Monday, August 31, 2009

आप भी साहित्य अमृतपान करें

पत्रिका-साहित्य अमृत अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, प्रबंध संपादक-श्यामसुंदर, पृष्ठ-68, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली110002(भारत)
देश विदेश में प्रख्यात साहित्यिक पत्रिका साहित्य अमृत के सितम्बर 09 अंक में विविधतापूर्ण पठ्नीय सामग्री का प्रकाशन किया गया है। श्रीनारायण चतुर्वेदी जी का स्मरण आलेख ‘हिमालय और मंदिर’ उस क्षेत्र मंे निर्मित मंदिरों का उल्लेख करने के साथ साथ उनकी विशेषताएं भी बताता है। प्रकाशित कहानियों में फौजी काका(आनंद कुशवाहा), तेतरी(सुधा), प्रेरणा(अमनचक्र) तथा सुधा की लघुकथाएं अच्छी तथा सहज सरल रचनाएं हैं। विशेष रूप से तेतरी कहानी के कथोपकथन कहानी की जान है तथा उसकी सरसता को बढ़ाते हैं। आलेखों में ‘पं. विद्यानिवास मिश्र का हिंदी भाषा विमर्श’(रामदरश मिश्र), ‘राष्ट्र जागरण में हिंदी संस्थाओं की भूमिका’(भवानीलाल भारतीय) प्रमुख हैं। इन आलेखों की विषय वस्तु पाठकों को अवश्य ही पसंद आएगी। शिवशंकर मिश्र व अतुल कनक के व्यंग्य प्रभावहीन लगे। विजय वर्मा का डोगरी साहित्य पर लिखा गया आलेख शोध छात्रों के साथ साथ आम पाठक के ज्ञान में वृद्धि करता है। रामनारायण सिंह ‘मधुर’ का यात्रा वृतांत अमरकंटक साहित्यिक रचना होते हुए भी इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पौराणिक पृष्ठभूमि को समुचित ढंग से समेटे हुए है। ब्रज लोक गीतों में राष्ट्रीय चेतना पर लिखे गए आलेख में हर्ष नंदिनी भाटिया को और अधिक संदर्भ जुटाकर आलेख को गंभीर बनाना था लेकिन फिर भी यह अच्छा बन पड़ा है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार खण्ड, समीक्षाएं, कविताएं तथा पत्र आदि प्रभावशाली हैं। अक्षय आमेरिया के चित्रों से झलकता है कि वे एक प्रतिभा सम्पन्न कलाकार हैं। पत्रिका में हिंदी पखवाड़ा व हिंदी भाषा की प्रगति पर उपयोगी तथा समसामयिक संपादकीय लिखा गया है। आज पुनः हिंदी को विश्वस्तर पर अपने शुद्ध रूप में स्थापित करने के लिए राजर्षि टंडन तथा श्री अरविंद जैसी विभूतियों की आवश्यकता हैं।

Saturday, August 29, 2009

क्या आपकों उपयोगी लेखों का खजाना चाहिए?

पत्रिका-हिमप्रस्थ-जुलाई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-56, मूल्य-रू.5(वार्षिक 50रू.), संपर्क-हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला -6,(भारत)
हिमप्रस्थ शासकीय विभाग द्वारा निकलने वाली सामान्य जन की प्रिय पत्रिका है। यह केवल पांच रूपये मासिक में अनमोल साहित्य प्रतिमाह प्रकाशित करती है। समीक्षित अंक में कुछ बहुत ही उपयोगी व समसामयिक आलेख प्रकाशित किए गए हैं। जिनमें ‘अमर कथा शिल्पी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी(राजेन्द्र परदेसी), ‘उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद्र’(जया चैहान), ‘रोरिक आर्ट गेलरीः अदभुत कला संग्रहालय’(सुदर्शन वशिष्ट) एवं वनस्पति अराधना के सांस्कृतिक संदर्भ’(अनुराग विजयवर्गीय) प्रमुख हैं। संतोष साहनी की कहानी वसंत ऐसे भी आया तथा उधार(डाॅ. आदर्श) अच्छी बन पड़ी हैं। लघुकथाओं में सुरेन्द्र श्रीवास्तव, सत्यनारायण भटनागर तथा रौशन विक्षिप्त की रचनाएं समाज को कुछ न कुछ संदेश देती हुई दिखाई देती हैं। संतोष उत्सुक, रचना गौड़, डाॅ. ओम प्रकाश सारस्वत तथा विजय रानी बसंल की कविताएं पठ्नीय हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं तथा समीक्षा व स्थायी स्तंभ भी पाठकों को अवश्य ही पसंद आएंगे।

Wednesday, August 26, 2009

क्या आप खिलखिलाने के साथ साथ चिंतन करना चाहते हैं?

