Monday, June 29, 2009

केवल..... 5रू,...5रू...., 5रू......में बहुत कुछ आपके लिए

पत्रिका-हिमप्रस्थ, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-56, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.) संपर्क-हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घौड़ा चैकी, शिमला 6
पत्रिका की विशेषता इसमें प्रकाशित प्रभावशाली व ह्दय पर अमिट छाप छोड़ने वाले आलेख हैं। समीक्षित अंक में शमी शर्मा, जगदीश चन्द्र शर्मा, जितेन्द्र कुमार तथा राजेश चंद्रा के आलेख पर्वतीय अंचल से परिचय कराते हैं। निधि भारद्वाज की कहानी विजेता वास्तव में पाठकों को भी पढ़ने पर विजय दिलाती है। संगीता शर्मा, प्रेम विज, सुरेन्द्र अग्निहोत्री, नवल कुमार एवं डाॅ. पीयूष गुलेरी की कविताएं अच्छी बन पड़ी हंै। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व्यंग्य तथा समीक्षाएं भी संग्रह योग्य हैं।

प्रभावशाली प्रस्तुतिकरण व सहज संप्रेषण युक्त पत्रिका

पत्रिका-पंजाबी संस्कृति, अंक-अप्रैल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. राम आहूजा, पृष्ठ-62, मूल्य-20रू.(वार्षिक 80रू.) संपर्क-एन 115, साउथ सिटी 1 गुड़गांव (हरियाणा)
पत्रिका का समीक्षित अंक पठनीय रचनाओं से युक्त है। प्रमोद कुमार, मंजुला वाधवा एवं ओम प्रकाश बजाज के आलेख प्रभावित करते हैं। जसवंत सिंह विरदी एवं श्याम सखा ‘श्याम’ की कहानी पाठक को बांधे रखती है। चांद शर्मा, शरद तैलंग, रमेश सोबती की कविताएं नए विषयों की सफल प्रस्तुति है। लघुकथाओं में संतोष सुपेकर, दिलीप भाटिया एवं सत्य प्रकाश भारद्वाज विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। पत्रिका का प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली व सहज सरल है।

Sunday, June 28, 2009

साहित्य से संवाद करती पत्रिका--आलेख संवाद

पत्रिका-आलेख संवाद, अंक-जून.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-उमेश चंद्र अग्रवाल, पृष्ठ-34, मूल्य-10रू.(वार्षिक 100रू.) संपर्क-बी.8 नवीन शहदरा, नई दिल्ली 110032(भारत)
गागर में सागर इस पत्रिका के समीक्षित अंक में ख्यात कवि कुुंवर नारायण की कविताओं को स्थान दिया गया है। अमृता प्रीतम की लगभग अपठित कहानी गरूड़ गंगा पाठकों को अवश्य ही प्रभावित करेगी। अंक की सबसे अधिक संुदर रचना मंगलेश डबराल की कविता शरीर है। श्याम सुंदर दुबे तथा राम पुनियानी के आलेख विशिष्ट शैली में लिखे गए हैं।

साहित्यिकता से भरपूर पत्रिका वागर्थ

वागर्थ अंक-जून.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-150, मूल्य-20रू.(वार्षिक 200रू.) संपर्क-भारतीय भाषा परिषद, शेक्सपियर सरणि, कोलकाता 700017(भारत)
प्रत्येक अंक की तरह वागर्थ का यह अंक भी अनूठा एवं पठनीय है। समीक्षित अंक में प्रख्यात कवि तथा साहित्यकार बाबा नागार्जुन पर विशेष सामग्री दी गई है। नागार्जुन के खत जो वागर्थ के संपादक सहित अन्य साहित्यकारों को लिखे गए थे उनसे बहुत ही उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है जिसका संबंध साहित्य के साथ साथ मनुष्य के जीवन की शुचिता से भी है। उषा किरण खान तथा पं. सुंदरलाल बहुगुणा के आलेख संग्रह योग्य हैं। प्रो. कमला प्रसाद की स्मृति में बसे प्रख्यात कवि सुदीप बनर्जी के स्मृति चित्र सुदीप जी की सह्दयता को प्रदर्शित करते हैं। रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, की कविताएं बाजारवाद को चीरकर रोशनी की किरण दिखाती है। पंकज परिमल एवं कृष्ण दत्त पालीवाल ने अपने आलेखों में गहराई से विषय का प्रस्तुतिकरण किया है। नंद भारद्वाज एवं स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएं ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह का लेख बादलों के ऊपर डायरी विधा में लिखा गया एक पठनीय आलेख है। पत्रिका की कहानियांे में हरे प्रकाश उपाध्याय तथा विद्या सिंह की रचनाएं विविधता का आभास कराती हैं। विलास गुप्ते का व्यंग्य तथा राजकिशोर के उपन्यास अंश सहित पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं संपादक श्री विजय बहादुर सिंह के विशेष प्रयासों से पाठक को निजता का आभास दिलाती है।

