Saturday, February 28, 2009

कथादेश......विविधता का संदेश

पत्रिका-कथादेश, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण, पृष्ठ-98, मूल्य-20रू.,(वार्षिक200रू), संपर्क-सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. सी-52, जेड़-3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110095(भारत)
पत्रिका के इस अंक में पांच कहानियां शामिल हैं। प्रत्येक कहानी अपने आप में अलग पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। जिनमें घुसपैठ(राजेन्द्र राव), तितली को ग्रामर आती है(भवप्रीतानंद) एवं विस्थापित(सुमति सक्सेना लाल) प्रमुख है। आलेखों में ‘पाप और शास्त्रीय कलाएंःतीसरा विकल्प’(शंभुनाथ), ‘हास्य और व्यंग्य’(गौतम सान्याल), ‘असंभव को संभव करती कुछ प्रार्थनाएं’(सुमन केसरी) उल्लेखनीय है। दिवंगत कथाकार लवलीन पर सत्यनारायण तथा एकांत श्रीवास्तव ने संस्मरण लिखे हैं। कविताओं से दलपत चैहान, मुकेश कोरिया तथा अरविंद बेगड़ा प्रभावित करते हैं। रवीन्द्र त्रिपाठी ने ‘वैकल्पिक मीड़िया यानी क्या’ में कुछ अच्छे प्रश्न उठाए हैं। ‘क्या हम अपनी भाषा में कुछ भी लिख सकते हैं’ पत्रिका का एक साधारण आलेख है। जिसमें कुछ भी का आशय स्पष्ट नहीं होता है। अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं, पाठकों के पत्र, साहित्यिक गतिविधियां/ समाचार आदि में कोई नयापन नहीं है। पत्रिका का अपने वर्षो पुराने बंधे बंधाए फार्मूले से हटकर कुछ नया देना चाहिए।

Friday, February 27, 2009

हंस...हिंदी साहित्य की उड़ान (भाग-02)

नोटः निवेदन है कि भाग 01 पहले पढ़ें
विजय शर्मा ने ‘द परफ्यूमःद स्टोरी आॅफ मर्डर’ की व्याख्या भारतीय फिल्म उद्योग के मानदण्ड़ों के आधर पर की है। किंतु कहानी की पृष्ठभूमि भारत न होकर जर्मनी है। इस आधार पर फिल्में देखने केे बाद मन में कुछ प्रश्न उठनेे का सवाल ही पैदा नहीं होता। महावीर राजी का आलेख ‘हुक्म, इन्हीं लोगों ने ले लीन्ही शराफत मेरी’(जिन्हांेने मुझे बिगाड़ा) हंस में प्रकाशित होने वाला मेरा प्रिय स्तंभ है। महावीर राजी ने बचपन से लेकर अब तक के जीवन में आए उतार चढ़ाव का कथात्मक विश्लेषण किया है। उनकी साहित्यिकता को मुकाम पर ले जाने की मुहीन में जिन्होंने साथ दिया है वे लेखक के साथ-साथ पाठक के भी प्रिय हो जाते हैं। शीबा असलम फ़हमी ने विचारणीय तथा झकझोर देने वाले विषय ‘इस्लाम की स्त्रीवादी व्याख्या अभी बाकी है’ को उठाकर बड़े ही जोखिम का कार्य किया है। डाॅ. रोहिणी अग्रवाल ‘नैतिकता के कोलाहल में देह विमर्श की धमक’ आलेख में शीबा असलम फ़हमी की बातों को ही आगे बढ़ाती हुई नारी मुक्ति के संदर्भ में विचार करती हुई दिखाई देती हैं। सेक्स में स्त्री की भूमिका को लेकर जितना कुछ छूट पुरूषों को प्रदान की गई है स्त्री उसका अंश मात्र भी नहीं चाहती। केवल स्त्री, स्त्री है इसलिए डरे? क्या यह उचित है? नैतिकतावादियों को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस अंक में अभय कुमार दुबे(सेकुलर-सांप्रदायिक विमर्श सांसत में), न तेजी बुरी न मंदी अच्छी(मुकेश कुमार), विश्व सिनेमा में स्त्री का नया अवतार(अजित राय) में नया कुछ पढ़ने में नहीं लगा। पुराने हो चुके विषयों को नए अंदाज में उठाना ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ भरने के समान है। श्री भारत भारद्वाज का आलेख, अजय नावरिया साहित अन्य लेखकों की समीक्षाएं तथा डाॅ. रंजना जायसवाल, मुकेश कुमार की कविताएं उत्तर आधुनिक काल के विस्तार के रूप में देखी जा सकती है। पत्रिका का संपादकीय कुछ नए प्रश्न रखकर उनके समाधान सुझाता है। इस बार हिंदी तहरीर को लेकर मेेरे प्रिय लेखक ने अच्छा खासा संस्मरण लिख डाला है। बधाई

हंस...हिंदी साहित्य की उड़ान (भाग-01)

पत्रिका-हंस, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, कार्यकारी संपादक-संजीव, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.,(वार्षिक250रू), संपर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110.002 (भारत)
हंस का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री उपलब्ध कराता है। कथा प्रधान इस अग्रणी मासिक में पांच कहानियां विभिन्न पाठक-वर्ग की जिज्ञासा शांत करती है। बिरादर(सलिल सुधाकर), मौत के लिए एक अपील(सजिद रशीद), चांदनी सी बातें(प्रेमकुमार), चिमनी(शरद उपाध्याय) एवं डर(दलपत चैहान) विचारणीय है। सलिल सुधाकर की कहानी ‘बिरादर’ आज की जाति आधारित राजनीति को बेनकाब करती है। इस राजनीति का उपयोग सत्तालोलुप वर्ग किस ढंग से करता है उसका खुलासा करते हुए कहानी पाठक की सुप्तप्राय संवेदना को झंकृत करती है। दूसरी प्रमुख कहानी ‘चांदनी सी बातें’ में प्रेमकुमार ने बच्चों द्वारा किए जाने वाले बेतुके प्रश्नों को कथानक का आधार बनाया है। वास्तव में ये प्रश्न बेकार दिखाई देते हैं लेकिन हम कभी-कभी उन के उत्तर न देकर किस तरह से व्यवहार करते हैं यह हमारी खोखली मानसिकता का परिचय देता है। ‘चिमनी’ कहानी में धुआं उगल रही चिमनी जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है के बंद हो जाने पर ‘विमला’ खुश होने के बजाए दुखी हो जाती है। उसके परिवार के भरण पोषण का आधार नष्ट होत देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है। कथाकार ने पेट की आग बुझाने के लिए धुआं पीना स्वीकार करने की मजदूरों की पीड़ा को संक्षेप में व्यक्त किया है। कथा को कुछ ओर विस्तार देकर अंत को पर्यावरण पदूषण मुक्त वातावरण बनाने की प्रेरणा देने वाला होना चाहिए था। ‘विमला’ का प्रायश्चित करना वह स्वीकार करता है जिसकी अंतिम परिणति मृत्यु है।