पत्रिका-व्यंग्य यात्रा-जन.-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-प्रेम जनमेजय, पृष्ठ-136, मूल्य-रू.20(वार्षिक 80रू.), संपर्क-73, साक्षर अपार्टमेंटस, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063(भारत)

व्यंग्य साहित्य की सार्थक त्रैमासिकी का समीक्षित अंक संयुक्तांक है। अंक में व्यंग्य गद्य व पद्य की कुछ समसामयिक रचनाएं इस आशय के साथ प्रकाशित की गई है कि यह समाज को दिशा देने का प्रयास करने के साथ साथ जन साहित्य को आम लोगों तक पहंुचाएगी। अंक में कुछ कालजयी रचनाएं जैसे शरद जोशी की सरकार का जादू, रवीन्द्र नाथ त्यागी की तीन मिनी कथाएं हर समय काल तथा हाल में पसंद की जाएंगी। ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास अंश ‘मर गए बब्बा’ पढ़कर इस उपन्यास को पढ़ने के लिए पाठ्क अवश्य ही बेताब रहेगा। जितनी चुटीली कटीली तथा असरकारक भाषा का प्रयोग ज्ञान जी ने किया है वह पाठक को अंक तक बांधे रखती है। अन्य रचनाओं में संपादक व्यंग्यकार पे्रम जनमेजय का व्यंग्य नाटक तथा सी भास्कर राव, के.पी. सक्सेना दूसरे, रामकुमार कृषक, रमेश सेनी, शम्भुनाथ सिंह, यश गोयल, राजेन्द्र उपाध्याय, अशोक गौतम, अनुराग वाजपेयी तथा योगेन्द्र दवे की रचनाएं अधिक प्रभावशाली हैं। व्यंग्य कविताओं में रामदरश मिश्र, शशि सहगल, दिविक रमेश, यज्ञ शर्मा, चांद शेरी तथा अक्षय जैन व्यंग्य की समझ तथा अंर्तवस्तु को प्रगट कर सके हैं। अंक के अन्य स्थायी स्तंभ आलेख तथा सामग्री व स्तरीय व पठ्नीय है। अब यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि डाॅ. प्रेम जनमेजय एक सफल तथा सिद्ध व्यंग्यकार के साथ साथ कुशल संपादक भी हो गए हैं। अंक की अच्छी प्रस्तुति तथा साज सज्जा के लिए बधाई।

Sunday, August 23, 2009

साहित्य में लघुत्तम महत्तम से भी बढ़कर-समावर्तन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रमेश दवे, पृष्ठ-96, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-‘माधवी’ 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.(भारत)
पत्रिका का यह अंक ख्यात कथाकार व्यंग्यकार सूर्यबाला के साहित्य सृजन कर्म पर एकाग्र है। उनसे सूर्यकांत नागर ने जा साक्षात्कार लिया है उससे उनके रचनाकर्म के महत्वपूर्ण पहलूओं को पाठक को जानने का अवसर मिला है। उन्होंने अपने आलेख में चुनौतियों पर भी विचार किया है। उनकी सारिका पत्रिका में प्रकाशित पहली कहानी ‘जीजी’ कहीं से भी नहीं लगती की यह किसी लेखिका के प्रारंभिक दिनों की कहानी है। पत्रिका में प्रकाशित कहानी वाब(प्रताप सहगल) तथा मां(क्षमा शर्मा) भी पठ्नीय व सारगर्भित रचनाएं हैं। ख्यात सिरेमिक कलाकार देवीलाल पाटीदार पर सामग्री शायद ही किसी अन्य पत्रिका में मिले? इस तरह के रचनाधर्मियों को अंक में स्थान देकर समावर्तन सच्चे अर्थ में कला संस्कृति साहित्य की पत्रिका बन सकी है। भारतीय एवं आंग्ल साहित्य में जीवनीयों तथा आत्मकथाओं की तुलना कर भारत भारद्वाज ने श्रेष्ठ जीवनियों तथा आत्मकथाओं की चर्चा की है। साथ ही यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि इस तरह का साहित्य सत्य के अधिक करीब तथा किसी दुराग्रह से परे होना चाहिए। अरूणेश शुक्ल, सुरेश पण्डित तथा विष्णुदत्त नागर के आलेख समसामयिक तथा पाठकों को उपयोगी जानकारी प्रदान करने वाले हैं। मोहम्मद रफीक खान तथा विलास गुप्ते ने अपने अपने आलेखों में विषय वस्तु को ग्राह्य बनाने का सर्वोत्तम प्रयास किया है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। राजेन्द्र परदेसी, अखिलेश शुक्ल तथा पिलकेन्द्र अरोरा की लघुकथाएं पत्रिका की गरिमा में वृद्धि करती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, समीक्षाएं तथा रचनाएं भी आकर्षक व सुरूचिपूर्ण हैं। प्रधान संपादक रमेश दवे का संपादकीय आजादी के बाद रचे गए साहित्य पर संक्षिप्त किंतु उपयोगी टिप्पणी करता है।