पत्रिका का लघुकथा अंक सार्थक प्रस्तुति है

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-जून.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.(वार्षिक 250रू.) संपर्क-161, बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल 462043 म.प्र.(भारत)
साहित्य सागर का समीक्षित अंक लघुकथा अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक में सनातन कुमार वाजपेयी तथा डाॅ. शरद नारायण खरे ने लघुकथा की विषय वस्तु व बुुनावट पर विस्तृत रूप से विचार किया है। प्रकाशित लघुकथाओं में शरद नारायण खरे, युगेश शर्मा, रेखा कक्कड़, लता अग्रवाल, डाॅ. मालती शर्मा तथा मदन प्रसाद सक्सेना की रचनाएं प्रभावित करती हैं। पं. गिरि मोहन गुरू पर एकाग्र सामग्री से उनकी साहित्य के प्रति निष्ठा का पता चलता है। अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं भी पठनीय तथा जानकारीप्रद हैं।

Saturday, June 27, 2009

क्या इसे हिंदी साहित्य कहंे?

पत्रिका-कथा बिंब, अंक-जन.मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. माधव सक्सेना ‘अरविंद’, पृष्ठ-52, मूल्य-15रू.(वार्षिक 50रू.) संपर्क-ए.10 बसेरा आॅफ दिन क्वारी रोड़, देवनार मुम्बई 400008(भारत)
पत्रिका कथाबिंब विगत 30 वर्ष से प्रकाशित हो रही है। लेकिन दुखद यह है कि अभी तक इस पत्रिका ने साहित्य जगत को ऐसा कुछ नहीं दिया जो उल्लेखनीय हो। समीक्षित अंक की कहानियों में उर्मि कृष्ण की कहानी चुटकी भर सिंदुर बिना को छोड़कर शेष कहानियां साहित्यिक स्तर से बहुत नीचे हैं। इन कहानियों को किसी भी तरह से साहित्यिक कहानियां नहीं कहा जा सकता। लघुकथाओं में भोलापन में नवीनता है तथा कथ्य व शिल्प की दृष्टि से यह लघुकथा अच्छी बन पड़ी है। पत्रिका की कविताएं, दोहे, ग़ज़लें तथा गीत आदिमयुगीन जान पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि हम ख्यात कवियों की कविताओं की पैरोड़ी पढ़ रहे हों। पत्रिका के अन्य स्तंभ जैसे लेटर बाक्स, बाइस्कोप, पुस्तक समीक्षाएं तथा कुछ कही कुछ अनकही इस पत्रिका को और भी लचर तथा स्तरहीन बनाते हैं। पत्रिका का सबसे उजला पक्ष इसके साथ ख्यात साहित्यकार तथा लेखक संस्मरणकार प्रबोध कुमार गोविल का जुड़ा रहना है। लेकिन जब तक पूरी टीम में कुछ नया करने का जज्बा न हो एक अकेला साहित्यकार संपादन सहयोग किस तरह कर सकेगा यह सोचने का विषय है। इस तरह की स्तरहीन पत्रिकाओं को शीघ्र ही बंद कर दिया जाना चाहिए।

