Thursday, July 14, 2011

साहित्य के लिए ‘प्रगतिशील आकल्प’

पत्रिका: प्रगतिशील आकल्प, अंक: मार्च2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. शोभनाथ यादव , पृष्ठ: 22, मूल्य: रू (आजीवन 1000रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 28376108, सम्पर्क: पंकज क्लासेस, पोस्ट आफिस बिल्ंिडग, जोगेश्वरी पूर्व मुम्बई 400060

टैब्लाइड आकार में प्रकाशित यह पत्र समसामयिक व जन सामान्य से जुड़ी रचनाओं का प्रकाशन विगत 11वर्ष से लगातार कर रहा है। अंक में आत्म संघर्ष के अंतर्गत मोहन सपरा के जीवन संघर्ष का प्रकाशन किया गया है। कहानियों में डान(श्याम कुमार पोकरा), सूरज(दर्शन सिंह धीर) एवं जो सुनना चाहती हैं औरते?(घनश्याम रंजन) विशेष रूप से प्रभावित करती है। ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल पर एकाग्र प्रो.जगदीश्वर चतुर्वेदी का आलेख अच्छा व जानकारीपरक है। डाॅ. शिवनारायण एवं केशव शरण की कविताएं नयापन लिए हुए हैं। शीतांशु भारद्वाज की लघुकथाएं बदलता चरित्र एवं खरबूजी रंग आज के समाज की कुरीतियों व दिखावे के चरित्र को उजागर करती हैं। घनश्याम रंजन की लघुकथा आज भी ठीक ठाक कही जा सकती है।

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