Sunday, January 31, 2010

कथा प्रधान पत्रिका- कथादेश

पत्रिका-कथादेश, अंक-जनवरी.10, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.(वार्षिक 200रू.), फोनः (011)22570252, ई मेलः kathadeshnew@gmail.com ,सम्पर्क-सहयात्रा प्रकाशन प्रा. लि. सी-52, जेड़-3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110.095
पत्रिका कथादेश का यह अंक साहित्यिक सामग्री से परिपूर्ण है। अंक में पांच अच्छी कहानियों का प्रकाशन किया गया है। जिनमें प्यार बाज़ार(विभांशु दिव्याल), छूटती हुई दुनिया(जयशंकर), अश्वमेघ(राजकुमार राकेश), वृहस्पति ग्रह(मनमोहन बावा) तथा गुजरना एक हादसे से(शीरीं) शामिल है। इनमें जयशंकर जी की कहानी छूटती दुनिया तथा राजकुमार राकेश की अश्वमेघ विशेष रूप से आज के वातावरण तथा उससे जुड़ी हुई विषमताओं को पाठकों के सामने रखती है। पुरूषोत्तम के प्रेम की अकथ कहानी(अर्चना वर्मा), लो वो दिखाई पड़े.हुसेन(अखिलेश) तथा धूमण्डलीकरण की संस्कृति(शुभनाथ) आलेख इन लेखकों की गहरी सोच का परिणाम है। इनमें वर्णित विषयों से आम पाठकों को जोड़कर बांधे रखने का प्रयास किया गया है। वीरेन्द्र कुमार वरनवाल का आलेख ‘गांधी और उत्तर आधुनिक बोध’, डाॅ. एल. हनुमंतैया पर विशेष सामग्री व हषीकेश सुलभ, देवेन्द्र राज अंकुर के आलेख हमेशा की तरह पत्रिका को उत्कृष्ट बनाते हैं। अनिल चमडिया तथा अविनाश लगातार अपने अपने विषयों पर गंभीर शोध तथा अध्ययन को पश्चात पाठकोपयोगी सामग्री लिख रहे हैं। अंक में बसंत त्रिपाठी, शरद कोकास तथा धमेंद्र कुशवाह की कविताओं को स्थान दिया गया है। इनमें शरद कोकास की कविताएं अर्थी सजाने वाले, बदबू तथा हैलमेट वर्तमान संदर्भ से जुड़कर भी अपने अतीत व इतिहास पर गहन दृष्टि डालती है। इनमें आधुनिकता व प्रगतिशीलता के मध्य का मार्ग चुना गया है। जिसकी वहज से ये कविताएं युवा वर्ग में अपने कर्तव्यों के प्रति चेतना जाग्रत करने का प्रयास करती दिखाई देती हैं। पत्रिका में प्रकाशित अन्य सामग्री, समीक्षाएं तथा रचनाएं भी प्रशंसनीय हैं। पत्रिका में कुछ चुने हुए रचनाकार ही स्थान पाते रहे हैं नए व अच्छा लिखने वाले प्रायः पत्रिका द्वारा उपेक्षित ही किए गए है। यह कमी इस पत्रिका में बहुत अखरती है। लेकिन फिर भी पत्रिका का स्वर व उसकी रचनाओं की सार्थकता को हर पाठक स्वीकार करेगा।

Saturday, January 30, 2010

अहल्या पत्रिका

पत्रिका-अहल्या, अंक-नवम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती आशादेवी सोमाणी, पृष्ठ-64, मूल्य-20रू.(वार्षिक 225रू.), फोनः (040)24804000, वेबसाइटः http://www.ahalyahindimagazine.com/ , सम्पर्क-14-1-498/ए, ज्ञानबाग रोड़, पान मण्डी के पास हैदराबाद, 500.012(आंध्र प्रदेश)
समीक्षित पत्रिका अहल्या का यह अंक विविधतापूर्ण रचनाओं के कारण संग्रह योग्य है। साहित्य के साथ साथ अन्य विविधत विषयों पर विश्लेषणात्मक आलेख इस पत्रिका की विशेषता है। प्रकाशित रचनाओं में - जनतंत्र का कोढ-भाई भतीजावाद(ओम प्रकाश बजाज), सामाजिक चेतना मंे लेखिकाओं की भूमिका(विभा देवसरे), खो रहा है बचपन(आकांक्षा यादव), प्राण दण्ड़(हितेश कुमार शर्मा), व्यंग्य कैसी हो धांसू आत्मकथा(निश्चल), कहानी पडोसी का फर्ज(नंदलाल भारती) तथा दहलीज(शुक्ला चैधरी) प्रभावित करती हैं। हालांकि उपरोक्त रचनाएं को विशुद्ध साहित्यिक तो नहीं कहा जा सकता लेकिन दक्षिण भारत से इनका प्रकाशन तथा देश भर में स्वीकार्यता ध्यान आकर्षित करती है। के.पी. दुबे, मिथिलेश कुमारी शुक्ल व प्रोमिला भारद्वाज की कविताएं तथा जुगल किशोर, सीताराम गुप्ता, डाॅ. आर.के. मालोत के आलेख भी पाठकों को नवीन जानकारी प्रदान करते हैं।