नवोदित रचनाकारों की अच्छी व पठनीय रचनाओं को स्थान दिए जाने की आवश्यकता

पत्रिका-हंस, अंक-जून.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-98, मूल्य-25रू.(वार्षिक 25रू.) संपर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 3/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002(भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में से इस बार नहीं(मुर्सरफ आलम जौक़ी), पी फार प्यार में पागल कभी-कभी(जयंती रंगनाथन) प्रमुख हैं। इन कहानियों की पृष्ठभूमि में आज का वह मानव दिखाई देता है जो जीवन यापन के लिए संर्घषरत है। क्योंकि उनका नाम नईम था(वीरेन्द्र जैन) आलेख ख्यात कवि तथा रचनाकार नईम के विषय में उपयोगी जानकारी उपलब्धक कराता है। आलोक श्रीवास्तव, राहुल झा, मलखान सिंह तथा संध्या गुप्ता की कविताओं में नयापन दिखाई देता है। इस बार शीबा असलम फहमी के आलेख में वह धार दिखाई नहीं दी जिसके लिए वे जानी पहचानी जाती हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने इसे जल्दी में लिखा हो? सी. भास्कर राव की फिल्मी डायरी उपयोगी तथा संग्रह योग्य जानकारी देती है। मुकेश कुमार का आलेख घृतराष्ट्र की सभा में सब अंधे हैं पाठक को आज के संदभों ेके साथ सोचने समझने की नई क्षमता प्रदान करता है। इस अंक की लघुकथाओं तथा ग़ज़लों में कुछ भी नयापन दिखाई नहीं दिया। न जाने क्यों हंस एक ही बात को बार बार प्रस्तुत कर पाठकों को क्या बताना चाहता है। भारत भारद्वाज के आलेख सहित पत्रिका की अन्य सभी रचनाएं कुछ कुछ टाइप्ड सी होती जा रही हैं। यदि हंस के संपादक मंड़ल द्वारा अपेक्षाकृत नए रचनाकारों की अच्छी तथा पठनीय रचनाओं को स्थान नहीं दिया गया तो पाठक इससे दूर हट सकते हैं।

Saturday, June 20, 2009

केरल से प्रकाशित हिंदी साहित्य की पत्रिका का स्वागत किया जाना चाहिए

पत्रिका-केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका, अंक-जन.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. एन.चन्द्रशेखरन नायर, पृष्ठ-24, संपर्क-श्री निकेतन, लक्ष्मीनगर, पट्टम पालस, पोस्ट तिरूवनन्तपुरम 695.004 केरल(भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक एक सार्थक व उपयोगी प्रस्तुति है। पत्रिका के इस अंक में कोर्टमार्शल-दलितोउन्मुख पुनरीक्षण(डाॅ. आन्टणी पी.एम.), साहित्य और उसका रस(कविता रानी), महिला सशक्तिकरणः ओडिया साहित्य के संदर्भ में(अर्जुन शतपथी) नए ढंग से लिखे गए आलेख हैं जिनमें पाठक को बहुत कुछ पढ़ने के लिए प्राप्त होता है। डाॅ. वीरेन्द्र शर्मा की अक्षरगीता पढकर एक नए आनंद की अनुभूति होती है। केरल से प्रकाशित हिंदी साहित्य की पत्रिका का स्वागत किया जाना चाहिए।

उज्ज्वल भविष्य, उत्कृष्ट प्रस्तुति--मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद् पत्रिका, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. वी. रामसंजीवैया, पृष्ठ-48, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.) संपर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560.010 कर्नाटक(भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रकाशित मुख्य आलेखों में राष्ट्रीय चेतना में तमिल और हिंदी का योगदान-एक तुलना(डाॅ. एम.शेषन), उत्तरी अमरीका में हिंदी के प्रति अनुराग(प्रो. पे्रममोहन लखोटिया), रामकथाओं के अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञः डाॅ. रमानाथ त्रिपाठी(डाॅ. रूक्मणि) तथा दिनकर के साहित्य में नारी विमर्श(मैत्री ठाकुर) प्रमुख है। इनके रचनाकारों ने परिश्रम के साथ विषय वस्तु को प्रस्तुत किया है। रामशंकर चंचल, सत्यवीर सिंह, सीताराम शेरपूरी तथा अशोक कुमार शेरी की कविताएं अच्छी पठनीय रचनाएं हैं। बेंगलूर से प्रकाशित होने वाली इस ंिहंदी साहित्यिक पत्रिका का भविष्य उज्ज्वल है।

