Saturday, February 11, 2012

पत्रिका ‘‘तेवर राग भोपाली’’ का कवि ओम भारती पर एकाग्र अंक

पत्रिका: राग भोपाली, अंक: 03, वर्ष 16, स्वरूप: मासिक, संपादक: शैलेन्द्र कुमार शैली, पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 9425023669, सम्पर्क: 22, एच. के. होम्स, बंजारी, कोलार रोड़, भोपाल .प्र.
पत्रिका राग भोपाली का समीक्षित अंक ख्यात कवि व साहित्यकार ओम भारती जी पर एकाग्र है। पत्रिका का यह अंक उनके समग्र व्यक्तिव की झलक दिखाने में पूर्णतः सफल रहा है। यह अंक में प्रकाशित रचनाओं व साहित्यकारों से उनके संबंधों के माध्यम से जाना जा सकता है। आत्म कथ्य में उनका कहना है कि उन्होंने ‘‘आखिरी दम तक रचते रहने की आकांक्षा पाल रखी है।’’ यह आकांक्षा अब वटवृक्ष बनकर नवोदित रचनाकारों का मार्गदर्शन कर रही है यह साहित्यजगत के लिए गौरव व हर्ष का विषय है। देवांशु पाल के प्रश्न के उत्तर में वे स्त्री विमर्श के संबंध में कहते हैं, ‘‘मेरी कविता मंे स्त्री विमर्श का वह रूप है, जो स्त्री को निर्वस्त्र किए बगैर उसकी बराबरी स्वीकारता है।’’ उनकी इस स्वीकारोक्ति से स्पष्ट हो जाता है कि वे तथाकथिन स्त्रीविमर्श के पैरोकारों से कितने अलग और संजीदा हैं। ख्यात समीक्षक, आलोचक पूर्णचंद्र रथ का मानना है कि, ‘‘ओम भारती की काव्य भाषा की विशेषता है कि वे नितांत रूढ़ अर्थ परिभाषित कर चुके शब्दों के विन्यास से नए अर्थ हासिल कर लेते हैं। वह भी भावों के तनावों और क्रम के साथ।’’ इसलिए ओम भारती आज के उन असंख्य तथाकथित कवियों से अलग नजर आते हैं जो किसी बेतुके विमर्श अथवा विमर्श की आड़ में चर्चा में बने रहना चाहते हैं। सुबोध श्रीवास्तव, मलय तथा प्रहलाद अग्रवाल भी उनके व्यक्तिव से उन विशेषताओं को खोजकर सामने रखते हैं जो अब तक उनके सम्पर्क में रहे साहित्यमर्मज्ञों भी नहीं जानते होगें? समीक्षा खण्ड के अंतर्गत विजय बहादुर सिंह, वीरेद्र मोहन, ओम निश्चल, लीलाधर मंडलोई, प्रेमशंकर रघुवंशी, प्रज्ञा रावत, हरिशंकर अग्रवाल, डाॅ. रेवती रमण सहित सभी विद्वानों के विचार ओम भारती जी के सृजन की गहराइयों से पाठकों का परिचित कराने में सफल रहे हैं। श्रीराम निवारिया का समीक्षालेख उनके कविता संग्रह ‘वह छटवां तत्व’ की समीक्षा पूर्वनिर्धारित मानदण्डों की अपेक्षा नए विधान गढ़कर करता दिखाई पड़ता है। जिसमें कलात्मकता के साथ साथ प्रगतिशीलता के तत्वों का समावेश भलीभांति हुआ है। माताचरण मिश्र तथा मोहन सिंह ठाकुर के आलेख भी उनके सृजन की विशेषताएं अपने ढंग से रखते हैं। पत्रिका का यह अंक ओम भारती जी पर एकाग्र होने से कविता विधा पर अनुसंधाकत्ताओं के लिए संग्रह योग्य हो गया है।

1 comment:

  1. अखिलेश जी आप बहुत मत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं हमें विभिन्न प्रकाशनों से मिलवाने का

    ReplyDelete