Thursday, January 28, 2010

हम सबके माथे पर.......(संपादकीय)--‘हंस’

पत्रिका-हंस, अंक-जनवरी 2010, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.(वार्षिक 250रू.), फोनः (011)23270377, ई मेलः editorhans@gmail.com , वेबसाइटः http://www.hansmonthly.in/ , सम्पर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 2/36, दरियागंज, नई दिल्ली 110002, भारत
हिंदी साहित्य का अग्रणी कथा मासिक इस मायने में उल्लेखनीय है कि यह हर अंक में ऐसी सामग्री प्रकाशित करता है जो समसामयिक होने के साथ साथ पाठक के संग्रह योग्य भी होती है। समीक्षित अंक में कल फिर आना(तेजेेन्द्र शर्मा), एक मुरदा सिर की कथा(साजिद रशीद), भ्रमित(क्षितिज शर्मा), रंडी बाबू(ंसंजय कुमार सिंह) तथा आखिरी निशानियों को बचा लो(उषा ओझा) प्रकाशित की गई हैं। इनमें तेजेन्द्र शर्मा व क्षिति ज शर्मा की कहानियां ही विशेष रूप से प्रभावित करती हैं शेष में विषयों का दुहराव तथा बार बार एक ही बात को जोर शोर से उठाना अखरता है। कविता के मामले में हंस का प्रायः हर अंक कमजोर साबित होता है इस बार भी वही हुआ है। राजेन्द्र नामदेव, अशोक चंद्र तथा योगिता यादव की कविता में क्या देखकर संपादक ने इन्हें पत्रिका में स्थान दिया है समझ से परे है। ‘जिन्होंने मुझे बिगाड़ा’ स्तंभ जिस मुखरता व प्रखरता के साथ शुरू हुआ था अब लगता है लटकों झटकों का शिकार होता जा रहा है। पत्रिका का सबसे सुंदर व पठनीय पक्ष ‘बीच बहस में है’ इसकी रचनाएं व विचार विश्व स्तर के किसी भी साहित्य से टक्कर ले सकते हैं। जाहिद खान व नूर जहीर ने तो दिमाग की खिडकियां खोल देने वाले विचार व्यक्त किए हैं। सुरेश गर्ग की लघुकथा ने पत्रिका के रिक्त स्थान की मात्र पूर्ति ही की है। श्रीप्रकाश श्रीवास्तव की ग़ज़ल ठीक ठाक है। अरूंधती राय का आलेख:आंतरिक सुरक्षा या युद्ध’ प्रत्येक साहित्य मर्मज्ञ को पढ़ना चाहिए। लगता है शीबा असलम फातमी किसी विशेष प्रयोजन को लेकर इस्लाम को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही हैं। इसलिए प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया फिर प्रतिक्रिया और एक प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अंतहीन सिलसिला आखिर कहां तक जाएगा? विचारणीय है। प्रायः सभी समीक्षाएं व मुकेश कुमार का मीडिया पर आलेख पठनीय है। ख्यात लेखक भारत भारद्वाज की परिक्रमा प्रतिवर्ष जनवरी में कुछेक फेरबदल, नए नाम, कुछ नए प्रसंग के साथ प्रकाशित होती है। जिसमें नयापन तो है लेकिन परिपूर्णता तब तक नहीं होगी जब तक इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्यिक गतिविधियों का इसमें समावेश नही होगा। कुल मिलाकर हंस का यह अंक भी अच्छी पठनीय सामग्री लेकर आया है। संपादकीय तो हर अंक के समान विचार योग्य है ही।