नारी अस्मिता......नारी चेतना के लिए समर्पित

पत्रिका-नारी अस्मिता, अंक-जून-नवम्बर.08, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. रचना निगम, पृष्ठ-48, मूल्य-20रू.,वार्षिक80रू संपर्क-15 गोयागेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी-ब्लाक, द्वितीय तल, एस/3, प्रतापनगर वडोदरा 390.004 (भारत)
नारी चेतना के लिए समर्पित पत्रिका नारी अस्मिता के इस अंक में नौ आलेख सम्मलित किए गए हैं। जिनमें भारतीय संस्कृति और दीपावली(आशीष दलाल), आजादी के आंदोलन में सक्रिय रही नारी(आकांक्षा यादव), अर्धनग्न पहनावों के गलियारों में भोगवाद के खुलते दरवाजे(प्रो. विमला जैन ‘विमल’) प्रमुख हैं। काश!हम भी बेटा होकर जन्म लेते(श्रीमती संतोष यादव) ने नारी मन की पीड़ा को बहुत ही आहत होकर लिखा है। कहानियों में लाल धागा(डाॅ. रानू मुखर्जी) तथा न्याय मंड़ी(सावित्री रांका) बहुत अधिक प्रभाव नहीं छोड़ पायी है। इनका लेखन आज के वर्तमान नारी लेखन की अपेक्षा कमजोर है। कविताओं मंे शबनम शुक्ला तथा जयराम आनंद की रचनाएं प्रभावित करती है। राजेन्द्र प्रसाद तथा ज्योति जैन की लघुकथाएं अच्छी बन पड़ी हैं। पत्रिका का मूल स्वर आक्रमक है, इसे बजाय आक्रमकता के सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए अपने लेखों का स्तर परिवर्तित करना चाहिए। पत्रिका का कलेवर तथा साज-सज्जा आकर्षित करती है।

Wednesday, February 25, 2009

नया ज्ञानोदय--------भारतीय ज्ञानपीठ का साहित्यिक प्रकाशन--1

पत्रिका-नया ज्ञानोदय, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रवीन्द्र कालिया, पृष्ठ-120, मूल्य-25रू.,वार्षिक250रू संपर्क-भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोधी रोड़ नई दिल्ली (भारत)
नया ज्ञानोदय का समीक्षित अंक आंशिक रूप से छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों पर एकाग्र है। अंक में तीन स्मरण ‘मित्र मनजीनः कलाकार मनजीन’(प्रयाग शुक्ल), लवलीन-चक्रवात में फंसी लड़की’(भारत भारद्वाज) एंव ‘हेराॅल्ड़ पिंटरःमंच से प्रस्थान’(विजय शर्मा) गंभीरतापूर्वक उन रचनाकारों का स्मरण कराते हैं। ख्यात चित्रकार ‘मनजीन बावा’ पर केन्द्रित वरिष्ठ कवि प्रयाग शुक्ल का आलेख मनजीन बावा के चित्रण में उनकी अनुभूति तथा प्रकृति से लगाव के साथ-साथ उनकी जीवन शैली पर भी प्रकाश डालता है। पचास वर्ष की अल्पायु में हमारे बीच से विदा हो चुकी लवलीन पर भारत भारद्वाज ने उनकी बोल्डनेस तथा गहन अध्ययन का बारीकी से अवलोकन किया है। विजय शर्मा हेराॅल्ड पिंटर का अवलोकन करते हुए इस रंगमंच से जुडे़ साहित्यकार की स्वभावगत विशेषताओं पर नए सिरे से विचार करते हैं। वरिष्ठ एवं ख्यात संस्मरणकार डाॅ. कांतिकुमार जैन की ‘फन्तासी’ इस अंक की सबसे अधिक पठ्नीय रचना है। वे अपने गहन अनुभव व विश्लेषणात्मक ढंग से अमीर खुसरो सेे लेकर आज तक के इतिहास का अपने अलग अंदाज में अवलोकन करते हैं। जब तक कोई शासन आम जन से सीधे संवाद नहीं करेगा तब तक 26/11 जैसी घटनाएं होती रहेगीं। राजकाज के सफल संचालन के लिए सजग खुफिया तंत्र का होना आज तो और भी जरूरी है। आज की खबरी चेनलें समाचार बनाकर आम जन के बीच न जाने कौन-सा संदेश दे रही हैं यह समझ से परे है। सुधीर सक्सेना छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पर बड़ी सिद्दत के साथ विचार करते हैं। उनके अनुसार इस नगर का प्राचीन वैभव तथा विनम्रता आज न जाने कहां लुप्त हो गई है। जिस रायपुर ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्व दिए वह सीमेंट के जंगले में बदल गया है यह चिंता का विषय है। समीक्षित अंक में कहानी का प्लाट(शिवपूजन सहाय), भगवान जी(हृदयेश), के बोल कान्हा गौआला रे(चन्द्रकिशोर जायसवाल), वह, उसका हीरों हाण्डा और काली बीएमडब्ल्यू(सतीाश जायसवाल), माफ करना कामरेड़(परितोष चक्रवर्ती), नहीं मरेगा आदमी(स्नेह मोहनीश), हार(परदेशी राम वर्मा) तथा जंगलगाथा(लोकबाबू) अच्छे कथानकों वाली कहानियां है। विेशेष रूप से ‘भगवानजी’ आज के समाज की हृदयहीनता तथा मतलबपरस्त दुनिया से रूबरू कराती है। ‘माफ करना कामरेड़’ बाजारवाद के वर्तमान दौर में मजबूरीवश माक्र्सवादी चिंतन पर पुर्नविचार का आग्रह करती है। सतीश जायसवाल की कहानी ‘वह, उसका हीरो हाण्डा और काली बीएमडब्ल्यू’ दो पीढ़ियों के टकराव से उत्पन्न सामाजिक संरचना पर स्पष्टीकरण है। कविताओं में विनोद कुमार शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी, उर्मिला शुक्ला, सीमा सोनी की कविताओं में भी भूमंड़लीकरण को कुछ संकोच के साथ स्वीकारने का स्वर सुनाई देता है। (शेष भाग-02 में)

Monday, February 23, 2009

साहित्य सागर.....ग़ज़ल के सागर में साहित्य के मोती ढूढने का प्रयास

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-फरवरी.09,स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-54, मूल्य-20रू., संपर्क-161, बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र. (भारत)
साहित्य सागर का समीक्षित अंक ग़ज़ल अंक है। इस अंक को श्री सतीश चतुर्वेदी पर एकाग्र किया गया है। ग़ज़ल विधा और इसकी खूबियों पर आलेख प्रमुख रूप से भवेश दिलशाद, डाॅ. महेन्द्र अग्रवाल, डाॅ. बी. जे. गौतम, कमर बरतर द्वारा लिखे गए हैं। इनमें महेन्द्र अग्रवाल का आलेख ‘नई ग़ज़लः लिपि और लहजे का प्रश्न’ आज लिखी जाने वाली तरक्की पसंद ग़ज़लों पर एक अच्छा मुरासला है। महेन्द्र ने बहुत ही अच्छे तरीके से उर्दू लिपि और हिंदी साहित्य में ग़़ज़ल के महत्व को रेखांकित किया है। ‘ग़ज़लायन’ के अंतर्गत कुछ बहुत ही खुबसूरत ग़ज़लें शामिल की गई हैं जिनमें रमेश सोबती, अशोक गीते, देवप्रकाश खन्ना, माणिक वर्मा, चन्द्रसेन विराट, नरेन्द्र दीपक, सतीश श्रोत्रिय एवं विनोद तिवारी प्रभावित करते हैं। इन ग़ज़लों में रदीफ और काफिया का बहुत ही करीने से ख्याल रखा गया है। समीक्षित ग़ज़लें सिर्फ ग़ज़ल के हरफी माइने न होकर समय के सच का इज़हार है। श्री सतीश चतुर्वेदी पर एकाग्र खण्ड़ में सुरेश नीरव, डाॅ. राधावल्लभ आचार्य, डाॅ. प्रेमलता नीलम एवं सरोज ललवानी के आलेख बहुत ही अच्छे बन पड़े हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी स्तरीय व पठनीय है। निरंतर सात वर्ष से साहित्य के सागर से नायाब मोती ढूढने का यह प्रयास सराहनीय है। इसके लिए संपादक बधाई के पात्र हैं।

