Sunday, January 23, 2011

समाज की विदू्रपताओं से मुठभेड़-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: जनवरी 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: राजेन्द्र परदेसी, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेन्डेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएडा 201303 उ.प्र.
ख्यात साहित्यिक पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से युक्त है। अंक मंे पत्रिकारिता की लक्ष्मण रेखा के तहत एक विचार श्रृंखला प्रकाशित की गई है। जिसमें ख्यात पत्रकारों, विद्वानों ने पेड़ न्यूज व वर्तमान पत्रकारिता पर अपने विचार रखे हैं। राम बहादुर राय, पुण्य प्रसून वाजपेयी, एन.के. सिंह, अरविंद मोहन, अरूण त्रिपाठी, विमल कुमार, दिलीप मंडल, विनीत कुमार, कुलदीप नैययर, श्रवण गर्ग, रामशरण जोशी, आलोक तोमर, संजीव श्रीवास्तव, अली अनवर, शैलेन्द्र एवं ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने पेड पत्रकारिता पर गंभीर चर्चा व विचार प्रस्तुत किए हैं। प्रकाशित कहानियों में काम(राम स्वरूप अणखी), शाम का भूला(वासुदेव), योग क्षेम(सुषमा मुनीन्द्र) एवं दीमक(गोविंद उपाध्याय) अच्छी व समसामयिक कहानियां हैं। शीबा असलम फहमी न ेख्यात कथाकार, उपन्यासकार एवं हंस के संपादक राजेन्द्र यादव जी से तत्कालीन साहित्य व लेखन पर गंभीर व सार्थक चर्चा की है। वाद विवाद एवं संवाद के अंतर्गत वंदना राग एवं भरत प्रसाद के विचार सराहनीय हैं। अशोक कुमार पाण्डेय, संदीप अवस्थी, सुशीला पुरी एवं अखिलेश्वर पाण्डेय की कविताएं भूमंडलीकरण के बीच से आम आदमी के जीवन में सुख चैन की आशा जगाती है। तेजेन्द्र शर्मा की ग़ज़ल कुछ खास प्रभावित नहीं कर सकी है। जितने अच्छे वे कहानीकार हैं उतना अच्छा प्रभाव ग़ज़ल में नहीं छोड़ सके हैं। राजीव रंजन गिरि , विनोद अनुपम एवं अरविंद श्रीवास्तव के लेख स्तरीय हैं व पत्रिका के विविधतापूर्ण स्वरूप को दर्शाते हैं। निर्मला सिंह की लघुकथा सहित पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

4 comments:

  1. सुंदर समीक्षा जी धन्यवाद

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  2. मुझे याद रखा आपने ...! हार्दिक आभार !!!

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  3. अभिनव प्रयास!

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