Wednesday, January 27, 2010

साहित्य की द्वैमासिकी--अक्षरा

पत्रिका-अक्षरा, अंक-जनवरी-फरवरी 2010, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलश चंद्र पंत, प्रबंध संपादक-सुशील कुमार केडिया, संपादक-सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-20रू.(वार्षिक 120रू.), फोनः (0755)2661087, सम्पर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन श्यामला हिल्स, भोपाल म.प्र.
समीक्षित पत्रिका अक्षरा का यह 28वां वर्ष है। इन वर्षो में पत्रिका ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। अंक में ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह का स्तंभ हमेशा की तरह विचारणीय सामग्री पाठकों के समक्ष रखता है। फधीश्वर नाथ रेणु का संस्मरण तथा स्वामी विवेकानंद का आलेख साहित्य के नए विज्ञ को हमारी धरोहर की जानकारी देने में सफल रहे हैं। प्रकाशित आलेख जिस ढंग से साहित्य व अन्य विषयों की परख करते हैं वह पत्रिका की शक्ति है। हिंदी के प्रति बढ़ती उदासीनता(परमानंद पांचाल), विदेशो व्याप्त रोमानी हिंदी(सूर्यप्रसाद दीक्षित), बाज़ार का दबाव और विज्ञापन की भाषाः उपभोक्ता का संदर्भ(अरूण कुमार पाण्डेय) तथा भारतीय संस्कृति और संगीत(महारानी शर्मा) जैसे आलेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि अब हिंदी साहित्य दुनिया के किसी भी साहित्य से कमतर नहीं है। नमिता सिंह और राजेन्द्र परदेसी की बातचीत बाजारवाद के संदर्भ में कहानी विधा की उपयोगिता व सार्थकता पर गहन विमर्श प्रस्तुत करती है। श्री रमेश चंद्र शाह के उपन्यास ‘सफेद परदे पर’ की परख करत हुए सुधीर कुमार ने लिखा है कि इसका कथानक तथा कथ्य एक नूतन, नव कलात्मक वैशिष्ट्य भी प्रदान करता है। उनके इस कथन से उपन्यास की उपयोगिता व सार्थकता अपने आप सिद्ध हो जाती है। नीरजा माधव, करूणाशंकर उपाध्याय व राजेन्द्र नागदेव के विभिन्न विधाओं में लिखे गए लेख शास्वत विषयों को आज के संदर्भ में विश्लेषित करते हैं। मालती जोशी की कहानी ‘इन्तहा मेरे सब्र की’ तथा बंधनों का सुख(सविता मिश्रा) में वर्तमान पीढ़ी को हमारी मान्यताओं परंपराओं से जोड़े रखने का प्रयास किया गया है। पुरूषोत्तत चक्रवर्ती व प्रद्युम्न भल्ला की कहानियां कुछ खास नहीं कह सकीं है। विवेक रंजन श्रीवास्तव, अशोक सोनी व रमेश कुमार त्रिपाठी की कविताएं व इसाक अश्क के दोहे भी पठनीय बन पड़े हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं, रचनाएं भी साहित्य जगत के लिए उपयोगी हैं।

Sunday, January 24, 2010

काव्य साहित्य में नारी विमर्श--‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका-हिमप्रस्थ, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-56, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), ईमेल himprasthahp@gmail.com , सम्पर्क-हिमाचल प्रदेश पिं्रटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला.05
साहित्यिक पत्रिका हिमप्रस्थ अपने आलेखों के उत्कृष्टता के कारण हमेशा पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है। पत्रिका पांच रूपए के साधारण से मूल्य पर संग्रह योग्य साहित्य उपलब्ध करवा रही है। समीक्षित अंक में ‘काव्य साहित्य में नारी विमर्श’(रामनिहाल गंुजन), ‘कश्मीरी संगीत’(सकीना अख़्तर), ‘क्रिसमस कथाओं में प्रेम और मानवीय मूल्य’(डाॅ. उषा वन्दे) तथा ‘कालजयी साहित्यकारःयशपाल’(पे्रम पखरोलवी) विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करते हैं। तीनांे कहानियों में से ‘कीचड़’(जितेन्द्र कुमार) तथा ‘मिस पल्लवी’(भगवती प्रसाद द्विवेदी) अपने शिल्प के कारण पाठकों के जेहन में गहराई तक उतरती हैं। अर्चना सोमानी तथा सत्यनारायण भटनागर की लघुकथाएं लघुता में विस्तृत अर्थ के कारण अपनी पहचान बनाने में कामयाब रही है। जितेन्द्र कुमार, हेमंत शर्मा, वीरेन्द्र गोयल तथा ममता चैहान की कविताएं दूब पर पड़ी ओस की बूंदों के सदृश्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं तथा रामसिंह यादव का व्यंग्य ‘नौकरीपेशा लोग..’ भी पढ़ने योग्य हैं।

Friday, January 22, 2010

पुस्तकों से बढ़ कर कोई मित्र हो सकता है क्या?--‘हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका-हिंदुस्तानी ज़बान, अंक-जनवरी.मार्च 2010, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ-80, मूल्य-10रू.(वार्षिक 40रू.), फोनः (022)22812871, ईमेल hpsabha@hotmail.com , सम्पर्क-महा. गां. मेमो. रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी, महा. गां. बिल्ंिडग, 7 नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई 400002
हिंदी एवं उर्दू ज़बान में एक साथ साए होने वाले इस अहम रिसाले के मर्कज़ में गांधी साहित्य का रोल काबिले तारीफ है। रिसाले की नुमाइंदगी कुछ इस तरह है कि उसे पढ़ने वाला हर आमों-खास अचरज से भर उठता है। इसमें तफ़शीस, और खुतूत के तरम्यान एक ऐसा तालमेल दिखाई देता है जो गौर फरमाने के काबिल है। जनाब विजय राघव रेड्डी ने ‘भाषा की आधुनिकीकरण प्रक्रियाःहिंदी का संदर्भ में अपनी बात को इस तरह से पेश किया है जिसे पढ़ते ही ज़बान के ताल्लुक बेवजह तकरार करने वालों पर तरस आता है। जाने माने अफ़सानान निगार जनाब पे्रमचंद पर डाॅ. संजीब कुमार दुबे और कवि घनानंद की आम लोगों को दिए गए कीमती तोहफे पर बहुत खूब लिखा है। प्रो. शंकर बुदेले ने तुकड़ो जी महाराज पर लिखा है। पत्रिका के तमाम तफसिरे, खत, समाचार भी काबिले गौर है। एक अच्छे रिसाले के लिए पत्रिका की संपादक को कथाचक्र परिवार की ओर से ढेरों बधाईयां।

