Sunday, October 3, 2010

‘‘अरावली उदघोष’ का आदिवासी संस्मरण अंक

पत्रिका: अरवली उदघोष, अंक: जून 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बी.पी. शर्मा ‘पथिक’, अतिथि संपादक: हरिराम मीणा, पृष्ठ: 88, मूल्य: 20 रू.(.वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 0294.2431742, सम्पर्क: 448, टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313001 राजस्थान
विगत 22 वर्ष से लगातार देश भर के आदिवासियों के लिए संघर्षरत पत्रिका अरावली उद्घोष का यह अंक आदिवासी संस्मरण अंक है। देश के विभिन्न अंचलों में फैले आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में लाकर उनका कल्याण करना पत्रिका का ध्येय है। इसलिए पत्रिका समय समय पर आदिवासियों की पीड़ा व्यक्त कर उन पर विचार करने के लिए विशेषांक निकालती है। इसी श्रंखला में इस अंक मे आदिवासियों से संबंधित संस्मरणों, डायरियों तथा विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन किया गया हैै। सभी संस्मरण सहेज कर रखने योग्य हंै व प्रभावित करते हैं। मिजोरम में वे कुछ दिन(श्री प्रकाश मिश्र), दहकते बुलबुले(सुरेन्द्र नायक), मेरे लड़कपन के अविस्मरणीय नायक(भागीरथ), सावधान नीचे आग है(केदार प्रसाद मीणा), आदिवासियों की गोत्र भूमि....(मिनीप्रिया आर.) जैसे संस्मरणों में आदिवासियों से संबंधित विभिन्न रीति रिवाजों, परंपराओं तथा उनके संयमित-संतुलित जीवन पर विचारात्मक विश्लेषण किया गया है। अन्य संस्मरणों जैसे - लो आज गुल्लक तोड़ता हूं(राकेश कुमार सिंह), अंडमान की यात्रा 1 व 2 (नवजोत भनोत, बजरंग बिहारी तिवारी), मेरा सिंह भूमि का भ्रमण(विभूति भूषण महोपाध्याय), कितनी दूर है अभी रोशनी(स्वधीन) तथा अपातानियों के बीच एक शाम(राघवेन्द्र) में आदिवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली समस्याओं को उठाकर उनके समाधान सुझाने का प्रयास किया गया है। ऐस थे स्व. भैरोलाल कालाबादल(ख्यालीराम मीणा), जमीनी जंग के सहरिया(डाॅ. रमेश चंद्र मीणा) एवं प्रभाष जोशी एवं जनसत्ता का तीसरा पाठक(महादेव टाप्पो) में लेखक आदिवासियों को लेकर अति संवेदनशील हो जाता है व वह चाहता है कि किसी तरह से उनके कल्याण की तरफ सरकारें गंभीरता से ध्यान दें। उनसे मिला अपनापन(अखिलेश शुक्ल), काजू बादाम खाने वाली गांधी जी की बकरी(लक्ष्मणगायकवाड़), बस्तर में कुछ दिन(चंद्रकांत देवताले) के संस्मरण कथा से लगते हैं व आदिवासियों की निजी जिंदगी में झांककर उनके संस्कारों से आम पाठक को परिचित कराते हैं। श्रीमती रचना गौड़ एवं स्वामी वाहिद काजमी की कहानियां संस्मरणात्मक कहानियां हैं जिनमे आदिवासी जीवन व उनक संघर्ष के दर्शन होते हैं। अतिथि संपादक हरिराम मीणा जी का गहन विश्लेषण युक्त संपादकीय समीक्षित अंक का सार प्रस्तुत करता है। एक अच्छी पत्रिका का उत्कृष्ट अंक देने के लिए पत्रिका की टीम बधाई की पात्र है।

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