Tuesday, March 31, 2009

प्रगतिशील वसुधा----समकालीन कहानी का प्रथम सोपान

पत्रिका-प्रगतिशील वसुधा, अंक-समकालीन कहानी विशेषांक.1, स्वरूप-त्रैमासिक, प्र. संपादक-प्रो. कमला प्रसाद, अतिथि संपादक-जयनंदन, पृष्ठ-368, मूल्य-75रू.(वार्षिक 250रू.), संपर्क-एम.31, निराला नगर, दुष्यंत मार्ग, भदभदा रोड़, भोपाल 461.003(भारत)

लब्धप्रतिष्ठित व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई द्वारा स्थापित पत्रिका का समीक्षित अंक ‘समकालीन कहानी विशेषांक-01’ है। अंक में नए किंतु प्रतिभावान कथाकारों को स्थान दिया गया है। अतिथि संपादक जयनंदन के अनुसार, ‘यह संतोष का विषय है कि हिंदी की सभी विधाओं में बड़ी संख्या मंे नई पीढ़ी सृजनरत है।’ हिंदी साहित्य का लेखक अंग्रेजी के लेखकों के समान धन-वैभव नहीं प्राप्त कर पाता है। इसकी वजह कोई और नहीं हम हिंदी के जानकार ही हैं। नवलेखकों रचनाकारों से अत्यधिक अपेक्षा रखना भी इसका एक प्रमुख कारण है। एक दम नया कथाकार उदयप्रकाश, स्वयंप्रकाश या ज्ञानरंजन तो हो नहीं समता फिर आखिर क्यों हम उसकी प्रारंभिक रचनाओं की तुलना करने लगते हैं? उसकी प्रतिभा के अनुरूप उसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। जो आज हिंदी साहित्य को अंग्रेजी और इतर यूरोपिय भाषाओं के साहित्य के बराबरी में खड़ा करने के लिए आवश्यक है। दूसरी प्रमुख वजह हिंदी साहित्य में गुटवाद, वर्गवाद तथा अपनावाद है। इस विवाद में पड़कर न जाने कितने कथाकारों ने साहित्य से मुख मोड़ लिया है। वसुधा के समीक्षित अंक ने नए रचनाकारों का स्वयं मूल्यांकन न कर उन्हें प्रकाशित करने का साहसिक कार्य किया है। उसमें भी उल्लेखनीय यह है कि वसुधा ने पाठकों पर यह दायित्व छोड़ दिया है कि वे इन रचनाकारों में भविष्य के लिए संभावनाएं तलाशें। अंक में रहगुजर की पोटली(अल्पना मिश्र), चोर-पंचर(कमल), बादलों को घिरते देखा है(स्नोवा बार्नो), हेलिकाप्टर(संजय कुंदन) तथा यस सर(अजय नावरिया) वर्तमाना संदर्भो से कथानक उठाकर लिखी गई अच्छी कहानियां है। इनके पात्र 21वीं शताब्दी में जी रहे भारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्फ पिघलेगी(अख्तर आजाद), मोक्ष(मनीष द्विवेदी), शहर की खुदाई में क्या कुछ मिलेगा(चंदन पाण्डेय) तथा खरपतवार(मनीषा कुलश्रेष्ठ) कहानियां भारतीय पाश्चात्य संस्कृति के भेद को मिटाती हुई दिखाई देती हैं। पत्रिका में वैचारिकी स्तंभ के अतर्गत कृष्ण मोहन, खगेन्द्र ठाकुर, बलराज पाण्डेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, महेश कटारे, वंदना राग, विनोद तिवारी तथा विजय शर्मा समकालीन कहानी का गंभीरतापूर्वक विश्लेषण करते हैं। इन लेखकों की वैचारिकी में गंभीर विश्लेषण ही नहीं भविष्य के कथाकारों-लेखकों के सृजन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत भी हैं। प्रगतिशील वसुधा का समीक्षित अंक संग्रह योग्य है। इसके संदर्भो की हर साहित्यकार को आवश्यकता होगी। उत्कृष्ट अंक के लिए बधाई।

Saturday, March 28, 2009

बाल वाटिका-----राजस्थान से प्रकाशित होने वाली प्रमुख बाल पत्रिका

पत्रिका-बाल वाटिका, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. भेरूलाल गर्ग, पृष्ठ-48, मूल्य-12रू.(वार्षिक 120रू.), संपर्क-नंद भवन कांदीखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा 311.001 राजस्थान (भारत)

बाल वाटिका राजस्थान से प्रकाशित होने वाली प्रमुख बाल पत्रिका है। काव्य-कथा प्रधान इस पत्रिक ा की पाठ्य सामग्री मनोरंजक के साथ साथ शिक्षाप्रद भी है। समीक्षित अंक में सात कहानियां शामिल हैं जिनमें अश्वपति के कुत्ते(रमाकांत कांत’), देशप्रेमी मालव(राजकिशोर सक्सेना), सूर्य और परनाल(मुरलीधर वैष्णव) तथा लटका हुआ हथौड़ा(रमेश मयंक) बच्चों को हमेशा याद रहेंगी। कविताओं में अशोक महान(प्रभाष मिश्र), वीरांगना अजीजन(जगदीश शर्मा), कितने फागुन(डाॅ. तारादत्त ‘निर्विरोध’) बच्चों को गुनगुनाने के लिए बाध्य करती हैं। काव्य के इतिहास पुरूष(डाॅ. हरिप्रसाद दुबे) आलेख बच्चों को उपयोगी तथा अनुकरणीय जानकारी प्रदान करता है। पत्रिका के सभी स्थायी स्तंभ तथा समीक्षाएं इसे हर तरह से बच्चों की पत्रिका का दर्जा प्रदान करते हैं। आज देश भर में बाल साहित्य की बहुत अधिक कमी है जिसे यह पत्रिका काफी हद तक पूरा करती है।

Friday, March 27, 2009

समावर्तन-----विविधता का प्रस्तुतीकरण

पत्रिका-समावर्तन, अंक-मार्च।09, स्वरूप-मासिक, प्र. संपादक-रमेश दवे, वरिष्ठ सह.संपादक-श्रीराम दवे पृष्ठ-136, मूल्य-15रू.(वार्षिक 150रू.), संपर्क-माधवी 120, दशहरा मैदान उज्जैन म.प्र. (भारत)
समावर्तन का समीक्षित अंक ख्यात कथाकार चित्रा मुदगल के लेखन की विशेषताओं को विस्तार से व्यक्त करता है। चित्रा मुदगल की प्रथम कहानी ‘सफेद सेनारा’, लघु कथाएं, कविताएं एवं आत्मकथ्य साहित्य के नव अनुरागियों के लिए बहुत उपयोगी हैं। शब्द कुमार व हरीश पाठक ने चित्रा जी के सानिध्य में बिताए छड़ों केा अपने शब्द दिए हैं। उर्मिला शिरीष ने उनसे बातचीत कर सत्तर के दशक से आज तक की साहित्यिक गतिविधियों की चर्चा की है। कहानी ‘वहम’(अनु. हसन जमाल) व दृष्टिहीन(सदाशिव कौतुक) वर्तमान समय की आधुनिक कहानियां हैं। ख्यात संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का संस्मरण ‘सीता की लट’ तथा आलोचक परमानंद श्रीवास्तव का आलेख ‘अज्ञेय के उपन्यासों में कवि दृष्टि’ गंभीर अध्ययन का प्रतिफल है। पत्रिका का दूसरा भाग कला के लिए समर्पित है। यह भाग प्रख्यात नाटककार हबीब तनवीर से परिचय कराता है। इस भाग में ‘ए लाइफ इन थियेटर’, कोरा नाटक नहीं, अन्तस और परिवेश(भारत रत्न भार्गव), हबीब तनवीर से उनके रंगकर्म की बारीकियों तथा बुनावट पर बातचीत पत्रिका का एक अतिरिक्त आकर्षण है। विपात्र के अतर्गत ‘मुक्तिबोध का पुनर्पाठ(कमला प्रसाद), अब अनुभववाद से काम नहीं चलेगा(रमेश उपाध्याय), पहला हमला मुद्राराक्षस पर हो(विष्णु दत्त नागर) तथा राजनीति युद्ध और कला(अशोक भौमिक) अच्छी रचनाएं हैं जो पाठक के जेहन में हमेशा बनी रहेंगी। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं तथा वर्तमान साहित्य पत्रिका के चार अंकों की समीक्षा(श्रीराम दवे) अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं से प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से भिन्न है जो पत्रिका को उल्लेखनीय बनाते हैं। पत्रिका के एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