आसपास....रचनाधर्मियों से संवाद के लिए

पत्रिका-आसपास, अंक-फरवरी.09,स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, मूल्य-5रू.60(वार्षिक), संपर्क-एच.03, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल 462003 (भारत)
‘आसपास’ रचनाधर्मियों की मासिक संवाद पत्रिका है। पत्रिका समाचारों के साथ-साथ साहित्यकारों-रचनाधर्मियों के मध्य सेतु का कार्य कर रही है। उनके सुख-दुख, उपलब्धियों, सम्मानों, पुरस्कारों आदि की जानकारी विस्तार से देती है। समीक्षित अंक में जुगलबंदी के अंतर्गत लंदन निवासी तेजेन्द्र शर्मा के दुष्यंत कुमार संग्रहालय प्रवास पर एक रिपोर्ट प्रमुखता से प्रकाशित की गई है। पुर्नपाठ कार्यक्रम में हरि भटनागर की तीन कहानियों को पाठ का समाचार बहुत ही संक्षिप्त है, जिससे कार्यक्रम की रूपरेखा आदि की जानकारी नहीं मिल सकी। जुगलबंदी के अंतर्गत रिपोर्ट अधिक विस्तारपूर्वक लिखे जाने की आवश्यकता है। समाचारों के अंतर्गत ‘सुविधाओं को लेकर उर्दू अकादेमी में विवाद’, जितेन्द्र करते हैं बे्रल अखबार का संपादन(विभिन्न समाचार पत्रों से साभार लेकर) प्रकाशित किए गए हैं। सम्मान/पुरस्कार के अंतर्गत महत्वपूर्ण समाचार श्री कैलाश चंद्र पंत को साहित्य भूषण सम्मान की रिपोर्ट में उनके कृतित्व पर प्रमुख रूप से प्रकाश डाला गया है। ‘उल्लेखनीय’ खण्ड में संस्कृति सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव द्वारा सुन्दर काण्ड के पुर्नपाठ को सात खण्ड़ों में लेखन का समाचार प्रकाशित किया गया है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। पत्रिका की जानकारियां संक्षेप में किसी ब्लाग या बेवसाइट पर उपलब्ध हो तो शोधरत विद्यार्थियों को बहुत लाभ होगा।

Sunday, February 22, 2009

रंग अभियान......नाटकों पर एकाग्र पत्रिका

पत्रिका-रंग अभियान, अंक-तेरह चैदह,स्वरूप-अनियतकालीन, संपादक-डाॅ. अनिल पतंग, पृष्ठ संख्या-72, मूल्य-20रू., संपर्क-नाट्य विद्यालय, वाघा, बेगूसराय 851.218 (बिहार)
नाट्य विधा पर प्रकाशित होने वाली यह एक महत्वपूर्ण पत्रिका है। समीक्षित अंक प्रख्यात नाटककार एवं नाट्य साहित्य मर्मज्ञ डाॅ. सिद्धनाथ कुमार पर एकाग्र है। अंक में उनके लेखन व्यक्तिगत जीवन तथा सृजन पर विस्तृत चर्चा की गई है। डाॅ. सिद्धनाथ कुमार के दो महत्वपूर्ण आलेख ‘भारत के नाट्य शास्त्र की मूल बातें’ तथा नाटककार और नाट्य निदेशक’ बहुत ही सूक्ष्म ढंग से नाट्य संयोजन, प्रदर्शन व प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ दर्शक की भूमिका पर प्रकाश डालते हैं। डाॅ. नरेन्द्र झा, निर्मल मिलिन्द, सरोज राय, राम निहाल गंुजन, श्रवण कुमार गोस्वामी ने डाॅ. सिद्धनाथ कुमार के नाट्य शिल्प दृष्टि के साथ-साथ उनके सृजन की विशेषताओं पर चर्चा की है। डाॅ. सिद्धनाथ कुमार की दो समसामयिक रचनाएं ‘वे अभी भी क्वांरी है’(रेडियो रूपक) तथा ‘साझे का मकान’(प्रहसन) समाज में व्याप्त समस्याओं को खोज कर उनके हल सुझाने का सफल प्रयास है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी आकर्षित करते हैं।

हिंदी प्रचार वाणी....दक्षिण में हिंदी साहित्य का यज्ञ

पत्रिका--हिंदी प्रचार वाणी, अंक-फरवरी.09,स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादिका-सुश्री बी.एस. शांताबाई, गौरव संपादिका-श्रीमती राधा कृष्णमूर्ति, पृष्ठ संख्या-32, मूल्य-5रू. वार्षिक-60रू., संपर्क-कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति, 178 चैथा मेन रोड़, चामराजपेठ बेंगलूर 560.018 कर्नाटक (भारत)
हिंदी प्रचार वाणी के समीक्षित अंक में रचनाओं को उनके साहित्यिक स्वरूप के अनुसार संजोया गया है। पत्रिका के प्रमुख आलेखांे में मानवतावादी कथाकारः जैनेन्द्र कुमार(डाॅ. सदानंद भोसले), शबरीमलै(अशोक कुमार शेरी), कौन हमारा है(डाॅ. सुरेश मारोतीराव मुळे) दिनकर की अलंकार योजना(डाॅ. मनीष) अन्या से अन्यया बनी प्रभा खेतान(निशा निहान) प्रमुख आलेख हैं। सदानंद भोसले ने अपने आलेख में जैनेन्द्र कुमार के मानवतावादी पहलू का विशेष रूप से उल्लेख किया है। यह एक ऐसा चिंतन है जिसमें समाज हित छिपा हुआ है। बिना मानवतावादी हुए श्रेष्ठ सृजन की कल्पना नहीं की जा सकती। डाॅ. मनीष ने छायावादोत्तर कवि दिनकर की अलंकार योजना पर विश्लेषणात्मक ढंग से प्रकाश डाला है। काव्यात्मक अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने के लिए दिनकर ने जिन अलंकारों का उपयोग किया है वे परंपरागत रूप से भारतीय हैं। प्रभा खेतान की संस्मरणात्मक कृति ‘अन्या से अन्यया तक’ पर निशा रेहान ने गंभीरतापूर्वक विचार किया है। यह संस्मरण प्रभा जी की निर्भीक आत्मस्वीकृति का खुला दस्तावेज है। उनकी अन्य रचनाओं से हटकर यह संस्मरण आम भारतीय स्त्री की मनोदशा भी व्यक्त करता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पाठक को आकर्षित करती है। दक्षिण भारत के बेंगलूर नगर से इस साहित्य यज्ञ में हम सभी को आहूति देना चाहिए।

Saturday, February 21, 2009

कथाबिंब.....‘संस्कृति संरक्षण संस्था’ मुम्बई की पत्रिका

पत्रिका-कथाबिंब, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर,स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. माधव सक्सेना ‘अरविंद’, संपादक-मंजुश्री, पृष्ठ संख्या-56, मूल्य-15रू. वार्षिक-50रू., संपर्क-ए-10, बसेरा आॅफ दिन कारी रोड़, देवनार मुम्बई 400088 महाराष्ट्र (भारत)
website-- www.kathabimb.com , email kathabimb@yahoo.com
पत्रिका के समीक्षित अंक में चार कहानियां माई बाड़ा(सुधीर अग्निहोत्री), मृग-मरीचिका(संतोष श्रीवास्तव), कस्बे में कहर के दिन(डाॅ. विद्याभूषण) एवं बटवारा(कृष्ण कुमार) शामिल हैं। संतोष श्रीवास्तव की कहानी मृग-मरीचिका में एक सामान्य भारतीय परिवार के दर्शन होते हैं जो सुबह से लेकर शाम तक घर में खटता रहता है। कृष्ण सुकुमार की कहानी बंटवारा किसी देश के विभाजन के पश्चात की कहानी न होकर घर परिवार में भाईयों के मध्य बंटवारे के पश्चात की स्थिति को प्रगट करती है। लघुकथाओं में मतदाता(डाॅ. सुरेन्द्र गुप्त), आदमीपन 01 व 02(आलोक कुमार सातपुते) एवं बेवसी(राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी) आधुनिक समाज में आम आदमी की मनोदशा को व्यक्त करने में अच्छी तरह कामयाब हुई है। कविताओं में एक चादर मैली सी(रमेश यादव) एवं सुशांत सुप्रिय की कविताओं एक अच्छी कविता तथा लौट आऊंगा मैं के सिवाय अन्य रचनाएं प्रभावहीन हैं। अन्य स्थायी स्तंभ ‘लेटर बाक्स’, ‘सागर सीपी’, ‘पुस्तक समीक्षाएं’ पत्रिका को पूर्णता प्रदान करते हैं। साफ सुथरी साज-सज्जा वाली यह पत्रिका आकर्षित करती है।

