Friday, February 27, 2009

हंस...हिंदी साहित्य की उड़ान (भाग-02)

नोटः निवेदन है कि भाग 01 पहले पढ़ें
विजय शर्मा ने ‘द परफ्यूमःद स्टोरी आॅफ मर्डर’ की व्याख्या भारतीय फिल्म उद्योग के मानदण्ड़ों के आधर पर की है। किंतु कहानी की पृष्ठभूमि भारत न होकर जर्मनी है। इस आधार पर फिल्में देखने केे बाद मन में कुछ प्रश्न उठनेे का सवाल ही पैदा नहीं होता। महावीर राजी का आलेख ‘हुक्म, इन्हीं लोगों ने ले लीन्ही शराफत मेरी’(जिन्हांेने मुझे बिगाड़ा) हंस में प्रकाशित होने वाला मेरा प्रिय स्तंभ है। महावीर राजी ने बचपन से लेकर अब तक के जीवन में आए उतार चढ़ाव का कथात्मक विश्लेषण किया है। उनकी साहित्यिकता को मुकाम पर ले जाने की मुहीन में जिन्होंने साथ दिया है वे लेखक के साथ-साथ पाठक के भी प्रिय हो जाते हैं। शीबा असलम फ़हमी ने विचारणीय तथा झकझोर देने वाले विषय ‘इस्लाम की स्त्रीवादी व्याख्या अभी बाकी है’ को उठाकर बड़े ही जोखिम का कार्य किया है। डाॅ. रोहिणी अग्रवाल ‘नैतिकता के कोलाहल में देह विमर्श की धमक’ आलेख में शीबा असलम फ़हमी की बातों को ही आगे बढ़ाती हुई नारी मुक्ति के संदर्भ में विचार करती हुई दिखाई देती हैं। सेक्स में स्त्री की भूमिका को लेकर जितना कुछ छूट पुरूषों को प्रदान की गई है स्त्री उसका अंश मात्र भी नहीं चाहती। केवल स्त्री, स्त्री है इसलिए डरे? क्या यह उचित है? नैतिकतावादियों को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस अंक में अभय कुमार दुबे(सेकुलर-सांप्रदायिक विमर्श सांसत में), न तेजी बुरी न मंदी अच्छी(मुकेश कुमार), विश्व सिनेमा में स्त्री का नया अवतार(अजित राय) में नया कुछ पढ़ने में नहीं लगा। पुराने हो चुके विषयों को नए अंदाज में उठाना ‘नई बोतल में पुरानी शराब’ भरने के समान है। श्री भारत भारद्वाज का आलेख, अजय नावरिया साहित अन्य लेखकों की समीक्षाएं तथा डाॅ. रंजना जायसवाल, मुकेश कुमार की कविताएं उत्तर आधुनिक काल के विस्तार के रूप में देखी जा सकती है। पत्रिका का संपादकीय कुछ नए प्रश्न रखकर उनके समाधान सुझाता है। इस बार हिंदी तहरीर को लेकर मेेरे प्रिय लेखक ने अच्छा खासा संस्मरण लिख डाला है। बधाई

2 comments:

  1. pranaam !
    sameeksha-column ke antargat Dehradun se chhapne wali patrika "sraswati-suman" ke 'gazal-visheshaank' ki sameeksha bhi prakaashit kareiN...aabhaar .
    sampark: Dr Anandsuman Singh
    1-Chhibar Marg
    Arya Nagar
    DEHRADUN
    ( 094120-09000 )

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  2. भाई अखिलेशजी, यह हंस का कौनसा अंक है? हर समीक्षा अलग होती है, उसके पूर्व भाग को देख कर भले ही जाना जा सकता है पर मेरे विचार में हर भाग का स्वतंत्र रूप हो तो अच्छा रहेगा।

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