Tuesday, January 31, 2012

पत्रिका ‘पाखी’ का स्त्री लेखन अंक

पत्रिका: पाखी, अंक: जनवरी, वर्ष: 2012,स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, आवरण/रेखाचित्र: विजेन्द्र , , पृष्ठ: 96, मूल्य: 25 रू.(वार्षिक 250 रू.), मेल: pakhi@pakhi.in ,वेबसाईट: www.pakhi.in , फोन/मोबाईल: 0120.4070500, सम्पर्क: इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएड़ा 201.303 .प्र.
प्रतिष्ठित पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक स्त्री लेखन अंक है। स्त्री अथवा महिला लेखन पर अनेक पाित्रकाओं ने भारीभरकम अंक निकाले हैं। उन अंकों सहित इस अंक में भी ऐसा कुछ विशेष नहीं है जिसकी चर्चा की जाए। ऐसा लगता है कि उपरोक्त अंक अनेक पत्रिकाओं के स्त्री लेखन विशेषांकों की अगली कड़ी मात्र है। हां, यह अवश्य है कि अंक की कहानियां नयापन लिए हुए है। इन कहानियों में बदलते समय के सरोकार तथा प्रतिमानों पर विशेष ध्यान दिया गया है। यद्यपि कहानियों के कथानक तो पुराने ही हैं लेकिन शिल्प की दृष्टि से इनमें नवीनता दिखाई पड़ती है। पत्रिका में लब्धप्रतिठित से लेकर उन नवीन कथा लेखिकाओं को भी शामिल किया गया है जिनकी अभी तक मात्र दो चार कहानियां ही प्रकाशित हुए है। उमा की कहानी .....और हवा खामोश हो गई राजस्थान की राजधानी जयपुर से होती हुई पाठक के मतिष्क में अंदर तक समाती हुई उसे झकझोरती है। कहानी खुशकिस्मत(मृदुला गर्ग), गुलाबी ओढ़नी(स्वाति तिवारी) ,एक बदमजा लड़की(कृष्णा अग्निहोत्री), करोड़पति(कमल कुमार), भेड़िए(लता शर्मा), एक सांवली सी परछाई(मनीषा कुलश्रेष्ठ), देह के पार(जयश्री राय) तथा विकलांक श्रद्धा(ज्योति कुमारी) कहानियों में बहुत कुछ है जो साहित्य के नवसिखियों को कथा की सरसता से अवगत कराएगा। सूरज पालीवाल तथा राकेश बिहारी के आलेखों में साहित्यिकता की अपेक्षा वर्तमान विज्ञापन युग को नए अंदान में परोसने की आकांक्षा ही अधिक दिखाई पड़ती है। अनंत विजय का मूल्यांकन, कविता का उपन्यास अंश तथा गरिमा श्रीवास्तव का आलेख दांसता के स्त्री स्वर में भी स्त्री को स्त्री ही बने रहने का भाव ही उजागर हुआ है। भारत भारद्वाज ने अपने स्तंभ में वर्ष 2011 की साहित्यिक गतिविधियों को बहुत ही सुंदर ढंग से पाठकों के सामने रखा है। लेकिन इसमें यदि इंटरनेट पर पिछले वर्ष होने वाली साहित्यिक गतिविधियों को भी शामिल किया जाता तो इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती।
पत्रिका का संपादकीय बोझिल तथा उबाऊ है। लगता है इसमें संपादक अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना चाहता है। अनावश्यक विश्लेषण पढ़कर लगता है कि हम पिछली शताब्दी के सातवें आठवें दशक की किसी पत्रिका का संपादकीय पढ़ रहे है। इस संपादकीय का केवल अंतिम पैरा ही दिया जाता तो वह पर्याप्त था। फिर भी इतना अवश्य है कि पाठकों को स्त्री लेखन पर एकाग्र एक और अंक से इस विषय पर फिर से सोचने विचारने का अवसर मिलेगा। पत्रिका की अन्य रचनाएं साधारण है।