Thursday, March 26, 2009

शुभ तारिका------साहित्य के लिए शुभ

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-मार्च।09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-30, मूल्य-12रू.(वार्षिक 120रू.), संपर्क- कृष्ण दीप, ए-4, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133.001 हरियाणा (भारत)
शुभ तारिका का समीक्षित अंक होली विशेषांक के रूप में आया है। इस अंक में व्यंग्य विनोद से परिपूर्ण रचनाओं का समावेश किया गया है। पत्रिका में प्रमीला गुप्ता, अजातशत्रु, अखिलेश शुक्ल, प्रो. शामलाल कौशल तथा अब्बास खान के व्यंग्य प्रकाशित किए गए हैं। प्रत्येक व्यंग्य अलग अलग पृष्टभूमि पर लिखा गया है जिसमे हास्य का पुट भी प्रमुखता से मिलता है। लघुकथाओं में प्रबोध कुमार गोविल, नरेन्द्र कोर छाबड़ा, विजय शर्मा, बालाजी तिवारी, डाॅ. पूरन सिंह, नरेन्द्र कुमार गौड़ की लघुकथाएं पत्रिका के होली अंक की उपयोगिता बढ़ाती है। लक्ष्मीनारायण शर्मा, डाॅ. गार्गीशंकर मिश्र, डाॅ. रूखसाना सिद्धिकी, राजेश्वर उनियाल तथा डाॅ. रचना निगम की कविताएं वसंत की उजास को और भी उजला बना देती है। डाॅ. महाराज कृष्ण जैन की बाल कथा तथा पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा पत्र-पत्रिकाएं साहित्यिक समाचार नई नई जानकारी प्रदान करते हैं। पत्रिका की संपादक श्रीमती उर्मि कृष्ण का स्त्री विषयक दृष्टिकोण शुभ तारिका का प्रमुख आकर्षण है।

Wednesday, March 25, 2009

प्रयास------काव्य प्रधान पत्रिका

पत्रिका-प्रयास, अंक-50,51, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-अशोक अंजुम, शंकर प्रसाद करगेती, पृष्ठ-96, मूल्य-50रू।(वार्षिक 100रू.), संपर्क- ट्रक गेट, कासिमपुर 202.127, अलीगढ़ उ.प्र. (भारत)
कविता प्रधान पत्रिका प्रयास का यह संयुक्तांक है। इसमें गीत, ग़ज़ल, छंदबद्ध कविता, नई कविता को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पत्रिक कवि के नाम की अपेक्षा रचना की उत्कृष्टता को महत्व देती है। समीक्षित अंक में अनमोल शुक्ल, इम्तियाज अहमद गात्री, अदम गोड़वी, ऋषिवंश, मुनव्वर राना, अशोक अंजुम, अनिरूद्ध सिन्हा, पवन दीक्षित, राजेन्द्र तिवारी, प्रो. भगवान दास जैन, रमेश प्रसून, शकूर अनवर, डाॅ. विनय मिश्र, दानिश, डाॅ. वशीर बद्र, अशोक रावत, मधुकर अस्थाना सहित अनेक कवियों की कविताएं शामिल है। भारत से प्रकाशित होने वाली काव्य प्रधान पत्रकाओं में प्रयास प्रमुख स्थान रखती है। इस अच्छे अंक के लिए बधाई

Tuesday, March 24, 2009

अहल्या----दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पारिवारिक पत्रिका

पत्रिका-अहल्या, अंक-मार्च।09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती आशादेवी सोमाणी, पृष्ठ-64, मूल्य-25रू.(वार्षिक 225रू.), संपर्क-14-1-498, ए ज्ञानबाग रोड़, पान मण्डी के पास, हैदराबाद 500.012 (भारत)
अहल्या दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाली प्रमुख साहित्यिक पारिवारिक पत्रिका है। समीक्षित अंक में समसामयिक विषयों पर अनेक आलेख प्रकाशित किए गए हैं। इनमें स्त्रियों का समाज में स्थान(श्रीमती वसुधा गुप्ता), संस्कार नोचने वाले(मधु हातेकर), मानसिकता बदलो(नारायण दास हेड़ा ‘शतदल’) तथा देश भक्त बेगम हजरत महल(डाॅ. शरद बंधु) है। पत्रिका की तीन प्रमुख कहानियां संकल्प(भैरूसिंह राव क्रांति), शेखचिल्लियों की दुकानदारी(प्रमोद भार्गव) तथा नौकरी मिली(तेलुगु कहानी-टी. गौरीशंकर, अनु. डाॅ. एस. रंगयप्पा) वर्तमान समकालीन समस्याओं को उठाकर उन्हें हल करने का मार्ग सुझाती है। लघुकथाएं सशक्त(ललित नारायण उपाध्याय) तथा उपयोगिता(रितेश अग्रवाल) आज प्रत्येक भारतीय की समस्या का स्पष्टीकरण है। पत्रिका की कविताएं प्रसंग, चुटकियां घरेलु टिप्स, रसोई तथा अन्य स्तंभ पत्रिका को रोचक बनाते हैं।

Monday, March 23, 2009

बच्चों का देश---------राजस्थान से प्रकाशित बाल पत्रिका

पत्रिका-बच्चों का देश, अंक-मार्च।09, स्वरूप-मासिक, प्र. संपादक-पंचशील जैन, संपादक-कल्पना जैन, पृष्ठ-48, मूल्य-15रू.(वार्षिक 160रू.पांच अंक),संपर्क-7, उषा कालोनी, मालवीय नगर, जयपुर -17 राजस्थान(भारत)
राजस्थान के जयपुर नगर से प्रकाशित होने वाली यह एक महत्वपूर्ण बाल पत्रिका है। इस अंक में साहसी बच्चे, बालक बना महान, भारत की बेटियां, एकता का संदेश देते रंग, भगतसिंह का पत्र आदि बालोपयोगी रचनाएं हैं। यह रचनाएं बच्चों के साथ साथ बड़ों के लिए भी पठनीय हैं। कहानी एंकाकी के अतर्गत हरिया की बुद्धिमानी, पहचानों अपनी मूर्खताएं, जी समझ गया तथा रूई कैसे साफ की गई शिक्षाप्रद तथा जीवन के लिए संदेश देने वाली रचनाएं हैं। पत्रिका में शामिल चारों कविताएं बच्चों के गुनगुनाने योग्य हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, ज्ञान विज्ञान आदि बच्चों के बौद्धिक विकास में अवश्य ही सहायक होंगे। पत्रिक में बच्चों से संबंधित समाचार तथा उनके पत्र भी शामिल किए जाने की आवश्यकता है।

