Wednesday, April 29, 2009

रचनाएं शोधार्थीयों के लिए संग्रह योग्य व उपयोगी

पत्रिका-हिमप्रस्थ, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-64, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.) संपर्क-हिमाचल प्रदेश प्रटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला हिमाचल प्रदेश (भारत)
पत्रिका के मार्च अंक में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में विष्णु कांत शास्त्री का राष्ट्रीय काव्य(पारितोष बेलगी), हिमाचल का हिंदी साहित्य(ओम प्रकाश शारस्वत), कला चिंतन(नंद लाल), रीति के मूल एवं नियामक तत्व(रन्जु पटियाल) प्रमुख हैं। कहानियों में स्मृति दंश(डाॅ. मंजु दुबे) तथा कविता पर संवाद(जगत सिंह) अच्छी व पठनीय रचनाएं हैं। रमेश चंद्र शर्मा, रामनिहाल गुर्जर, सुनील कुमार शर्मा, उमेश कुमार अश्क की कविताओं ने प्रभावित किया। Fropper.com - Make Friends, Find Dates, Have Fun पत्रिका का व्यंग्य, स्थायी स्तंभ तथा समीक्षा सहित अन्य रचनाएं शोधार्थीयों के लिए संग्रह योग्य व उपयोगी है।

Tuesday, April 28, 2009

सौहार्द का व्यंग्य विशेषांक

पत्रिका-सौहार्द, अंक-17, स्वरूप-अनियतकालीन, संपादक-डाॅ. संत कुमार टण्डन ‘रसिक’, पृष्ठ-56, संपर्क-386/195 हिम्मतगंज इलाहाबाद उ.प्र.
सन् 1990 में स्थापित पत्रिका सौहार्द का समीक्षित अंक हास्य व्यंग्य विशेषांक है। अंक में कुछ बहुत ही अच्छे चुने हुए व्यंग्यों को शामिल किया गया है। एक गधे का रोजनामचा(ऋषि मोहन श्रीवास्तव), नव वर्ष मंगलमय हो(गोविंद शर्मा), मैरिज ब्यूरो(सन्त समीर), नानी की कहानी(सर्वेश आस्थाना), चलती हुई फाइल(जगदीश ज्वलंत), बर्थ डे अनारकली का(राजेन्द्र परदेसी) तथा आया एडमीशन का मौसम(अखिलेश शुक्ल) प्रमुख है। पत्रिका की अन्य रचनाएं कविताएं तथा स्थायी स्तंभ भी प्रभावशाली हैं। लेकिन दुख का विषय है कि आज के व्यावसायिक युग में हिंदी साहित्य की स्तरीय तथा रचनात्मकता से भरपूर पत्रिकाओं को कोई पूछने वाला भी नहीं है।
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मीडिया और जनतंत्र पर विशेष सामग्री-क्थन

पत्रिका-कथन, अंक-अप्रैल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ-98, मूल्य-25रू.,वार्षिक100रू., संपर्क-107, साक्षर अपार्टमेंट, ए.03, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली 110.063 (भारत)
हर अंक की तरह पत्रिका कथन का यह अंक भी उल्लेखनीय है। समीक्षित अंक में मुख्य रूप से मीडिया और जनतंत्र पर विशेष पठनीय सामग्री प्रकाशित की गई है। इस विषय पर आयोजित परिचर्चा में सेवंती निनान, गौहर रज़ा, अमित सेनगुप्ता, पंकज पचैरी, जवरीमल्ल पारख, रामशरण जोशी ने गहन गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया है। संजन कुदंन व सी. भास्करराव की कहानियां भी अच्छी रचनाएं हैं। प्रख्यात कवि सुदीप बनर्जी पर चन्द्रकांत देवताले का संस्मरण तथा उनकी कविताओं के साथ साथ एकांत श्रीवास्तव, कुमार विनोद, गोविंद माथुर की कविताएं जनतंत्र को शक्ति देती दिखाई देती हैं। अहमद नदीम कासमी की कहानी ‘थल’ उर्दू साहित्य की अच्छी रचनाओं में शीघ्र ही शुमार होगी। जवरीमल्ल पारख का फिल्म पर एकाग्र आलेख तथा उत्पल कुमार की विशेष समीक्षा हमेशा की तरह धारयुक्त तथा सटीक हैं। Jaipur_Hotels
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पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं इसे हिंदी की अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं से अलग महत्वपूर्ण स्थान दिलाते हैं।

Sunday, April 26, 2009

पत्रिका-अणु कन्या, वर्ष-01, अंक-02, स्वरूप-मासिक, संपादक-एम. कृष्ण चन्द्र राव, पृष्ठ-60, मूल्य-निःशुल्क व निजी वितरण के लिए, संपर्क-कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट, कुडनकुलम पोस्ट, राधापुरम तालुक, तिरूनेलवेली, तमिलनाडू भारत अणुकन्या का समीक्षित अंक पत्रिका का हिंदी विशेषांक है। हिंदी पाठकों के लिए यह हर्ष का विषय है कि विशुद्ध तकनीकि संस्थान भी अब हिंदी के विकास के लिए प्रयासरत हैं। तमिलनाडू से इस पत्रिका का प्रकाशित होना यह सिद्ध करता है कि अब हिंदी केवल विरोध की भाषा न होकर देशव्यापी जन सम्पर्क का माध्यम हो गई है। पत्रिका में कुुडनकुलम पावर प्रोजेक्ट की हिंदी के विकास संबंधी गतिविधियों के समाचार व जानकारी का समावेश है। Shaadi on mind? Act now. Register at Shaadi.com Matrimonial
अणुकन्या ने खेलकूद, पर्यावरण, तकनीकि विषयों सहित साहित्य पर भी रचनाएं प्रकाशित करने का सफल प्रयास किया है। आशा है पत्रिका भविष्य में हिंदी साहित्य की रचनाओं को प्रमुखता से प्रकाशित करेगी।

