
पाखी का हर अंक इस मायने में समृद्ध होता है कि यह ज्वलंत प्रश्न उठाती है। समीक्षित अंक में नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या पर विचार किया गया है। प्रसन्न कुमार चैधरी, अभय कुमार दुबे, राजकिशोर , गौतम नवलखा आदि लेखकों ने इस पर अपने अमूल्य विचार लिखे हैं। प्रकाशित कहानियों में खूटें(जितेन्द्र विसारिया), दीमकों का घर(डाॅ.सीमा शर्मा), टमाटर की ढेरी पर रिश्ते(रामजी यादव) तथा पतन(अखिलेश श्रीवास्तव चमन) का प्रकाशन किया गया है। खूटें तथा चमन कहानियां आजादी के 63 वर्ष बाद भी समाज की कुरीतियों पर विचार करती है। अभी भी देश का एक बड़ा भाग अशिक्षित तथा उपेक्षित है जिसपर अत्यधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। गीत ग़ज़लों में शैलेन्द्र, भरत प्रसाद, यश मालवीय तथा विपिन जैन पढ़ने के लिए बाध्य करते हैं। भवदेव पाण्डेय, जवाहर चैधरी तथा राजीव रंजन गिरि के आलेख अपने अपने विषयों के साथ अच्छा विश्लेषण करते हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी तथा विनोद अनुपम के स्तंभ तथा रवीन्द्र त्रिपाठी का तीसरा नेत्र समाज के लिए उपयोगी जानकारी के साथ फिल्म साहित्य तथा रंगमंच की समीक्षा के माध्यम से जनचेतना हेतु प्रयासरत हैं। पत्रिका की उपसंपादक प्रतिभा कुशवाह ने वर्ष 2009 में विभिन्न ब्लागों पर विवाद पर विश्लेषण युक्त चर्चा की है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी अपनी सामग्री तथा प्रस्तुतिकरण से प्रभावित करती है। वर्तमान हिंदी साहित्य पर प्रकाशित हो रही पत्रिकाओं में यह इस मायने में उल्लेखनीय है कि इसमें किसी व्यक्ति विशेष को लेकर कोई टीका टिप्पणी या विवाद प्रकाशित नहीं हो रहा हैं। वहीं दूसरी ओर अन्य साहित्यिक पत्रिकाएं गैरजरूरी विवादों से चर्चा में बने रहना चाहती हैं।
हिन्दी ब्लागजगत मे आपका यह योगदान वन्दनीय है.
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धन्यवाद.
बहुत सुंदर जानकरी जी. धन्यवाद
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