Friday, February 20, 2009

समावर्तन......हिंदी साहित्य को द्विगुणित करने का सफल प्रयास

पत्रिका--समावर्तन, अंकजनवरी--09,स्वरूप--मासिक, प्रधान--संपादक रमेश दवे, संपादक--निरंजन श्रोत्रिय पृष्ठ संख्या--96, मूल्य--15रू.. संपर्क--माधवी, दशहरा मैदान, 129 उज्जैन म.प्र. (भारत)
समावर्तन के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री संग्रहित है। श्री दिनेश ठाकुर पर एकाग्र सामग्री उनके समग्र व्यक्तित्व को अच्छी तरह से प्रस्तुत करती है। उनके रंगकर्म पर वरिष्ठ कवि प्रयाग शुक्ल द्वारा लिखा गया आलेख श्री दिनेश ठाकुर के बहुआयामी व्यक्तित्व को प्रस्तुत करता है। प्रख्यात कवि अज्ञेय जी के चौथा सप्तक पर अवधेश कुमार की भूमिका इस संग्रह की विभिन्न खूबियों को उजागर करती है। नए कविताओं में प्रताप राव कदम, योगेन्द्र कृष्णा, सुदर्शन प्रियदर्शिनी, प्रेमशंकर शुक्ल, अतुल अजनबी ने अपनी अपनी कविताओं को प्रगतिशील विचारधारा से ओतप्रोत होते हुए भी आधुनिक संस्कारों के ताने बानों से बहुत दूर नहीं रखा है। वक्रोक्ति में सूर्यकांत नागर का व्यंग्य ॔नाक का बाल’ एक अच्छी व्यंग्य रचना है। आया अटरिया पे चोर(कैलाश माण्डलेकर) तथा काके लागू पांय(मुकेश जोशी) व्यंग्य के साथसाथ हास्य से भी कुछ हद तक न्याय कर पाए हैं। श्रीराम दवे का व्यंगालेख ॔चलो बसंत! इस बार ऐसे ही सही....।’ बसंत की आधुनिक व्याख्या है। प्रख्यात कथाकार गोविंद मिश्र जी पर एकाग्र रचनाएं प्रभावशील हैं। सरोज कुमार की ॔वह असमंजस में है’ सहित अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं ॔हिसाब’ तथा ॔इतिश्री’ एवं वाणी दवे की लघुकथा ॔मजबूत कंधे’ संक्षेप में बहुत ही विशिष्ट कथानक को स्पष्ट कर पाने में सक्षम रही हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी उपयोगी तथा पठनीय हैं।

Thursday, February 19, 2009

हिमप्रस्थ......साहित्य, संस्कृति, एवं दर्शन की प्रस्तुति

पत्रिका-हिमप्रस्थ,अंक--जनवरी09,स्वरूप-मासिक, संपादकरणजीत सिंह राणा, मूल्य5रू.वार्षिक-50रू. संपर्कहिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला05 (भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में हिमाचल की कला एवं संस्कृति पर केन्द्रित आलेख शामिल किए गए हैं। इनमें हिमाचल के हिंदी उपन्यास में लोक जीवन(डॉ. आशु फुल्ल), हिमाचल के आंदोलन का संगठित रूप(डॉ. हिमेन्द्र वाली ॔हिम’), मलाणा एक साम्राराज्य जो राख हो गया(डॉ. बी.एल. कपूर), स्मृति शेषःसुर्दशन फाकिर(राजेन्द्र राजन), इशिकावा ताकुबोकूः छोटे जीवन का बड़ा कवि प्रमुख है। पत्रिका की तीनों कहानियां पॄने योग्य है इनमें है न बाबा(डॉ. मदन मोहन वर्मा), स्वप्न4(डॉ. मदन चन्द्र भट्ट) तथा पहल(सीताराम गुप्ता) हैं। समीक्षित कहानियां में वर्तमान पी़ी का जीवन दर्शन उकेरा गया है। साधु शर्मा ॔दर्शक’ तथा महेन्द्र सिंह शेखावत की लघुकथाएं एवं जगदीश चन्द्र शर्मा, नरेन्द्र सोनी एवं अरूण कुमार शर्मा की कविताएं भी अच्छी पृष्ठभूमि पर किया गया चिंतन है। व्यंग्य, साक्षात्कार, पुस्तक समीक्षा एवं अन्य स्थायी स्तंभ भी उपयोगी जानकारी देते हैं।

Tuesday, February 17, 2009

सृजनगाथा की समीक्षा शीघ्र ही नेट पर

कथा चक्र के प्रिय पाठकों शीघ्र ही इंटरनेट प र प्रस्तुत की जाएगी । इस समीक्षा पर आपके विचारों से अवश्य ही अवगत कराएं। इस साइट का यूआरएल निम्न है--
समीक्षा पॄने के पूर्व इस साइट पर विजिट करके आप स्वयं जान सकते हैं कि जो विशेषता अथवा कमियां इस समीक्षा में बतलाई गई हैं उनसे आप किस हद तक सहमत हैं।

Monday, February 16, 2009

पंजाबी संस्कृति.......हिंदी साहित्य की धरोहर

पत्रिका-पंजाबी संस्कृति, अंक-जनवरी.मार्च09,स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डॉ. राम आहूजा, मूल्य-20रू.त्रैवार्षिक-200रू. संपर्क-9/20, सी.सी.एच., एच.ए.यू. हिसार 125.001 हरियाणा (भारत)

पंजाबी संस्कृति के समीक्षित अंक में तीन महत्वपूर्ण आलेख ॔वर्तमान परिस्थितियों में’(आचार्य बलदेव राज शांत), ॔संस्कार’(ओम प्रकाश बजाज) तथा ॔सखि! वसंत आया’(कृष्णा कुमारी) समकालीन रचनाएं हैं। कृष्णा कुमारी ने अपने ललित निबंध में निराला के वसंत संबंधी विचार पर उदाहरणों के माध्यम से विचार किया है। कहानी ॔जिहाद’(प्रेमचंद) तथा ॔हिंसा के बच्चे’(जसवंत सिंह विरदी) में आजकल के वातावरण की विवेचना की गई है। लघुकथाओं में उर्मि कृष्ण, प्रो. शामलाल कौशल, डॉ. राम आहूजा, डॉ. रामनिवास मानव के कथ्य में नवीनता है। रेलवे स्टेशनों पर होने वाले सफाई अभियान पर अखिलेश शुक्ल का हास्यात्मक व्यंग्य पाठकों को हंसाते हुए रेलवे की अव्यवस्था से रू-ब-रू कराता है। घमण्डी लाल अग्रवाल, भगवान दास ॔एजाज’, चन्द्रसेन विराट, वीथिका तिवारी, कृष्णा कुमारी, चांद शर्मा, सजीवन मयंक तथा राकेश वत्स की कविताएं, ग़ज़लें तथा दोहे आदि पत्रिका को उत्कृष्ट बनाते हैं। अन्य स्थायी स्तंभ- स्वास्थ्य परिचर्चा, बालकोना एवं प्रेरक प्रसंग हर अंक की तरह नवीनता लिए हुए हैं। हिंदी साहित्य को ॔पंजाबी संस्कृति’ के माध्यम से प्रस्तुत करने वाली यह पत्रिका हिंदी साहित्य की धरोहर है।


