Sunday, February 22, 2009

हिंदी प्रचार वाणी....दक्षिण में हिंदी साहित्य का यज्ञ

पत्रिका--हिंदी प्रचार वाणी, अंक-फरवरी.09,स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादिका-सुश्री बी.एस. शांताबाई, गौरव संपादिका-श्रीमती राधा कृष्णमूर्ति, पृष्ठ संख्या-32, मूल्य-5रू. वार्षिक-60रू., संपर्क-कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति, 178 चैथा मेन रोड़, चामराजपेठ बेंगलूर 560.018 कर्नाटक (भारत)
हिंदी प्रचार वाणी के समीक्षित अंक में रचनाओं को उनके साहित्यिक स्वरूप के अनुसार संजोया गया है। पत्रिका के प्रमुख आलेखांे में मानवतावादी कथाकारः जैनेन्द्र कुमार(डाॅ. सदानंद भोसले), शबरीमलै(अशोक कुमार शेरी), कौन हमारा है(डाॅ. सुरेश मारोतीराव मुळे) दिनकर की अलंकार योजना(डाॅ. मनीष) अन्या से अन्यया बनी प्रभा खेतान(निशा निहान) प्रमुख आलेख हैं। सदानंद भोसले ने अपने आलेख में जैनेन्द्र कुमार के मानवतावादी पहलू का विशेष रूप से उल्लेख किया है। यह एक ऐसा चिंतन है जिसमें समाज हित छिपा हुआ है। बिना मानवतावादी हुए श्रेष्ठ सृजन की कल्पना नहीं की जा सकती। डाॅ. मनीष ने छायावादोत्तर कवि दिनकर की अलंकार योजना पर विश्लेषणात्मक ढंग से प्रकाश डाला है। काव्यात्मक अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने के लिए दिनकर ने जिन अलंकारों का उपयोग किया है वे परंपरागत रूप से भारतीय हैं। प्रभा खेतान की संस्मरणात्मक कृति ‘अन्या से अन्यया तक’ पर निशा रेहान ने गंभीरतापूर्वक विचार किया है। यह संस्मरण प्रभा जी की निर्भीक आत्मस्वीकृति का खुला दस्तावेज है। उनकी अन्य रचनाओं से हटकर यह संस्मरण आम भारतीय स्त्री की मनोदशा भी व्यक्त करता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पाठक को आकर्षित करती है। दक्षिण भारत के बेंगलूर नगर से इस साहित्य यज्ञ में हम सभी को आहूति देना चाहिए।

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