पत्रिका: साहित्य अमृत, अंक: फरवरी 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, पृष्ठ: 154, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 50रू.यह अंक(वार्षिक 200), ई मेल: info@sahityaamrit.in , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.23289777, सम्पर्क: 4/19, आसफ अली रोड़, नई दिल्ली 110002
ख्यात पत्रिका साहित्य अमृत का समीक्षित अंक जन्मशती अंक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक को दिवंगत साहित्यकारों बाबा नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, गोपाल सिंह नेपाली तथा उपेन्द्र नाथ अश्क पर एकाग्र किया गया है। पत्रिका ने इन प्रतिष्ठित साहित्यकारों पर संस्मरण, आलेख तथा उनकी प्रतिनिधि रचनाएं प्रकाशित कर नए पाठकों को हिंदी के अतीत तथा वैभव के संबंध में जानने समझने का सुनहरा अवसर प्रदान किया है। प्रकाशित संस्मरणों में ‘मेरे आत्मीय बाबा नागार्जुन(महेन्द्र भटनागर), ‘बाबा नागार्जुन मेरी सरकारी धर्मशाल में मेरे अतिथि(बालकवि बैरागी), नागार्जुन ने मित्र से मुलाकात के लिए टिकिट लिया(राधा कांत भारती), नेपाली जी तीन प्रेरक प्रसंग(नरेन्द्र गोयल), गोपाल सिंह नेपाली(श्रीरामनाथ सुमन), लौट आ ओ पांखुरीःशमशेरबहादुर सिंह(केशव चंद्र शर्मा) विशेष रूप से संग्रह योग्य हैं। शोभाकांत, लीला मोदी, सी.आर.राजश्री, प्रिया ए., भगवती प्रसाद द्विवेदी, क्षेमचंद्र सुमन, बालकवि बैरागी, सुरेश गौतम, शिवकुमार गोयल, गोविंद कुमार गंुजन, रमानाथ अवस्थी, कृष्णदत्त पालीवाल, हरदयाल, शंभु बादल, दीपक प्रकाश त्यागी, अरूण कुमार वर्मा, रीतारानी पालीवाल, श्रीकृष्णकुमार द्विवेदी, भवानीलाल भारतीय तथा राजकरण सिंह के संबंधित रचनाकारों-साहित्यकारों पर लेख उत्कृष्ट व गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल से रामशंकर द्विवेदी की बातचीत हिंदी साहित्य के अतीत से लेकर उसके भविष्य के प्रति आकर्षक चिंतन है। उपेन्द्रनाथ अश्क की कहानी ‘चारा काटने की मशीन’ तथा नाटक ‘अधिकार का रक्षक’ पुनः पढ़कर पिछली सदी के उस समय की याद दिला देती है जब हिंदी वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय होने के लिए छटपटा रही थी। शैलेष मटियानी का उपन्यास अंश ‘सीढ़ियां’ इसे पढ़ने की उत्कट इच्छा जाग्रत करता है। नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, बलबीर सिंह करूण तथा केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं प्रत्येक साहित्यप्रेमी को इन कविताओं के संबंध में वर्तमान समय के आधार पर व्याख्या करने के लिए प्रेरित करेगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी उपयोगी व पठनीय है। पत्रिका के संपादक श्री चतुर्वेदी जी ने बिलकुल ठीक लिखा है कि, ‘पांच दिवंगत रचनाकारों के व्यक्तित्व और अवदान के विभिन्न आयामों को एक अंक में सम्मिलित करने का सीमित प्रयास करना खतरे से खाली नहीं है।’ लेकिन साहित्य अमृत ने इसे खतरे की अपेक्षा चुनौती मानकर उठाया और यह प्रयास सफल रहा है। संपादक के साथ साथ साहित्य अमृत की पूरी टीम इस पुनीत कार्य के लिए बधाई की पात्र है।

2 تعليقات

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  2. इस अंक में मेरा अनुवाद ‘साहित्य का विश्व परिपार्श्व’ में छपी है :)

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