Saturday, March 7, 2009

पूर्वग्रह----------साहित्य एवं कलाओं की आलोचना त्रैमासिकी

पत्रिका-पूर्वग्रह, अंक-जन.-मार्च2009, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ-124, मूल्य-30रू.,(वार्षिक150रू), संपर्क-भारत भवन न्यास, ज. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स, भोपाल 462.002 (भारत)
विश्व प्रसिद्ध साहित्य एवं कला केन्द्र भारत भवन भोपाल द्वारा प्रकाशित पूर्वग्रह का यह 124 वां अंक है। पत्रिका आंशिक रूप से वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण पर एकाग्र है। अंक में उनकी कुछ चुनी हुई कविताएं शामिल हैं। डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय के अनुसार उनकी कविताओं में उदारता एवं संतुलन का अद्भुत समन्वय है। उनका काव्य संग्रह ‘वाजश्रवा के बहाने’ जीवन से पूर्व एवं मृत्यु के बाद के मध्य सेतु का कार्य करता है। अरून्धती सुब्रमण्यम ने उनसे साक्षात्कार कर साहित्य के प्रति उनका अनुराग तथा रचनाशीलता के आयामों को पाठकों के समक्ष लाने में सफलता प्राप्त की है। एक ओर गोविंद चन्द्र पाण्डे ‘वाजश्रवा के बहाने’ संकेत सूत्र ढूंढते हैं वहीं दूसरी ओर कृष्णदत्त पालीवाल उनके साहित्य पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करते हैं। रमेश दवे ने उनमें भारती य संगीत की मधुर ध्वनियां व मानव जीवन की स्मृतियां उद्घाटित करने का सफल प्रयास किया है। रवि भूषण कविवर कुंवर नारायण को मन व बुद्धि से रूपायित करते हैं। ‘दव्हाइट टाइगर’ पर अंग्रेजी भाषा के लेखक अरविंद अडिगा को बुकर पुरस्कार मिला है। द्रोणवीर कोहली ने इसे पिछड़ों को स्वर देने का रचनात्मक प्रयास माना है। लेकिन पिछड़ापन दूर न होने में हमारे देश की दूषित व स्वार्थपरक राजनीति काफी हद तक जिम्मेदार है। साहित्यकारों, लेखकों तथा मीडिया ने भी सिवाय खबरों को चटपटी बनाने के और किया ही क्या है? प्रभा खेतान ने मीडिया में स्त्री की छवि को लेकर विमर्श प्रस्तुत किया है। जो इस विषय पर विस्तार से विश्लेषण कर कुछ नए प्रश्न खड़े करता है। भारत भवन मंे आयोजित ‘स्त्री का सृजन प्रतिरोध’ विषय पर गीतांजलि श्री, मनोज श्रीवास्तव, अनामिका, सारा राय एवं गिरीश रस्तोगी के संपादित अंश पठनीय व संग्रह योग्य हैं। यतीन्द्र मिश्र तथा पार्थिव शाह ने अपने अपने आलेखों में विषय का निर्वाहन बहुत ही सुंदर ढंग से किया है। ज्ञान चतुर्वेदी कमल वशिष्ट, कपिल तिवारी, अमृतलाल बेगड़ के लेख नवनीत मिश्र, राकेश सिंह की कहानी तथा राजी सेठ का समकालीन हिंदी कहानी पर आलेख लीलाधर जगूड़ी व गीत चतुर्वेदी की कविताएं बाज़ारवाद के मध्य से आम जन के लिए सुखमय जीवन का रास्ता खोजती है। पत्रिका संग्रह योग्य पठ्नीय व आकर्षक कलेवर व साज-सज्जा से युक्त है।

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