Sunday, January 29, 2012

समावर्तन और हिंदी साहित्य

पत्रिका: समावर्तन, अंक: जनवरी 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, पृष्ठ: 96, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: samavartan@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0340.2524427, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन .प्र.
प्रतिष्ठित पत्रिका समावर्तन का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क जी पर आंशिक रूप से एकाग्र है। अंक में उनके समग्र व्यक्तित्व पर कमलेश्वर, विजय बहादुर सिंह के लिखे आलेखों का प्रकाशन किया गया है। उनकी कविताएं तथा अन्य रचनाएं साहित्य के नए पाठकों के लिए उपयोगी है। केशव तिवारी की कविताओं पर निरंजन श्रोत्रिय ने अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। प्रणव कुमार बंधोपाध्याय, कमर मेवाड़ी, सिम्मी हर्षिता की रचनाएं विशिष्ट व ज्ञानवर्धक हैं। सुनीता जैन, केशव शरण, चंद्रभान भारद्वाज, पूनम गुजरानी तथा जहीर कुरेशी की कविताएं प्रभावित करती है।
रंगशीर्ष के अंतर्गत वसंत पोतदार पर प्रकाशित जानकारी उपयोगी व संग्रह योग्य है। महिमा जोशी व विष्णु चिंचलांकर के आलेख उनके रंगकर्म पर संक्षिप्त किंतु उपयोगी जानकारी प्रस्तुत करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी प्रभावित करती है।

Saturday, January 28, 2012

साहित्यिक पत्रिका साक्षात्कार का नया अंक

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: दिसम्बर, वर्ष: 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवन नाथ शुक्ल, आवरण: मुन्नालाल विश्वकर्मा, , पृष्ठ: 120, मूल्य: 25 रू.(वार्षिक 200 रू.), मेल: sahityaacademy.bhopal@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0755.2554762, सम्पर्क: साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल 3 .प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक अच्छी जानकारीपरक रचनाओं से युक्त है। अंक में ख्यात साहित्कार, लेखक व प्रशासक श्री मनोज श्रीवास्तव से उषा जायसवाल द्वारा लिया गया साक्षात्कार दशावतार की कथा हर मनुष्य के जीवन की कथा है’ प्रकाशित किया गया है। एक प्रश्न के उत्तर में उनका कहना है कि, ‘‘ मैं विशेषणों, जो आपने प्रशासक, लेखक और कवि के साथ जोड़े हैं, से असहमति जरूर प्रकट करना चाहूंगा। अभी यह सारे विशेषण प्रिमेच्योर हैं। बात सिर्फ प्रशासक और कवि के दो पक्षों की है। वे दोनों पक्ष मुझे एक दूसरे के विरोध या विकल्प में नहीं लगते बल्कि दोनों एक दूसरे को मजबूती देते लगते हैं।’’ उनके विचार लेखक के साथ साथ प्रशासनिक कार्यो के साथ निष्ठा दर्शाते हुए पाठकों से भी यह आग्रह करते लगते हैं कि वह भी अपने जीवन के सभी पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखे। उनका आलेख ‘त्रिजटा का स्वप्न’ पहली नजर में सामान्य धार्मिक आलेख लगता है। लेकिन गंभीरता पूर्वक विचार करने पर उसमें समाज के अनेक रंग दिखाई पड़ते हैं।
महेन्द्र राजा, शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी, कुमार रवीन्द्र, नित्यानंद श्रीवास्तव तथा सिद्धेश्वर के आलेख भले ही पूरी तरह से साहित्यिक आलेख न हों पर इन लेखों का मूल स्वर साहित्य से अधिक निकटता रखता है। कुमकुम गुप्ता का गीत तथा भगवानदास जैन की ग़ज़ल अच्छी व नए विचारों का पोषण करती जान पड़ती है।इस अंक की कहानियां निष्प्रभावी रही है। इनमें ऐसा कुछ नहीं है जिसकी चर्चा की जाए। एडगर एलन पो की कहानी का अनुवाद इंदुप्रकाश कानूनगो ने सटीक व रूचिकर अनुवाद किया है, जिसमें रचना का मूल स्वर अपनी विशिष्टता के साथ निखरता चला गया है। पत्रिका की समीक्षाएं ठीक ठाक कही जा सकती है। संपादकीय वह, जो हम भूल रहे हैं अधिक लम्बा होते हुए भी संग्रह योग्य है। अच्छे साक्षात्कार युक्त अंक के लिए पत्रिका की टीम बधाई की पात्र है।