‘रिश्ते हमारी संस्कृति का उपहार है’-शुभ तारिका

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-30, मूल्य-12रू.,वार्षिक120रू., संपर्क- कृष्णदीप ए.47, शास्त्री कालोनी अम्बाला छावनी, हरियाणा (भारत)Agra_Hotels
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कहानी लेखन महाविद्यालय अम्बाला की पत्रिका के इस अंक में विजया जैन, किशोरी लाल वर्मा, हंसमुख रामदेपुत्रा, हेमंत यादव, संतोष परिहार तथा नरेन्द्र आहूजा की लघुकथाएं प्रकाशित की गई हैं। विनय मिश्र, सुमन सिंह तथा माला वर्मा की कविताएं पठनीय व संग्रह योग्य हैं। पत्रिका का मुख्य आकर्षण डाॅ. महराज कृष्ण जैन का कहानी लेखन पर आलेख है। इस आलेख में कहानी लेखन की मूलभूत बातों को स्पष्ट किया गया है। अर्जुन सिंह का व्यंग्य तथा मृदुला छाजन की कहानी अंक को भव्यता प्रदान करती है। ‘रिश्ते हमारी संस्कृति का उपहार है’ संपादक का कथन रिश्तों की प्रगाढ़ता के लिए प्रयासरत दिखाई देता है।

‘सपनों के बिखरने और संवरने का जीवंत दस्तावेज’-सदंर्भ संबोधन

पत्रिका-सम्बोधन, अंक-जनवरी.मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-कमर मेवाड़ी, पृष्ठ-92, मूल्य-20रू.,वार्षिक100 रू., संपर्क- संबोधन त्रैमासिक, काकरोली, जिला राजसमंद राजस्थान (भारत)Need a friend? Indian Dating at Fropper.com
प्रख्यात कथाकार व नावेलनिगार नासिरा शर्मा के नवीनतम उपन्यास ‘जीरो रोड़’ पर एकाग्र पत्रिका संबोधन का अंक अपने नाम के अनुरूप साहित्य से संबोधन कराने का प्रयास करता है। पत्रिका में कृष्ण विहारी, विष्णु दत्त शर्मा, डाॅ. हुसेनी बोहरा, उषा किरण खान, राम वचन राय तथा डाॅ. पल्लव के जीरो रोड पर विचार इस उपन्यास के बारे में बहुत कुछ कहकर इसे पढ़ने की उत्सुकता जगाते हैं। डाॅ. मलय पानेरी, राजाराम भादू तथा सुधा सिंह के आलेखों में नासिरा जी के लेखन व उनके व्यक्तित्व के कुछ अनझुए पहलूओं पर एक विचार प्रस्तुत किया गया है। संपादक का यह कथन इस उपन्यास की सार्थकता पर विचार करता है जिसमें उन्होंने इसे ‘सपनों के बिखरने और संवरने का जीवंत दस्तावेज’ कहा है। एक सार्थक व उपयोगी अंक के लिए बधाई ।

Saturday, April 25, 2009

‘भाषा पांडित्य नहीं प्रेम मांगती है’-भाषा स्पंदन

पत्रिका-भाषा स्पंदन, अंक-16, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ-48, मूल्य-10रू.,वार्षिक100 रू., संपर्क- कर्नाटक हिंदी अकादमी, विनायका, 127, एम.आई.जी./के.एच.बी., 5वां ब्लाॅक, कोरमंगला, बेंगलूर, कनार्टक (भारत)
दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाली भाषा स्पंदन आज हिंदी साहित्य की धड़कन बन गई है। पत्रिका में साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचनाओं के दर्शन होते हैं। समीक्षित अंक में यंत्र अनुवाद की समस्या पर श्रीनारायण समीर का उपयोगी आलेख कम्प्यूटर द्वारा अनुवाद की समस्याओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालता ैहै। राजेन्द्र परदेसी ने अपने आलेख साहित्य के सामाजिक सरोकार में साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है इस तथ्य की ओर संकेत किया है। डाॅ. सत्यकाम पहाडिया ने विश्व पटल पर हिंदी के बढ़ते कदम पर विचार किया है। पुष्पा रघु की कहानी एक मुट्ठी धूप पठनीय व आज के सदंर्भ में उपयोगी रचना है। सजीवन मयंक, मोहन उपाध्याय, डाॅ. मोहन तिवारी ‘आनंद’ तथा अशोक अंजुम विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।Looking for someone special? Register at Shaadi.com Matrimonials इस संुदर अंक के लिए बधाई।

Friday, April 24, 2009

बाज़ारवाद की प्रवृत्तियां और साहित्य (द्वितीय भाग)

बाज़ारवाद पर आपने पहली पोस्ंिटग में कुछ जानकारी प्राप्त की। दरअसल बाज़ारवाद कोई साहित्यिक प्रवृत्ति न होकर आधुनिक जीवन शैली का एक हिस्सा ही है। जिस तरह से माक्र्सवाद ने पिछली सदी में यूरोप और दुनिया के बहुत से देशों को अपने प्रभाव में लेकर उनके उत्थान के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया था वही भूमिका बाज़ारवाद 21 वीं सदी में निभा रहा है। अमरीका, जापान, जर्मनी, फ्रांस सहित दुनिया के तमाम देशों ने समझ लिया है कि हिंदी की उपेक्षा अब अधिक दिनों तक संभव नहीं है। साहित्य के साथ साथ खेलकूद, राजनीति, समाज, शिक्षा, प्रशासन आदि के लिए बाज़ारवाद आधुनिक जीवन शैली तथा विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का जरिया है। अफ्रीका में आई.पी.एल. का सफल आयोजन व उसके प्रसारण के लिए हम भारतीयों का दीवाना होना क्या बाज़ारवाद का विस्तार नहीं है? आज अमरीकी तंत्र से यदि भारतीयों को अलग कर दिया जाए तो आप समझ सकते हैं कि उस देश का क्या होगा।Agra_Hotels
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बाज़ारवाद पर आपकी छोटी सी प्रतिक्रिया का इंतजार है।(शेष अगली पोस्ट में)