नए व प्रतिभाशाली रचनाकारों को भी स्थान दिए जाने की आवश्यकता--अक्षरा

पत्रिका-अक्षरा, अंक-मई-जून.09, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलाश चन्द्र पंत, प्रबंध संपादक-सुशील कुमार केड़िया, सम्पादक-डाॅ. सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-20रू.(वार्षिक 120रू.) संपर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स, भोपाल म.प्र.(भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में भारतीय आलोचना परंपरा से संबंधित आलेख मनोविमर्शःसाहित्यालोचन के संदर्भ मंे(प्रो. रमेश चंन्द्र शाह) मानव की वैचारिकता तथा अमूत्र्त चिंतन को व्यक्त करता है। धरोहर के अंतर्गत ‘धर्म का आधारःआचरण’(अज्ञेय) तथा आर्ष परंपरा और हजारी प्रसाद द्विवेदी’(राममूर्ति त्रिपाठी) आलेख भारतीय काव्य तथा दर्शन को विस्तार से व्यक्त करते हैं। युगेश शर्मा का आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी को याद करता आलेख तथा ओम प्रकाश मंगोला, सुरेन्द्र बंसल, कृष्ण चन्द्र गोस्वामी तथा कृष्ण चन्द्र गुप्त की वैचारिकी वर्तमान संदर्भो को अतीत से जोड़कर उनकी व्याख्या करते में सफल रही है। ऋतु सारस्वत तथा जसविंदर शर्मा की कहानियों के कथ्य में नवीनता नहीं दिखाई दी हालांकि विषय का चयन सोच समझकर किया गया है। गोपाल नारायण आवटे की कहानी ‘एहसास’ साहित्यिकता से भरपूर रचना है। पत्रिका का कविता खण्ड अधिक प्रभावशाली है। राजकुमार कुम्भज, गजानन चैहान, लखन लाल आरोही की कविताएं विषय वस्तु की पुनरावृति से दूर लगी जो आज के संदर्भ में अति आवश्यक है। प्रणव कुमार बनर्जी का यात्रा वृतांत, रमेश दवे का आलेख तथा समीक्षाएं पत्रिका को पठनीय तथा संग्रह योग्य बनाने में पूर्णतः सफल रही हैं। अक्षरा का सादा साफ सुथरा ऋुटि रहित मुद्रण आकर्षक व प्रभावशाली है। आशा है अंको के प्रकाशन का शतक पूरा करने के पश्चात दोहरे शतक तक की यात्रा में नए व प्रतिभाशाली रचनाकारों को स्थान देगा।

Friday, June 19, 2009

पहाड़ों से उतरता हिंदी साहित्य का दरिया-चिनाब

पत्रिका-चिनाब, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-सिमर सदोष, पृष्ठ-44, संपर्क-पंजाब कला साहित्य अकादेमी(रजि.) 186/डब्ल्यू,बी., बाजार शेखां, जालंधर 144.001 (भारत)
पंजाब कला साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका चिनाब का यह प्रवेशांक है। अंक भरोसा दिलाता है कि इसमें भविष्य में और भी उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाएं प्रकाशित होंगी। समीक्षित अंक में प्रकाशित सुरेश सेठ का आलेख ‘अकेले पथ के साथी’ सिमर सदोष के साहित्य के प्रति अनुराग को प्रगट करता है। ललित सुरजन का संस्मरण उनके जीवन संघर्ष की दास्तान है जो उन्होंने देशबंधु समाचार पत्र को स्थापित करते समय प्राप्त किए हैं। राजेन्द्र परदेसी की कहानी ‘विश्वास का अंकुर’ आम पाठक के मन में विश्वास जगाती है कि वह हिम्मत न हारे। डाॅ. अजित गुप्ता का व्यंग्य एक अच्छी हास्य प्रधान रचना है जो नामों के रास्ते से पाठकों को गुदगुदाती है। सुरेश उजाला की कविता मनुष्य के मनोविकार और प्रवृति को व्यक्त करने में सक्षम रही है। उषा बजाज की कविताएं तथा डाॅ. अमरेन्द्र का समीक्षा आलेख में अभी और विस्तार की आवश्यकता थी। अखिलेश शुक्ल की कहानी ‘परिवर्तन’ ग्रामीण वातावरण में व्यप्त कुरीतियों के वबंडर से पाठक को निकालने का प्रयास करती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं भी पाठकोपयोगी व संग्रह योग्य हैं। कथा चक्र परिवार पत्रिका चिनाब के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है।