Friday, August 21, 2009

इसमें पढ़ने के लिए बहुत कुछ है--संदर्भ प्रेरणा

पत्रिका-प्रेरणा, अंक-जुलाई-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-अरूण तिवारी, पृष्ठ-178, मूल्य-रू.20(वार्षिक 100रू.डाक व्यय सहित), संपर्क-ए-4, पेलेस आर्चड़ रोड़, फेज़-03, सर्वर्धम के पीछे, कोलार रोड़, भोपाल म.प्र.
पत्रिका के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री का समावेश किया गया है। प्रमुख आलेखांे मंे शिवसिंह पतंग, डाॅ. सुभाष रस्तोगी, राधेलाल विजघावने, परमानंद श्रीवास्तव, विजय मोहन शर्मा, पुष्पलता सिंह, सुरेश पण्डित तथा प्रमोद भार्गव के आलेख पठ्नीय तथा विचारपूर्ण है। विमर्श के अतंर्गत षीना एन.बी. तथा डाॅ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’ विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। कहानियों में साहब का कुत्ता(प्रद्युम्न भल्ला), मकड़ी का जाल(कैलाश चंद्र जायसवाल) तथा रेशमी लिहाफ(विनीता अग्रवाल) आज के समय को व्यक्त करती हुई रचनाएं हैं। कमल चोपड़ा तथा अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं लघु होेते हुए भी किसी उपन्यास की सी मारक क्षमता रखती हैं। कविताओं में ड़ाॅ. सरोजनी प्रीतम, राजेन्द्र उपाध्याय, राग तेलंग, केशव तिवारी, रति सक्सेना, नवल जायसवाल, दिनकर कुमार रचनाओं के साथ सच्चे अर्थ में न्याय कर सके हैं। इन कविताओं में कथ्य की पुनरावृति की अपेक्षा शिल्पगत तथा विधागत नवीनतादं दिखाई देती हैं। कैलाश पचैरी, अदिति मिश्र, राम मेश्राम तथा अनिरूद्ध सिन्हा, अशोक अंजुम, भागवत प्रसाद राय की ग़ज़लें नए दौर की ग़ज़ल व कविताएं हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं, पत्र, परिचर्चा तथा संपादकीय स्तरीय तथा पठ्न योग्य है। एक अच्छे अंक के लिए संपादक तथा उनकी टीम बधाई की पात्र है।

Thursday, August 20, 2009

हिंदी साहित्य का विशिष्ट अर्थ--वागर्थ

पत्रिका-वागर्थ, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-138, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-भारतीय भाषा परिषद्, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017(भारत)
वागर्थ के समीक्षित अंक मंे साहित्य की उन विषयों को शामिल किया गया है जो आने वाले कुछ वर्ष मंे भारतीय साहित्य जगत का हिस्सा बनेंगे। संपादक श्री विजय बहादुर सिंह ने बहुत सटीक लिखा है कि ‘कवि या लेखक का सच्चा सृजन-विवेक यही है कि वह अपन और अपनी कविता/साहित्य की राजनीति को समझे। यही उकसी गतिशीलता होगी, उन तमाम मानसिक जड़ता के विरूद्ध जो उसके काव्य बोध को घेर कर खड़ी है। यही प्रगतिशीलता भी।’ पत्रिका में कृष्ण प्रताप सिंह तथा प्रदीप सक्सेना अपने अपने आलेखों में आम जनता तक अपनी बात पहंुचाने के लिए जिस मार्ग का चयन करते हैं वह अपने आप में परिपूर्ण है। विमर्श के अतंर्गत रंजना जायसवाल वर्तमान स्त्री विमर्श का सच उजाकर करती हुई प्रतीत होती है। विद्यासागर नौटियाल का संस्मरण पाठक को अपने पठ्न जाल में बांध-सा लेता है। हमेशा की तरह गुलज़ार की कविताएं आम जन की कविताएं ही प्रतीत होती हंै। ख्यात लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव ने तुलसी साहित्य पर नए तरीके से विमर्श प्रस्तुत किया है। इसमें सुंदरकाण्ड पर आधुनिक बोध के माध्यम से विचार करते हुए दिखाई देते हैं। हनुमान जी के चरित्र के सकारात्मक पहलू को जिस ढंग से उन्होंने स्पष्ट किया है वह पठ्नीय तथा संग्रह के योग्य है। उर्मिला खारपुसे तथा आकृति पाण्डे की कविताएं चमत्कार से कोसों दूर रहकर वास्तविकता के धरातल पर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। ख्यात आलोचक, लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के स्मरण खण्ड़ के अंतर्गत बलराज साहनी, शिवानी, डाॅ. नामवर सिंह तथा नवल जी के विचार जानकर द्विवेदी जी की साहित्यिक प्रतिब्धता के प्रति बहुत कुछ जाना जा सकता है। धु्रव गुप्त की ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल को नया रूप देने का सफल प्रयास है। कहानी खण्ड़ के अंतर्गत तीनों कहानियां उल्लेखनीय बन पड़ी हैं। जयशंकर की कहानी मंजरी, हसन जमाल की कहानी नामुराद तथा रमेश दवे की कहानी विज्ञापन को एक साथ पढ़ा जाए तो इन कहानियों के बीच से आज के आम आदमी के जीवन में रोशनी देने वाले रास्ते को खोजा जा सकता है। पत्रिका की अन्य कविताएं, समीक्षाएं स्थायी स्तंभ, पत्र आदि भी उपयोगी तथा पठ्नीय बनातेे है। ईश्वर से कामना है कि वह इसे डाॅ. विजय बहादुर सिंह के मार्गदर्शन में विश्व साहित्य के शिखर तक ले जाए।

