Friday, February 28, 2014

साहित्य में ‘‘प्रोत्साहन’’

पत्रिका: प्रोत्साहन,  अंक: जनवरी 2014, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कमला जीवितराम सेतपाल, आवरण/रेखाचित्र: लवसुयश सेतपाल, पृष्ठ: 28, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 150रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 022.26365138, सम्पर्क: ई-3/307, इन्लैक्स नगर, यारी रोड, वर्सोवा, अन्धेरी पश्चिम मुम्बई। 
ख्यात साहित्यकार स्व. श्री जीवितराम सेतपाल जी द्वारा स्थापित व संपादित इस पत्रिका के समीक्षित अंक में रूपा यादव, राधेलाल नवचक्र, जीवितराम सेतपाल, अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, रामचरण यादव, मनोहर शर्मा की कहानियां व लघुकथाएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई है। पत्रिका के इस अंक मंे सभी स्थायी स्तंभ, समाचार ,पत्र आदि को भी विशिष्ट ढंग से समाहित किया गया है। 

हम भारतवासियों की ‘‘हिंदुस्तानी जबान’’

पत्रिका: हिंदुस्तान जबान,  अंक: दिसम्बर2013, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. सुशीला गुप्ता, मुहम्मद हुसैन परकार, आवरण/रेखाचित्र: निरंजन जोशी, अभिषेक आचार्य, पृष्ठ: 44, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 22812871, सम्पर्क: महात्मा गाॅधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महात्मा गाॅधी बिल्ंिडग, 7 नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई महाराष्ट्र
हिंदी व उर्दू जबान में विगत 45 वर्ष से निरंतर प्रकाशित हो रही यह पत्रिका हिंदी ही नहीं भारतीय  साहित्य की प्रमुख पत्रिका है। पत्रिका के समीक्षित अंक में कनक तिवारी, रणजीत साहा, संजीव कुमार दुबे के आलेख साहित्य की गाॅधीवादी विचारधारा का उम्दा प्रस्तुतिकरण है। डाॅ. श्रीराम परिहार का ललित निबंध बचाल ले थोड़ी सी धरती थोड़ा सा आकाश सरस व पढ़ने में रूचिकर है। ख्यात कवि लेखक लीलाधर जगूडी, लेखिका व साहित्यकार सुधा अरोड़ा एवं सविता भार्गव की कविताएं उत्कृष्ट हैं। मुर्शरफ आलम जौकी की कहानी समाज की मतभिन्नताओं व समानताओं पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। पद्मजा शर्मा की कहानी किस्सागो अंदाज में आगे बढ़ती हुई आदि से अंत तक बांधे रखती है। 
ऋता शुक्ल का उपन्यास अंश, ख्यात साहित्यकार गंगाप्रसाद विमल से कला नाथ मिश्र जी की बातचीत पत्रिका के अन्य आकर्षण हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ व समाचार आदि भी उल्लेखनीय है। उर्दू खण्ड की रचनाएं भाषागत विशेषताओं के साथ साथ भारतीय समाज का अच्छा चित्रण प्रस्तुत करता है। 

Thursday, February 27, 2014

कहानियों के महाविद्यालय से शुभ तारिका

पत्रिका: शुभतारिका,  अंक: जनवरी 2014, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, आवरण/रेखाचित्र: विजय कुमार, पृष्ठ: 44, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 150रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133001 हरियाणा
पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रत्यूष गुलरी, डाॅ. मुक्ता, शमीम देवबन्दी, तारिक अस्लम तस्नीम, प्रकाश भानु मेहतो, दिनेश छाजड तथा नीलम सिंह की लघुकथाएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई है। मुकेश जैन तथा रमेश प्रभाकर के संस्मरण अपनी सरसता से प्रभावित करते हैं। एम.डी. मिश्रा, रामप्रवेश रजक, शिवदत्त डोगरें, रूखसाना सिद्दकी तथा अक्षय जैन की कविताएं उल्लेखनीय हैं। सविता वर्मा व प्रतीक्षा पुष्प की कहानियों में नयापन है। अनूप घई का व्यंग्य मारक बन सका है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ, समाचार व समीक्षा आदि  स्तरीय व पाठन योग्य हैं।  

कथाप्रधान त्रैमासिक ‘‘कथाबिंब’’