Thursday, January 21, 2010

अखबारों से नाटक क्यों गायब है?--इप्टा वार्ता

पत्रिका-इप्टा वार्ता, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हिमाशु राय, पृष्ठ-08, मूल्य-समाचार पत्र पर अंकित नहीं, फोनः (0761)2417711, ईमेल iptavarta@rediffmail.com , सम्पर्क-पी.ड़ी. 04, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर जबलपुर .02
मध्य प्रदेश इप्टावार्ता जबलपुर मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाली एकमात्र नाट्य समाचार पत्रिका है। समीक्षित अंक में देश भर में होने वाली नाट्य गतिविधियों पर जानकारीपरक समाचार प्रकाशित किए गए हैं। पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जी के जन्म दिवस कार्यक्रम का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। सुप्रसिद्ध कथाकार उदयप्रकाश की कहानी तिरिछ के मंचन का समाचार भी दूसरे पेज पर विशेष विवरण के साथ प्रकाशित किया गया है। विश्वप्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर का आलेख ‘उपभोक्ता समाज में कला और संस्कृति एक गंभीर व आज के संदर्भ में विचारणीय आलेख है। ‘रंग खबर’ स्तंभ के अंतर्गत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत गायिका स्व. गंगूबाई हंगल के जीवन संघर्ष से पाठक का परिचय कराया गया है। अन्य समाचारों में ‘इंदोर में हबीब तनवीर के नाटक ‘चरणदास चोर’ का मंचन, नटरंग की गोष्ठी, विवेचना का राष्ट्रीय नाट्य समारोह, नादिकर के नाटक को स्थान दिया गया है। मराठी रंगमंच तथा कलाजगत की प्रमुख हस्ती नीलू फूले के निधन के समाचार के साथ उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है। पत्रिका संक्षेप में इतना कुछ कह जाती है जो कई दिनों तक पाठक के जेहन में घूमता रहता है। प्रत्येक कला पे्रमी अवश्य ही इसे पढ़ना चाहेगा। क्या आप नहीं चाहेंगे?

Wednesday, January 20, 2010

‘आरक्षण स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को हतोत्साहित करता है’(संपादकीय)--मसि कागद

पत्रिका-मसि कागद, अंक-अगस्त-दिसम्बर .09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-श्याम सखा श्याम, पृष्ठ-64, मूल्य-25रू.(वार्षिक 100रू.), फोनः (01262)255930, ईमेल shyam.skha@gmail.com, सम्पर्क-‘पलाश’ 12, विकास नगर, रोहतक 124001 हरियाणा विगत 11 वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रही पत्रिका मसि कागद की रचनाओं का स्तर किसी भी तरह से ख्यात पत्रिकाओं सेे कमतर नहीं है। अंक में जन सामान्य के बीच की कहानियों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख है-- लीपापोती(परमानंद अधीर), रिश्ता(डाॅ. सुरेश मंथन), किलर(विमला भण्डारी) एवं पुराने फ्रेम में नई फोटो(संदीप फाफरिया सृजन)। गीत ग़ज़लों में शैलजा नरहरि, राममूर्ति सिंह सौरभ, केशव शरण, उषा यादव एवं मंजु दलाल की रचनाएं भावप्रधान व प्रस्तुतिकरण में संुदर हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, संस्मरण, आलेख व समीक्षाएं भी अपना महत्व रखते हैं।

