पत्रिका:  परिकथा, अंक: जुलाई-अगस्त2021, स्वरूप: मासिक, संपादक: श्री शंकर, आवरण/रेखाचित्र: बंशीलाल परमार, जयंत एवं लोकेश, पृष्ठ:96, मूल्य: 50 रूपये, वार्षिक मूल्य: 450 रूपयें, ई मेल : parikatha.hindi@gmail.com फोन/मोबाइल: 0129-4116726, वेबसाइट: not given , सम्पर्क: परिकथा, 96, बेसमेंट, फेज 3, इरोज गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली 110044 भारत

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मित्रों, परिकथा कथा प्रधान पत्रिका है। इसमें अन्य साहित्यिक सामग्री भी प्रमुखता से प्रकाशित होती है। इस पत्रिका का स्वरूप बहुत कुछ हंस पत्रिका के समान है। आइये शुरू करते हैं, पत्रिका परिकथा की समीक्षा -

संपादकीय 

परिकथा के संपादकीय का शीर्षक मिट्टी की आवाजें दिया गया है। जुलाई में प्रत्येक वर्ष की तरह पत्रिका ख्यात कथाकार, उपन्यासकार प्रेमचंद को याद करती है। इस अंक में भी उन्हें याद किया गया है। लेकिन इस बार दृष्टिकोण कुछ बदला हुआ है। लेख में प्रेमचंद की याद वर्तमान कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन के संदर्भ में की गई है। 

संपादक के अनुसार लोकतंत्र में किसी समूह के लिये यह उम्मीद करना एवं मांग करना न्यायोचित है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि कुछ समय कानून को लागू होने दिया जाये। उसके पश्चात जो भी कमी हो उसे बाद में दूर किया जा सकता है। आखिर कानून सड़कों पर एकत्रित हुई भीड़ के अनुसार तो नहीं बनेगें। संपादकीय में इन कानूनों को लेकर काफी कुछ  लिखा गया है। 

लेख

पत्रिका के इस अंक में चार लेख प्रकाशित किये गये हैं। उनका विवरण निम्नानुसार है-

डाॅ. ब्रजकुमार पाण्डेय का लेख प्रेमचंद पर एकाग्र है। शीर्षक है, प्रेमचंद और किसान: कल और आज हिंदी साहित्य के पाठक जानते है कि प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में भारतीय किसानों के जीवन संघर्ष को आधार बनाया है। लेखक ने अनेक तथ्यों के माध्यम से उस समय के किसानों की स्थिति पर प्रकाश डाला है। संदर्भ प्रेमचंद का कथा साहित्य है। लेख अच्छा है, हिंदी साहित्य के पाठकों के लिये उपयोगी है।

प्रेमचंद के साहित्य को लेकर इस पत्रिका में अन्य उपयोगी आलेख प्रकाशित किये गये हैं। यह शोधार्थियों के लिये उपयोगी हैं। इसी श्रृंखला का अन्य आलेख है, मुस्लिम समुदाय ओर प्रेमचंद का कथा साहित्य (अरूण कुमार)। लेख का आधार प्रेमचंद की कुछ प्रसिद्ध कहानियां है। जिनमें ईदगाह, कर्मभूमि उपन्यास एवं अन्य रचनाएं, आलेख आदि है। अच्छा लेख हैं

आलेख सिनेमा के पर्दे पर किसान: काल के धूसर केलाइडोस्कोप में। लेख श्री सूरज कुमार ने लिखा है। लेख में भारतीय फिल्मों में किसान  जीवन का परिचय है। अंग्रेजी राज से लेकर आज तक के किसान संघर्ष, आंदोलन तथा सत्याग्रह की जानकारी लेख में हैं। यह विषय बहुत विस्तृत है लेकिन फिर भी लेखक ने इसे अच्छी तरह से कवर करने का प्रयास किया है। फिल्मकारों, कलाकारों, निर्माता निर्देशकों का किसान जीवन के चरित्र की जटिलताओं को लाने में योगदान रहा है। पठनीय लेख है। 

पत्रिका के इस अंक में एक अन्य आलेख प्रकाशित किया गया है। यह साहित्यिक लेख ना होकर सामान्य लेख है। जिसे श्री शैलेन्द्र अस्थाना ने लिखा है। शीर्षक है, कोरोना के बाद की दुनियां। 

स्मरण 

पत्रिका के इस भाग में ख्यात कथाकार, उपन्यासकार तथा संपादक श्री रमेश उपाध्याय को याद किया गया है।कथा चक्र में हमने भी उनके संपादन में प्रकाशित पत्रिका कथन के अनेक अंकों की समीक्षा पूर्व में की है। 


स्व. श्री रमेश उपाध्याय पर डॉ. शंभुनाथ ने मार्मिक लेख लिखकर उन्हें याद किया है। उनके श्री उपाध्याय जी से संबंधों तथा घनिष्ठता की जानकारी इस स्मरण से मिलती है। श्री रमेश उपाध्याय फेसबुक पर काफी अधिक सक्रिय रहे थे। उनके संपादन में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका कथन का हिंदी साहित्य में सम्मान था। 