Wednesday, August 19, 2009

आपकी हम सबकी एक ही ज़बान--हिदुस्तानी ज़बान

पत्रिका-हिंदुस्तानी ज़बान, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ-52, मूल्य-रू.10(वार्षिक 40रू.), संपर्क-महात्मा गाॅधी मेमोरियल रिसर्च सेन्टर एवं लाईबे्ररी, महा. गाॅ. बिल्ंिडग, 7 नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई 400.002(भारत)
हिंदी व उर्दू ज़बान में प्रकाशित इस पत्रिका में गाॅधी साहित्य विशेष रूप से प्रकाशित किया जाता है। समीक्षित अंक में समसामयिक आलेख प्रकाशित किए गए हैं। इनमें नारी आंदोलन का उदयः संदर्भ और मुद्दे(डाॅ. मनोज पाण्डेय), आधुनिक कथा साहित्य में समाज चित्रण(डाॅ. सुशील कुमार शर्मा), रहस्यवाद और मीरा की काव्य साधना(डाॅ. राजेन्द्र परदेसी) तथा श्रीकृष्ण की उपासियका कवयित्री ‘ताज’(डाॅ. परमानंद पांचाल) प्रमुख हैं। इन आलेखों में विषय को नवीन अनुसंधानों के आधार पर संजोया गया है। पत्रिका में पुस्तक समीक्षा, पत्र सम्पादकी आदि भी प्रभावशाली हैं। उर्दू के जानकारों के लिए इस खण्ड की रचनाएं प्रभावित करती हैं।

Tuesday, August 18, 2009

दक्षिण में हिंदी की ध्वजवाहक-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-जुलाइ.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ.बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक-डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ-48, मूल्य-रू.5(वार्षिक50रू.), संपर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट ाआॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर कर्नाटक(भारत)
दक्षिण भारत में हिंदी को आम जन तक पहुंचाने वाली इस पत्रिका की जितनी तारीफ की जाए कम है। इससे जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति तथा उसके समपर्ण की भावन राष्ट्रीयता से ओतप्रोत है। जिसकी झलक इस अंक में भी दिखाई देती है। अंक में प्रभुलाल चैधरी, डाॅ. महेश चंद्र शर्मा, डाॅ. एम. नारायण रेड्डी, पी. सरस्वती, डाॅ. एम. शेषन दक्षिण भारतीय हिंदी के विद्वान है जिनकी विषय पर पकड़ शेष भारत के किसी हिंदी लेखक से कमतर नहीं है। डाॅ. अमर सिंह बधान का लेख ‘भारतीय भाषाओं में आपसी समन्वय जरूरी’ पत्रिका के राष्ट्रीय स्वरूप को स्वर प्रदान करता है। डाॅ. गोरखनाथ तिवारी, आई. साजिया फरहाना, कृष्णपाल सिंह गौतम तथा आर. के. भारतद्वाज के आलेख हिंदी साहित्य को विभिन्न भारतीय विषयों से जोड़ते दिखाई देेत हैं। एस.पी. केवल की कहानी, नलिनीकांत, ओम रायजादा, अंजु दुआ जैमिनी तथा भानुदत्त त्रिपाठी ‘मधुरेश’ की कविताएं बहुत ही अच्छी रचनाएं हैं। केवल 5 रू. की कीमत में उपलब्ध इस पत्रिका को अवश्य ही पढ़ा जाना चाहिए।