Tuesday, January 19, 2010

नव वर्ष में साहित्यजगत से आग्रह करता--वागर्थ

पत्रिका-वागर्थ, अंक-जनवरी.2010, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-146,मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.),फोनः(033)22817476, ईमेल bbparishad@yahoo.co.in , website http://www.bharatiyabhashaparishad.com/ सम्पर्क-भारतीय भाषा परिषद, 35 ए, शेक्सपियर शरणि कोलकाता 700017 भारतीय भाषा परिषद कोलकाता द्वारा प्रकाशित यह वागर्थ का नए वर्ष का प्रथम अंक है। ख्यात पत्रकार संपादक प्रभाष जोशी जी को याद करते हुए दयानंद पाण्डेय ने बहुत ही संतुलित तथा जानकारीप्रद संस्मरण लिखा है। जिसमें प्रभाष जी के व्यक्तित्व के पहलूओं पर विस्तार से उन्होंने प्रकाश डाला है। गिरीश मिश्र ने भूमण्डलीकरण के बीस वर्ष बीतने पर इस बात पर चिंता जाहिर की है कि हमारे देश में फिर भी सन्नाटा क्यों है? बांग्ला के प्रतिष्ठित कवि शंकर घोष पर चिंतन के अंतर्गत संजय भारती ने उनके सम्पूर्ण कृतित्व को अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है। ख्यात कवि विष्णु नागर तथा स्थापित कवयित्री नीलेश रघुवंशी की कविताएं के माध्यम से आम आदमी व उसकी घुटती पिसती जिंदगी को भीतर तक झांककर देखा जा सकता है। ख्यात आलोचक शंभुनाथ ने भारत के लोगों, उनके व्यव्हार व कार्यप्रणाली को आजादी के पहले तथा बाद के संदर्भ में विचार कर लिखा है। उर्मिला शिरीष, विनोद साव व आरती झा की कहानियां आज के बदलते समाज का आईना है। जिसमें उभरती तस्वीर भविष्य के लिए सचेत करती है। स्वयं प्रकाश जी की नोटबुक पढ़कर प्रत्येक पाठक किसी कहानीकार के अंतर्मन को समझ सकता है। कुसुम खेमानी, रेमिका थापा, अजय कुमार एवं विजय शर्मा के आलेख भारतीय साहित्य कला एवं संस्कृति को नए ढंग से देखते हैं। बीना क्षत्रिय, ओमप्रकाश यादव एवं अनिकेत शर्मा की कविताएं भी पत्रिका के स्तर के अनुरूप हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं सामग्री भी किसी अन्य साहित्यिक पत्रिका की अपेक्षा विविधतापूर्ण व जानकारीप्रद हैं।

Monday, January 18, 2010

कहानियों में संवदेना की तलाश--प्रेरणा

पत्रिका-पे्ररणा, अंक-जुलाई-दिसम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-अरूण तिवारी, पृष्ठ-212, मूल्य-20रू.(वार्षिक 100रू.), फोनः (0755)2422109, ईमेल prerna_magazine@yahoo.com, website http://www.prernamagazine.com/ , सम्पर्क-ए.74, पैलेस आर्चड़ फेज.03, सर्वधर्म के पीछे, कोलार रोड़, भोपाल म.प्र. 462042
पत्रिका prerna का समीक्षित अंक कहानी विशेषांक है। अंक में कहानियों के साथ साथ अन्य विधाओं को भी समुचित स्थान दिया गया है। सभी कहानियां व लघुकथाएं मानवीय संवेदना से जुड़ी हुई रचनाएं हैं। इन रचनाओं में लेखक के व्यक्तिगत अनुभव की अपेक्षा आम जीवन से जुडे़ यथार्थ को कहानी का रूप दिया गया है। बलराम, प्रदीप पंत, सूर्यकांत नागर, सुषमा मुनीन्द्र, राहजेन्द्र परदेसी, जयंत, गोपाल काबरा एवं ष्याम सुंदर चैधरी की कहानियां अनुभव के आसपास बुनी हुई हैं। सुरेन्द्र गुप्ता, मुकुट सक्सेना, डाॅ. प्रभा दीक्षित, कमल चोपड़ा एवं रामरतन यादव की लघुकथाएं भी कलेवर में भले ही लघु हों लेकिन अपने कथन के दृष्टिकोण से विशाल हैं। बलराम गुमास्ता, राजेन्द्र उपाध्याय, वीणा जैन एवं हरपाल सिंह के आलेख सृजन पर अच्छी बहस प्रस्तुत करते हैं। ख्यात आलोचक संपादक कमला प्रसाद जी से पत्रिका के संपादक अरूण तिवारी तथा बलराम गुमास्ता की बातचीत उनके अंतरंग को खोलने के साथ साथ आज के वर्तमान साहित्य व उसकी दिशा व दशा पर भी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। पत्रिका की समीक्षाएं अन्य रचनाएं व मुद्रण आकर्षक व प्रभावशाली है। पत्रिका के संपादन में संपादक व उनकी टीम का श्रम झलकता है।

Saturday, January 16, 2010

हैदराबाद से निकल रहा है--‘पुष्पक’

पत्रिका-पुष्पक, अंक-02,जनवरी.10, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ-114, मूल्य-75रू.(वार्षिक 250रू.), फोनः (040)23703708, सम्पर्क-93सी, राजसदन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद 500038, सी 7
आंध्रप्रदेश हैदराबाद से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका विशुद्ध साहित्य के लिए पूर्णतः समर्पित है। समीक्षित अंक मंे रचनाओं को संुदर ढंग से संयोजित किया गया है। डाॅ. अहिल्या मिश्र, शांति अग्रवाल, श्याम सख श्याम, पवित्रा अग्रवाल, प्रो. एस. शेषारत्नम, सरिता सुराणा, कमला प्र. बेखबर, की कहानियां प्रकाशित की गई हैं। आकांक्षा, पंकज शर्मा की लघुकथाएं तथा नृत्यगोपाल कटारे का व्यंग्य ‘नालायक होने का सुख’ पठनीय हैं। शैलेश भारतवासी, डाॅ. दुर्गानागवेणी, रामगोपाल गोयनका के आलेखों में नवीनता तथा पैनापन है। रमा द्विवेदी, कृष्णकुमार गोस्वामी, यासमीन सुल्ताना नकवी, प्रकाश सूना, रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’, सुषमा वेद एवं लक्ष्मीनाराण अग्रवाल की कविताएं पत्रिका के नाम के अनुरूप हैं। अन्य रचनाएं समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी इसे उपयोगी व समयानुकूल बनाते हैं।