Thursday, April 23, 2009

नारी अस्मिता- नारी चेतना की प्रगतिशील पत्रिका

पत्रिका-नारी अस्मिता, अंक-दिसम्बर-मई.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. रचना निगम, पृष्ठ-48, मूल्य-20रू.,वार्षिक80 रू., संपर्क-15, गोयामेंट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी. ब्लाक, द्वितीय तल, एस.-3, प्रतापनगर बडौदा गुजरात (भारत)
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गुजरात
से प्रकाशित होने वाली नारी विषयक इस पत्रिका का समीक्षित अंक सार्थक रचनाओं से युक्त है। हासिए से मुख पृष्ठ पर आती स्त्री(अंजु दुआ जैमिनी), विष अमृत का खेल(नीरजा माधव) तथा डाॅ. रचना निगम का विचार मंच एक स्वागत योग्य विचारणीय प्रयास है। अढ़ाई गज की ओढ़नी(चित्रा मुदगल) एक ऐसी कथा है जो आज के तथाकथित सभ्य समाज की असभ्यता को उजागर करने में कामयाब रही है। संतोष सुपेकर, सुकीर्ति भटनागर एवं डाॅ. पूरन सिंह की लघुकथाओं ने एक सुंदर कथानक को संक्षेप में बिना किसी कांट छांट के पेश किया है। उर्मि कृष्ण का संस्मरण एवं अरूण कुमार शर्मा, ख्याल खन्ना, शैल वर्मा, मृदुला झा की कविताएं गीत व ग़ज़ल विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।

Wednesday, April 22, 2009

भाषा को बचाने से ही साहित्य बचेगा-प्रभाकर श्रोत्रिय: संदर्भ समार्वतन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.,वार्षिक200 रू., संपर्क- माधवी 129 दशहरा मैदान उज्जैन म.प्र. (भारत)
राष्ट्रीय स्तर की ख्यातिप्राप्त पत्रिका समार्वतन के समीक्षित अंक में रमेश दवे का आलेख गांधी अतीत, वर्तमान और भविष्य एक विचारणीय तथा पढ़ने योग्य आलेख है। पत्रिका का दूसरा खण्ड ख्यात आलोचक, निबंधकार, संपादक तथा लेखक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर केन्द्रित है। इस खण्ड में उनकी कविताएं, साक्षात्कार आदि को विस्तार से स्थान दिया गया है। जीवन विवेक की एक मोमबत्ती ऊंची में कुछ गूढ़ गंभीर चिंतन प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। प्रो. कमला प्रसाद का आलेख डाॅ. ओमप्रकाश वालमिकी के उपन्यास जूठन पर गंभीरतापूर्वक विचार करता है। प्रतिष्ठित साहित्यकार एड़गर एलन पो की कहानी ‘शराब का कनस्तर’ मानव जीवन के असली संघर्ष की कथा बन गई है। हिंदी उपन्यास में यथार्थ चिंतन पर पुष्पलता सिंह ने एक विस्तृत खाका खींचा है। श्रीराम दवे, कांति कुमार जैन, विष्णु दत्त नागर, कमेन्द्रु शिशिर की रचनाओं में नई सदी का नयापन दिखाई देता है। पत्रिका के अन्य स्तंभ भी पठनीय व संग्रह योग्य हैं।
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Tuesday, April 21, 2009

साहित्यिक पत्रिकाओं में बाज़ारवाद की भूमिका

आजकल जितनी भी साहित्यिक पत्रिकाएं निकल रही हैं उनमें वर्तमान सदी के बाजारवाद की प्रमुख भूमिका है। कविता, कहानी, संस्मरण, जीवनी जैसी प्रमुख साहित्यिक विधाओं के साथ साथ अन्य विधाओं में भी इसे महसूस किया जा सकता है। हंस, कथादेश, प्रगतिशील वसुधा, नया ज्ञानोदय जैसी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के अलावा अक्षरा, साक्षात्कार, परती पलार जैसी पत्रिकाओं में एक ऐसा लेखन हो रहा है जो आने वाली पीढ़ी के लिए हिंदी साहित्य का नया स्वरूप प्रस्तुत कर रहा है। बाजारवादी साहित्य की प्रवृतियां किसी भी तरह से प्रगतिशील विचारधारा की विरोधी नहीं है। बल्कि यह कहा जा सकता है कि जिस मान्यताओं को प्रगतिवाद आम जन तक नहीं पहुंचा पाया उसे बाजारवादी प्रवृतियों ने अल्प समय में सहज सुलभ बना दिया है। सामान्यतः हिंदी के ख्यातिनाम आलोचक यह कह सकते हैं कि इसने हिंदी का स्वरूप बिगाड़ कर रख दिया है। लेकिन जब संचार माध्यमों इंटरनेट, मोबाईल आदि को उपयोग साहित्यिक यात्रा के विकास में किया जाएगा तो उसका स्वरूप अतर्राष्ट्रीय होगा। जिसके लिए विश्व की अन्य भाषाओं के शब्दों को हिंदी को आत्मसात करना ही पडे़गा। (शेष अगले अंक में )