Sunday, March 22, 2009

व्यंग्य यात्रा-----श्रीलाल शुक्ल पर एकाग्र पठनीय अंक

पत्रिका-व्यंग्य यात्रा, अंक-अक्टू।-दिस.08, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-प्रेम जनमेजय, पृष्ठ-192, मूल्य-20रू.(वार्षिक 100रू.पांच अंक),विशेष-ख्यात साहित्यकार व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल पर केन्द्रित, संपर्क-73, साक्षर अपार्टमेंट, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110.063 (भारत)
व्यंग्य यात्रा का समीक्षित अंक ख्यात व्यंग्यकार साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल जी पर एकाग्र है। पाथेय के अंतर्गत शुक्ल जी के लेखन के ऐतिहासिक क्षण, व्यंग्य विधा की स्वीकार्यता तथा रवीन्द्र नाथ त्यागी जी के आलेख ‘राग दरबारी एक उत्कृष्ट कथाकृति’ शामिल है। ‘राग दरबारी’ हिंदी साहित्य की यात्रा का तीसरा प्रमुख पड़ाव है। गोदान, मैला आंचल, के ग्रामीण अंचल को इस उपन्यास में स्वतंत्र भारत में स्वेच्छाचारिता के प्रतिफल के रूप में देखा जा सकता है। नित्यानंद तिवारी, प्रो.निर्मला जैन तथा ज्ञान चतुर्वेदी जी ने इस उपन्यास की बुनावट कसावट तथा वक्रोक्ति पर दृष्टिपात किया है। श्रीलाल शुक्ल जी से साक्षात्कार में उनके लेखन संबंधी महत्वपूर्ण पहलूओं पर चर्चा की गई है। श्रीलाल शुक्ल एवं उनके साहित्य पर कृष्णदत्त पालीवाल, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, भारत भारद्वाज, सुवास कुमार सहित अन्य लेखकों के आलेख व्यंग्य विधा पर विचार के साथ साथ समाज की वर्तमान स्थिति पर राग दरबारी को ध्यान में रखकर विचार किया गया है। राग दरबारी के व्यंग्य, शिल्प तथा उसकी बुनावट को लेकर काफी कुछ कहा गया है। कुछ आलोचक इसे उपन्यास ही नहीं मानते वहीं कुछ ने इसे उब से उपजा व्यर्थ का आलाप भी निरूपित किया है। लेकिन उन सब के विपरीत ‘राग दरबारी’ को भारतीय समाज के साथ साथ विदेशों में भी सराहा गया है। खगेन्द्र ठाकुर, राजेश जोशी, हरिमोहन, सूर्यबाला, सुरेश कांत तथा आशा जोशी के आलेखों में इस उपन्यास पर विचार किया गया है। जवाहर चैधरी, विनोद शाही, रमेश तिवारी ने शुक्ल जी की रचना दृष्टि में जीवन संदर्भो की खोजबीन की है। आम जन से लेकर ख्यात साहित्कारों से उनके संबंधों तथा निकटता पर सर्वश्री कन्हैयालाल नंदन, गंगा प्रसाद विमल, गोपाल चतुर्वेदी, शेरजंग गर्ग, अशोक चक्रधर अरविंद तिवारी एवं साधना शुक्ल के संस्मरण अच्छे व पठ्नीय हैं। पत्रिका में यह बात अवश्य खटकी की आखिर क्यों कर राग दरबारी के किसी प्रख्यात तथा प्रमुख अंश को स्थान नहीं दिया गया। व्यंग्य यात्रा के एक और उत्कृष्ट अंक के लिए बधाई।

Saturday, March 21, 2009

सृजन गाथा---गंगा से टेम्स तक हिंदी साहित्य गाथा

पत्रिका-सृजन गाथा, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक,
विशेष-इंटरनेट पर उपलब्ध, संपादक-जयप्रकाश मानस,
संपर्क- http://srijangatha.com/
सृजन गाथा इंटरनेट पर उपलब्ध एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका है। बेव पर उपलब्ध अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में यह अपना विशिष्ठ स्थान रखती है। समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री तथा उसकी प्रस्तुति आकर्षक है। इस अंक में अखिलेश्वर पाण्डेय, कुमार मुकुल, तेजपाल सिंह, अजन्ता शर्मा तथा सुरेश कुमार पंड़ा की कविताएं संजोयी गई हैं। वरिष्ठ कवि अखिलेश्वर की कविता ‘मां की तस्वीर’ तस्वीर के फ्रेम मंे से मां की ममता का आभास पाठकों को कराने में सफल रही है। ‘और हम देखते रहेंगे’ में तेजपाल सिंह मेले, सूखी होली तथा परंपरा आदि पर के साथ ही कुछ करना भी चाहते हैं। प्रवासी कवि रेखा मैत्रा की कविता ‘होली’ तथा माह के कवि ‘विश्वनाथ प्रसाद तिवारी’ ‘पुस्तकंे’ के माध्यम से अतीत और वर्तमान के बीच की खाई को पाटने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। डाॅ. महेश भटनागर, आनंदी सहाय शुक्ल के गीत तथा नरेन्द्र कुमार विजय, डाॅ. यशोधरा राठौर के नवगीत स्वाधीनता, संकट, समर्पण आदि नवीन विषयों का सफलतापूर्वक निर्वाहन करते हैं। श्याम सुमन, अर्चना पंड़ा तथा अशोक अंजुम के गीतों में ग्राम्य जीवन के साथ साथ मानव के लिए शुभकामनाओं का संदेश है। गैर हिंदी भाषी कविताओं के अंतर्गत सिंधी की चैदह कविताएं (विस्सी सदारंगाणी) में समय के साथ साथ चलने की कामना निहित है। हरजीत अटवाल के उपन्यास ‘रेत’ के सोलवें खण्ड को पढ़कर इस उपन्यास के कथ्य को समझा जा सकता है। ‘जोगड़ा बाट जोहता है’ बाल कथा(गिजू भाई बधेका/अनु. काशीनाथ त्रिवेदी) बच्चों के साथ साथ आम पाठक को भी पसंद आने वाली रचना है। आलेख पानी(गंगा प्रसाद बरसैया), अंगद का पांव(नंदलाल भारती) तथा राजस्थानी कहावतों पर वरिष्ठ साहित्यकार विजयदान देथा ने पठनीय तथा डाउनलोड करने योग्य रचनाएं उपलब्ध करायी है। महेश चंद्र द्विवेदी ने विस्तारपूर्वक आतंकवाद तथा उसके दुष्परिणामों पर विचार किया है। अख्तर अली, डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव तथा कृष्ण कुमार यादव के लेख समसामयिक विषयों की गंभीर पड़ताल करते हैं। अंक में ‘होंठ मांगे बांसुरी’(स्नोवा वार्नो), गोमती बुआ(अखिलेश शुक्ल) तथा तूफान(खलील जिब्रान, उर्दू कहानी) सामाजिक संबंधों की व्याख्या युगीन परिवर्तनों के माध्यम से करने में सफल रही है। रामवृक्ष बेनीपुरी तथा अखिलेश्वर पाण्डेय का संस्मरण पाठक को बांधे रखने में सफल रहे हैं। वरिष्ठ कवि तथा रचनाकार अशोक वाजपेजी से और अधिक प्रश्न पूछकर उनके उत्तर जानने की आवश्यकता है। ऐसे प्रश्न जो प्राचीन भारतीय साहित्य तथा वर्तमान लेखन पद्धतियों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाल सके। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार, लघुकथाएं, व्यंग्य, निबंध आदि इस पत्रिका डाउनलोड कर संग्रहित करने के लिए प्रेरित करते हैं। मूल्यवान साहित्यिक रचनाओं से युक्त प्रत्येक हिंदी प्रेमी इंटरनेट उपयोगकर्ता तक पहंुचाये जाने की आवश्यकता है।