Friday, January 15, 2010

पे्रम गीत अंक--साहित्य सागर

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-जनवरी.10, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.(वार्षिक 240रू.), फोनः (0755)4260116, सम्पर्क-161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल 462043 म.प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात गीताकार कवि लेखक डाॅ. पशुपतिनाथ उपाध्याय पर एकाग्र है। पत्रिका में गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय महत्व के साहित्यिक सांस्कृतिक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें नृपेन्द्र नाथ गुप्त, डाॅ. जयराम आनंद, डाॅ. शरदनारायण खरे एवे प्रकाश वैश्य प्रमुख हंै। डाॅ. उपाध्याय पर राकेश गुप्त, गोपालदास नीरज, वेदप्रकाश अभिताभ तथा महाश्वेता चतुर्वेदी ने उपयोगी तथा जानकारीपरक आलेख लिखें हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं भी पठनीय व समसामयिक हैं।

Thursday, January 14, 2010

वह नौजवान कवि--समावर्तन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-जनवरी.10, स्वरूप-मासिक, प्रधान मुकेश् वर्मा, अध्यक्ष संपादक मण्डल-रमेश दवे, संपाक-निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.(वार्षिक 240रू.), ईमेलः samavartan@yahoo.com , फोनः (0734)2524457, सम्पर्क-माधव 129 दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
ख्यात पत्रिका समावर्तन का समीक्षित अंक जग प्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार मंजूर एहतेशाम जी पर एकाग्र है। एहतेशाम जी ने भारतीय मुस्लिम समाज व उसकी समस्याआंे पर गंभीरतापूर्वक चिंतन किया है।उनका संपूर्ण लेखन इस बात के लिए समर्पित है कि जब दोनों संप्रदाय सामाजिक सांस्कृतिक रूप से एक समान हैं तथा उनकी परंपराएं एवं मान्यताएं भी एकसी हैं तो फिर अनावश्यक संघर्ष आखिर क्यो? इसी बात को उन्होंने अपने साक्षात्कार में भी स्पष्ट किया है। उनके ख्यात उपन्यास सूखा बरगद पर सम्मानीय आलोचक डाॅ. धनंजय वर्मा ने उनके लेखन को तत्कालीन सामाजिक सांस्कृतिक चिंता में किया गया हस्तक्षेप माना है। उनकी कहानियां धरती पर, रास्ते में तथा छतरी अपनी विषयगत व विधागत विशेषताओं के कारण हमेशा याद रखी जाएंगी। पत्रिका के इस अंक में श्रीराम दवे की कविताएं प्रकाशित की गई हैं। इन कविताओं को श्री रमेश दवे ने पत्थर पर खुदी फूलों की बेला से खुशबू की तरह माना है। कैलाश पचैरी, अनूप सेठी, उमाशंकर चैधरी की कविताएं समकालीन समाज का लेखा जोख प्रस्तुत करती हैं। सच्चितानंद जोशी की कहानी तथा पिलकेन्द्र अरोरा एवं सतीश दुबे की लघुकथाएं भी समय को भेदकर उसकी परख करती दिखाई देती हैं। ख्यात रंगकर्मी रतन थियम पर गिरीश रस्तोगी, जयदेव तनेजा एवं नवीन डबराल(अनुवादित आलेख) ने विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। प्रेम शशांक, महावीर अग्रवाल, आभा भार्गव, मोहम्मद रफीक खान एवं भगवतीलाल राजपुरोहित के आलेख भी पाठकों को अवश्य ही पसंद आएंगे। पत्रिका का निखरा हुआ रूप व गहन साहित्यिक समझ प्रभावित करती है।