कविताओं के लिए एक ‘अभिनव प्रयास’

पत्रिका-अभिनव प्रयास, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-अशोक अंजुम, पृष्ठ-32, मूल्य-रू.15(वार्षिक150रू.), संपर्क-615,ट्रक गेट, कासिमपुर, अलीगढ़ उ.प्र (भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में ग़ज़ल, गीत, दोहे, हाइकू तथा मुक्तक को बहुत ही संुदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नीरज, जहीर कुरेशी, दीप विलासपुरी, अजीत सिंह बादल, मनोहर विजय तथा संजीव गौतम की ग़ज़लें बहुत ही उद्देश्यपूर्ण व सार्थक रचनाएं हैं। कुमार ललित व गोविंद सेन के दोहे नए संदर्भ की प्रस्तुति का सफल प्रयास है। महेश अनथ, अशोक गीते, निरूपम, तिलकराज गोस्वामी तथा सतीश गुप्ता के गीत नवगीत गुनगुनाने के लिए बाध्य करते हैं। रमेश राज व राजीव नामदेव के हाइकू पाठक को अवश्य ही पसंद आएंगे। कृष्ण कुमार यादव, अखिलेश शुक्ल, विनोद कुमार की कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। पत्रिका का स्वरूप काव्य प्रधान होते हुए भी इसमें सरसता व सरलता है जो विशेष रूप से प्रभावित करती है।

Monday, August 17, 2009

नारी चेतना की प्रगतिशील पत्रिका-नारी चेतना

पत्रिका-नारी चेतना, अंक-जुलाई-अगस्त.09, स्वरूप-द्वैमासिक, संपादक-डाॅ. रचना निगम, पृष्ठ-40, मूल्य-रू.20(वार्षिक 80रू.), संपर्क-15 गोयामेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमंेट्स, बी-ब्लाक, द्वितीय तल, एस/3, प्रताप नगर बड़ोदरा (गुजरात)
पत्रिका विशेष रूप से दलित, पिछड़ी हुई तथा समाज में पूर्णतः उपेक्षित स्त्री पर सामग्री प्रस्तुत करती है। नारी चेतना विशेष रूप से नारी से संवाद का बेहतर मंच है। इस अंक में डाॅ. रूखसाना सिद्दकी, कल्पना वशिष्ट तथा शरद सिंह के आलेख नारी सशक्तीकरण के लिए प्रयासरत दिखाई देते हैं। सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘छुट्टी’ एक विचारणीय रचना है। नसीम अख्तर प्रेमिला भारद्वाज, पूजा रामबीर माहला की कविताएं अच्छी तथा सारगर्भित रचनाएं हैं। अखिलेश शुक्ल तथा मीरा शलभ की लघुकथाएं पत्रिका के स्तर में वृद्धि करती है। अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, समाचार तथा समीक्षाएं भी स्त्री चेतना को वाणी प्रदान करते हैं।

गागर में सागर है पत्रिका-साहित्य सागर

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-रू.20(वार्षिक200रू.), संपर्क-161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल (म.प्र.)
पत्रिका के समीक्षित अंक में रमेश सोबती, जीवराज सिंधी, कमला चतुर्वेदी के आलेखों को स्थान दिया गया है। भारती राउत की ललित निबंधात्मक कहानी तथा पे्रमलता नीलम की लघुकथाएं पठ्नीय हैं। रेखा कक्कड़, सनातन कुमार वाजपेयी, कैलाश जायसवाल तथा आचार्य भगवत दुबे की कविताएं विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। ख्यात साहित्कार श्याम बिहारी सक्सेना पर एकाग्र परिशिष्ट पाठकों को अवश्य ही पसंद आएगा। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार, पत्र खण्ड तथा समीक्षाएं अन्य अंक की तरह संुदर ढंग से प्रस्तुत की गई है।