Monday, April 20, 2009

दुष्यंत कुमार अलंकरण समारोह का सुंदर प्रकाशन

पत्रिका-आसपास, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, पृष्ठ-24, मूल्य-5रू.,वार्षिक 60 रू.60, संपर्क- एच.03, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र. (भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में दुष्यंत कुमार अलंकरण समारोह का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया गया है। वरिष्ठ कवि अशोक चक्रधर तथा आबिद सुरती को सम्मान का समाचार पढ़कर सुखद अनुभूति हुई। पत्रिका में श्री अशोक चक्रधर की उपलब्धियों का समाचार तथा उनके पारिवारिक पृष्ठ भूमि आदि पर विचार किया गया है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा रचनाएं इसे उपयोगी व पठ्नीय बनाती हैं। आसपास म.प्र. से प्रकाशित होने वाली एक उपयोगी व संवाद प्रधान पत्रिका है। शायद पूरे देश में इस तरह की यह एक अनूठी पत्रिका है।

Sunday, April 19, 2009

‘आज नाट्य विधा साहित्य की एक उपेक्षित विधा हो गई है।’ - रंग अभियान

पत्रिका-रंग अभियान, अंक-15, स्वरूप-अनियतकालिक, संपादक-डाॅ. अनिल पतंग, पृष्ठ-64, मूल्य-15रू., संपर्क-नाट्य विद्यालय वाघा, पो. एस. नगर, बेगूसराय बिहार (भारत)
नाट्य प्रधान समीक्षित पत्रिका के अंक में ओम प्रकाश मंजुल का आलेख शेक्सपियर-साहित्य और स्वास्थ्य शिक्षण एक उपयोगी मनन योग्य रचना है। अश्विनी कुमार आलोक ने अंगिका लोक कथा पर विचारात्मक आलेख लिखा है। धरोहर के अंतर्गत जावेद इकबाल की रचना एक अच्छी प्रस्तुति है। श्याम कुमार पोकरा का नाटक झगड़ा पाठक को अंत तक बांधे रखने में सक्षम है। संपादक का कथन, ‘आज नाट्य विधा साहित्य की एक उपेक्षित विधा हो गई है।’ सचमुच एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा पत्र मित्र व साहित्यिक समाचार भी इसे उपयोगी बनाते हैं।

Saturday, April 18, 2009

पत्रिका समकालीन परिदृश्य का आईना है। (संदर्भ प्रगतिशील आकल्प)

पत्रिका-प्रगतिशील आकल्प, अंक-जनवरी-मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. शोभनाथ यादव, पृष्ठ-20, मूल्य-आजीवन रू.1000, संपर्क-पंकज क्लासेस, पोस्ट आॅफिस बिल्ंिडग, जोगेश्वरी (पूर्व) मुम्बई (भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में डाॅ. शिवनारायण को आत्म संघर्ष सहित दो महत्वपूर्ण कहानियां शामिल हैं। कहानी शिकार(बिपिन विहारी) तथा मोमी चूर के लड्डू(श्याम कुमार पोकरा) जीवन संघर्ष की कहानियां हैं। डाॅ. बालशौरि रेड्डी का आलेख राष्ट्रभाषा हिंदी और महात्मा गाॅधी’ गाॅधी का राष्ट्रभाषा के विकास के लिए योगदान को विस्तार से बताता है। युगेश शर्मा, कौशल चंद्र पाण्डेय तथा देवेन्द्र सौरभ की लघुकथाएं वर्तमान परिस्थियों पर केन्द्रित सृजन है। हूबनाथ पाण्डेय, कुतल कुमार जैन, जगमोहन आजाद केशव शरण तथा अशोक भाटिया की कविताएं कम्प्यूटर युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। अन्य स्थायी स्तंभ भी पत्रिका को उत्कृष्ट बनाते हैं। पत्रिका समकालीन लेखन परिदृश्य का आईना है।
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Friday, April 17, 2009

समय और सम्यक भारतीय सोच के दो विशिष्ट आयाम हैं।’(संदर्भ-साक्षात्कार)

पत्रिका-साक्षात्कार, अंक-जनवरी.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-देवेन्द्र दीपक, संपादक-हरिभटनागर, सलाहकार- श्री मनोज श्रीवास्तव, श्रीराम तिवारी पृष्ठ-120, मूल्य-15रू.(वार्षिक150रू.), संपर्क-साहित्य अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाण गंगा भोपाल म.प्र. (भारत)Shaadi.com Matrimonials - Register for FREE
साक्षात्कार के समीक्षित अंक में डोगरी की प्रख्यात कवयित्री पद्मा सचदेव से बातचीत में डोगरी भाषा व उसके साहित्य का परिचय मिलता है। अमृत लाल वेगड़ की नर्मदा परिक्रमा इस नदी को भारतीय संस्कृति से जोड़ती हुई दिखाई देती है। मृदुला सिन्हा व गोविंद उपाध्याय की कहानियां समय का सार्थक कथन है। तेजराम शर्मा, निशांत तथा प्रदीपकांत की कविताएं देशकाल का प्रतिबिम्ब है। आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, वीरेन्द्र सिंह आलेख तथा शंकर पुणताम्बेकर का व्यंग्य पठ्नीय रचना है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा पत्र समीक्षा आदि अंक को पठ्नीय बनाते हैं। संपादकीय में श्री देवेन्द्र दीपक ने भारतीय चिंतन की व्यापकता को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, ‘समय और सम्यक भारतीय सोच के दो विशिष्ट आयाम हैं।’
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Thursday, April 16, 2009

प्रेमचंद्र और शरत चंद्र की कहानियां भारतीय हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं (साहित्य सागर)