Wednesday, January 13, 2010

‘सवालों से मुठभेड़’--पाखी

पत्रिका-पाखी, अंक-जनवरी.2010, स्वरूप-मासिक, संपादक-अपूर्व जोशी, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.(वार्षिक 240रू.), ईमेलः pakhi@pakhi.in , फोनः (0120)4070300, सम्पर्क-इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी. 107, सेक्टर 63, नोएड़ा 201303 उ.प्र.
पाखी का हर अंक इस मायने में समृद्ध होता है कि यह ज्वलंत प्रश्न उठाती है। समीक्षित अंक में नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या पर विचार किया गया है। प्रसन्न कुमार चैधरी, अभय कुमार दुबे, राजकिशोर , गौतम नवलखा आदि लेखकों ने इस पर अपने अमूल्य विचार लिखे हैं। प्रकाशित कहानियों में खूटें(जितेन्द्र विसारिया), दीमकों का घर(डाॅ.सीमा शर्मा), टमाटर की ढेरी पर रिश्ते(रामजी यादव) तथा पतन(अखिलेश श्रीवास्तव चमन) का प्रकाशन किया गया है। खूटें तथा चमन कहानियां आजादी के 63 वर्ष बाद भी समाज की कुरीतियों पर विचार करती है। अभी भी देश का एक बड़ा भाग अशिक्षित तथा उपेक्षित है जिसपर अत्यधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। गीत ग़ज़लों में शैलेन्द्र, भरत प्रसाद, यश मालवीय तथा विपिन जैन पढ़ने के लिए बाध्य करते हैं। भवदेव पाण्डेय, जवाहर चैधरी तथा राजीव रंजन गिरि के आलेख अपने अपने विषयों के साथ अच्छा विश्लेषण करते हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी तथा विनोद अनुपम के स्तंभ तथा रवीन्द्र त्रिपाठी का तीसरा नेत्र समाज के लिए उपयोगी जानकारी के साथ फिल्म साहित्य तथा रंगमंच की समीक्षा के माध्यम से जनचेतना हेतु प्रयासरत हैं। पत्रिका की उपसंपादक प्रतिभा कुशवाह ने वर्ष 2009 में विभिन्न ब्लागों पर विवाद पर विश्लेषण युक्त चर्चा की है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी अपनी सामग्री तथा प्रस्तुतिकरण से प्रभावित करती है। वर्तमान हिंदी साहित्य पर प्रकाशित हो रही पत्रिकाओं में यह इस मायने में उल्लेखनीय है कि इसमें किसी व्यक्ति विशेष को लेकर कोई टीका टिप्पणी या विवाद प्रकाशित नहीं हो रहा हैं। वहीं दूसरी ओर अन्य साहित्यिक पत्रिकाएं गैरजरूरी विवादों से चर्चा में बने रहना चाहती हैं।

Sunday, January 10, 2010

कहानियों का अंक ‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका-हिमप्रस्थ, अंक-नवम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-96, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), ईमेलः himprasthahp@gmail.com , सम्पर्क-हिमाचल प्रदेश पिं्रटिंग पे्रस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला .05
पत्रिका का नवम्बर .09 अंक कहानी अंक है। इसमें कहानी विधा पर महत्वपूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है। सभी आलेख विश्लेषणात्मक हैं तथा कहानी विधा पर अच्छी तरह से प्रकाश डालते हैं। प्रमुख आलेखों में - डाॅ सुशील कुमार फुल्ल, रविलाल शाहीन, राजेश बंटा एवं नवीन कुमार मदवाना के आलेख शामिल हैं। डाॅ. जोगिन्द्र यादव, अशोक गौतम, राजेन्द्र परदेसी एवं साधुराम दर्शक की कहानी आज के संदर्भों का निर्वाहन कर सकी हैं। लघुकथाओं में प्रेम नारायण गुप्ता, विपाशा शर्मा एवं डाॅ. सुरेश उजाला कथा के स्वरूप से उसके गूढ़ अर्थ तक जा सकी हैं। कविताओं मंे डाॅ .दिनेश चमोला, रमेश चंद्र शर्मा, डाॅ. रीता हजेला, सीताराम गुप्ता, केशव चंद्र प्रदीप शर्मा, प्रियंका भारद्वाज तथा संतोष उत्सुक ने विशेष रूप से प्रभावित किया है।
पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा व्यंग्य रपट आदि भी अपना महत्व रखते हैं।

Tuesday, January 5, 2010

हिंदी साहित्य के ‘पथ की कलम’

पत्रिका-पथ की कलम, अंक-अगस्त.अक्टूबर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. रमाकांत कुशवाह, पृष्ठ-47, मूल्य-30रू.(वार्षिक 120रू.), मो. 094506716, सम्पर्क-ग्राम व पोस्ट गौरा, (रामपुर कारखाना), तहसील देवरिया सदन, जनपद देवरिया उ.प्र.
पथ की कलम अब तक नियमित नहीं हो सकी है। इस पत्रिका का स्वरूप विविधतापूर्ण साहित्य प्रकाशित करने का है। अंक में कपिल देव राम, मोती प्रसाद गुप्ता, बाबूराम शर्मा, सोम्या सिंह, जलज भादुडी एवं मनमोहन बागड़ी के कुछ सारगर्भित आलेखों का प्रकाशन किया गया है। राणा सिंह, वीरेन्द्र यादव, कवि ‘शुष्क’, संजय कुमार, अर्पिता श्रीवास्तव, योगेन्द्र नारायण एवं पंकज कुमार राय की काव्य रचनाएं प्रभावशाली हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पाठक पर अपना प्रभाव डालती हैं।

Monday, January 4, 2010

कला मानव संस्कृति के सौन्दर्यबोध का नाम है-प्रगति वार्ता(संपादकीय)

