
कथा प्रधान इस मासिक में कुछ बहुत ही अच्छी कहानियों का समावेश किया गया है। हुस्नबानु का आठवां सवाल(शरद सिंह), पार्टनर(नीरज वर्मा), स्थानापन्न(प्रतिभा), बलुवा हुजूम(मिथिलेश प्रियदर्शनी) एवं दा लास्ट अफेयर्स(घनश्याम कुमार देवांश) शामिल हैं। कविताओं मेें कला सुरैया, नरेश मेहन एवं सुशांत सुप्रिय की कविताएं चर्चा के योग्य हैं। प्रमुख आलेखों में हिंदु मानसिकता के पहलू(कृष्ण बिहारी), जिन्ना के कलपते मंडल(विकास कुमार झा) एवं सच का सामना बनाव सत्य के प्रयोग(दयाशंकर शुक्ल सागर) उल्लेखनीय हैं। वीरेन्द्र कुमार वरनवाल का आलेख वो बात उनकी बहुत नागवार गुजरी पढ़ने व विचार करने योग्य है। इस बार भारत भारद्वाज के स्तंभ में वह बात, वह पैनापन दिखाई नहीं दिया जो हर बार पढ़ने में आता है। पत्रि?का में बार बार नजरिया प्रकाशित कर अनावश्यक रूप से पेज भरने की आवश्यकता समझ से परे है। जबकि इस तरह के विचारों से एक आम पाठक को कोई लेना देना नहीं है क्योंकि सृजन का सबका एक अलग व अपना ढंग होता है, इस क्षेत्र में अनुकरण प्रायः बहुत कारगर सिद्ध नहीं होते।
बहुत सुंदर जानकारी फ़िर से.
ردحذفधन्यवाद
आभार।
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