पत्रिका-साहित्य सागर अंक-अप्रैल09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमल कांत सक्सेना, पृष्ठ-50, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया भोपाल 462.043(भारत)
साहित्य सागर का समीक्षित अंक कहानी अंक है जिसमें छः कहानियां सम्मलित हैं। इनमें मां हम अकेले रह सकते हैं(लता अग्रवाल), आश्रयदाता(कैलाश जायसवाल) तथ सरपंच पति(सतीश श्रीवास्तव) बहुत ही अच्छी रचना बन पड़ी हैं। देवेन्द्र कुमार मिश्रा, हरिवल्लभ श्रीवास्तव की कविताएं दिल को छू लेती हैं। पत्रिका का दूसरा खण्ड सनातन कुमार वाजपेयी जी पर एकाग्र है। उन पर लिखे गए आलेखों में भगवत दुबे, मदन मोहन अवधिया वाजपेयी जी की साहित्यिक यात्रा Agra_Hotels
Agra_Hotels पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। संपादक के अनुसार ‘प्रेमचंद्र और शरतचंद्र की कहानियां भारतीय हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं’ बिलकुल ठीक वक्तव्य है। मेरे विचार से तो इन दोनों रचनाकारों की तुलना में विश्व के कथा साहित्य में गिने चुने ही लेखक हैं। इस अच्छे अंक के लिए बधाई।

Wednesday, April 15, 2009

‘मीडिया हमारे समय का सबसे हिंसक शिकारी है और बेरहम दलाल भी’ (संदर्भ वागर्थ)

पत्रिका-वागर्थ, अंक-अप्रैल09, स्वरूप-मासिक, संपादक-विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-146, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-भारतीय भाषा परिषद, 36ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता700.017 (भारत)
पठनीय सामग्री से परिपूर्ण वागर्थ के समीक्षित अंक में आॅस्कर की राजनीति पर मृणाल सेन, के विक्रमसिंह व शशांक दुबे द्वारा आलेख लिखे गए हैं। समकालीन हिंदी कविता में राम और अयोध्या(रघुवंश मणि) तथा भाषा ईश्वर और देरिदा(विनोद शाही) में विषय को विश्लेषणात्मक ढंग से स्पष्ट किया गया है। भारतीय कथा साहित्य की वर्तमान दशा व दिशा पर भालचंद्र जोशी आलेख कुछ चिंता कुछ संदेह हमारे समाज के लिए कुछ विचारणीय बिंदु उठाता है। नवजागरण के पहले राष्ट्रकवि डेरोजियो की मान्यताओं तथा सृजन का संुदर विवेचन कनक तिवारी ने किया है। एक शख्स कहानी सा(कुसुम खेमानी) तथा गांव के आदमी का भारी मन(कृष्ण विहारी मिश्र) पाठक को बांधे रखने में सफल रचनाएं हैं। भाषान्तर के अतर्गत अहमद शामलू, रमानाथ राय तथा वित्त विचार में गिरीश मिश्र साहित्येत्तर विषयों पर साहित्य की सीमा में रहते हुए अच्छे ढंग से प्रकाश डाल सके हैं। कहानियों में भीतरी सन्नाटे(यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’) कंचन का पेड़(मनोहर चमोली मनु) तथा मुन्ना शायर.....(अखिलेश शुक्ल) की रचनाएं विधागत तटबंधों को तोड़कर कथन की प्रस्तुति सुंदर ढंग से कर सकी है। मुन्ना शायर से शादीLooking for someone special? Register at Shaadi.com Matrimonials संबंधी प्रश्न पूछना व उसका विचलित होना कहानी का चरम बिंदु है जहां से असली कथा प्रांरभ् ा होती है। कविताओं में नीलेश रघुवंशी, धु्रव शुक्ल, हरीश भावनी, यश मालवीय किसी वाद विवाद में न पड़कर आम जन के साथ न्याय करते दिखाई पड़ते हैं। पत्रिका के सभी स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं तथा अन्य रचनाएं भी संग्रह योग्य व पठनीय बन पड़ी हैं। संपादक श्री विजय बहादुर सिंह ने ‘मीडिया हमारे समय का सबसे हिंसक शिकारी है और बेरहम दलाल भी’ कहकर पाठक की भावनाओं को अपने गंतव्य तक पहुंचा दिया है।

Tuesday, April 14, 2009

यात्रा में मच्छर न काटे तो?-------सदंर्भ यात्रा कथा

लल्लू लाल जी को यात्रा करना है। इस ग्रीष्म में यात्रा और वह भी भारतीय रेल में? कभी नहीं? पर करना है तो करना है। अतः कुछ भी हो जाए टिकिट कटाकर ट्रेन में बैठना है और अपनी यात्रा पर निकल पड़ना है। पहला कदम है टिकिट बुकिंग का लेकिन यह क्या? सभी टिकिट बुक हो चुके हैं? तत्काल बुकिंग का भी समय नहीं तब यात्रा के लिए क्या किया जाए। पैदल भारत भ्रमण संभव ही नहीं। फिर क्या किया जाए क्यों न कु छ समय बाद यात्रा शुरू की जाए तब तक के लिए आप भी अपनी तैयारी कर लीजिए अन्यथा कहना पड़ेगा? यात्रा... भारतीय रेल में? कभी नहीं।Jaipur_Hotels
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remaining part : after tea break

Monday, April 13, 2009

कथा चक्र----इस माह की समीक्षाओं का बदला हुआ रूप

कथा चक्र के ब्लाॅग पर इस माह प्रकाशित होने वाली समीक्षाएं अब एक नए आकर्षक रूप में प्रकाशित की जाएंगी। उन समीक्षाओं में युवाओं के लिए आकर्षण होगा तथा उनके पढ़ने के लिए बहुत सी ऐसी सामग्री होगी जो उन्हें बेहद प्रभावित करेंगी। Shaadi.com Matrimonials - Register for FREE