Friday, March 20, 2009

आसपास----अलंकरण का विशेष समाचार

पत्रिका-आसपास, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, पृष्ठ-22, मूल्य-वार्षिक 60 रू., संपर्क-एच.3 उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल (म.प्र.)
पत्रिका का यह अंक विविध साहित्यिक समाचारों से अवगत कराता है। सुप्रतिष्ठित गीताकार नईम को एक लाख रूपये की आर्थिक सहायता का समाचार यह संतोष प्रदान करता है कि इससे श्री नईम की बीमारी के इलाज में सहायता मिल सकेगी। उल्लेखनीय के अंतर्गत वरिष्ठ कवि साहित्यकार राजेन्द्र अनुरागी के नाम पर भोपाल की एक सड़क होगी। हिंदी के साहित्यकारों को आमजन की स्मृति में लाने का यह प्रयास प्रशंसनीय है। दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय द्वारा चार वरिष्ठ साहित्यकारों रचनाकारों श्री अशोक चक्रधर, श्री इकबाल मजीद, श्री आबिद सुरती एवं डाॅ. प्रेमलता नीलम को सम्मानित करने का समाचार आसपास के पाठक को जानकारी प्रदान करता है। इस आयोजन से दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय का कद ऊंचा हुआ है तथा पुरस्कारों की गरिमा बढ़ी है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभों में सम्मान पुरस्कार, प्रविष्ठियां, लोकापर्ण, हालचाल आदि भी ‘शब्द शिल्पियों’ को एक दूसरे के ‘आसपास’ लाने में सफल रहे हैं।

आंकठ-------प्रकाश दीक्षित पर एकाग्र

पत्रिका-आकंठ, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिशंकर अग्रवाल, पृष्ठ-40, मूल्य-10रू.,(वार्षिक100रू), संपर्क-इंदिरा गाॅधी वार्ड, वनवारी रोड़, तहसील कालोनी, पिपरिया जिला होशंगाबाद(म.प्र.)
पत्रिका का यह अंक प्रकाश दीक्षित की साहित्यिक उपलब्धियों की पड़ताल करता है। प्रगतिशील रचनाधर्मी प्रकाश दीक्षित ने लगभग तीन उपन्यास, दो नाटक, तीन सौ के लगभग कहानियों सहित सैकड़ों कविताएं लिखी हैं। उनके लेखन की प्रेरणा तथा सृजन की आवश्यकता पर भगवान सिंह निरंजन ने कई प्रश्न पूछे हैं। प्रकाश दीक्षित ने अधिकांश लेखन अपने आसपास के समाज को लेकर किया है। जिसे वे आज के संदर्भ में आवश्यक मानते हैं। ओम प्रकाश शर्मा ने अपने आलेख में प्रकाश दीक्षित के साहित्य की उपयोगिता व महत्व पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है। समीक्षित अंक में प्रकाश दीक्षित की कविताएं तथा उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को प्रकाश में लाने का सफल प्रयास किया गया है। एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

Thursday, March 19, 2009

साहित्य सागर------हास्य व्यंग्य से ओतप्रोत एक और अंक

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.,(वार्षिक250रू), संपर्क-161बी, शिक्षक कांगे्रस नगर, बाग मुगलिया भोपाल म.प्र.(भारत)
साहित्य सागर अपने प्रत्येक अंक में किसी न किसी नए विषय को उठाकर उस पर उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करता रहा है। समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री के साथ साथ व्यंग्य पर विशेष आलेख प्रकाशित किए गए हैं। डाॅ. परसुराम विरही, कुमार सुरेश, डाॅ. देवप्रकाश खन्ना ‘देव’, के आलेख पठनीयता से ओतप्रोत हैं। व्यंग्य लेखों में सतीश चतुर्वेदी, मीरा मानसिंह, गफूर स्नेही तथा डाॅ. पुष्पारानी गर्ग के लेख व्यंग्य के साथ साथ हास्य का पुट भी लिए हुए हैं। पत्रिका के स्थायी स्तंभ में जगदीश किंजल्क, डाॅ. रामकिशन सोमानी, रमेश सोबती, श्रीमती प्रभा पाण्डेय की रचनाएं नयापन लिए हुए है। व्यंग्य कविताओं में रमेश चन्द्र खरे, शंकर सक्सेना, माणिक वर्मा, डाॅ. दामोदर शर्मा, कमलकांत सक्सेना, रमेश मनोहर तथा राम सहाय व्यंग्य के साथ पूरी तरह न्याय कर सके हैं। हास्य व्यंग्य प्रधान इस उत्तम अंक के लिए बधाई।

नया सूरज----बाल पत्रिका का नया अंक

पत्रिका-नया सूरज, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. दीपंकर गुप्त, पृष्ठ-22, मूल्य-20रू.,(वार्षिक200रू), संपर्क-एम.1, शकूरपुर कालोनी, नई दिल्ली 110.034 (भारत)
देश में बहुत सी बाल पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही है। इन पत्रिकाओं में नया सूरज उन सब से हटकर है। बच्चों के लिए इसमें ‘गौतम बुद्ध की कहानी’, ‘सूरज मुस्काया’, ‘एकलव्य’, ‘क्रांतिनायक मंगल पाण्डे’ एंव ‘बहादुर बच्चे’ रोचक कहानियां हैं। पत्रिका बच्चों के मनोरंजन के साथ साथ उनके स्वास्थ्य, शिक्षा व अच्छे नागरिक बनाने के लिए कटिबद्ध है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पत्रिका मंे योग, परीक्षा, खेलकूद एवं विज्ञान से संबंधित सरल सरस आलेखों को समाविष्ट किया गया है। कविताएं, विविध सामग्री, गीत तथा अन्य रचनाएं सुंदर ढंग से संयोजित की गई है। पत्रिका में बच्चों के पत्र तथा उनसे संबंधित समाचार को भी स्थान दिया जाना चाहिए। उत्कृष्ट बाल पत्रिका के लिए बधाई।

Wednesday, March 18, 2009

कथादेश-------नवजीवनवादी साहित्य का प्रस्तुताकत्र्ता


कथादेश, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण जी, पृष्ठ-98, मूल्य-20रू.,(वार्षिक200रू), संपर्क-सी.52/जेड़.3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110.095 (भारत)
कथादेश के समीक्षित अंक में पांच कहानियां शामिल की गई हैं। इनमें देश की बात(हृदेश), लल्लू लाल कौ रूपैया(विभांशु दिव्याल), शतरंज(मुरलीधर), आतंक(विजय शर्मा) तथा सुर न सधे(लवलीन) प्रमुख हंै। हृदयेश की कहानी देश की बात भारतीय ग्रामीण जीवन व उसकी विषमताओं पर विचार करती है। विभांशु दिव्याल ने बहुत ही रोचक शैली में देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर विचार किया है। वे कहानी में यह समझाने में पूर्णतः सफल रहे हैं कि आखिर उस ‘एक रूपैया’ के कितने हिस्से होंगे? वह रूपया जो पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के लिए हैै किस तरह से ऊपर से नीचे तक प्रवाहित होता रहता है। मुरलीधर की कहानी शतरंज तथा विजय शर्मा की कहानी आतंक भी कथ्य एवं शिल्प में अद्वितीय है। पुरूषोत्तम अग्रवाल का आलेख (रामानंद आख्यान के बारे में) तथा शीला इन्द्र का संस्मरण (ऐसी भी एक मां थी) बिलकुल नई विषय वस्तु प्रस्तुत करने में कामयाब रहे हैं। विश्वनाथ त्रिपाठी तथा वरिष्ठ कवि लीलाधर मण्डलोई ने ख्यात कवि सुदीप बनर्जी के व्यक्तित्व की विशेषताओं पर सुदंर ढंग से प्रकाश डाला है। पत्रिका की सबसे अधिक उपयुक्त रचना गुजराती दलित लेखनः अंतरंग पड़ताल है। आलेख में बजरंग बिहारी तिवारी दलित लेखन के विभिन्न दौर के माध्यम से दलित व्यथा का चित्रण करने में सफल रहे हैं। हषीकेश सुलभ मनोज कुलकर्णी तथा रवीन्द्र त्रिपाठी ने अपने अपने आलेखों में विषय वस्तु का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है। कविताओं में सुचेता मिश्र, प्रज्ञा रावत तथा एस.एम. मेहदी की कविताएं उल्लखनीय हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं, साहित्यिक समाचार इस अंक को विशिष्ट बनाने में कामयाब रहे हैं। कथादेश के तेरहवें वर्ष में प्रवेश करने पर हार्दिक बधाई

