रकाशन किया जाता है। इस वर्ष भी इसे विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। पत्रिका के समीक्षित अंक में विद्वानों के आलेख मार्गदर्शक ही नहीं संग्रह योग्य भी हैं। अंक मंे प्रकाशित आलेखों में हिंदी के प्रति हिंदीभाषियों के कर्तव्य(फादर कामिल बुल्के), अमरीका में हिंदी शिक्षण की लहर(सुरेन्द्र गंभीर), हिंदी के प्राचीनतम व्याकरण की खोज एवं स्वरूप(तेज कृष्ण भाटिया), संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषाएं एवं हिंदी(महावीर शरण जैन), राजभाषा हिंदी आगे बढ़ रही है मगर चुपचाप(हीरालाल बाछोतिया), विश्व की स्वैच्छिक हिंदी सेवाओं का योगदान(कामता कमलेश), मारिशस में हिंदी(अजामिल माताबदल,धनराज शंभु), हिंदी और काशी की नागरी प्रचारणी सभा(राकेश कुमार दुबे), विेदशों में हिंदी शिक्षण(कृष्ण कुमार गोस्वामी) एंव प्रो. रामप्रकाशः न भूतो, न भविष्यति(राज हीरामन) प्रमुख हैं।
सूचना प्रोद्योगिकी एवं विश्व में हिंदी के अंतर्गत बालेंदु्र शर्मा दधीच एवं पूर्णिमा वर्मन के लेख हिदी ब्लागिंग एवं वेव पत्रकारिता से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी से युक्त हैं। विश्व में हिंदी विविध आयाम के अंतर्गत हंगरी में हिंदी(विजया सती), स्पेन में हिंदी और भारतीय सिद्धांतविषयक परिचर्चा(विजयकुमारन), आस्टेªलिया में हिंदी(दिनेश श्रीवास्तव), बेलारूस में मेरी हिंदी..(आलेसिया माकोव्सकाया), अंडमान निकोबार द्वीप समूह में हिंदी(अनिता गांगुली), आस्टेªलिया में हिंदी कथ्य और तथ्य(रवीन्द्र अग्निहोत्री) तथा हिंदी हमारी प्रिय हिंदी(स्नेह ठाकुर) लेख प्रकाशित किए गए हैं। इन आलेखों के माध्यम से विश्व में हिंदी के क्षेत्र में किए जा रहे कार्याो की विस्तृत जानकारी मिलती है। डायस्पोरा साहित्य के इतिहास पर प्रकाशित विशेष आलेखों में साहित्य में प्रवासी हिंदी साहित्य(अर्चना पैल्यूली), दक्षिण अफ्रीका में हिंदी साहित्य(रामभजन सीताराम), फीजी का हिंदी साहित्य(सत्नेश कुमार), अमरीका का साहित्यिक परिदृश्य तथा अमरीका में हिंदी का भविष्य(इला प्रसाद) एवं अमरीका के कथा साहित्य में अमरीकी परिवेश(सुधा ओम ढीगरा) साहित्यकता तथा जानकारी से भरपूर आलेख हैं। पत्रिका का कलेवर, साज सज्जा तथा नयनाभिराम प्रिटिंग प्रभावित करती है।

Wednesday, March 7, 2012

साक्षात्कार का नया अंक

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: फरवरी 2012,स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2554782, सम्पर्क: .प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल
विविध साहित्य के मर्मज्ञ डाॅ. राष्ट्रबंधु से प्रीतिप्रवीण की बातचीत पत्रिका का प्रमुख आकर्षण है। अंक में प्रो. रमेश चंद्र शाह, डाॅ. रमानाथ त्रिपाठी, भुवनेश्वर उपाध्याय, गोपाल गुप्त के आलेख नवीनता लिए हुए हैं। अनवरे इस्लाम की रचना को छोड़कर इस बार की कविताएं विशेष प्रभावित नहीं कर सकी हैं। कहानियों में साधना सान्याल, मीनाक्षी स्वामी एवं नंदकिशोर कुशवाहा ने समकालीन समाज के साथ पूरी तरह से न्याय किया है। प्रभु श्रीवास्तव पीयूष ने संस्कृत के महान रचनाकार अमरूक के शतकों का सुंदर अनुवाद किया है, जिसमें रचना की मौलिकता कहीं से भी प्रभावित नहीं हुई है। नई कलम के अंतर्गत रश्मि गोयल रजनी की कविताएं आस्वस्त करती हैं कि भविष्य में उनका लेखन और भी निखरकर सामने आएगा। पत्रिका की समीक्षाएं, अन्य रचनाएं तथा समाचार आदि भी ध्यान देने योग्य है। पत्रिका का संपादकीय अपने आप में एक विशिष्ट रचना है जिसमें माधवराव सर्पे जी के सृजन को बड़ी शिद्दत के साथ याद किया गया है।