समकालीन साहित्य, संस्कृति, कला और विचार का मासिक--उत्तर प्रदेश

पत्रिका-उत्तर प्रदेश, अंक-मई09, स्वरूप-मासिक, संपादक-सुरेश उजाला, पृष्ठ-43, मूल्य-10रू.(वार्षिक110रू.), संपर्क-सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पार्क रोड़, लखनऊ उ.प्र.(भारत)
समीक्षित पत्रिका सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग उ.प्र. द्वारा प्रकाशित पठनीय पत्रिका है। इस अंक में पांच आलेख प्रकाशित किए गए हैं। जिनमें बौद्ध धर्म का वैश्विक अध्ययन(प्रो. अगने लाल), वर्णित आदर्शोन्मुख यथार्थवाद(डाॅ. सम्राट सुधा), कहावतों की शाम(इन्दर चन्द्र तिवारी) प्रमुख है। आलेखों के विषय समकालीनता, समाज तथा संस्कृति के साथ साथ साहित्यिकता से भरपूर है। आचार्य रजनीकांत शर्मा की कहानी ‘मृगलोचनी’ तथा श्याम सुंदर सुमन व उमेश चन्द्र सिंह की लघुकथाएं पत्रिका के उद्देश्य की पूर्ति करती दिखाई देती है। पत्रिका की सहेज कर रखने योग्य रचना राजेन्द्र परदेसी द्वारा डाॅ. सुशीला गुप्ता से लिया गया साक्षात्कार है। आजकल तकनीकि हो चुके लेखन व सृजन जैसे विषयों को प्रश्नों के माध्यम से लेखन कला पर गंभीरता पूर्वक विचार किया गया है। विवेक कुमा मिश्र, जसविंदर शर्मा, राजेन्द्र निशेश, जय प्रकाश मिश्र की कविताएं प्रभावित करती है। तारकेश्वर शर्मा विकास का व्यंग्य ललित निबंध सा लगता है। डाॅ. सुकदेव श्रोत्रिय का संस्मरण रेखाचित्र का आभास कराता है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं भी पत्रिका के स्तर के अनुरूप हैं। अच्छे उपयोगी अंक के लिए संपादक व उनकी टीम बधाई की पात्र है।

Wednesday, June 17, 2009

साहित्य और कलाओं की आलोचना त्रैमासिकी--पूर्वग्रह

पत्रिका-पूर्वग्रह, अंक-अप्रैल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, मूल्य-30रू. (वार्षिक 100रू.), संपर्क-भारत भवन न्यास, जे. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स भोपाल .प्र. 462002(भारत)

पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात कथाकार उदयप्रकाश पर एकाग्र है। अंक में उन पर अत्यधिक उपयोगी तथा सार्थक सामग्री संजोयी गई है। ज्यादातर पाठक उदयप्रकाश के कथाकार रूप से ही परिचित हैं लेकिन वे एक उत्कृष्ट कवि भी हैं। इन कविताओं मेें आज का समाज तथा उसकी स्थिति दिखाई देती है। रेखा सेठी से साक्षात्कार में उन्हांेने स्वीकार किया है कि वे मूलतः एक कवि हैं। वे कहते हैं कि उनकी कहानियां कवित का ही एक्सटेंशन है। उदयप्रकाश की कहानियों पर खालिद जावेद में अपने आलेख में स्पष्ट किया है कि ये कहानियां प्रतिरोध की कहानियां है। तिरिछ, टेपचूं, छप्पन तोल का करधन, और अंत में प्रार्थना तथा मोहनदास जैसी कहानियां हिंदी कथा साहित्य को पाश्चात्य कथा साहित्य के समकक्ष रखती हैं। पाकिस्तान की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाआजके संपादक अजमल कमाल की यह टिप्पणी गौर करने लायक है कि, ‘पाकिस्तान में वैसे तो सबकुछ है, मगर वहां कोई उदयप्रकाश नहीं है।अजमल कमाल का यह कहना सिद्ध करता है कि उदयप्रकाश का कथा साहित्य भारतीय भाषाओं सहित विश्व की अनेक भाषाओं के लिए मागर्दशक बना हुआ है। वी. विजय कुमार तथा कैलाश चन्द्र के आलेख भी उनकी कहानियों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। पुतला, पीली छतरी वाली लड़की, पालगोमरा का स्कूटर, दद्दू तिवारीःगणना अधिकारी, साइकिल तथा नेलकटर जैसी कहानियां आधुनिक यर्थाथ तथा भावबोध की अभिव्यक्ति है। अन्य रचनाओं में छापा कला प्रयोग और प्राविधि(ज्योति भट्ट), आनंद का अनहद(विनय उपाध्याय), परिवर्तन का उद्घोष स्लमडाॅग करोड़पति(अरविंद कुमार) भारत में अमरिका और युगांण्डा(आलोक पुराणिक), रंग निर्देशों के बदलते स्वरूप(देवेन्द्र राज ठाकुर) तथा निगम आगम एवं पुराण में सरस्वती(राममूर्ति त्रिपाठी) के आलेख पत्रिका की व्यापकता को स्पष्ट करते हैं। संग्रहयोग्य उपयोगी अंक के लिए पत्रिका के संपादक तथा उनकी टीम बधाई की पात्र है।

Thursday, June 11, 2009

आपके दिमाग के लिए भरपूर खुराक है इस ब्लाग पर --

कथा चक्र पर इस माह उपलब्ध समीक्षाएं
पत्रिकाओं के नए अंक साहित्यिकता से भरपूर सामग्री जिनकी समीक्षा आपको अवश्य ही आकर्षित करेगी--
1. पूर्वग्रह2. वागर्थ3. इप्टा वार्ता4. मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका5. हंस6. कथाबिंब7. साहित्य सागर8. परती पलार9. सुखदा10. चिनाब11. समावर्तन12. नया ज्ञानोदय 13. कथादेश
बेव पत्रिकाएं --
1. सृजन गाथा2. रचनाकार3. अभिव्यक्ति4. अनुभूती
आपकी जानकारी के लिए नवीनतम जानकारी से युक्त सामग्री तथा रचनाओं की विशिष्टता के साथ साथ पत्रिका के पते के साथ साथ और भी बहुत कुछ। कृपया नियमित रूप से पढ़ने के लिए बुकमार्क करें अथवा मेल करें।
suchetaji@gmail.com

Friday, June 5, 2009

कलम की ठंडी बयार---संदभ्र शुभ तारिका

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-मई-जून.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, मूल्य-25रू. (वार्षिक 120रू.), संपर्क-कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी अंबाला छावनी, 133.001 हरियाणा (भारत)
प्रख्यात साहित्यकार महाराज कृष्ण जैन पर एकाग्र पत्रिका का समीक्षित अंक संग्रह योग्य सामग्री से भरपूर है। स्मृति दर्पण के अंतर्गत नलिन जैन, विष्णु प्रभाकर, अजात शत्रु, प्रबोध कुमार गोविल, रमेश प्रसून, प्रतीक्षा भाटिया, धनंजय कुमार, अरूण कुमार भट्ट, पृथ्वी राज अरोड़ा, अर्चना कुमारी, स्नेह बंसल तथा पंकज शर्मा के संस्मरण डाॅ. महाराज कृष्ण जी पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। इन आलेखों से पाठक सहज ही यह जान लेता है कि डाॅ. महाराज कृष्ण जी एक साहित्यकार के साथ साथ सहृदय व्यक्तित्व भी थे। सरल सहज व मिलनसार इस साहित्यकार ने साहित्य सृजन करने के साथ साथ साहित्य को अपने जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाया था। उनकी रचनाएं आम आदमी के इर्द-गिर्द घूमती तथा उससे प्रश्न करती हुई दिखाई देती हैं। शुभ तारिका ने समीक्षित अंक मंे उनके व्यक्तित्व के रचनात्मक पहलु को बहुत ही सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। इस पुनीत कार्य के लिए पत्रिका की संपादिका तथा उनकी टीम बधाई की पात्र है।