रमेश उपाध्याय: सांस्कृतिक जददृोजहद का जीवंत प्रतीक स्मरणालेख डॉ. आनंद प्रकाश ने लिखा है। लेखक ने श्री उपाध्याय जी को उनकी कहानियों, दैनिक सक्रियता के माध्यम से याद किया है। 

श्री राजकुमार शर्मा का लेख रमेश उपाध्याय का जाना जानकारीपरक, मार्मिक लेख है। 

श्री जानकी प्रसाद शर्मा का स्मरणालेख कहानीकार रमेश उपाध्याय: ऐसा कहां से लाउ। लेख श्री रमेश उपाध्याय जी की रचनाओं को आधार बनाकर लिखा गया है। अच्छा लेख है। 

श्री हरियश राय का लेख रमेश उपाध्याय: साहित्य का काम मनुष्य को बेहतर और दुनिया को बेहतरीन बनाना है। श्री राय ने स्व. श्री रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व को उनकी कहानियों के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है। अच्छा लेख है, पढ़ें।  

कहानी की रचनात्मकता और प्रेम शीर्षक लेख श्री तसलेम गुजराल ने लिखा है। यह लेख स्व. श्री उपाध्याय के अंतिम कहानी संग्रह प्रेम और पाठ पर एकाग्र है। 

जीवन का स्वर्ग रचते दंडद्धीप सुश्री प्रज्ञा जी का स्मरणालेख है। लेख का आधार स्व. श्री रमेश उपाध्याय जी का उपन्यास दंड द्धीप है।  यह उपन्यास धर्मयुग में धारावाहिक के रूप में भी छप चुका है। उपन्यास के माध्यम से प्रज्ञा जी ने श्री रमेश उपाध्याय के लेखन की बारीकियों पर गभीरतापूर्वक विचार किया है। अच्छा लेख है। 

कहानी की रचनात्मकता और प्रेम शीर्षक लेख श्री तसलेम गुजराल ने लिखा है। यह लेख स्व. श्री उपाध्याय के अंतिम कहानी संग्रह प्रेम और पाठ पर एकाग्र है। 

कविताएं 

इस भाग में तीन कवियों की रचनाएं हैं। उनका विवरण निम्नानुसार है-

राकेश रेणु  -  एक रंग हरा, खतरा, किसान, खेत चाहिये तथा अनुनय है। सभी कविताएं ग्रामीण परिवेश तथा वातावरण से उपजी हुई है। अच्छी कविताएं है। 

लक्ष्मीकांत मुकुलधोबही के सिवान पर धमाका, दिल्ली की सड़कों पर किसान, बारहमासा तथा खुशहाली के फूल नहीं खिलते पटना में लिखी है। इन कविताओं में कुछ नये प्रयोग किये गये हैं। पढ़ने पर पसंद आयेगी। 

भूपिंदर कौर प्रीत  - मिट्टी निकालती औरतें कवयित्री ने ग्रामीण परिवेश में महिलाओं की वर्तमान स्थिति दर्शायी है। यह सही है कि महिलायें ही हैं जो किसी की भी सलामती चाहती है। फिर भले ही वह कोई पराया ही क्यों ना हो।

श्रद्धांजलि 

इस भाग में स्व. श्री सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव पर एकाग्र लेख सुश्री रश्मि रावत ने लिखा है। लेख का शीर्षक है, अधूरी ख्वाहिशों की आग में जलता चांद। रश्मि रावत ने विस्तार से अपनी बात कही है जिसमें संवेदनशील कवि, लेखक श्रीवास्तव जी का समग्र व्यक्तित्व आ जाता है। 

प्रसंग 

प्रसंग के अंतर्गत मधुरेश जी का आलेख है। इस लेख का शीर्षक है, रवि कथा अर्थात अपने ढंग से जीने की जिद। लेख प्रसिद्ध कथाकार, लेखिका ममता कालिया जी की संस्मरण कृति पर एकाग्र है। 

दूसरा लेख डाॅ. सूरज पालीवाल ने लिखा है। लेख वर्तमान सवाल, इतिहास और उपन्यास । यह  लेख ऐतिहासिक उपन्यासों पर मधुरेश जी की किताब पर एकाग्र है। 

संस्कृति 

इस उपकथानक के अंतर्गत जयकृष्ण अमन का लेख है। जिसे उन्होंने नेवान नाम दिया है। यह लेख ग्रामीण गीत संगीत तथा खुशहाली का संदेश है। वह भी तब जब गांवों में नई फसल का आगमन होता है। पठनीय  लेख है। 