शब्द शिल्पियों के आसपास-साहित्यिक समाचार से जुड़ी पत्रिका

पत्रिका-आसपास, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, पृष्ठ-24, मूल्य-रू.60वार्षिक(आजीवन 1000रू.), संपर्क-एच.04, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल (म.प्र.)
ख्यात आलोचक, समीक्षक डाॅ. धनंजय वर्मा के अमृत महोत्सव से संबंधित सामग्री का पत्रिका के समीक्षित अंक में समावेश किया गया है। वसंत सकरगाए ने उनके लेखन पर संक्षिप्त किंतु सारगर्भित लेख लिखकर महोत्सव को स्मरणीय बना दिया है। अन्य समाचारों में माधवराव सप्रे संग्रहालय में पत्रकार अलंकृत, अशोक चक्रधर हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष, हर कदम संघर्ष है साहित्यिक पत्रिका का समावेश किया गया है। लोकापर्ण, पुरस्कार तथा देश विदेश तथा प्रदेश की साहित्यिक गतिविधियों को आकर्षक ढंग से पत्रिका मंे संजोया गया है। साहित्यिकारों के लिए यह संतोष का विषय है कि पत्रिका अपने सीमित संसाधनों से उपयोगी तथा सूचनापरक जानकारी उपलब्ध करा रही है।

Sunday, August 16, 2009

अब नव साहित्यकारों को प्रोत्साहन कैसे मिलेगा?--संदर्भ प्रोत्साहन

पत्रिका-प्रोत्साहन, अंक-73(श्रद्धांजलि अंक), स्वरूप-त्रैमासिक, संस्थापक- स्व.श्री जीवितराम सेतपाल, सम्पादक-श्रीमती कमला सेतपाल, सजावट-महिमा सेतपाल, पृष्ठ-26, सम्पर्क-ई-3/307, इन्लैक्स नगर, यारी रोड़, वर्सोवा, अंधेरी (पश्चिम), मुम्बई
पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार, लेखक तथा संपादक स्व. श्री जीवितराम जी सेतपाल के समग्र कृतित्व पर एकाग्र है। सेतपाल जी ने साहित्य सृजन के साथ साथ नए साहित्यकारों को ‘प्रोत्साहन’ देते हुए अपनी पत्रिका में हमेशा स्थान दिया था। वे लेखक से भी बढ़कर एक अच्छे प्रोत्साहक थे जिनके मार्गदर्शन में अनेक लोग साहित्य से जुुडे़। समीक्षित अंक में राजेश विक्रांत, मोतीलाल मिश्र, मनोज सोनकर, डाॅ. अवधेश, डाॅ. पराड़कर, डाॅ. गोपाल हीरानंदानी, देवेश ठाकुर तथा मधुराज मधु के आलेख उन्हंे सच्ची श्रृद्धांजलि देते हैं। मोहनलाल पोहूमल शर्मा, सुदर्शन शर्मा, चंद्रसेन विराट, देवी नागरानी तथा सरताज मेहदी के आलेख उनके समग्र लेखन जीवन शैली तथा साहित्य संपादन का विश्लेषण करते हैं। डाॅ. मिर्जा हसन नासिर तथा रति लाल साहिन ने उनके जीवन के महत्वपूर्ण पढ़ाव तथा आने वाले उतार चढाव पर प्रकाश डाला है। कथा चक्र परिवार की ओर से प्रोत्साहनकत्र्ता स्व. सेतपाल जी को विनम्र श्रृद्धांजलि।

साहित्य के हमेशा से शुभ रही पत्रिका--शुभ तारिका

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-जुलाई09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-34, मूल्य-रू.12 (वार्षिक रू.120), संपर्क-कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी अम्बाला छावनी, हरियाणा(भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक स्व. श्री विष्णु प्रभाकर जी के साहित्य पर एकाग्र है। पत्रिका में उन पर प्रबोध कुमार गोविल, यश खन्ना ‘नीर’, आनंद प्रकाश आर्टिस्ट तथा अशेष ने विस्तारपूर्वक आलेख लिखे हैं। पत्रिका की अन्य रचनाओं में अरूण जैन, सुखचैन भंडारी, अजय जैन की लघुकथाएं अच्छी हैं। रचना निगम, विनय मिश्र तथा पंकज शर्मा की कविताएं आज के संदर्भ को विश्लेषणात्मक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार, समाचार तथा समीक्षाएं पूर्व अंकों की तरह आकर्षक व प्रभावशाली हैं।

