पत्रिका: सरस्वती सुमन, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: आनंद सुमन सिंह, अतिथि संपादक: कृष्ण कुमार यादव, पृष्ठ: 180, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: saraswatisuman@rediffmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0135.2740060, सम्पर्क: 1, छिब्बर मार्ग,(आर्यनगर), देहरादून 248001
पत्रिका का समीक्षित अंक लघुकथा विशेषांक है। अंक में 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं को उनके परिचय के साथ प्रकाशित किया गया है। इसके अतिरिक्त लघुकथा विधा पर आलेख भी प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं। लघुकथाओं पर वैसे तो बहुत सी पत्रिकाओं के अंत पिछले कुछ वर्षो में प्रकाशित हुए हैं। पर सरस्वती सुमन का यह अंक रचनाओं की बुनावट तथा कसावट के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। इसके साथ ही नए लघुकथाकारों को लघुकथा विधा से परिचित कराने के साथ साथ उन्हें लघुकथा लिखने के लिए प्रेरित करता है। अंक में अकेला भाई, अनिल कुमार, अनुराग, अब्ज, अशोक अज्ञानी, अशोक भाटिया, अशोक वर्मा, अशोक सिंह, अश्विनी कुमार आलोक, आकांक्षा यादव, भगवत दुबे, आनंद दीवान, आशा खत्री लता, आशीष दशोतर, उषा महाजन, दर्द ओमप्रकाश, कमल कपूर, कमल चोपड़ा, कपिल कुमार, कालीचरण प्रेमी, किशोर श्रीवास्तव, कुअंर बैचेन, कुमार शर्मा, कुलभूषण कालड़ा, कुंअर प्रेंमिल, कुंवर विक्रमादित्य एवं कौशलेन्द्र पाण्डेय की लघुकथाओं सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कृष्ण कुमार यादव, कृष्णानंद कृष्ण, कृष्णलता यादव, गोवर्धन यादव, घमंडी लाल अग्रवाल, जगतनंदन सहाय, जितेन्द्र सूद, जयबहादुर शर्मा, ज्योति जैन, जवाहर किशोर प्रसाद, तारा निगम, तारिक अस्लम तस्लीम, दीपक चैरसिया मशाल, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, नरेन्द्र कौर छाबड़ा, नमिता राकेश, नवनीत कुमार, नीतिपाल अत्रि, पंकज शर्मा, प्रकश सूना, प्रभात दुबे, पासर दासोत, पूरन सिंह, पुष्पा जमुआर, बलराम अग्रवाल, माला वर्मा, मिथिलेश कुमारी मिश्र, रमाकांत श्रीवास्तव, रश्मि बडथ्वाल, राजेन्द्र परदेसी, सत्यनारायण भटनागर, सतीश दुबे, समीर लाल, सुकेश साहनी, सुरेश उजाला, संतोष सुपेकर, हरिप्रकाश राठी एवं संतोष श्रीवास्तव की लघुकथाएं किसी भी बड़ी विशाल कैनवास युक्त कहानी की अपेक्षा अधिक प्रभावित करती है। प्रकाशित आलेखों में कमल किशोर गोयनका, बलराम अग्रवाल, श्याम सुंदर दीप्ति, रामनिवास मानव, माधव नागदा एवं रामेश्वर कांबोज हिमांशु के लेख लघुकथा विधा की चर्चा करते हुए उसे साहित्य में एक नवीन व प्रभावशाली विधा के रूप में प्रतिष्ठित करते दिखाई देते हैं।

9 تعليقات

  1. इसका मूल्य प्रकाशित क्यों नहीं है ?

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  2. अखिलेश शुक्ल जी,
    खूबसूरत समीक्षा के लिए बधाई. कृष्ण कुमार जी ने इस अंक को वाकई 'लघु कथा' का इनसाइक्लोपीडिया बना दिया है. अंक मेरी भी निगाहों से गुजरा है आपने उल्लेख किया है कि पत्रिका में मेल उपलब्ध नहीं है, जबकि यह लिखा हुआ है-saraswatisuman@rediffmail.com, इसे तदनुसार सुधार लें.

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  3. @ शरद जी,

    जहाँ तक मेरी जानकारी है, सरस्वती सुमन पत्रिका में पञ्च-वर्षीय या आजीवन सदस्यता से नीचे का प्रावधान नहीं है. यदि फिर भी कोई अंक चाहता है तो संपादक महोदय द्वारा उपलब्धतानुसार भेज दिया जाता है. फ़िलहाल पत्रिका की 9,000 प्रतियाँ प्रकाशित होती हैं.

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  4. अखिलेश जी,

    सरस्वती सुमन के लघुकथा अंक की सारगर्भित समीक्षा के लिए आभार !!

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  5. कृष्ण कुमार जी ने इस अंक को ऐतिहासिक बनाने के लिए काफी श्रम किया है. वाकई इस अंक के माध्यम से वे लघुकथा विधा की चर्चा करते हुए उसे साहित्य में एक नवीन व प्रभावशाली विधा के रूप में प्रतिष्ठित करते दिखाई देते हैं।..खूबसूरत समीक्षा..बधाई.

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  6. ऐतिहासिक अंक बन पड़ा है. अब तक इससे विशाल लघु-कथा अंक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में नहीं दिखा.. के.के. सर जी को बधाई.

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  7. लघु-कथा के इस अनुपम विशेषांक में मेरी लघु-कथाओं को स्थान देने के लिए के.के. सर जी का आभारी हूँ.

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  8. अखिलेश जी, इस सशक्त समीक्षा के लिए साधुवाद स्वीकारें.

    कृष्ण जी के कुशल संपादन में सरस्वती सुमन का यह लघु-कथा अंक तो वाकई अद्भुत बन पड़ा है. वैसे कई लोगों को यह पच भी नहीं रहा है. इतना सशक्त विशेषांक देखकर कुछेक तथाकथित महानुभावों का हाजमा ख़राब हो रहा है.

    खैर, यही तो बड़ाई है.

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  9. सरस्वती सुमन का यह अंक रचनाओं की बुनावट तथा कसावट के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। इसके साथ ही नए लघुकथाकारों को लघुकथा विधा से परिचित कराने के साथ साथ उन्हें लघुकथा लिखने के लिए प्रेरित करता है।

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    ..अखिलेश शुक्ल जी ने बड़े मनोयोग से समीक्षा की है...हार्दिक बधाइयाँ. अब हम भी कुछ सीख सकेंगें.

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