Saturday, June 27, 2009

क्या इसे हिंदी साहित्य कहंे?

पत्रिका-कथा बिंब, अंक-जन.मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. माधव सक्सेना ‘अरविंद’, पृष्ठ-52, मूल्य-15रू.(वार्षिक 50रू.) संपर्क-ए.10 बसेरा आॅफ दिन क्वारी रोड़, देवनार मुम्बई 400008(भारत)
पत्रिका कथाबिंब विगत 30 वर्ष से प्रकाशित हो रही है। लेकिन दुखद यह है कि अभी तक इस पत्रिका ने साहित्य जगत को ऐसा कुछ नहीं दिया जो उल्लेखनीय हो। समीक्षित अंक की कहानियों में उर्मि कृष्ण की कहानी चुटकी भर सिंदुर बिना को छोड़कर शेष कहानियां साहित्यिक स्तर से बहुत नीचे हैं। इन कहानियों को किसी भी तरह से साहित्यिक कहानियां नहीं कहा जा सकता। लघुकथाओं में भोलापन में नवीनता है तथा कथ्य व शिल्प की दृष्टि से यह लघुकथा अच्छी बन पड़ी है। पत्रिका की कविताएं, दोहे, ग़ज़लें तथा गीत आदिमयुगीन जान पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि हम ख्यात कवियों की कविताओं की पैरोड़ी पढ़ रहे हों। पत्रिका के अन्य स्तंभ जैसे लेटर बाक्स, बाइस्कोप, पुस्तक समीक्षाएं तथा कुछ कही कुछ अनकही इस पत्रिका को और भी लचर तथा स्तरहीन बनाते हैं। पत्रिका का सबसे उजला पक्ष इसके साथ ख्यात साहित्यकार तथा लेखक संस्मरणकार प्रबोध कुमार गोविल का जुड़ा रहना है। लेकिन जब तक पूरी टीम में कुछ नया करने का जज्बा न हो एक अकेला साहित्यकार संपादन सहयोग किस तरह कर सकेगा यह सोचने का विषय है। इस तरह की स्तरहीन पत्रिकाओं को शीघ्र ही बंद कर दिया जाना चाहिए।

2 comments:

  1. सुंदर जानकारी, आप इन सब के बारे जो समीक्षा देते है अगर यह नाराज हो गये तो काफ़ी मुश्किल आन पडॆगी आप पर, थोडा समभंल कर.
    धन्यवाद

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  2. राज जी की टिप्पणी मजेदार है..
    आपके प्रयास की जितनी तारीफ़ की जाये कम है, किंतु!

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