Sunday, September 5, 2010

स्त्री को स्त्री ही कहें तो बेहतर-‘कथन’

पत्रिका: कथन, अंक: जुलाई-सितबर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ: 98, मूल्य:25रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल: kathanpatrika@hotmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 011.25268341, सम्पर्क: 107, साक्षर अपार्टमेंटस, ए-3 पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110.065
साहित्य व संस्कृति के लिए समर्पित पत्रिका कथन के समीक्षित अंक में समाज के विभिन्न वर्गो की स्थिति का आकलन कर उनके उत्थान के लिए आग्रह करती कहानियों का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित कहानियों में मोक्ष(लक्ष्मी शर्मा), अंधी बहरी आस्था(उर्मिला शिरीष) एवं सब मिले हुए हैं(श्याम जागिड़) शामिल हैं। संतोष चैबे, मनोहर बिल्लौरे, मदन केशरी, श्रीराम दवे, रेखा चमोली एवं आशीष त्रिपाठी की कविताएं भी आज के वातावरण व अपसंस्कृति से लोगों को सचेत करती दिखाई देती है। आशुतोष दुबे की कविताएं तथा रज़ा हैद र का व्यक्ति चित्र पाठकों को बांधे रखने में पूर्णतः सफल रहे हैं। वंृदा करात के पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय की बातचीत स्त्री सशक्तिकरण के संदर्भ में कुछ नए प्रश्नों के साथ समाधान सुझाती है। सविता सिंह व उर्वशी बुटालिया के स्त्री सशक्तिकरण सबंधी विचार महज खानापूर्ती है, उनमें कुछ भी नयापन नहीं दिखा। जवरीमल पारख का स्तंभ परदे पर अवश्य ही समाज और पर्दे पर स्त्री की भूमिका पर गहन विचार प्रस्तुत कर सका है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

3 comments:

  1. भाई शीर्षक तो अच्छा है ...
    (आजकल तो मौत भी झूट बोलती है ....)
    http://oshotheone.blogspot.com....

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  2. मुझे तो कथन के इस अंक में लक्ष्मी शर्मा की कहाने मोक्ष अद्भुत लगी है. इतनी सशक्त कहानियां रोज़ रोज़ नहीं लिखी जाती है. अकेले इस कहानी के लिए भी इस अंक को सहेज कर रखा जा सकता है, हालांकि इस अंक में अन्य सामग्री भी कम महत्व की नहीं है. संपादक को बधाई.

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