Sunday, August 23, 2009

साहित्य में लघुत्तम महत्तम से भी बढ़कर-समावर्तन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रमेश दवे, पृष्ठ-96, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-‘माधवी’ 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.(भारत)
पत्रिका का यह अंक ख्यात कथाकार व्यंग्यकार सूर्यबाला के साहित्य सृजन कर्म पर एकाग्र है। उनसे सूर्यकांत नागर ने जा साक्षात्कार लिया है उससे उनके रचनाकर्म के महत्वपूर्ण पहलूओं को पाठक को जानने का अवसर मिला है। उन्होंने अपने आलेख में चुनौतियों पर भी विचार किया है। उनकी सारिका पत्रिका में प्रकाशित पहली कहानी ‘जीजी’ कहीं से भी नहीं लगती की यह किसी लेखिका के प्रारंभिक दिनों की कहानी है। पत्रिका में प्रकाशित कहानी वाब(प्रताप सहगल) तथा मां(क्षमा शर्मा) भी पठ्नीय व सारगर्भित रचनाएं हैं। ख्यात सिरेमिक कलाकार देवीलाल पाटीदार पर सामग्री शायद ही किसी अन्य पत्रिका में मिले? इस तरह के रचनाधर्मियों को अंक में स्थान देकर समावर्तन सच्चे अर्थ में कला संस्कृति साहित्य की पत्रिका बन सकी है। भारतीय एवं आंग्ल साहित्य में जीवनीयों तथा आत्मकथाओं की तुलना कर भारत भारद्वाज ने श्रेष्ठ जीवनियों तथा आत्मकथाओं की चर्चा की है। साथ ही यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि इस तरह का साहित्य सत्य के अधिक करीब तथा किसी दुराग्रह से परे होना चाहिए। अरूणेश शुक्ल, सुरेश पण्डित तथा विष्णुदत्त नागर के आलेख समसामयिक तथा पाठकों को उपयोगी जानकारी प्रदान करने वाले हैं। मोहम्मद रफीक खान तथा विलास गुप्ते ने अपने अपने आलेखों में विषय वस्तु को ग्राह्य बनाने का सर्वोत्तम प्रयास किया है जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। राजेन्द्र परदेसी, अखिलेश शुक्ल तथा पिलकेन्द्र अरोरा की लघुकथाएं पत्रिका की गरिमा में वृद्धि करती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, समीक्षाएं तथा रचनाएं भी आकर्षक व सुरूचिपूर्ण हैं। प्रधान संपादक रमेश दवे का संपादकीय आजादी के बाद रचे गए साहित्य पर संक्षिप्त किंतु उपयोगी टिप्पणी करता है।

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