Tuesday, August 4, 2009

साहित्य की प्रदक्षिणा--संदर्भ साहित्य परिक्रमा

पत्रिका-साहित्य परिक्रमा, अंक-अप्रैल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रबंध संपादक-जीत सिंह जीत, संपादक-मुरारीलाल गुप्त ‘गीतेश’, प्रकाशक-श्रीधर पराड़कर, अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास, पृष्ठ-64, मूल्य-रू.15 (वार्षिक रू.60), संपर्क-राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर 474.001म.प्र.(भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में डाॅ. कृष्ण चंद्र गोस्वामी ने हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि दिनकर जी के अवदान पर प्रकाश डाला है। प्रो. चमनलाल गुप्त ने कमलेश्वर के द्वारा लिखे गए ख्याति प्राप्त उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ पर एक नए दृष्टिकोण से विचार किया है। लोक चेतना के कवि भूषण की काव्य दृष्टि पर प्रो. त्रिभुवनलाल शुक्ल का विचार पत्रिका की महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। डाॅ. कन्हैया सिंह जी के आलेख को पढ़कर लगता है कि उन्होंने ख्यात कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध का संपूर्ण साहित्य पढ़े बिना ही आलेख लिख डाला है। रमेश चंद्र पंड़ित तथा सीताराम गुप्ता की कथाएं अच्छी बन पड़ी हैं। नरेन्द्र आहूजा की अपेक्षा अब्बास खान ‘संगदिल’ का व्यंग्य ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ अधिक प्रभावशाली है। पत्रिका की कविताएं, साहित्यिक समाचार तथा समीक्षाएं भी इसे अग्रिम पंक्ति में स्थान दिलाते हैं। समग्र रूप से साहित्य परिक्रमा समकालीन सारगर्भित साहित्य प्रस्तुत करती है।

Monday, August 3, 2009

आमजन के लिए साहित्य का कथन-संदर्भ कथन पत्रिका

पत्रिका-कथन, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-संज्ञा उपाध्याय, संस्थापक-रमेश उपाध्याय, पृष्ठ-100, मूल्य-रू.25 (वार्षिक रू.100), संपर्क-107 साक्षर अपार्टमेंट, ए-3 पश्चिम विहार नई दिल्ली
भारत कथन का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार स्व. श्री विष्णु प्रभाकर पर आंशिक रूप से एकाग्र है। हालांकि पत्रिका ने इस बात की घोषणा तो नहीं की है कि अंक की रचनाएं उन्हें समर्पित हैं पर पत्रिका का मूल स्वर स्पष्ट करता है कि स्व. श्री विष्णु जी पर एकाग्र रचनाएं तथा संस्मरण पत्रिका से उस महान साहित्यकार के संबंध किस तरह के थे। कहानी ‘कितने जेबकरते’ पढ़कर समझा जा सकता है कि आज भी परिस्थितियों में कोई विशेष फर्क नहीं आया है। नंद भारद्वाज की कहानी ‘उलझन में अकेले’ भी एक प्रभावशाली रचना हैं लेकिन आर. के. पालीवाल की कहानी ‘अनगढ़ हीरे’ दिल्ली की ट्रेवल कम्पनियों के ड्रायवरों की जिंदगी तथा उनकी मनः स्थिति पर प्रकाश डालती है तथा उनके कल्याण के लिए मार्ग सुझाती है। अंक में नईम, महेन्द्र नेह तथा पवन करण की कविताएं दिल को झंकृत करती प्रतीत होती है। लेकिन सविता भार्गव की कविताओं पर लीलाधर मण्डलोई का आलेख कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण लगा। उन्हंे इस अतिवाद से बचना चाहिए। तेलुगु कहानी ‘सामूहिक मृत्युदंड़’ के हिंदी अनुवाद में अनुवादक आर. शांता संुदरी ने कथा का अनावश्यक हिंदीकरण कर दिया है जिससे उसकी मौलिकता तथा प्रवाह पर खराब प्रभाव पड़ा है। सरला संुदरम तथा मुकुल शर्मा के आलेख नए विषयों की साहित्यिक प्रस्तुति का सफल प्रयास है। विचार चर्चा के अंतर्गत सभी आलेख विशेष रूप से प्रभात पटनायक तथा वंशी वकुलाभरणम विषय की गहराई तक पहंुच सके हैं। हमेशा की तरह ज्वारीमल्ल पारख ने फिल्मों के बहाने आम आदमी से संवाद स्थापित किया है। उत्पल कुमार, चंद्रेश तथा संज्ञा उपाध्याय ने संक्षिप्त किंतु सटीक समीक्षा लिखी है। पत्रिका कुछ गिने चुने लेखकों की वजह से एकाकी मार्ग होती जा रही है जबकि इसे फोर लाईन राजमार्ग होना चाहिए। आशा है पत्रिका की नवोदित संपादक संज्ञा उपाध्याय इस तथ्य पर विशेष ध्यान देगीं।