Sunday, February 15, 2009

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद् पत्रिका... गंभीर साहित्य की प्रस्तुति

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद् पत्रिका, अंक-जनवरी.09,स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. बि. रामसंजीवैया गौरव संपादक-डाॅ. मनोहर भारती, मूल्य-5रू.वार्षिक-50रू. संपर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद्, 58, वेस्ट आॅॅॅफ कार्ड़ रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560.010 कनार्टक (भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक प्रत्येक अंक की तरह साहित्यिक सामग्री से भरपूर है। इस अंक में राजेन्द्र कुमार बादेल ने गोस्वामी तुलसीदास की आज के संदर्भ में उपयोगिता पर प्रकाश डाला है। आज मनुष्य तनावपूर्ण जीवन से अशांत है जिसे तुलसी साहित्य शांति प्रदान करता है। लेखक के अनुसार उस काल की वर्ण व्यवस्था, शासन व्यवस्था, राजनीतिक दृष्टिकोण आदि अनुकरणीय है जिसका तुलसीदास ने अपनी रचनाओं में विस्तृत रूपस से वर्णन किया है। रूप कमल चैधरी ने ‘तुलसी की शरणागति’ आलेख में बहुत ही सुंदर ढंग से स्पष्ट किया है कि तुलसी साहित्य की शरण में जाने पर मनुष्य हर तरह से शुद्ध हो जाता है। मन वचन तथा कर्म से वह अपना अंतःकरण शुद्ध कर लेता है। भक्ति मार्ग ही एक ऐसा मार्ग है जो संपूर्ण प्राणि जगत का तारणहार है। डाॅ. अमर सिंह वधान ने गणेश शंकर विद्यार्थी पर लिखे अपने आलेख में उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर अच्छा विश्लेषणात्मक आलेख लिखा है। इसरार कुरेशी हिंदी ग़ज़ल एवं दोहे की विकास प्रक्रिया तथा शिल्प को समझाने में पूर्णतः सफल रहे हैं। डाॅ. जसवंत भाई जी पंडया ने प्रणामी संप्रदाय को अपने लेखन का आधार बनाया है। इसके अतिरिक्त ‘भाषाई अखण्डता बनाम कन्नड़’(प्रो. बी. बै ललिताम्बा), ‘कन्नड़ साहित्य’(टी. जी. प्रभाकर प्रेमी) तथा क्रिकेट और आतंकवाद’(हितेश कुमार शर्मा) भी पठ्नीय आलेख है। पत्रिका का व्यंग्य ‘विश्वस्त है विश्वासघाती’(अरविंद मिश्र) अधिक प्रभावित नहीं कर पाया है। देवेन्द्र कुमार मिश्र की कहानी साहित अन्य रचनाएं, कविताएं व ग़ज़ल गीत भी अच्छे लगते हैं। सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह है कि दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका गंभीर हिंदी साहित्य प्रस्तुत कर रही है जिसके लिए इसकी प्रशंसा की जाना चाहिए।

Friday, February 13, 2009

प्रयास....गीत, ग़ज़ल का सार्थक प्रयास

त्रिका-प्रयास, अंक-49,स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-अशोक अंजुम एवं शंकर प्रसाद करगेती,मूल्य-15रू।वार्षिक-50रू। संपर्क-ट्रक गेट, कासिमपुर अलीगढ़202127 .प्र. (भारत)

ूलतः ग़ज़ल एवं गीत प्रधान यह लघु पत्रिका .प्र. के कासिमपुर से प्रकाशित होती है। समीक्षित अंक में ग़ज़लें शीर्षक के अंतर्गत सूर्यभानु गुप्त, रमेश सिद्धार्थ, विकास, पूनम कौसर, राजेश असीर, रमेश नीलकमल, गोंविद कुमार सिंह एवं केशव शरण की ग़ज़लें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। इन्हें नई ग़ज़ल की संज्ञा दी जा सकती है। दोहे खण्ड़ में अनमोल शुक्ल, प्रदीप दुबे तथा दादा कानपुरी इस विधा के साथ न्याय कर पाए हैं। वेकल उत्साही, निर्मल शुक्ल, महाश्वेता चतुर्वेदी तथा श्रीकांत प्रसाद सिंह के गीत कुछ अच्छे लगे। हाइकू विधा की रचनाएं उतनी अधिक प्रभावित नहीं कर पाती हैं। रूबाईयां तथा मुक्त छंद आजकल की अप्रभावशाली विधाएं हैं जिनपर रचनाकारों तथा आलोचकों का ध्यान कम ही जाता है। लघु कलेवर की इस पत्रिका का प्रयास सराहनीय है साथ ही अल्प साधनों में प्रकाशन की प्रशंसा की जानी चाहिए।



सृजन की आंच...हिंदी साहित्य के लिए

पत्रिका-सृजन की आंच, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर।08,स्वरूप-द्वैमासिक, संपादक-डाॅ. माया सिंह, मूल्य-20रू.वार्षिक-180रू. संपर्क-21,22 शुभालय विला, बरखेड़ा, भेल, भोपाल म.प्र. (भारत)
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित होने वाली नव पत्रिका ‘सृजन की आंच’ का यह दूसरा ही अंक है। इसमें हिंदी के जाने मान आलोचक-विचारक डाॅ. रामविलास शर्मा का आलेख ‘भाषा विज्ञानः अंध विश्वास एवं रूढ़िवाद’ (भारतीय साहित्य की भूमिका से साभार) प्रकाशित किया गया है। यह आलेख भाषा विज्ञान की व्याख्या विश्व की अन्य भाषाओं में निहित ध्वनियों तथा उनकी रचना शैली पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालता है। ‘संत साहित्य की उपादेयता पर डाॅ. राधा वल्लभ शर्मा ने अपने आलेख में सुंदर ढंग से स्पष्ट किया है कि हमारे संत किसी भाषा, संप्रदाय अथवा बोली वाणी के समर्थक न होकर समाज के विकास के लिए कृतसंकल्पित थे। डाॅ. पवन मिश्रा ने ‘भारतीय चिंतन परंपरा में शक्ति की उपासना’ आलेख मंे जनजातिय एवं दलित समाज के देवी देवताओं पर कुछ भी नहीं लिखा है जिसकी वजह से यह आलेख कुछ अधूरा-सा लगता है। नारायण चंद्र भावे, अंशुमान सिंह, कुवेर नाथ राय के आलेख कुछ नया दे सके है इसलिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। कविताएं, कहानियां तथा साहित्य की अन्य विधाओं पर इस पत्रिका में अधिक सामग्री न होते हुए भी पत्रिका प्रकाशन के प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए।