Tuesday, March 17, 2009

हंस---------पठनीय अंक (संक्षिप्त टिप्पणी प्रथम भाग)

पत्रिका-हंस, अंक-मार्च.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्री राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.,(वार्षिक250रू), संपर्क-2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110.002 (भारत)
पत्रिका के मार्च-09 अंक मंे भी विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री को समाविष्ट किया गया है। कथा प्रधान इस मासिक के समीक्षित अंक में सात कहानियों को स्थान दिया गया है। जिनमें, लो आ गई मैं तुम्हारे पास(स्लोवा वाॅर्नो), बंटवारा(राजन पाराशर), यमन्ना(संतोष साहनी), काली जबान(मिर्जा हामिद बेग), भगवान पायल को बचाए रखना(आर.के. पालीवाल), महामशीन(राजेश जैन) तथा सोप आॅपेरा(विपिन चैधरी) है। ख्यात कवि विचारक सुदीप बनर्जी पर महाश्वेता देवी का आलेख उनके जीवन के उतार चढ़ाव को अपनी संवेदनाएं देता है। शीबा असलम फ़हमी ने अपने आलेख ‘इस्लाम कोई मेन्स ओनली क्लब नहीं’ में मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है। दया दीक्षित ने अपेन साहित्यिक जीवन के विकास के लिए अध्ययन को सर्वोपरि माना है। नरेश कुमार टाॅक, चित्रा जैन, सुधीर सक्सेना, सुधांशु उपाध्याय, अंजना मिश्र, अशोक भाटिया तथा पंकज परिमल की कविताएं सामाजिक स्थितियों व समस्याओं पर दृष्टिपात करती है। जसवीर चावला की लघुकथा एवं डाॅ. रहमान मुसव्विर, माधव कौशिक की ग़ज़लें प्रगतिशीलता का संदेश देती है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षा तथा समकालीन सृजन संदर्भ आदि इसे पठ्नीय अंक बनाते हैं।
नोट- दूसरे भाग के लिए अगली पोस्ट का इंतजार करें।

Sunday, March 15, 2009

केरल हिंदी साहित्य आकदमी शोध पत्रिका---एक अभिनव प्रयास

पत्रिका-केरल हिंदी साहित्य अकादेमी शोध पत्रिका, अंक-अक्टूबर.08, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. एन. चंद्रशेखरन नायर, पृष्ठ-20, मूल्य-20रू.,(वार्षिक80रू), संपर्क-श्रीनिकेतन, लक्ष्मी नगर, पट्टम पालस पोस्ट, तिरूवननतपुरम 695.004 केरल (भारत)
केरल से प्रकाशित समीक्षित पत्रिका की सामग्री पठ्नीय व संग्रह योग्य है। डाॅ. के. मणिकंठन नायर ने राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में बापू और पटेल के योगदान पर विचार किया है। डाॅ. बैजनाथ प्रसाद अपने आलेख में भारत को विभिन्न भाषाओं का देश के साथ-साथ अनुकरणीय संस्कृति का प्रतीक भी मानते हैं। डाॅ. प्रभाकरण हैव्वार इल्लत ने भाषा के संबंध में लिखा है कि वह मानव के बौद्धिक मानसिक चिंतन की कुंजी भी होती है। डाॅ. एन. चंद्रशेखरन नायर का महाकाव्य ‘व्यासदेव’ एक कथा मात्र न होकर मानव के उत्थान का दर्शन है। अंक में श्रीमती उर्मि कृष्ण, अखिलेश शुक्ल, वी. गोविंद शैनाय की लघुकथाएं बाजारवाद के दौर में हमारी अस्मिता की तलाश है। श्रीमती इंदु ने जैनेन्द्र कुमार के कथा साहित्य में त्रिकोणीय प्रेम को उस समय के सामाजिक मूल्यों से जोड़कर विचार किया है। उत्कृष्ट सज्जा व कलेवर तथा शुद्ध त्रुटिविहीन मुद्रण पत्रिका की अनूठी विशेषता है। पत्रिका देखकर सहसा यह विश्वास नहीं होता कि यह केरल से प्रकाशित होती है। इस प्रयास के लिए पत्रिका के संपादक तथा उनके सहयोगी बधाई के पात्र हैं।

Saturday, March 14, 2009

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका----कर्नाटक का साहित्यिक प्रेम

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. वि. रामसंजीवैया, पृष्ठ-48मूल्य-5रू.,(वार्षिक50रू), संपर्क-58, वेस्ट आॅफ कार्ड़ रोड़, राजाजी नगर बंेगलूर 560.010 कर्नाटक (भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक पठ्नीय रचनाओं से युक्त है। अंक में बदलते वैश्विक परिवेश में हिंदी की भूमिका और स्वैक्षिक संस्थाएं’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया है। पहले आलेख में डाॅ. राकेश कुमार शर्मा ने हिंदी की स्थिति पर सरकारी एवं संस्थागत सहयोग के के दृष्टिकोण से विचार किया है। वर्तमान परिवेश में यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाए जाने पर समाज पर उसके प्रभाव का विशेष अध्ययन इस आलेख में पढ़ने में आता है। प्रो. ललिताम्बा ने हिंदी की विभिन्न बोलियों तथा उपबोलियों के विकास को हिंदी का विकास माना है। जिसमें इसे विज्ञान की भाषा बनाना भी शामिल है। स्वैक्षिक संस्थाएं तथा मीडिया इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है। प्रो. एम. ज्ञानम इसकी व्याख्या नए व पुराने के संदर्भ में करते हुए इसे सांस्कृतिक संरक्षण व अस्मिता की भाषा मानते हैं। विश्व में हिंदी व उसका विकास क्रम तथा वर्तमान स्थिति पर डाॅ. टी. जी. प्रभाकर का दृष्टिकोण व्यापक है। डाॅ. एम विमला बदलतेे परिवेश में हिंदी के महत्व को स्वीकार करते हुए इसे सूचना प्रोद्योगिकी की मानक भाषा बनाने पर बल देेती हैं। एच.बी. रामचंद्रन राव हिंदी के विकास में अनुवाद के क्षेत्र को ्रप्राथमिकता देते हैं। वरिष्ठ कवि विष्णु खरे पर डाॅ. एम. शेषन तथा सत्यम वारोट ने आलेख लिखे हैं। इन आलेखों में श्री विष्णु खरे की काव्यगत विशेषताओं पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है। होलिका उत्सव पर सतीश उपाध्याय तथा पं भीमसेन जोशी जी की संगीत यात्रा पर श्री कृष्ण जी जोशी(अनुवाद श्रीमती सुधा गुडगुडी) ने सुंदर विश्लेषण प्रस्तुत किया है। डाॅ. बी. जी. पटैल ‘अंधा युग में युगीन संदर्भ’ ढूंढते हुए इसे आधुनिक सभ्यता तथा मानवता के लिए महाकाव्य निरूपित करते हैं। पत्रिका में हितेश कुमार शर्मा, डाॅ. दिनेश चमोला, राजेश कुमार सिंह, अखिलेश शुक्ल, मित्रेश कुमार गुप्त की कविताएं-लघुकथाएं भी आज की स्थिति का यथार्थवादी चित्रण है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ इसे आकर्षक व पठ्नीय बनाते हैं।