Sunday, August 2, 2009

आओ विश्व नाट्य साहित्य की खबर पढ़ें -संदर्भ इप्टा वार्ता

पत्रिका-इप्टा वार्ता, अंक-जनवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हिमांशु राय, पृष्ठ-08, मूल्य-रू.5 (वार्षिक रू.50), संपर्क-पी.डी. 04, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर, जबलपुर-02 म.प्र.(भारत)
इप्टा वार्ता नाट्य समाचार की प्रमुख मासिक पत्रिका है। पत्रिका के समीक्षित अंक में मुखपृष्ठ पर आसिफ अली लिखित निर्देशित नाटक 50 मिनिट 60 सेकेण्ड का समाचार है। यह नाटक भूमिगत क्रांतिकारियों के संघर्ष, स्वप्न और मृत्यु का वरण करने से पहले जिंदगी को जी भरकर जी लेने की लालसा को पेश करता है। समाचार पत्र ने जयपुर के ‘कथा रंग’ आयोजन का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया है। ख्यात चित्रकार मंजीत बावा के निधन पर रंग अनुभव के अंतर्गत उनसे जुड़े प्रसंगों को विस्तृत रूप से पत्रिका ने प्रकाशित किया है। अजित राय ने 11 वे भारत रंग महोत्सव की रिपोर्टिग बहुत ही साफगोई से की है। इस रिपोर्ट में उन्होंने देश भर में आयोजित रंगकर्म का लेखा जोखा प्रस्तुत किया है। रंग खजाना के अंतर्गत रमेश राजहंस ने निदेशक के लिए आवश्यक गुण तथा उसके बुद्धि व चातुर्य तथा कौशल पर प्रकाश डालते हुए अभिनय के विभिन्न आयामों से पाठक का परिचय कराया है। रंग खबर के अंतर्गत जबलपुर में आयोजित राष्ट्रीय नाट्य समारोह 2008 की खबर रोचक होने के साथ साथ ज्ञानवर्धक भी है। पत्रिका का नकारात्मक पक्ष यह है कि यह समीक्षा के लिए अधिक देर से उपलब्ध होती है जिसके कारण से खबरें पुरानी पड़ जाती हैं। फिर भी अच्छी पत्रिका के लिए कथा चक्र परिवार की ओर से बधाई।

Saturday, August 1, 2009

समय से मुलाकान कराती पत्रिका--साक्षात्कार

पत्रिका-साक्षात्कार, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, सलाहकार-मनोज श्रीवास्तव(सचिव संस्कृति विभाग), श्रीराम तिवारी(संचालक संस्कृति संचालनालय) प्रधान संपादक-देवेन्द्र दीपक(निदेशक साहित्य अकादेमी भोपाल), संपादक-हरि भटनागर, पृष्ठ-120, मूल्य-रू.15 (वार्षिक रू.150), संपर्क-साहित्य अकादमी, म.प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन वाण गंगा भोपाल-03 म.प्र. (भारत)
समय से साक्षात्कार कराने वाली यह पत्रिका दिन प्रतिदिन निखरती जा रही है। हालांकि इसके आलोचक इसमें ऐसा कुछ नहीं पाते जो उल्लेखनीय हो। पर ऐसा भी नहीं है कि पत्रिका ने केवल गैर प्रगतिशील साहित्य ही प्रकाशित किया है। दरअसल प्रगतिशीलता के मायने समय के साथ बदलते जा रहे हैं। इस सदी में प्रगतिशीलता पर नए सिरे से विचार किए जाने की आवश्यकता है। अच्छा तो यह होगा कि प्रगतिशीलता को भूमंड़लीकरण से समय रहते जोड़ लिया जाए। इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए पत्रिका ने सूर्यबाला, जीवन सिंह ठाकुर व इंदिरा दांगी की जीवंत तथा समय के सापेक्ष कहानी लिखी है। भालचंद्र झा, राजेन्द्र उपाध्याय, विनीता गुप्ता, उमेश नेमा तथा देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के गीत अच्छे बन पड़े हैं। आलेखों में विष्णु प्रभाकर तथा ओम भारती विषय की गहराई तक सुंुदर ढंग से पहंुच सके हैं। पारमिता सतपथी ओडिया कहानी का सटीक अनुवाद राजेन्द्र प्रसाद मिश्र ने किया है। श्रीराम परिहार जी का निबंध तथा अमृतलाल वेगड़ की नर्मदा यात्रा पाठक के मन में तरंगों को उत्पन्न करती हैं। पत्रिका के सभी स्थायी स्तंभ, पत्र, समीक्षाएं तथा लघुपत्रिकाओं पर लिखा गया संपादकीय प्रभावशाली है। पत्रिका में हिंदी साहित्य पर लिखे जा रहे ब्लाॅग पर भी कुछ सामग्री प्रकाशित किए जाने की आवश्यकता है। क्योंकि जो काम पत्रिका की अनेक प्रतियां नहीं कर सकती वह काम ब्लाॅग का छोटा सा आलेख कर सकता ै। आशा है पत्रिका का ब्लाॅग के साहित्य जगत से अवश्य ही ‘साक्षात्कार’ होगा।