Wednesday, February 11, 2009

शब्द....साहित्य के लिए

पत्रिका-शब्द, अंक-अक्टूबर.08, स्वरूप-मासिक, संपादक-आर.सी. यादव, मूल्य-100रू.वार्षिकसंपर्क-सी-1104, इंदिरा नगर, लखनऊ, उ.प्र.(भारत)
लघुपत्रिका ॔शब्द’ दस वर्ष से निरंतर प्रकाशित हो रही है। पत्रिका के समीक्षित अंक में छः आलेख प्रकाशित किए गए हैं। इनमें ॔गॉधी जी की आखिरी वसीयत’(कन्हैयालाल मित्र ॔प्रभाकर’), तनाव(मुनमुन प्रसाद श्रीवास्तव), भगवती चरण वर्मा(राकेश शुक्ल) प्रमुख है। पत्रिका में दो अन्य रचनाएं ॔पिटाई के असीमित आनंद’.(अखिलेश शुक्ल-व्यंग्य तथा ॔ईश्वर की शरारत’(आर.सी.यादव) अपने तरह की विशिष्टि रचनाएं हैं। कविताओं में संत कुमार टण्डन, पुष्पा रघु, आकांक्षा यादव, पूनम कौसर की कविताएं नई कविता की राह पर दिखाई देती है। 32 पृष्ठ की यह पत्रिका ऋुटि विहीन मुद्रण तथा कुशल संपादन से युक्त है।

Tuesday, February 10, 2009

इस माह की समीक्षा........कथा चक्र के ब्लाग पर

प्रिय पाठकों आप एक माह से साहित्यिक पत्रिकाओं की समीक्षा पॄ रहे हैं। इनपर आपकी प्रतिकि्रयाओं का इंतजार है। इस माह में प्रकाशित होने वाली कुछ पत्रिकाओं की समीक्षा में निम्न लिखित हैं--- समकालीन भारतीय साहित्य , परती पलार, शब्द, कथा शक्ति , पंजाबी संस्कृति, हंस, वागर्थ ,नया ज्ञानोदय एवं अन्य छोटी बड़ी साहित्यिक पत्रिकाएं।

Monday, February 9, 2009

साक्षात्कार......साहित्यिकता से परिपूर्ण पत्रिका

पत्रिका-साक्षात्कार, अंक-नवम्बर.08, स्वरूप-मासिक, सलाहकार-मनोज श्रीवास्तव एवं पवन श्रीवास्तव, प्रधान संपादक-देवेन्द्र दीपक, संपादक-हरिभटनागर, मूल्य-15रू.वार्षिक-150रू. संपर्क-साहित्य अकादेमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाण गंगा भोपाल-3 (भारत)
साफ सुथरी सादगीपूर्ण साज-सज्जा से युक्त साक्षात्कार का नवम्बर 08 अंक विविधतापूर्ण साहित्यिक रचनाओं से परिपूर्ण है। इस अंक में ओम भारती, कुमार सुरेश एवं ब्रज श्रीवास्तव की कविताएं शामिल की गई हैं। एक ओर जहां ओम भारती की कविताएं ‘शाम’, ‘किसी सड़क पर’, ‘कहां है वह बीज’ प्रगतिशीलता का उद्घोष करती हैं वहीं दूसरी ओर कुमार सुरेश की लम्बी कविता ‘समयातीत पूर्ण’ तथा ‘इस मुश्किल का अहसास भी’(ब्रज श्रीवास्तव) बाज़ारवाद से बचते हुए हमारी विरासत को बचाने के लिए आग्रह करती दिखाई देती है। मोहन सगोरिया की सभी कविताओं में से ‘ध्वंस के आसपास ही’ कविता आम आदमी को तमाम समस्याओं के रहते हुए भी जीवन जीने का संदेश देती है। गीत ग़ज़लांे में श्याम सुंदर दुबे, जगदीश श्रीवास्तव, के गीत नवगीत से भी आगे अभिनव गीत की ओर ले जाते हैं। श्याम लाल शमी तथा मधु शुक्ला के गीतों का स्वर आज की आपाधापी युक्त जिंदगी में पेड़ की घनी छाया तले बैठ कर कुछ देर सुस्ताने का अहसास कराता है। से. रा. यात्री एवं ए. असफल की कहानियों में नएपन का अहसास होता है। विशेष रूप से ए. असफल ब्लैक होल’ कहानी में प्रगतिशीलता के रूटीन से हटकर कुछ नया सृजित करते हुए दिखाई देते हैं। शोभना वाजपेयी मारू की कहानी ‘बाई साहब’ में कथाकार ने शासकीय मशीनरी में खटते घुटते हुए आम आदमी की समस्यों की तरफ संकेत किया है। हमेशा की तरह अमृतलाल वेगड़ नर्मदा के जल से सुधी पाठकों की प्यास बुझाते लगते हैं। सीतेश आलोक के उपन्यास अंश से ‘ विषय वस्तु पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी है। पत्रिका का समीक्षा खण्ड एवं पाठक मंच हमेशा की तरह उपयोगी पठ्नीय सामग्री संजोए हुए हैं।

Sunday, February 8, 2009

नवोदित स्वर......साप्ताहिक साहित्यिक समाचार पत्र

पत्रिका-नवोदित स्वर, अंक-2 फरवरी.09, स्वरूप-साप्ताहिक, प्रधान संपादक-श्रीमती रश्मि आलोक, संपादक-दीप्ति द्विवेदी, मूल्य-1रू.वार्षिक-50रू. संपर्क-वासन्तम् 42, इन्दर रोड़, देहरादून उत्तरांचल (भारत)
भारत के प्रमुख शहर देहरादून से प्रकाशित होने वाला यह प्रमुख साहित्यिक समाचार पत्र है। पत्र में साहित्यिक समाचार, पुरस्कार, उपलब्धियां, सम्मान समाचार आदि प्रकाशित किए जाते हैं। पत्र में डाॅ. हरिनारायण दीक्षित (प्रोफेसर एवं अध्यक्ष संस्कृत विभाग कुमांऊ विश्वविद्यालय, नैनीताल) को उनकी कालजयी कृति ‘राधाचरितम्’ को प्राप्त हुए के.के. बिरला फाउंडेशन पुरस्कार का समाचार प्रमुखता से मुखपृष्ठ पर प्रकाशित किया गया है। दूसरे समाचार मंे ज्ञानपीठ पुरस्कार से विभूषित हिंदी कविता के शलाका पुरूष कुॅवर नारायण का समाचार है जिसकी रिपोर्टिग हरिप्रसाद दुबे न की है। अपने उद्बोधन ने उन्होंने कहा कि मैं साहित्य में पैसा कमाने के लिए नहीं आया था। कुॅवर नारायण नई कविता के प्रवर्तक कवि हैं। हिंदी कविता में उनका अवदान उच्च रहा है ऐसे कवि को यह पुरस्कार मिलना उस संस्था के लिए गौरव का विषय है जिसने यह पुरस्कार प्रदान किया है। मणिनाथ में हुए कवि सम्मेलन ‘एक शामः शहीदों के नाम’ पर विस्तृत रिपोर्ट सुभाष चन्द्र यादव ने बरेली से भेजी है। नवोदित स्वर के अनुसार यह कार्यक्रम पूरे देश में सराहा गया है। डाॅ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी ने ‘कालिदास के प्रेम पत्र’ नाम से जो आलेख पत्रिका के लिए लिखा है वह आधुनिकता की अपने एक अलग तरह की व्याख्या है। ‘एक विचारक के बहु-वचन’ में सुरेन्द्र वर्मा ने ‘चेतना के द्वार’(कविता संग्रह, कवि रमेश कुमार त्रिपाठी) जापानी विधा हाइकू से अलग हटकर विधा द्विपदी माना है। जिसके माध्यम से कम शब्दों में बहुत कुछ कहा जा सकता है। बद्रीनारायण तिवारी ने ‘आखिर हिंदी बोलने में शर्म कैसीः मार्क टुली’ आलेख में भारत को छोड़कर हिंदी साहित्य एवं भाषा के क्षेत्र में किए जा रहे कार्य की सराहना की है। यह हमारे लिए दुर्भाग्य है कि देश की अधिकांश जनता अंग्रेजी नहीं जानती फिर भी दवाईयों के नाम, रेलवे स्टेशन, प्रमुख शासकीय विभाग हिंदी से अनावश्यक दूरी बनाए हुए है। जब बहुराष्ट्रीय कम्पनीयां ‘ठंड़ा मतलब.......’ एवं ’लाईफ झिंगालाला’ से ख्याति, धन अर्जित कर सकती है तो फिर हम क्यों उससे परहेज कर रहे हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि यह साप्ताहिक समाचार पत्र केवल साहित्यिक समाचार ही प्रकाशित कर रहा है। रू. 50 में वर्ष भर के प्रमुख साहित्यिक समाचार प्राप्त करना बुरा तो हरगिज नहीं है।