Friday, March 13, 2009

कथा बिंब-------कथा प्रधान त्रैमासिक पत्रिका

पत्रिका-कथा बिंब, अंक-जुलाई-सितम्बर.08, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-माधव सक्सेना ‘अरविंद’, संपादिका-मंजुश्री, पृष्ठ-52, मूल्य-15रू.,(त्रैवार्षिक125रू), संपर्क-ए-10, बसेरा, आॅफ दिनकारी रोड़, देवनार मुंबई 400.988 महाराष्ट्र (भारत)
कथा प्रधान पत्रिका ‘कथा बिंब’ के समीक्षित अंक में पांच कहानियां प्रकाशित की गई है। कोढ़ फूटेगा(नूर मोहम्मद ‘नूर’), राम-जीवन(देवेन्द्र सिंह), हेलिकाप्टर(राजीव सिंह), कस्तूरी(राजेन्द्र रावत) तथा कीड़े(शिवप्रसाद) शामिल हैं। हेलिकाप्टर तथा कस्तूरी कहानियां आज के आम जीवन की अपने कथ्य के माध्यम से जांच पड़ताल करती हैं। इनके कथाकारों ने अपने जीवन अनुभव को आम जन की दुःख तकलीफों के बीच से कथा का रूप दिया है। लघुकथाओं में ज्ञानदेव मुकेश तथा रामकुमार आत्रेय विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। डाॅ. वरूण कुमार तिवारी, डाॅ. प्रभा मजुमदार, चंद्रसेन विराट, जय चक्रवर्ती, साहिल तथा सुरेन्द्र वर्मा की कविताएं तथा ग़ज़लें आकर्षित करती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ समीक्षाएं भी पठ्नीय तथा संग्रह योग्य हैं।

Thursday, March 12, 2009

हिंदी चेतना---------कनाडा से प्रकाशित साहित्यिक त्रैमासिकी

पत्रिका-हिंदी चेतना, अंक-जनवरी-मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रमुख संपादक-श्याम त्रिपाठी’, संपादक-डाॅ. सुधा ओम ढीगरा, डाॅ. निर्मला आदेश, पृष्ठ-62, संपर्क- 6 Larksmere Court, Markham, Ontario L3R 3R1 email hindichetna@yahoo.ca
पत्रिका के समीक्षित अंक में सभी साहित्यिक विधाओं का सुदंर ढंग से संयोजन किया गया है। कविता , गीत, ग़ज़लों में सुधा ओम ढीगरा, रजनी भार्गव, त्रिलोकी नाथ टण्ड़न, शशि पाधा, साहिल लखनवी, प्राण शर्मा, संदीप त्यागी, भगवत शरण श्रीवास्तव, प्रो. देवेन्द्र मिश्रा, सुरेन्द्र भूटानी, कुंवर बेचैन, अमित कुमार सिंह, किरण सिंह, देवमणि पाण्डेय, निर्मल सिद्धू, महेश नंदा ‘शैदा’ की समसामयिक रचनाएं प्रभावशाली हैं। इनमें वर्तमान परिस्थितियों के प्रति चिंता का भाव दिखाई देता है। साथ ही अधिकांश अप्रवासी भारतीय कवियों की कविताएं देश प्रेम तथा भाई चारे की भावनाओं से ओतप्रोत हैं। ख्यात कथाकार तेजेन्द्र शर्मा की कहानी ‘उड़ान’ मुम्बई की पृष्टभूमि पर लिखी गई एक पठ्नीय रचना है। कहानी की पात्र ‘नीलू’ लंदन की उड़ान के माध्यम से वह सब कुछ पा लेती है जो वह पाना चाहती है। प्रख्यात साहित्यकार डाॅ. महीप सिंह से पत्रिका के संपादक श्याम त्रिपाठी की बातचीत व्यक्तिगत संवाद न होकर साहित्य का गहन चिंतन व विमर्श है। अरविंद नागले का चित्रकला संबंधी आलेख ‘वैचित्रय’ उनका कला संबंधी समर्पण दर्शाता है। कनाड़ा की प्रख्यात लेखिका इन्दरा (वडेरा) की प्रश्नोंत्तरी ‘प्रज्ञा परिशोधन’ उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराती है। रचना श्रीवास्तव की बाल कथा ‘हलवा’, इला प्रसाद की कहानी ‘कुंठा’ तथा अतुल मिश्र का व्यंग्य हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचनाएं हैं। डाॅ. राही मासूम रज़ा पर लिखा गया आलेख उनके व्यक्तित्व व कृतित्त्व पर समग्रता से विचार करता है। मुकेश निमामा का ‘यात्रा’ वृत्तांत अल्मोड़ा के साथ-साथ उसके आसपास के स्थलों की सैर कराते हुए उपयोगी जानकारी देता है। पत्रिका की चित्रकार कार्यशाला एक अनूठे ढंग की पेशकश है। नरेन्द्र कोहली का व्यंग्य ‘आत्मरक्षा का अधिकार’ तथा ओंकार त्रिवेदी का आलेख ‘शिष्टाचारः अभिवादन’ संग्रह योग्य रचनाएं हैं। पत्रिका के सभी स्थायी स्तंभ, साहित्यिक समाचार, समीक्षा, पत्र-प्रतिक्रया आदि इसे संग्रह योग्य बनाते हैं। हिंदी चेतना के इस उत्कृष्ट अंक के लिए बधाई।

Wednesday, March 11, 2009

सनद--------साहित्य संस्कृति की पत्रिका

पत्रिका-सनद, अंक-पांच,छः, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-माहेश्वर तिवारी, पृष्ठ-80 मूल्य-20रू.,(वार्षिक125रू), संपर्क-4,बी.फ्रेंड़स अपार्टमेंटस, मधुविहार गुरूद्वारा के पास, पटपड़गंज, दिल्ली 110.092 (भारत)

साहित्य संस्कृति की पत्रिका सनद विगत दो वर्ष से उपयोगी साहित्य प्रकाशित कर रही है। समीक्षित अंक मंे फ़जल इमाम मल्लिक का बहुत ही उपयोगी तथा तथ्यपरक आलेख ‘एटमी करार और मुसलमान’ प्रकाशित किया गया है। लेखक के अनुसार ‘समय के जिस मोड़ पर आज मुसलमान खड़ा है वहां उसे अब तय करना होगा और उन राजनीतिक दलों को बताना है कि अब वह महज राजनीतिक मोहरा नहीं है। फ़जल इमाम मल्लिक ने अल्पसंख्यक शब्द के भ्रमजाल में न उलझते हुए बहुत ही साफगोई के साथ अपनी बात कहीं है। पत्रिका में ज्ञानदेव मुकेश, माधव नागद तथा नदीम अहमद ‘नदीम’ की लघुकथाएं आज के वातावरण में संस्कृति की सुगंध बिखेरती है।
कविताओं में श्रीनिवास श्रीकांत, शबाब ललित, हरिशंकर सक्सेना, डाॅ. रंजना जायसवाल, राधेश्याम शुक्ल ने अत्यधिक प्रभावित किया है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा प्रतिक्रयाएं भी स्तरीय तथा प्रभावशाली हैं।

Tuesday, March 10, 2009

आकंठ--------प्रगतिशील लेखन के लिए

पत्रिका-आकंठ, अंक-जनवरी..2009, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिशंकर अग्रवाल, मूल्य-10रू.,(वार्षिक100रू), संपर्क-इंदिरा गांधी वार्ड, तहसील कालोनी, वनवारी रोड़, पिपरिया जिला म.प्र. (भारत) होशंगाबाद
काव्य प्रधान पत्रिका आकंठ में दुर्गाप्रसाद झाला, प्रभा मजूमदार, महाश्वेता चतुर्वेदी, जनार्दन मिश्र, चांद शेरी, शकूर अनवर, अरूण कुमार शर्मा, संजीव बख्शी, लालजीराम मालवीय, की कविताएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई हैं। प्रकाशित कविताओं व ग़जलों में ग्रामीण जीवन की झलक दिखाई देती है। साथ ही किताबों के प्रति चिंता तथा उल्लासमय जिंदगी की चाह का स्वर गूंजता है। शकूर अनवर की ग़ज़लों में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण दिखाई देता है। पत्रिका के संपादक हरिशंकर अग्रवाल से राजेन्द्र परदेसी की बातचीत व्यक्तिगत न होकर प्रगतिशील चिंतन का आज के संदर्भ में विश्लेषण है। छोटे-से स्थान से प्रकाशित होने वाली छोटी पत्रिका होते हुए भी आकंठ बड़े एवं महत्त्वपूर्ण लक्ष्य लेकर चल रही है। बधाई

