Friday, March 21, 2014

पत्रिका साहित्य परिक्रमा का राष्ट्रीय अधिवेशन विशेषांक

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा,  अंक: जनवरी मार्च, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: जी सिंह जीत, श्रीमती क्रांति कनाटे, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, पृष्ठ: 92, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 9425407471, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर म.प्र. 
                                          प्रतिष्ठित पत्रिका साहित्य परिक्रमा का यह समीक्षित अंक राष्ट्रीय अधिवेशन
विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक में अधिवेशन की गतिविधियों को रंगीन चित्रों के प्रकाशन के माध्यम से पाठकों से साझा किया है। पत्रिका में चिंतनयोग्य विचारपूर्ण आलेखों का प्रकाशन इस अंक की विशेष उपलब्धि है। श्री श्रीधर पराडकर, डाॅ. वलवंत जानी, डाॅ. शत्रुध्न प्रसाद, प्रो. त्रिवुभननाथ शुक्ल, श्री भूपेन्द्र राय चैधरी, प्रो. कुसुमलता केडिया, श्री नंदलाल मेहता वागीश, डाॅ. सम्राट सुधा, श्री रवीन्द्र शुक्ल रवि, डाॅ. ज्वाला प्रसाद कौशिक ाधक, श्रीमती विनय राजाराम, डाॅ. बिनु पयटटुविला, श्री हरीश व्यास, डाॅ. एन सुंदरम, प्रो. राजेश लाल मेहरा, डाॅ. लता सुमंत, श्री अखिलेश कुमार शर्मा, श्रीमति क्रांति कनाटे एवं श्री लक्ष्मीनारायण भाला के आलेख विशिष्ट हैं। सभी आलेखों में विद्वानों ने अलग अलग ढंग से राष्ट्रीय अस्मिता तथा वर्तमान साहित्य में उसकी सार्थकता को लेकर विचार किया है। मानव जीवन के सिद्धांत, इतिहास तथा वर्तमान शताब्दी की गतिमान जीवन शैली के बीच जिस गंभीरता से पत्रिका ने राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्न पर विचार किया है व स्वागत योग्य है। इस उत्तम संग्रह योग्य अंक के लिए पत्रिका की पूरी टीम बधाई की पात्र है। 

Sunday, March 9, 2014

हिंदी साहित्य में भाषा स्पंदन

पत्रिका: भाषा स्पंदन,  अंक: 32-33, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. मंगल प्रसाद, आवरण/रेखाचित्र: जानकारी उपलब्ध नहीं, पृष्ठ: 44, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100रू.), ई मेल: karnatakahindiacademy@yahoo.com
,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 9886241853, सम्पर्क: कर्नाटक हिंदी अकादमी, 853, 8वां क्रास, कोरमंगला, बेंगलूर  560.095
पत्रिका का समीक्षित अंक भाषा विशेषांक है। अंक में हिंदी भाषा व साहित्य पर विशेष सामग्री का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित रचनाओं में अमृतांशु, डाॅ. अमर सिंह वधान, सुरिन्दरजीत कौर, सुरेन्द्र अग्निहोत्री, राष्ट्र किंकर, नृपेन्द्र नाथ गुप्त एवं फादर कामिल बुल्के के आलेख प्रभावित करते हैं। इन आलेखों में हिंदी भाषा के विकास, स्वरूप व लोकव्यापिकरण को लेकर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। चित्रेश की कहानी सपना मानव जीवन के मूल्यों व उसके क्षरण को लेरक गंभीर चिंता व्यक्त करती है। 
पत्रिका के संपादक डाॅ. मंगलप्रसाद की रचना आप बीति चिकित्सा जगत में व्याप्त विसंगतियों की ओर संकेत करती है। जसविंदर शर्मा व वेंकटेश कुमार के आलेख हिंदी भाषा के वैश्विकीकरण का लेखा जोखा प्रस्तुत करते हैं। डाॅ. अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, नरेन्द्र परिहार, मोहन तिवारी, श्रीमती निर्मला गुप्ता, सत्यकाम पहारिया एवं डाॅ. महाश्वेता देवी की कविताएं, ग़ज़लें, गीत आदि प्रभावित करते हैं। दक्षिण से प्रकाशित ‘‘भारतीय भाषा, साहित्य और सामासिक संस्कृति को राष्ट्रीय स्वर देने वाली हिंदीतर भाषा की लोकप्रिय पत्रिका’’ भाषा स्पंदन का  प्रत्येक अंक संग्रहयोग्य व पठनीय है।