Thursday, March 10, 2011

साहित्य समाज का दर्पण नहीं.....‘साक्षात्कार’

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: अक्टूबर-नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 50रू(वार्षिक 250रू.), ई मेल: sahityaacademy.bhopal@gmail.com , वेबसाईट: नहीं , फोन/मो. 0755.2554782, सम्पर्क: साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाण गंगा, म.प्र. भोपाल-03
मध्यप्रदेश से प्रकाशित यह पत्रिका साहित्य जगत की प्राचीन प्रतिष्ठित पत्रिका है। समीक्षित अंक में ख्यात साहित्यकार देवेन्द्र दीपक से जया केतकी की बातचीत साहित्य के साथ साथ उसके निरंतर बदलते परिवेश पर एक सार्थक पहल है। उनकी कविताओं में अद्यतन भारत के दर्शन होते हैं। प्रमुख रूप से थ्रू प्रापर चेनल, अंतर, हमें कुछ कहना है तथा क़लम उल्लेखनीय कविताएं है। दया प्रकाश सिन्हा, डाॅ. शिवकांत त्रिपाठी तथा डाॅ. प्रमोद वर्मा के लेख हमारी विरासत व संस्कृति तथा कला को नए संदर्भो में विश्लेषित करते हैं। प्रकाशित कहानियों में मुंडेर की धूप(मनोहर काजल), सड़क की कराह(मीनाक्षी स्वामी) में वर्तमान समय की निस्सारता को ध्यान में रखते हुए बहुत कुछ कहने का प्रयास किया गया है। शरद नारायण खरे, हरपाल सिंह अरूष, के.जी. बालकृष्ण पिल्लै तथा सुरेश सेन निशांत की कविताएं बदलते विषयों की धंुधली होती तस्वीरों को साफ करने का एक अच्छा प्रयास है। इंदुप्रकाश कानूनगो द्वारा किए गए अनुवाद में वही कमियां हैं जो प्रायः अनुदित रचनाओं में मिलती हैं। डाॅ. एन. संुदरम ने ख्यात कवि डाॅ. हरिवंश राय बच्चन को बहुत अच्छे ढंग से याद किया है। संगम पाण्डेय ने लगता है तोलस्तोय की जीवनियां तथा साहित्य बहुत गंभीरता से पढ़ा नहीं है लेकिन फिर भी उनका आलेख प्रभावित करता है। वर्तमान में गीत व ग़ज़लों में कुछ कहने करने के लिए शेष बचा नहीं है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि उपयोगी हैं। संपादकीय में साहित्य को समाज का अर्पण कहा गया है। संपादकीय पढ़कर उसमें दिए गए सुझावों पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाना चाहिए।

5 comments:

  1. सुंदर जानकारी, धन्यवाद

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  2. आवरण चित्र सुंदर लगा. ''प्राचीन'' (प्रतिष्ठित पत्रिका), शब्‍द का इस्‍तेमाल खटकने वाला है.

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  3. अच्छी जानकारी। धन्यवाद।

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  4. सार्थक प्रस्तुति, बधाईयाँ !

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