Sunday, March 8, 2009

कथा क्रम---------कथा प्रधान त्रैमासिक

पत्रिका-कथा क्रम, अंक-जन.-मार्च2009, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-शैलेन्द्र सागर, पृष्ठ-120, मूल्य-25रू.,(वार्षिक100रू), संपर्क-3, ट्रांजिट होस्टल, वायरलेस चैराहे के पास, महानगर लखनऊ 226.006 उ.प्र. (भारत)
कथा प्रधान पत्रिका कथा क्रम के इस अंक मंे सात बहुत ही अच्छी कहानियां सम्मलित हैं। इनमें प्रमुख हैं- एपेण्डिक्स(सुषमा मुनीन्द्र), भारत भाग्य विधाता(राकेश कुमार सिंह), यहां प्रेतात्माएं रोती हैं(रमेश कपूर), भंवर(शैलेष), कायर(प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव) एवं साथ-साथ, अलग अलग(राजेश झरपुरे)। सभी कहानियां अपने कथ्य व शिल्प की दृष्टि से अलग अलग पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं। विशेष रूप से एपेण्डिक्स तथा साथ-साथ, अलग अलग कहानियां आज के वातावरण मंे पुरानी पीढी व नवीन विचारों के मध्य समन्वय का रास्ता खोजती है। शैलेष की ‘भंवर’ तथा प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव की कहानी ‘कायर’ अपेक्षाकृत विस्तृत केनवास की कहानियां हैं जिनमें विचारों के टकराव के बजाए बचकर निकलने का तरीका ढूंढने का प्रयास किया गया है। लघुकथाओं में रेस(लोकेन्द्र सिंह कोट), नई जात(आलोक कुमार सातपुते) अच्छी लघुकथाएं हैं। शेष में कुछ भी नया पन नहीं दिखाई देता है। नरेश सक्सेना, कुंवर नारायण, सरिता भालोठिया, राहुल झा तथा कुमार विनोद की कविताएं तथ्यपरक रचनाएं हैं जो आज की कविता के सुर में सुर न मिलाते हुए वैश्विीकरण के नफे नुकसान की ओर संकेत करती हैं। पंकज राग की कविता ‘पापा फुग्गा दो’ में बच्चे ने जो अपेक्षाएं की हैं वे आज के पिता द्वारा शायद ही कभी पूरी की जाती हों। ‘पापा अब तुम भी हंसो’ लिखकर पंकज राग आज के कार्यालयीन कल्चर में जी रहे उस ‘खास आदमी’ को सचेत करते हैं। पत्रिका की सबसे अधिक आकर्षक रचनाएं वरिष्ठ साहित्यकार मधुरेश जी व ख्यात कथाकार स्वयंप्रकाश जी की रचनाएं हैं। इन रचनाओं से कथा का क्रम पूरा हो सका है। अन्य स्थायी स्तंभ, रपट, प्रसंगवश आदि भी पत्रिका को उपयोगी तथा पठ्नीय बनाते हैं। (पत्रिका पर सक्षिप्त समीक्षा)

Saturday, March 7, 2009

पूर्वग्रह----------साहित्य एवं कलाओं की आलोचना त्रैमासिकी

पत्रिका-पूर्वग्रह, अंक-जन.-मार्च2009, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ-124, मूल्य-30रू.,(वार्षिक150रू), संपर्क-भारत भवन न्यास, ज. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स, भोपाल 462.002 (भारत)
विश्व प्रसिद्ध साहित्य एवं कला केन्द्र भारत भवन भोपाल द्वारा प्रकाशित पूर्वग्रह का यह 124 वां अंक है। पत्रिका आंशिक रूप से वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण पर एकाग्र है। अंक में उनकी कुछ चुनी हुई कविताएं शामिल हैं। डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय के अनुसार उनकी कविताओं में उदारता एवं संतुलन का अद्भुत समन्वय है। उनका काव्य संग्रह ‘वाजश्रवा के बहाने’ जीवन से पूर्व एवं मृत्यु के बाद के मध्य सेतु का कार्य करता है। अरून्धती सुब्रमण्यम ने उनसे साक्षात्कार कर साहित्य के प्रति उनका अनुराग तथा रचनाशीलता के आयामों को पाठकों के समक्ष लाने में सफलता प्राप्त की है। एक ओर गोविंद चन्द्र पाण्डे ‘वाजश्रवा के बहाने’ संकेत सूत्र ढूंढते हैं वहीं दूसरी ओर कृष्णदत्त पालीवाल उनके साहित्य पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करते हैं। रमेश दवे ने उनमें भारती य संगीत की मधुर ध्वनियां व मानव जीवन की स्मृतियां उद्घाटित करने का सफल प्रयास किया है। रवि भूषण कविवर कुंवर नारायण को मन व बुद्धि से रूपायित करते हैं। ‘दव्हाइट टाइगर’ पर अंग्रेजी भाषा के लेखक अरविंद अडिगा को बुकर पुरस्कार मिला है। द्रोणवीर कोहली ने इसे पिछड़ों को स्वर देने का रचनात्मक प्रयास माना है। लेकिन पिछड़ापन दूर न होने में हमारे देश की दूषित व स्वार्थपरक राजनीति काफी हद तक जिम्मेदार है। साहित्यकारों, लेखकों तथा मीडिया ने भी सिवाय खबरों को चटपटी बनाने के और किया ही क्या है? प्रभा खेतान ने मीडिया में स्त्री की छवि को लेकर विमर्श प्रस्तुत किया है। जो इस विषय पर विस्तार से विश्लेषण कर कुछ नए प्रश्न खड़े करता है। भारत भवन मंे आयोजित ‘स्त्री का सृजन प्रतिरोध’ विषय पर गीतांजलि श्री, मनोज श्रीवास्तव, अनामिका, सारा राय एवं गिरीश रस्तोगी के संपादित अंश पठनीय व संग्रह योग्य हैं। यतीन्द्र मिश्र तथा पार्थिव शाह ने अपने अपने आलेखों में विषय का निर्वाहन बहुत ही सुंदर ढंग से किया है। ज्ञान चतुर्वेदी कमल वशिष्ट, कपिल तिवारी, अमृतलाल बेगड़ के लेख नवनीत मिश्र, राकेश सिंह की कहानी तथा राजी सेठ का समकालीन हिंदी कहानी पर आलेख लीलाधर जगूड़ी व गीत चतुर्वेदी की कविताएं बाज़ारवाद के मध्य से आम जन के लिए सुखमय जीवन का रास्ता खोजती है। पत्रिका संग्रह योग्य पठ्नीय व आकर्षक कलेवर व साज-सज्जा से युक्त है।