Tuesday, January 24, 2012

हिमनगरी से ‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: 12, वर्ष: 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, आवरण: सुरजीत, , पृष्ठ: 64, मूल्य: 5 रू.(वार्षिक 60 रू.), मेल: himprasthahp@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग पे्रस परिसर, घोड़ चैकी, शिमला-6
हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित इस पत्रिका के प्रत्येक अंक में साहित्य से जुड़ी अनेक सार्थक रचनाएं प्रकाशित की जाती है। समीक्षित अंक में भी सारगर्भित व जानकारीपरक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक मंे हेमराज कौशिक, सुरेश उजाला, राजेन्द्र परदेसी, ओम प्रकाश सारस्वत, मनोज शर्मा, शशिभूषण सलभ, सुनील कुमार फुल्ल, उषा रानी, हेमन्त गुप्ता, प्रभा दीक्षित व श्यामनारायण श्रीवास्तव के शोधपरक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। कहानियों में मदन चंद्र भट्ट, गंगाराम राठी व डाॅ. नारायण की कहानियां प्रभावित करती है। पवित्रा अग्रवाल, भीमसिंह नेगी एवं कृष्णचंद्र की लघुकथाएं अच्छी व पठनीय है। प्रोमिला भारद्वाज, रमेश चंद्र शर्मा, संतोष श्रेयांस, मोहन भारतीय तथा भुवनेश्वर सुमन की कविताएं नयापन लिए हुए है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व लेख आदि भी उपयोगी व जानकारीपरक हैं।

Sunday, January 22, 2012

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: 07, वर्ष: 2011,स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादक: आर. चंद्रशेखर, संपादक: मनोहर भारती, आवरण: जानकारी नहीं, पृष्ठ: 52, मूल्य: 5 रू.(वार्षिक 50 रू.), मेल: brsmhpp@yahoo.co.in ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 080.23404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर बेंगलूर 500010 कर्नाटक
इस पत्रिका का प्रत्येक अंक शोधपरक रचनाओं से युक्त होता है। समीक्षित अंक में हरिकृष्ण निगम, रानू मुखर्जी, एम. शेषन, इंदिरा बी., के. मुस्ताक हुसैन, विकास मानव, विनोद चंद्र पाण्डेय, जालिम प्रसाद, गीता ए. भट्टी, हितेश कुमार शर्मा के आलेख प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं। रामसेवक शुक्ल तथा बी. बै. ललिताम्बा के सामाजिक तथा भाषापरक आलेख प्रभावित करते हैं। रामचरण यादव की कहानी तथा एस.पी. केवल का उपन्यास अंश अच्छी रचनाएं हैं। कुंवर प्रदीप निगम, किशन लाल शर्मा, कृष्णपाल सिंह गौतम के गीत कविताएं अच्छी व सामाजिक मूल्यों में परिवर्तन की ओर संकेत करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी साहित्यिकता से भरपूर हैं।

Saturday, January 21, 2012

जापानी काव्य विधा हाइकु की पत्रिका 'हाइकु लोक'

पत्रिका: हाइकु लोक, अंक: 01, वर्ष: 2011,स्वरूप: अर्द्धवार्षिक, प्रधान संपादक: राजेन्द्र परदेसी, संपादक: मिथलेश दीक्षित, आवरण: जानकारी नहीं, पृष्ठ: 16, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: NA ,वेबसाईट: NA , फोन/मोबाईल: 9415045584, सम्पर्क: भारतीय पब्लिक अकादमी, चांदन रोड़, फरीदनगर, लखनऊ .प्र.
हाइकु विधा मूलतः जापानी काव्य विधा है लेकिन यह पिछले कुछ वर्षो से हिंदी में भी लोकप्रिय हो रही है। हाइकु लोक भारत में इस विधा की एकमात्र पत्रिका है। छंदयुक्त इस विधा में मात्राओं का अत्यधिक महत्व है इसके बिना हाइकु का निर्माण नहीं किया जा सकता है। अंक में हाइकु काव्य के विषय में संपादक मिथलेश दीक्षित ने संक्षेप में अच्छा परिचयात्मक आलेख लिखा है। सृजन के अंतर्गत कुछ अच्छे व सारगर्भित हाइकु का प्रकाशन किया गया है। इनमें अनिरूद्ध सिंह सेंगर, इंदिरा अग्रवाल, ओम प्रकाश सिंह, कमल किशोर गोयनका, गोपाल दास नीरज, नलिनीकांत, रामेश्वर काम्बोज, सदाशिव कौतुक तथा सुभाष नीरव सहित अन्य हाइकुकारों के हाइकु पाठकों को संदेश देते हैं। विदेशों से देवी नागरानी, पूर्णिमा वर्मन, मंजु मिश्रा तथा हरदीप कौर के हाइकु विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। हाइकु समारोह पर पत्रिका के प्रधान संपादक राजेन्द्र परदेसी जी का आलेख इस विधा तथा इसकी भविष्य में हिंदी साहित्य में संभावनाओं पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। हिंदी के अन्य रचनाकारों को चाहिए की इस विधा पर समुचित ध्यान देकर इसमें सृजन करें तो वे अपनी बात संक्षेप में कहकर साहित्य का भला कर सकेंगे।