स्मृति यात्रा

यह यात्रा वृतांत है। जिसमें मथुरा के पास के गांव की यात्रा का रोचक विवरण है। वृतांत लोग मेरे गांव के को डाॅ. सूरज पालीवाल ने लिखा है। लेख में दर्शायी गई स्थितियां किसी एक गांव की ही नहीं है। भारत के प्रत्येक गांव में लगभग यही नजारा देखने को मिलेगा। अच्छा लेख है। 

कथा यात्रा

इस उपशीर्षक के अंतर्गत श्री हरियश राय जी का लेख प्रकाशित किया गया है। जिसका शीर्षक है, हाल फिलहाल की कहानियां। लेख में आजकल लिखी जा रही कहानियों पर विचार किया गया है।

कहानियां 

पत्रिका के इस अंक में अच्छी कहानियां प्रकाशित की गई है। आइये अब उनके बारे में जानते हैं -

परिकथा के इस अंक में तेलुगु कहानी जटाधारी बरगद प्रकाशित की गई है। मूल रचना को तेलुगु में चंदू तुलसी ने लिखा है। कहानी का अनुवाद डाॅ. एस. के साबिरा ने किया है। यह कहानी भारतीय गांवों के किसान जीवन पर आधारित है।  

अशोक की लिखी कहानी न्यूजीलैण्ड एक अच्छी कथा है। यह कहानी संक्रमण से ग्रस्त व्यक्ति की कहानी है। कहानी में अनेक प्रसंग हैं जहां मुख्य पात्र भटकता है, परेशान होता हैं उसके पश्चात भी उसे एक अदद बैड मिलना मुश्किल हो जाता है। कहानी में नयापन है, प्रभावित करती है।

बालकनी कहानी श्री सी. भास्करराव की लिखी हुई है। यह किसी छोटे नगर/कसबे की कालोनी की कहानी है। किसी तरह से पडौसी वृद्ध परिवार बीमार व्यक्ति से सहानुभूति प्रगट कर सहयोग करता है। कहानी पढकर जानियें। 

डाॅ. शैलेन्द्र शर्मा की लिखी कहानी जन्नत भी कोरोनाकाल की घटनाप्रधान कहानी है। जिसमें डाॅक्टरों से संबंधित वार्तालाप अधिक गहराई लिये हुये है। हिंदू युवक किसी बाबूजी के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर देते हैं। उसके पश्चात कहानी का घटनाक्रम तेजी से बदलता है एवं कहानी सुखांत की ओर बढती है। अच्छी कहानी है। 

सुरेश कांटक की लिखी कहानी मटिलगना एक अलग तरह की रचना है। इस कहानी में ग्रामीण परिवेश है। सीदा सादे ग्रामीण जीवन को कहानी में कथाकार ने स्थान दिया है। 

श्रीमती रजनी गुप्त अच्छी कथाकार तथा संपादक हैं। उनकी लिखी कहानी पोटली में भी ग्रामीण परिवेश उभरकर सामने आया है। लेकिन यह अन्य कहानियों की अपेक्षा अलग है। यह वे गांव है जो अर्धशहरीकरण की ओर बढ रहे हैं। 

सुश्री आशा पाण्डेय की लिखी कहानी तुम्हारे जाने के बाद उनके लिखे गये उपन्यास का एक छोटा सा भाग है। 

आदित्य अभिनव की लिखी कहानी छीमा माई, छिमा एक मध्यमवर्गीय परिवार है। यह परिवार बड़े जतन से आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन राह में आने वाली रूकावटों से पार पाना इसके लिये कठिन हो जाता है। पढ़कर आनंद लें। 

सुश्री कविता वर्मा की लिखी कहानी पीर पिरवानी में नयापन मिलेगा। जिसमें संवाद की नई शैली है। कथन छोटे तथा प्रभावशाली है। अच्छी कहानी है। 

श्री संदीप शर्मा की लिखी कहानी बूढों का गांव में सरहद पर स्थित गांव की बदलती परिस्थितियां है। जिसमें नित बदलते घटनाक्रम से गांव में क्या नयापन आता है? रचना पढ़कर जानिये। 

श्री नर्मदेश्वर जी की लिखी कहानी विदाई एक गांव के किसान की कहानी है। जिसमें मुख्य पात्र बुनियादी सुविधाओं को जुटाने में लगा रहता है उसके पश्चात कहीं विदाई का नम्बर आता है। अच्छी कहानी है।

किताबें 

इस भाग में कुछ पुस्तकों की समीक्षा तथा श्री रमाकांत श्रीवास्तव जी का आलेख है। लेख का शीर्षक है बाकी बचे कुछ लोग।  

प्रकाश देवकुलिश द्वारा लिखी गई समीक्षा प्रकाशित की गई हैं। यह समीक्षा अनवर शमीम की लिखी हुई किताब अचानक कबीर पर है। 

पत्रिका की शेष अन्य रचनाएं, समाचार आदि प्रभावित करते हैं। पत्रिका अवश्य पढे।

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2 टिप्पणियाँ

  1. सुंदर , सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी है। बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

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  2. सुंदर सारगर्भित समीक्षा ।

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