Friday, March 6, 2009

शुभ तारिका----साहित्य के लिए शुभ

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-फरवरी 2009, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-38, मूल्य-12रू.,(वार्षिक120रू), संपर्क-कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133.001 हरियाणा (भारत)
शुभ तारिका का समीक्षित अंक वसंत अंक है। अंक में सार्थक तथा उददेश्यपूर्ण लघुकथाएं शामिल हैं जिनमें अरूण कुमार जैन, अलका मित्तल, चेतन आर्य तथा सुनील कुमार चैहान प्रभावित करते हैं। कृष्ण शलभ, वीरेन्द्र गोयल, देवेन्द्र कुमार मिश्रा तथा रमेश प्रसून की कविताएं वसंती रंगों की आभा लिए हुए हैं। आलोक भारती जी से परिचय पाकर सुखद लगा। उनके व्यक्तित्व तथा कृत्तित्व को समेटता हुआ परिशिष्ट पत्रिका को उत्कृष्ट बनाता है। नई कहानी(डाॅ. महाराज कृष्ण जैन) तथा विज्ञान पत्रकारिता(अनिल कुमार) आलेख नई कहानी तथा विज्ञान पत्रकारिता पर गंभीरता से विचार करते हैं। सुखदेव सिंह भंड़ारी की कहानी ‘पूरा आदमी’ व्यक्ति के रिक्त ह्दय में झंकार उत्पन्न करती है। वह झंकार जो मनुष्य को अचेतन से चेतन की ओर ले जाती है। अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं आदि भी रोचक हैं। अच्छे सार्थक अंक के लिए बधाई।

हिमप्रस्थ..... हिमाचल की संस्कृति का वाहक

पत्रिका हिमप्रस्थ, अंक फरवरी.09, स्वरूप मासिक, पृष्ठ56, संपादक रणजीत सिंह राणा, मूल्य5 रू., (50 रू. वार्षिक) सम्पर्क हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला5 (भारत)
पत्रिका के में हिमाचल प्रदेश के साहित्य व संस्कृति से संबंधित आलेखों को शामिल किया गया है। इनमें प्रमुख हैं हिमाचल लोक संगीत में सांगीतिक तत्व (डॉ. आर.एस. सांडिल), हिमाचल में आंदोलन का संगठित स्वरूपः प्रजामंड़ल आंदोलन(डॉ. हिमेन्द्र बाली हिम), चम्बा जनपद में बौद्ध धर्म प्रमुख है। कहानियों में निर्णय(डॉ. दया दीक्षित), घरौंदा(प्रेम गुप्ता मानी) तथा भय का भूत(राजेन्द्र परदेसी) प्रमुख है। अखिलेश शुक्ल का रेखाचित्र ॔शहद बेचने वाले’ म.प्र. ें निवास करने वाली आदिवासी जातियों के कष्टमय जीवन का चित्र खींचती है। उमेश कुमार अश्क, सत्यदेव भारद्वाज, द्विजेन्द्र द्विज, राजेन्द्र निशेश व तेजराम शर्मा कवितओं में प्रभावित करते हैं। अन्य स्थायी स्तंभ तथा समीक्षा पत्रिका के इस अंक को संग्रह योग्य बनाते हैं।

Tuesday, March 3, 2009

साहित्य अमृत......साहित्य एवं संस्कृति का संवाहक

पत्रिका-साहित्य अमृत, अंक-मार्च 2009, स्वरूप-मासिक, संपादक-त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, प्रबंध संपादक-श्यामसुंदर,, पृष्ठ-66, मूल्य-20रू.,(वार्षिक200रू), संपर्क-4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली 110.002 (भारत)
साहित्य अमृत के मार्च 2009 अंक में विविध साहित्यिक सामग्री है। इसमें ‘अंबिका प्रसाद द्विव्य के गीत, कैलाश पचैरी, अरूणेश नीरन की कविताएं प्रभावित करती है। मेजर रतन जांगिड़ की कहानी ‘पीली आंधी उजली धरती’ राजस्थानी पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक अच्छी समसामयिक रचना है। सारंग बारोट की कहानी ‘मां’ (गुजराती से गोपालदास नागर द्वारा अनुवादित) मां के व्यक्तित्व व उनके विभिन्न पहलूओं पर प्रकाश डालती है। होली त्यौहार पर शशिष कुमार निवारी की कविता समाज के कमजोर वर्ग द्वारा त्यौहारांे पर महज खानापूर्ति करने व उसके मनाने के लिए की जाने वाली जद्दोजहद पर विचार करती हुई दिखाई देती है। हरदयाल का आलेख ‘शेखरः एक जीवनी’, रागेय रांघव का काव्य् जगत’(शक्ति त्रिवेदी) तथा श्रवण तट रत्नं हरिकथा’(प्र्रेमप्रकाश पाण्डेय) अपने अपने विषयों को विस्तार से उठाते हुए दिखाई देते हैं। भरत चंद्र मिश्र का संस्मरण, नरेन्द्र मोहन के डायरी अंश तथा मोतीलाल विजयवर्गीय का आलेख ‘हिंदी वर्तनी विचार’ पत्रिका की विविधता को और भी विस्तार देेते दिखाई देते हैं। राजेश्वरी शांडिल्य का आलेख ‘भोजपुरी लोक साहित्य में नारी चित्रण’ पढ़ने पर उद्वहरणों की अधिकता के कारण बिखराव सा आ गया है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ अन्य अंकों की तरह विविधतापूर्ण सामग्री लिए हुए हैं।

Monday, March 2, 2009

साक्षात्कार....साहित्यकारों से साहित्य के लिए

पत्रिका-साक्षात्कार, अंक-दिसम्बर.08, स्वरूप-मासिक, सलाहकार-श्री मनोज श्रीवास्तव, श्रीराम तिवारी, प्रधान संपादक-देवेन्द्र दीपक, संपादक-हरिनारायण, पृष्ठ-120, मूल्य-15रू.,(वार्षिक150रू), संपर्क-साहित्य अकादेमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, बाण गंगा, भोपाल म.प्र. (भारत)
पत्रिका का दिसम्बर .08 अंक साहित्यिक सामग्री से भरपूर है। इस अंक में चन्द्रकांत पाटिल, पे्रमशंकर रघुवंशी, सत्यवान, पल्लवी तिवारी तथा सुदर्शन ‘प्रियदर्शनी’ की अच्छी कविताओं को शामिल किया गया है। पे्रमशंकर रघुवंशी की कविता ‘दुकान के मार्फत ही जाने जाएंगें हमारे घर’ आज के समय में बाजारवाद के हावी हो जाने की ओर संकेत करती है। आज हर व्यक्ति, व्यक्ति न होकर काम करने का उपकरण हो गया है। जिसे कवि ने बहुत ही सूक्ष्मतापूर्वक विश्लेषित किया है। चंद्रकांता की कहानी ‘निर्जन में उत्सव’ तथा विभा रानी की कहानी ‘हर समय एक रत्नाकर’ में कुछ अधिक ही विवरण तथा डिटेल्स का समावेश हो गया है जो कथा की कथात्मकता में बाधा डालती सी प्रतीत होती है। ‘निर्जन में उत्सव’ कहानी में उत्सव जैसा कुछ पढ़ने में नहीं आता है। अनिल माधव दवे का आलेख ‘शताब्दी के पांच काले पन्ने’ एक विचारपूर्ण रचना है जो हमारे अतीत के बारे में पुर्नविचार के लिए कुछ नए प्रश्न सुझाते हैं। हमेशा की तरह अमृतलाल बेगड़ ने अपनी ‘नर्मदा परिक्रमा से पाठक को बांधे रखने में सफलता प्राप्त की है। कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ की आत्मकथा ‘मैं कैसे लेखक बना’ पढ़कर यह जाना जा सकता है कि लेखक बनने के लिए किन किन यातनाओं से होकर गुजरना पड़ता है। ज्योत्सना मिलन का आलेख ‘भारतीय संदर्भ में स्त्री विमर्श’ नारी की सृजनात्मकता पर पाश्चात्य तथा भारतीय वर्ग विभेद से हटकर विचार करता है। उच्च तथा निम्न वर्ग का विभेद न करते हुए लेखिका ने स्त्री की मौलिक प्रतिभा पर हो रहे अन्याय पर भी विचार किया है। पत्रिका की समीक्षाएं अन्य साहित्यिक स्तंभ पूर्व अंक की तरह नई जानकारियां उपलब्ध कराते हैं। इस अच्छी पत्रिका को अपनी पैठ अधिक पाठकों तक बनाने की आवश्यकता है।