पत्रिका: कथाबिंब,  अंक: दिसम्बर 2013, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. माधव सक्सेना, मंजुश्री, आवरण/रेखाचित्र: डाॅ. अरविंद, पृष्ठ: 44, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 25515541, सम्पर्क: ए-10, बसेरा, आॅफ दिनक्वारी रोड, देवनार मुम्बई 400088
कथाप्रधान पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में छोटा सा एक हादसा(सुरेन्द्र अंचल), आदाब(डाॅ. अमिताभ शंकरराय चैधरी), भीगी हथेलियों का स्पर्श(सुरभि बेहेरा), धर्म-अधर्म(इंदुमति सरकार) एवं संतो की लाड़ो ब्याह(अशोक वशिष्ठ) प्रमुख हैं। नरेन्द्र कौर छाबड़ा, नीरा सिंह, आनंद बिल्थरे तथा डाॅ. सुरेश गुप्त की लघुकथाएं स्तरीय व पढ़ने योग्य हैं। नवीन माथुर पंचैली, सुशांत सुप्रिय, प्रभा मजूमदार, मधु प्रसाद, देवेन्द्र कुमार मिश्रा एवं शरीफ कुरैशी की कविताएं, ग़ज़लें प्रभावशाली हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व स्तंभ भी प्रभावित करते हैं।  

ख्यात पत्रिका समावर्तन का फरवरी अंक

पत्रिका: समापवर्तन,  अंक: फरवरी2014, स्वरूप: मासिक, संपादक: मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय,  आवरण/रेखाचित्र: अक्षय आमेरिया, पृष्ठ: 64, मूल्य: 150रू.(वार्षिक 1500रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0734.2524457, सम्पर्क: ‘‘माधवी’’ 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
विगत छः वर्ष से लगातार हिंदी साहित्य की अग्रणी पंक्ति में शामिल इस पत्रिका का स्वरूप निरंतर निखरता गया है। इस ब्लाग पर पत्रिका के अनेक ख्यातअंकों की समीक्षा की गई है। यह अंक भी अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान साहित्यमर्मज्ञों तथा आम पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी व संग्रह योग्य है। यह अंक ख्यात साहित्यकार अभिमन्यु अनत तथा सुप्रसिद्ध बांसुरी वादक पंडित रघुनाथ सेठ पर एकाग्र है। अनत जी का आत्मकथ्य ‘‘मैं जब चरित्रहीन पढ़ रहा था’’ उनके लेखक होने की पीड़ा का मार्मिक दस्तावेज है। उनकी कविताएं विशेष रूप से गंूगा इतिहास, चार भाव विचारयोग्य है। माॅरिशस तथा काफी हाउस पर उनके विचार देश विदेश में हिंदी साहित्य के विकास व विस्तार पर विचार है। गोयनका जी ने उनका साक्षात्कार लिया है जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि सृजन प्रक्रिया भोगी हुई पीढ़ा की पुनरावृत्ति होती है। कथन स्पष्ट करता है कि वे साहित्य के लिए किस हद तक व कितने अधिक समर्पित हैं। अविनाश मिश्र की कविताएं (संपादक निरंजन श्रोत्रिय का चयन), ख्यात आलोचक धनंजय वर्मा का दर्दे बयां ‘‘खुतूत से नुमाया तक’’, विनय मिश्र, संजय कुंदन की ग़ज़लें कविताएं दिन ब दिन बदल रहे हालातों पर सच्ची प्रतिक्रिया है। रमेश दवे, प्रभाकर श्रोत्रिय जी के आलेख धर्मपाल की रचना पत्रिका के अन्य आकर्षण हैं। ख्यात आलोचक लेखक कृष्णदत्त पालीवाल, विनोद शाही, नर्मदा मर्मज्ञ अमृतलाल बेंगड़ का भाषान्तर अंतर्मन की गहराई तक पाठक को प्रभावित करते हैं। स्व. डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे का आलेख बांसुरी की सरसता तथा मधुरता का मार्मिक चित्रण है। पंडित रघुनाथ सेठ के संगीत योगदान पर जगदीश कौशल का लेख तथा उनसे रफी शब्बीर एवं सुनीरा कासलीवाल की बातचीत सातों सुर की मधुरता संजोए हुए है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती है। पत्रिका समावर्तन के संग्रह योग्य सृजन प्रस्तुतिकरण के लिए माननीय श्री प्रभात कुमार भटटाचार्य जी विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं जिनके अथक प्रयासों से हिंदी को अमूल्य व संग्रह योग्य रचनाएं प्राप्त हो रही है।