इस माह में प्रकाशित होने वाली समीक्षाआंे में हंस, कथादेश, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, रंग अभियान, साक्षात्कार, नारी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री का संक्षिप्त रूप तथा रचनाओं की व्याख्या युवाओं को ध्यान में रखती हुए की जाएगी।

Sunday, April 12, 2009

हमेशा याद आयेगी उस आवारा मसीहा की-----संदर्भ विष्णु प्रभाकर

ख्यात कथाकार, साहित्यकार विष्णु प्रभाकर आज से हमारे बीच नहीं हांेगे। होगी तो केवल उनकी यादें जिनमें हम हिंदी साहित्य के स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज तक के विकास के सोपानों पर विचार कर सकेंगे। प्रख्यात बंग्ला उपन्यासकार शरत चंद्र की जीवनी को ‘आवारा मसीहा’ के नाम से पाठकों के सामने लाकर उन्होंने उस महान लेखक के सदंर्भो को आम आदमी के लिए सुलभ कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गांधीवादी विचारक विष्णु प्रभाकर के लिए पुरस्कार कोई मायने नहीं रखते। उन्होंने हमेशा पुरस्कार देने वाली संस्था को ही सम्मानित किया। पुनः स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर को कथा चक्र परिवार की विनम्र श्रृद्धांजलि।

Friday, April 10, 2009

अक्षरा-------पत्रिका का शतांक

पत्रिका-अक्षरा, अंक-मार्च-अप्रैल09, स्वरूप-द्वैमासिक, प्र. संपादक-कैलाश चंद्र पंत, संपादक-डाॅ. सुनीता खत्री, सुशील कुमार केडिया, पृष्ठ-220, मूल्य-20रू.(वार्षिक120रू.), संपर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स, भोपाल म.प्र. (भारत)
अक्षरा पत्रिका का यह सौवां अंक है। जिसमें बहुत ही उत्कृष्ट साहित्यिक सामग्री का समावेश किया गया है। सबद विचार के अतंर्गत रमेश चंद्र शाह, आलेखों में विनोद शाही, रामदरश मिश्र, ब्रज बिहारी कुमार, प्रमोद कुमार दुबे, रामेश्वर मिश्र पंकज, पुष्पपाल सिंह तथा अच्युतानंद मिश्र उल्लेखनीय हैं। उपन्यास अंश् वेणु की वापसी(सूर्यबाला), राम मेश्राम का राजेन्द्र अनुरागी जी पर संस्मरण, ललित गद्य के अंतर्गत अनुराधा शंकर की रचनाएं अच्छी तथा संग्रह योग्य हैं। योगेन्द्र अटल, सुरेन्द्र वर्मा, राममूर्ति त्रिपाठी तथा करूणाशंकर उपाध्याय के आलेखों में तत्कालीन परिस्थितियों का सुदंर विवेचन प्रस्तुत किया गया है। सूर्यकांत नागर, महीप सिंह, मृदुला सिन्हा तथा देवेन्द्र उपाध्याय का यात्रा वृतांत सौवें अंक की सार्थक ता को पूर्ण करते हैं। प्रतीक मिश्र, बटुक चतुर्वेदी, शिवकुमार अर्चन, नरेन्द्र दीपक, मयंक श्रीवास्तव तथा पुष्पारानी गर्ग के गीत गुनगुनाने योग्य हैं। रमेश चंद्र पंत, कमलेश बख्शी, मालती शर्मा की कविताएं अच्छी रचनाएं हैं। श्याम संुदर दुबे, नीरज माधव, श्रीराम परिहार व ज्ञान चतुर्वेदी का व्यंग्य अक्षरा को अन्य पत्रिकाओं से अलग करता है। अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं व समीक्षा आदि भी पत्रिका की उपादेयता सिद्ध करती है। सौवें अच्छे अंक के लिए बधाई।

Wednesday, April 8, 2009

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका----------हिंदी साहित्य के प्रचार के लिए

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद् पत्रिका, अंक-मार्च09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. वी. रामसंजीवैया, पृष्ठ-48, मूल्य-5रू.(वार्षिक50रू.), संपर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 कर्नाटक (भारत)
पत्रिका के इस अंक में डाॅ. मित्रेश कुमार गुप्त ने राजभाषा हिंदी पर अपने आलेख में हिंदी के राजभाषा बनने से लेकर आज तक के सफर को विस्तार से प्रस्तुत किया है। डाॅ. मोहनानंद मिश्र लिखते हैं कि हिंदी तलवार की भाषा नहीं यह तो कलम की भाषा है। वे हिंदी में नवीन चिंतन को आवश्यक मानते हैं। प्रभुलाल चैधरी ने अपने आलेख ‘आज देश में हिंदी की स्थिति’ चिंता जाहिर की है। गणेश गुप्त का विचार है कि अंग्रेजी तथा अंग्रजियत ने राष्ट्रभाषा ही नहीं अपितु क्षेत्रिय भाषाओं का भी नुकसान किया है। डाॅ. जशवंत भाई पण्डया ने मनोवैज्ञानिकता, दमन का निरूपण तथा आत्म पीड़न का निरूपण के आधार पर जैनेन्द्र के उपन्यासों में नारी की स्थिति पर विचार किया है। विनोद चंद्र पाण्डेय राहुल सांकृत्यायन की यात्राओं में देश के विभिन्न भागों की तत्कालीन स्थिति से अवगत कराते हैं। प्रो. बी. ललिताम्बा ने समाज और संस्कृति के विकास में भाषा के योगदान को महत्वपूर्ण माना है। पत्रिका को संपादक ने ओम रायजादा, सविता चड्डा, मित्रेश कुमार गुप्त, रमेश तिवारी ‘विराम’ तथा देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कविताओं से सज्जित किया है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा आलेख भी इसे पठ्नीय तथा शोध छात्रों के लिए उपयोगी बनाते हैं।

