
नाट्य व कला पर आधारित पत्रिका का समीक्षित अंक रचनात्मकता से भरपूर है। यह हर्ष का विषय है कि हिंदी में नाट्य विधा पर कार्य करके यह पत्रिका इस विधा में कमी को काफी हद तक पूरा कर रही है। अंक में धरोहर के अंतर्गत उत्तराखण्ड की लोक कथाएं व संस्कृति(डाॅ. शशि पवांर), लोक रंगमंच व रामलीला में लोक कल्याण की भावना(हनीफ भट्टी) हमारी धरोहर के संबंध में अच्छी जानकारी उपलब्ध कराती है। नाट्यालेखों में मैं कोचवान बनूंगा(डाॅ. मनोज श्रीवास्तव), आग(रवीन्द्र राकेश, कु. आलोक) तथा मैं इंसान हूं(सुरेश कांटक) प्रभावशाली रचनाएं हैं। स्मृति शेष के अंतर्गत मुखर्जी दा पर सुधांशु कुमार चक्रवर्ती का लेख संग्रह योग्य रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा सभी स्थायी स्तंभ प्रभावित करते हैं।
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