Wednesday, February 25, 2009

नया ज्ञानोदय--------भारतीय ज्ञानपीठ का साहित्यिक प्रकाशन--1

पत्रिका-नया ज्ञानोदय, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रवीन्द्र कालिया, पृष्ठ-120, मूल्य-25रू.,वार्षिक250रू संपर्क-भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोधी रोड़ नई दिल्ली (भारत)
नया ज्ञानोदय का समीक्षित अंक आंशिक रूप से छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों पर एकाग्र है। अंक में तीन स्मरण ‘मित्र मनजीनः कलाकार मनजीन’(प्रयाग शुक्ल), लवलीन-चक्रवात में फंसी लड़की’(भारत भारद्वाज) एंव ‘हेराॅल्ड़ पिंटरःमंच से प्रस्थान’(विजय शर्मा) गंभीरतापूर्वक उन रचनाकारों का स्मरण कराते हैं। ख्यात चित्रकार ‘मनजीन बावा’ पर केन्द्रित वरिष्ठ कवि प्रयाग शुक्ल का आलेख मनजीन बावा के चित्रण में उनकी अनुभूति तथा प्रकृति से लगाव के साथ-साथ उनकी जीवन शैली पर भी प्रकाश डालता है। पचास वर्ष की अल्पायु में हमारे बीच से विदा हो चुकी लवलीन पर भारत भारद्वाज ने उनकी बोल्डनेस तथा गहन अध्ययन का बारीकी से अवलोकन किया है। विजय शर्मा हेराॅल्ड पिंटर का अवलोकन करते हुए इस रंगमंच से जुडे़ साहित्यकार की स्वभावगत विशेषताओं पर नए सिरे से विचार करते हैं। वरिष्ठ एवं ख्यात संस्मरणकार डाॅ. कांतिकुमार जैन की ‘फन्तासी’ इस अंक की सबसे अधिक पठ्नीय रचना है। वे अपने गहन अनुभव व विश्लेषणात्मक ढंग से अमीर खुसरो सेे लेकर आज तक के इतिहास का अपने अलग अंदाज में अवलोकन करते हैं। जब तक कोई शासन आम जन से सीधे संवाद नहीं करेगा तब तक 26/11 जैसी घटनाएं होती रहेगीं। राजकाज के सफल संचालन के लिए सजग खुफिया तंत्र का होना आज तो और भी जरूरी है। आज की खबरी चेनलें समाचार बनाकर आम जन के बीच न जाने कौन-सा संदेश दे रही हैं यह समझ से परे है। सुधीर सक्सेना छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पर बड़ी सिद्दत के साथ विचार करते हैं। उनके अनुसार इस नगर का प्राचीन वैभव तथा विनम्रता आज न जाने कहां लुप्त हो गई है। जिस रायपुर ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यक्तित्व दिए वह सीमेंट के जंगले में बदल गया है यह चिंता का विषय है। समीक्षित अंक में कहानी का प्लाट(शिवपूजन सहाय), भगवान जी(हृदयेश), के बोल कान्हा गौआला रे(चन्द्रकिशोर जायसवाल), वह, उसका हीरों हाण्डा और काली बीएमडब्ल्यू(सतीाश जायसवाल), माफ करना कामरेड़(परितोष चक्रवर्ती), नहीं मरेगा आदमी(स्नेह मोहनीश), हार(परदेशी राम वर्मा) तथा जंगलगाथा(लोकबाबू) अच्छे कथानकों वाली कहानियां है। विेशेष रूप से ‘भगवानजी’ आज के समाज की हृदयहीनता तथा मतलबपरस्त दुनिया से रूबरू कराती है। ‘माफ करना कामरेड़’ बाजारवाद के वर्तमान दौर में मजबूरीवश माक्र्सवादी चिंतन पर पुर्नविचार का आग्रह करती है। सतीश जायसवाल की कहानी ‘वह, उसका हीरो हाण्डा और काली बीएमडब्ल्यू’ दो पीढ़ियों के टकराव से उत्पन्न सामाजिक संरचना पर स्पष्टीकरण है। कविताओं में विनोद कुमार शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी, उर्मिला शुक्ला, सीमा सोनी की कविताओं में भी भूमंड़लीकरण को कुछ संकोच के साथ स्वीकारने का स्वर सुनाई देता है। (शेष भाग-02 में)

2 comments:

  1. हृदयेश जी की कहानी भगवान जी इस अंक की महत्वपूर्ण रचना है।
    पत्रिकाओं से परिचित कराने का काम आप अच्छे से कर रहे हैं। बधाई और शुभकामनाएं स्वीकारें।

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  2. लवलीन और बावा का जाना हिंदी जगत और चित्रकला के लिए दुखद है। उनके संस्मरण लिख कर लेखकों ने उन्हें श्रद्धांजली अर्पित की है। अच्छी समीक्षा के लिए बधाई।

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