Tuesday, April 7, 2009

परती पलार------साहित्य की उर्वर जमीन

पत्रिका-परती पलार, अंक-अक्टूबर.दिसम्बर08, स्वरूप-त्रैमासिक, प्र. संपादक-नमिता सिंह,पृष्ठ-170, मूल्य-20रू.(वार्षिक80रू.), संपर्क-आश्रम रोड़, वार्ड नं. 08, अररिया 854311(भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक प्रकाशन के काफी अधिक समय बाद समीक्षा के लिए प्राप्त हुआ है। इस काव्य विशेषांक में कविता के विभिन्न रूप के साथ-साथ अन्य विधाओं की रचनाओं को भी स्थान दिया गया है। पत्रिका में प्रकाशित आलेखों में नई कविता में प्रगतिवाद(डाॅ. उदित कुमार वर्मा), गुलाब के रंग बिरंगे मिथक(बनवारी लाल ऊमर वैश्य) अधिक प्रभावशाली हैं। प्रो. अशोक कुमार झा का यात्रा वृतांत ‘मैला आंचल-बहती नदिया सौरा की..... रिपोतार्ज की सी प्रस्तुति है जिसे पढ़कर रचना का आनंद प्राप्त होता है। कहानियों में लूट का माल-दिले बेरहम(उपेन्द्र नाथ झा अमरावत), जीवन और स्वप्न(मनोज तिवारी) तथा रेखा(मोती लाल शर्मा) पठ्नीय तथा विचारणीय रचनाएं हैं। गालिब और कबीर पर लिखे गए आलेखों में कुछ प्रमुख बातों का उल्लेख लेखकों द्वारा किया जाना छूट गया हैै। जो आवश्यक प्रतीत होती हैं। ओंकार लाल शर्मा ने डाॅ. शिवमंगल सिंह सुमन पर अच्छा संस्मरण लिखा है। चूंकि यह कविता अंक है इसलिए इसमें कविताओं की अधिकता है। विविधता के रूप में अंक में हाइकू, झणिकाएं, मुक्तक, दोहे, ग़ज़ल, गीत, कविता को पर्याप्त स्थान दिया गया है। सुरेश उजाला, पं. गिरिमोहन गुरू, अनिल कुमार, चन्द्रसेन विराट, रामकिशोर कपूर, डाॅ. यू.एस. आनंद, प्रभा जैन, डाॅ. परमलाल गुप्त, प्रो. भगवान दास जैन, रामनिवास मानव, सुखदेव नारायण, चांद शेरी, रोहित शुक्ल रोहित, कादिर लखीमपुरी, ओमप्रकाश मंजुल विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। पत्रिका की संपादक नमिता सिंह ने कोशी में आई बाढ़ की विभीषिका पर बहुत ही मार्मिक संपादकीय लिखा है। अररिया जैसे छोटे से स्थान से प्रकाशित होने वाली बडे़ फलक की यह पत्रिका ने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं से उपेक्षित रचनाकारों को स्थान देकर उनके साहित्य से पाठक को अवगत कराया है इसके लिए परती पलार बधाई की पात्र है। (पत्रिका की संक्षिप्त जानकारी)

Monday, April 6, 2009

प्रगतिशील वसुधा का कहानी विशेषांक भाग .02------विगत पन्द्रह वर्ष का लेखा जोखा

पत्रिका-प्रगतिशील वसुधा, अंक-समकालीन कहानी विशेषांक.2, स्वरूप-त्रैमासिक, प्र. संपादक-प्रो. कमला प्रसाद, अतिथि संपादक-जयनंदन, पृष्ठ-368, मूल्य-75रू.(वार्षिक 250रू.), संपर्क-एम.31, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा रोड़, भोपाल 461.003(भारत)