पत्रिका-प्रगति वार्ता, अंक-नवम्बर.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ.राम जन्म मिश्र, संपादक-सच्चिदानंद, पृष्ठ-52,मूल्य-20रू.(वार्षिक 200रू.),फोनः(06436)222467,ईमेलः pragativarta@yahoo.co.in , सम्पर्क-प्रगति भवन चैती दुर्गा संस्थान, साहिबगंज 816109 (झारखण्ड)
पत्रिका का यह अंक साहित्यिक व पठ्नीय सामग्री से भरपूर है। अंक में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में देश की जन समस्याओं को साहित्यिक स्वरूप के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया है। डाॅ. ऋषिकेश राय, डाॅ. आशा ओझा, धीरज कुमार एवं समता मिश्रा के आलेख इसके प्रमाण हैं। पत्रिका के संपादक सच्चिदानंद एवं कृष्ण गोपाल मिश्र का आलेख संबंधित व्यक्तित्व पर अच्छी तरह से प्रकाश डालने में सफल रहे हैं। विजय प्रकाश एवं सीमा आनंद की कहानियां आज के वातावरण से संबंधित हैं। डाॅ .लीला मोदी, सुरेश उजाला, दिनेश ‘तपन’, राजकिशोर वर्मा एवं सचिन केजरीवाल की कविताएं नयापन लिए हुए हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी उपयोगी व स्तरीय हैं।

Sunday, January 3, 2010

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद् पत्रिका

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ .बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक-डाॅ .मनोहर भारती, पृष्ठ-52, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), फोनः(080)23404892, ईमेलः brsmhpp@yahoo.co.in , सम्पर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58 वेस्ट आॅफ कार्ड रोड, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 (भारत)
दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका हिंदी साहित्य व भाषा के लिए समर्पित है। इस अंक में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में - राजभाषा नीति और दण्ड व्यवस्था का प्रश्न(कृष्ण कुमार ग्रोवर), रामधारी सिंह दिनकर के काव्य में नारी संबंधी विचार(इल्यास आर जेठवा), हिंदी के विकास में विदेशी विद्वानों का योगदान(डाॅ. एम. शेषन), भारत और वैश्विक सांस्कृतिक समीकरण(डाॅ. अमर सिंह वधान), मालती जोशी की कहानियों में पारिवारिक संदर्भ(भूपिन्द्र कौर) तथा शमशेर कवि कला का फूल(अमित अश्विनी भाई पटेल) सम्मलित है। कहानियों मंे जसविंदर शर्मा एवं रामशंकर चंचल प्रभावित करते हैं। जगदीश तिवारी, नलिनी कांत एवं सूर्यप्रसाद शुक्ल से भविष्य के लिए आशा बंधती है।

Saturday, January 2, 2010

उड़ि जा रे हंस भैया का देस.....(शुभ तारिका)

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-98, मूल्य-25रू.(वार्षिक 120रू.), फोनः(0171)2610483, सम्पर्क-कृष्णदीप, ए.47, शास्त्री कालोनी अम्बाला छावनी 133001 हरियाणा email: urmi.klm@gmail.com
पत्रिका का समीक्षित अंक म.प्र. के साहित्य पर एकाग्र विशेषांक है। अंक में मध्यप्रदेश की साहित्यिक, सांस्कृतिक व कला धरोहर पर विशेष सामग्री का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित लेखकों में प्रमुख हैं - स्वाति तिवारी, डाॅ. महाराज कृष्ण जैन, शिव अनुराग पटेरिया, उर्मि कृष्ण, महेश श्रीवास्तव, मदनमोहन जोशी तथा अजातशत्रु प्रमुख हैं। ये सभी रचनाकार मध्यप्रदेश से हैं जिन्होंने विभिन्न विषयों पर गंभीरतापूर्वक लेखन कार्य किया है। मंगला रामचंद्र, डाॅ. रामसिंह यादव तथा दिनेश चंद्र दुबे की कहानियां इस दशक के विषयों तथा उसकी समस्याओं पर विस्तार से प्रकाश डालती हैं। प्रकाश पुरोहित का व्यंग्य किताब का कार्यक्रम उर्फ क्रियाकर्म अच्छा व्यंग्य है। अन्य रचनाओं में कुत्तों से सावधान(मालती जोशी) एवं लूट सके तो लूट(कांतिलाल ठाकरे) अच्छी पठनीय रचनाएं हैं। कविताओं में विशेष रूप से ऋषिवंश, देवेन्द्र कुमार जैन, आनंद बिल्थरे, नंदलाल भारती, अखिलेश शुक्ल, नर्मदा मालवीय तथा ओम रायजादा की कविताएं अपने अपने विषयों के साथ न्याय कर सकीं हैं। लघुकथाकारों में प्रभात दुबे, पुष्पारानी गर्ग, शहनाज सुलतान एवं अरूण कुमार जैन ने अच्छा विषय निस्पादन किया है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। एक अच्छे विशेषांक के लिए पत्रिका की टीम बधाई की पात्र है।