Saturday, February 7, 2009

शुभ तारिका.....कहानी विशेषांक

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-जनवरी09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण मूल्य-12रू.वार्षिक-120रू. संपर्क-कृष्ण दीप ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133.001 हरियाणा (भारत)
प्रख्यात मासिक पत्रिका शुभ तारिका का जनवरी 09 अंक कहानी विधा पर एकाग्र है। अंक में 15 कहानियां शामिल की गई है। प्रत्येक कहानी अपने कथ्य व शिल्प में अलग है। इनमें इंदिरा किसलय(वो जरूर लौटेगा), नीलिमा टिक्कू(आज का सच), सदाशिव कौतुक(खुदा हाफिज), अखिलेश शुक्ल(मास्साब का मोबाईल) तथा देवेन्द्र कुमार मिश्र(पागल पत्नी) प्रमुख है। प्रायः सभी कहानियां वर्तमान समय व समाज की समस्याओं को उठाकर उनके समाधान खोजने का आग्रह करती दिखाई देती है। पत्रिका की सबसे उपयोगी व संग्रह योग्य रचना डाॅ. महाराज कृष्ण जैन का आलेख कहानी का कला पक्ष है। हांलाकि आज की कहानियां भाव प्रधान है लेकिन कलात्मकता का अपना महत्व है। जब लेखक स्वयं कहानी की गहराईयों में उतरता है तब ही वह कला के साथ न्याय कर पाता है। वंशीलाल शर्मा, नलिनीकांत, पंकज शर्मा, सूर्य भानु गुप्त तथा ऋषिवंश अपनी कविताओं से प्रभावित करते हैं। प्रत्येक अंक की तरह यह भी संग्रह योग्य पठनीय अंक है।

Friday, February 6, 2009

हंस.....रचनाओं का अनूठापन (द्वितीय भाग)

(अधिक जानकारी के लिए प्रथम भाग का अवलोकन करें)
हंस मूलतः कथा प्रधान पत्रिका है। इसके संस्थापक प्रेमचंद हैं। चंूकि वे स्वयं एक प्रगतिशील कथाकार हैं इसलिए वर्तमान संपादक श्री राजेन्द्र यादव ने इसके मूल स्वर में बिलकुल भी परिवर्तन नहीं किया है।
समीक्षित अंक की प्रमुख कहानियों में से एक ‘पेड़ लगाकर फल खाने का वक्त नहीं’ (सुभाष चन्द्र कुशवाहा) एक ऐसी कहानी है जेा वर्तमान राजनीतिक अवसरवाद की तह तक जाती है। कहानी का पात्र ‘संतराम’ अपने सहयोगियों को माध्यम बनाकर मंत्री पद तक पहंुचता है। लेकिन उस पद पर जाते ही अपने कठिन दिनों में काम में आने वाले मित्रों को भुला देता है। वह अपनी प्रेमिका के माध्यम से अनजान लोगों के ऊल-जलूल काम करके धन संग्रह करता है। जिन लोगों ने उसे साथ दिया था वे केवल आश्वासनांे के सहारे ही डूबते उतराते हैं। यही आज के समय का राजनीतिक चरित्र है जो हमें विश्व में नीचा देखने के लिए बाध्य करता है।
रमणिका गुप्ता ने ‘ओह ये नीली आंखें’ कहानी का तानाबाना कुछ इस तरह बुना है कि वह पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कहानी पुरूष की मनोवृति को उजागर करने में पूरी तरह कामयाब रही है। पति के साथ यात्रा करते समय नीली आंखों वाले सहयात्री का पत्नि के शरीर को पाने की इच्छा रखना तथा उस इच्छा को स्त्री पात्र के माध्यम से व्यक्त करना कहानी की एक अन्य खूबी है। रमणिका गुप्ता ने लिखा है, ‘एक स्त्री आजाद मुक्त स्वतंत्र और - बस, एक मनुष्य एक जीवंत जिंदगी जो जिंदा रहती है, जो न मृत्यु से जाती है न समाज से।’ आज के समाज का सच है।
सोहन शर्मा की कहानी ‘वो आखिरी बार सैन फ्रांसिस्को में देखी गई थी’ भी महिला पात्र ‘प्रिया’ के आसपास बुनी गई है। एन.आर.आई. पति को पसंद करने वाली प्रिया जब अमरीका जाती है तो अपने पति का जन्म जन्मांतर तक साथ निभाने की सौगंध खाती है। लेकिन वहां की चकाचैध देखकर विस्मित रह जाती है। यकायक उसे अपने कैरियर की चिंता हो आती है। जिस पुरूष को उसने कभी देखा तक नहीं था उसके कहने पर वह विवाह का प्रस्ताव ठुकरा देती है। उसके पश्चात सभ्य कहलाने वाले समाज द्वारा उसे लूटा और ठगा जाता है। अति महत्वाकांक्षी स्त्रीयों के लिए यह कहानी एक सबक है। इस अंक की अनूठी विविधतापूर्ण कहानियों के लिए संपादक को साधुवाद दिया जाना चाहिए।

Thursday, February 5, 2009

व्यंग्य यात्रा...हिंदी व्यंग्य पर एकमात्र पत्रिका

पत्रिका-व्यंग्य यात्रा, अंक-जुलाई-सितम्बर08, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. प्रेम जनमेजय, मूल्य-20रू. संपर्क-73, साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार नई दिल्ली 110063 (भारत)
हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा पर यह एकमात्र पत्रिका है। समीक्षित अंक में पाथेय के अंतर्गत हरिशंकर परसाई जी(ख्यात व्यंग्यकार) पर कांति कुमार जैन ने विचार किया है। दूसरा आलेख हरीश नवल का है। दोनों ही आलेखों में परसाई जी के सादगीपूर्ण जीवन तथा रहन सहन का रोचक विवरण है। त्रिकोणीय के अंतर्गत हिंदी व्यंग्य साहित्य के इतिहास तथा उसके परिवेश की पड़ताल की गई है। प्रमुखतः एक चुनौती के आमने सामने(पे्रम जनमेजय), कहानी हिंदी व्यंग्य के इतिहास की(सुभाष चन्दर), व्यंग्य के धर्म और मर्म की पड़ताल(राजेन्द्र सहगल) उल्लेखनीय रचनाएं हैं। पत्रिका में व्यंग्य विधा की सभी रचनाएं समसामयिक विद्रूपताओं पर प्रहार करती दिखाई पड़ती है। रामशरण जोशी, श्याम सुंदर घोष, कैलाश मण्डलेकर, रमेश सेनी, हरदर्शन सहगल के व्यंग्य अच्छे बन पड़े हैं। यह प्रश्न विचारणीय है कि आखिर क्योंकर संपादक ने व्यंग्य के नाम पर कुछ अनावश्यक रचनाओं को पत्रिका में स्थान दिया है। जबकि देश भर में कई अच्छे व्यंग्यकार हैं। रोमेश जोशी की रचना ‘माचिस कैसे जलाएं’, आशा रावत का व्यंग्य ‘हंसो हंसो मगर’ किसी भी दृष्टिकोण से व्यंग्य नहीं है। व्यंग्य कविता लेखन तो और भी श्रमसाध्य कार्य है। पत्रिका में राधेश्याम तिवारी, केवल गोस्वामी, ब्र्रजेश कानूनगो, आकर्षित करते हैं। शेष रचनाएं निरर्थक तथा व्यंग्य के नाम पर अनावश्यक प्रलाप प्रतीत होती है। संपादक के लिए यह उचित होगा कि रचना चयन में निष्पक्षता बरते भले ही पत्रिका मंे कुछ कम पृष्ठ हों, आकार छोटा हो, पर पत्रिका का स्वरूप काम्पेक्ट हो। हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा पर एकमात्र पत्रिका होने के कारण इस रचना चयन की गुणवत्ता सुधारने की आकांक्षा के साथ स्वीकार किया जा सकता है।