ख्यात पत्रिका प्रगतिशील वसुधा का समीक्षित अंक समकालीन कहानी विशेषांक .2 है। अंक में सम्मलित कहानियों में दिलनवाज तुम बहुत अच्छी हो(प्रत्यक्षा), बोनसाई(योगिता यादव), अक्स बरक्स(यहया इब्राहिम), ठंडी गदूली(चरण सिंह पथिक), धूल(कविता), जींस(मनोज कुमार पाण्डेय), रौखड़(दिनेश कर्नाटक), खूंटा बदल गया(सच्चितानंद चतुर्वेदी), इंटरनेट सोनाली और सुब्रिमल मास्टर(प्रभात रंजन), लोकतंत्र के पहुरिये(पदमा शर्मा), बाकी बातें फिर कभी(राकेश बिहारी), सिनेमा के बहाने(वंदना राग), जाल(संजय कुमार), शेक्सपियर क्या तुम उससे मिलना चाहोगे(उमाशंकर चैधरी), बजंर जमीन(ज्योति ज्वाला), सब्जेक्ट फ्लेट नं. टू थर्टी वन(तरूण भटनागर),शामिल हैं। उपरोक्त कहानियों में विगत पन्द्रह वर्ष के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक विषयों पर आधारित कथानकों ेको कहानी का रूप दिया गया है। प्रत्येक कहानी समाज के कमजोर वर्ग को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने का प्रयास करती हुई दिखाई देती है। प्रत्यक्षा की कहानी ‘दिलनवाज तुम बहुत अच्छी हो’ का शिल्प तथा वंदना राग की कहानी ‘सिनेमा के बहाने’ आज की सामाजिक आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करती दिखाई देती है। उमाशंकर चैधरी की कहानी ‘शेक्सपियर क्या तुम उससे मिलना चाहोगे’ बाल विधवा के जीवन तथा उसके संघर्ष से पाठक को बांधे रखती है। प्रभात रंजन ने इंटरनेट तथा आधुनिक कम्प्यूटर तकनीकि को गांव कस्बे के आम आदमी तथा उसके जीवन में आ रहे ऊतार चढ़ाव को बाखुबी प्रस्तुत किया है। वहीं तरूण भटनागर फ्लेट नं. टू थर्टी वन के माध्यम से महानगरों की भूल भुलैया तथा प्राइवेट डिटेक्टिव एजंेसी के माध्यम से मनुष्य के भटकाव व उसकी हड़बड़ाहट जासूसी नावेल पढ़ने का अहसास कराती है। राहुल सिंह, शंभू गुप्त, नीरज खरे, बजरंग बिहारी, राकेश कुमार सिंह, भरत प्रसाद, पल्लव, जीतेन्द्र गुप्त, अवधेश मिश्र तथा अरूण कुमार की वैचारिकी इमरजेंसी के बाद की कहानी तथा उसके विकास का लेखा जोखा प्रस्तुत करती है। वैचारिकी में नए रचनाकारों की रचनाओं को आज के सदर्भ में विश्लेषित किया गया है। विमर्श के अतंर्गत पूछे गए सवालों के जवाब भविष्य के लिए कहानी विधा की दिशा का निर्धारण करेंगे। जिन ख्यात साहित्यकारों ने विमर्श प्रस्तुत किया है उनमें राजेन्द्र यादव, असरगर वजाहत, रमेश उपाध्याय, मृदुला गर्ग, गिरिराज किशोर, रवीन्द्र कालिया, अखिलेश, संजीव, शशांक, अनामिका, लीलाधर मण्डलोई, शिवराम शामिल है। (समकालीन कहानी विशेषांक 02 की संक्षिप्त समीक्षा का भाग 01)

Friday, April 3, 2009

अनुभूति----काव्य की एक सुखद अनुभूति

पत्रिका- अनुभूति(बेव पत्रिका), अंक-30.02.2009 स्वरूप-साप्ताहिक, संपादक-पूर्णिमा वर्मन, सहयोग-दीपिका जोशी, ,मूल्य-इंटरनेट पर निःशुल्क उपलब्ध,
संपर्क- http://www.anubhuti-hindi.org/
अनुभूति बेव पर उपलब्ध एक महत्वपूर्ण काव्य प्रधान पत्रिका है। इस पर लगभग तीस हजार से अधिक कविताएं उपलब्ध हैं। समीक्षित पत्रिका को प्रति सप्ताह अपडेट किया जाता है। 30 मार्च को प्रकाशित अंक में भी कुछ समसामयिक विषयों पर आधारित कविताएं प्रकाशित की गई हैं। ख्यात गीतकार विनोद निगम का गीत ‘अभी बरसेंगे घन’ में एक और गीत के जन्म के लिए निगम घन का बरसना जरूरी मानते हैं। पुर्नपाठ के अतंर्गत पं. नरेन्द्र शर्मा की चार कविताएं कहानी कहते कहते, रथवान, पनहारिन, स्वागतम प्रभावित करती हैं। मां की ममता कहानी कहते कहते बहुत कुछ कह जाती है। कविता पनहारिन में वे जल भरने के लिए जाती हुई युवती का संुदर चित्र खींचते हैं। सरोज कुमार वर्मा की छोटी कविताओं में घर परिवार, पत्नी, बच्चे अपनी उपस्थिति का अहसास कराते हैं। श्यामल सुमन के दोहे ‘नेता पुराण’ आज की अवसरवादी राजनीति पर कटाक्ष करने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं। पत्रिका का संयोजन, संपादन तथा प्रस्तुतिकरण आकर्षक है। लेकिन यह दुख का विषय है कि हिंदी साहित्य जगत में बेव पर उपलब्ध साहित्यिक पत्रिकाओं पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितने की वे हकदार हैं। अच्छे अंक के लिए बधाई।
विशेष: चित्र तथा जानकारियां अनुभूति पत्रिका की बेव साइट से साभार

Wednesday, April 1, 2009

रचनाकार----बेव पर उपलब्ध साहित्य का खजाना

पत्रिका-रचनाकार, अंक-मार्च.09, स्वरूप-बेव पत्रिका, संपादक-रविशंकर श्रीवास्तव,
मूल्य-निःशुल्क उपलब्ध,
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रचनाकार बेव पर उपलब्ध म.प्र. की एकमात्र तथा महत्वपूर्ण पत्रिका है। लगभग एक वर्ष से भी कम समय में इसने इंटरनेट पर हिंदी साहित्य को विश्वव्यापी रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। पत्रिका मूलतः एक ब्लाग के रूप में है जिसे लगभग प्रतिदिन अपडेट किया जाता है। इसमें हिंदी साहित्य की कविता, कहानी, संस्मरण, साक्षात्कार, जीवनी, रिपोतार्ज आदि कई विधाओं की रचनाओं को संकलित किया गया है। रचनाकार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी रचना की गुणवत्ता को ही प्रकाशन का प्रमुख आधार मानती है। इसे साहित्यकार के नाम अथवा ख्याति से कोई सरोकार नहीं है। पत्रिका ने अपने ब्लाॅग पर कई उपयोगी लिंक भी उपलब्ध कराए हैं जो इस ब्लाॅग पर आने वाले प्रत्येक विजिटर्स के लिए उपयोगी हैं। हिंदी के प्रचार प्रसार तथा साहित्य को सर्व सुलभ बनाने के लिए रचनाकार बधाई का पात्र है।