Wednesday, February 4, 2009

रचनाकार........वेब पर उपलब्ध शानदार साहित्यिक पत्रिका

पत्रिका-रचनाकार (वेब पत्रिका), संपादक-रवि रतलामी, एफ-2-आर, प्रोफ्रेसर कालोनी, भोपाल मध्य प्रदेश

URL http://rachanakar.blogspot.com/ ईमेल rachanakar@gmail.com

भोपाल मध्य प्रदेश से वेब पर प्रकाशित यह एक बहुत ही उपयोगी तथा पठनीय पत्रिका है। इसके संपादक रवि रतलामी ने इसे ब्लागस्पाट पर एक ब्लोग के रूप में संजोया है। पत्रिका में साहित्य की लगभग सभी विधाओं पर केके न्द्रि त रचनाओं को शामिल किया गया है। पत्रिका रचनाओं के प्रकाशन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करती केवल रचना की गुणवत्ता ही प्रकाशन के लिए आधार है। अभी इस पर कुमारेन्द्र सिंह सेंगर का आलेख बुन्देलखण्डी लोक कलाएं एक सुंदर ब्लाग प्रस्तुति के रूप में है। पाठक अपनी रूचि मे अनुसार रचना का आनंद उठा सकता है। तो फिर देर किस बात की है यदि आप भी साहित्यिक रूचि रखते हैं तो भेज दीजिए ईमेंल अटेचमेंट के रूप में अपनी साहित्यिक रचनाएं । यह ध्यान अवश्य रखें की रचना कृतिदेव, डेवलिस, श्रीलिपि, शुषा, वेबदुनिया, जिस्ट-आईएसएम, लीप या किसी भी अन्य फ़ॉन्ट में पेजमेकर या एमएस वर्ड फ़ाइल के रूप में अपनी रचना ई-मेल के जरिए rachanakar@gmail.com .के पते पर भेजें. . आप अपनी रचनाओं के सस्वर ऑडियो/वीडियो पाठ की सीडी भी प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं

Tuesday, February 3, 2009

हिंदुस्तानी जबान....एक सुंदर प्रस्तुति

पत्रिका-हिंदुस्तानी जबान, अंक-जन।-मार्च09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपा- डॉक्टर सुशीला गुप्ता, मूल्य-10 रू। संपर्क-महात्मा गाॅधी मेमोरियन रिसर्च सेन्टर एवं लाइब्रेरी, महात्मा गाॅधी बिल्ंिडग, 7 नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई 400.002 (भारत)
महात्मा गाॅधी मेमोरियल रिसर्च सेन्टर द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका का प्रथम आलेख ‘अक्षर से अर्थ तक की यात्रा’ डाॅ. खेमसिंह डहेरिया ने लिखा है। लेखक ने ख्यात कथाकार-उपन्यासकार अमृता प्रीतम जी के रचनाकर्म को लेखन का आधार बनाया है। अमृता जी के साहित्य में मानव जीवन तथा समाज के उन प्रश्नों के उत्तर निहित हैं जिनपर अभी तक पाठकों का ध्यान नहीं गया है। डाॅ. रमा सिंह ने अब्दुर्रहीम खानखाना के जीवन परिवेश तथा साहित्यिक उपलब्धियों पर सुंदर ढंग से प्रकाश डाला है। नए कवियों की सांस्कृतिकता आलेख में डाॅ. घनश्याम सिंह को और भी अधिक विस्तारपूर्वक विश्लेषण करना चाहिए था। डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने पर्यावरण और इसके प्रदूषण के विविध आयाम’ निबंध में पर्यावरण की व्याख्या करते हुए उसके आयामों को विश्लेषणात्मक ढंग से व्यक्त किया है। डाॅ. अशोक वातुलकर, के.जी. बालकृष्ण पिल्ले ने गाॅधीवादी विचारधारा की वर्तमान संदर्भ में उपयोगिता पर नए तरीके से विचार किया है। डाॅ. अमर सिंह वधान ने मुम्बई के 26.11 को हुए आतंकवादी हमले को इतिहास के चश्मे से देखने का अच्छा प्रयास किया है। पत्रिका के अन्य अंकों के समान यह भी एक अच्छी प्रस्तुति है।

Monday, February 2, 2009

पुष्पक.....हिंदी साहित्य की उड़ान

पत्रिका-पुष्पक, अंक-09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ। अहिल्या मिश्र, वार्षिक-150 रू., संपर्क-93/सी राजसदन, वेंगलरावनगर, हैदराबाद 500.038 सी-07
कादम्बिनी क्लब हैदराबाद द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका साहित्यिक रचनाओं का अत्यधिक सुंदर संचयन है। पत्रिका में साहित्य की सभी विधाओं को स्थान दिया गया है। कहानियांे में डाॅ. अहिल्या मिश्र(टेमी पवैयन), गोवर्धन यादव(घोसले अपने अपने आसमान अपने अपने), विशेष प्रभावित करते हैं। लघुकथाओं में पवित्रा अग्रवाल(स्टेटस) तथा विनोदिनी गोयनका की शांताक्लाज अच्छी रचनाएं हैं। ग़ज़लों में देवी नागरानी, राजेन्द्र बहादुर सिंह कविताओं में डाॅ. मलखान सिंह, अरूण कुमार भट्ट, उषा शर्मा की रचनाएं समसामयिक रचनाएं कही जा सकती है। गोरखनाथ तिवारी, स्नेहलता प्रसाद तथा सतीश चतुर्वेदी के आलेख तथा निबंध विधागत विशेषताओं को बिम्बित करते हैं। आकर्षक आवरण युक्त यह लघु पत्रिका नव-साहित्यकारों के लिए अनुकरणीय है।

Sunday, February 1, 2009

रवीन्द्र ज्योति.....प्रमुख साहित्यिक समाचार पत्र

पत्रिका-रवीन्द्र ज्योति, अंक-जनवरी 09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डॉक्टर केवल कृष्ण ‘पाठक’, मूल्य-2रू. वार्षिक-24रू., संपर्क-343/19, आनंद निवास गीता कालोनी, जीन्द, 126.120 (हरियाणा) भारत
हरियाणा के जीन्द से विगत 38 वर्ष से निरंतर प्रकाशित होने वाला साहित्यिक समाचार पत्र रवीन्द्र ज्योति अपने आप में अनूठा आयोजन है। साहित्यिक समाचार, चिंतन, विचार दृष्टि, पत्र-पत्रिकाओं की जानकारी आदि इसमें समय-समय पर प्रकाशित की जाती है। इस अंक में समाज और साहित्य से संबंधित आलेख प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। इस आलेख को श्याम सुन्दर दास ने लिखा है। सम्मान स्तंभ के अंतर्गत राजेन्द्र परदेसी, कमर मेवाड़ी, सुनील कुमार चैहान, गोपाल कौशल, हसमुख रामदेपुत्रा, डाॅ. तारा सिंह सहित अन्य रचनाकारांे के सम्मान के समाचार है। यह साहित्यिक समाचार पत्र संक्षेप में देश भर की साहित्यिक गतिविधियों को अपने आप में समेटता है।