Thursday, January 19, 2012

केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका

पत्रिका: केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका, अंक: 58, वर्ष: 2011,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: एम. चंद्रशेखर नायर, आवरण: जानकारी नहीं, पृष्ठ: 30, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: ,वेबसाईट: , फोन/मोबाईल: 0471.2541355, सम्पर्क: श्रीनिकेतन, लक्ष्मीनगर, पट्टम पालस पोस्ट, तिरूवनंतपुरम, 615004 केरल
केरल राज्य से हिंदी पत्रिका के प्रकाशन की खबर ही अपने आप में महत्वपूर्ण है। कथाचक्र पर इस पत्रिका के अनेक अंकों की समीक्षा समय समय पर की जा चुकी है जिसे देश भर के विद्वानों द्वारा सराहा गया है। समीक्षित अंक में भी साहित्यिक सामग्री का प्रकाशन उत्तरभाषी राज्य से प्रकाशित पत्रिका के स्तर का है। पत्रिका में सोनिया गांधी जी के सत्य व अहिंसा पर संपादकीय राजनीतिक आलेख न होकर विशुद्ध सामाजिक आलेख है जिसमें सोनिया जी की अहिंसा व सत्य के प्रति प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया गया है। जीवन शुक्ल की रचना, मनोहर धरफने का आलेख एवं केशव फलके की हिंदी के प्रति चिंता प्रभावित करती है। डाॅ. अरूणा ने अपने शोध आलेख में नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में पौराणिक संदर्भो को अच्छे विश्लेषण व विवरण के माध्यम से रखा है। पत्रिका का प्रमुख आकर्षण समकालीन हिंदी मलयालम कहानी: स्त्री विमर्श(उषाकुमारी के.पी.) है। जिसमें दोनों भाषाओं की महिला रचनाकारों की चुनी हुई कहानियों को केन्द्र में रखकर विचार किया गया है। लीला कुमारी का आलेख लौटना और लौटना में जीवन मूल्यों का अवमूल्यन तथा जयश्री बी. के आलेख में विस्तार के साथ साथ गंभीर विश्लेषण भी है। षमशाद श्रीराम आर., नलिनीकांत, मोईउद्दीन शाहीन तथा इंदिरा वी.सी. की रचनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

Sunday, January 15, 2012

साहित्य के लिए अहम ‘पूर्वग्रह’

पत्रिका: पूर्वग्रह, अंक: 134, वर्ष: 2011,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: रमेश दवे, आवरण: टाटजाना मनेया, पृष्ठ: 134, मूल्य: 30रू (वार्षिक: 120रू.), मेल: bharatbhavantrust@gmail.com ,वेबसाईट: NA, फोन/मोबाईल: 0755.2660239, सम्पर्क: भारत भवन न्यास, जे. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स भोपाल .प्र.
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित यह पत्रिका अपनी रचनात्मकता तथा विशिष्ट अभिव्यक्ति के कारण देश भर में जानी जाती है। समीक्षित अंक में भी सहेजकर रखने योग्य आलेखों का प्रकाशन किया गया है। अंक की अधिकांश रचनाएं समालोचनात्मक हैं जिनमें हिंदी समालोचना को वर्तमान संदर्भो से जोड़ने का प्रयास किया गया है। अंक में शमशेर बहादुर, केदारनाथ अग्रवाल, फैज अहमद फैज, नागार्जुन, अज्ञेय की चुनी हुई प्रमुख कविताओं के साथ साथ उनके साहित्यिक अवदान पर आलेख का प्रकाशन किया गया है। इन आलेखों की विषय वस्तु साहित्यिकारों रचनाकारों के सृजन तथा दैनिक जीवन में संघर्षो से पाठक का परिचय कराती है। ज्योत्सना मिलन, हरीश पाठक, राजेश जोशी, नंद भारद्वाज, एलिस फै़ज, अतीकुल्लाह, भगवतशरण उपाध्याय, प्रयाग शुक्ल, वीरेन्द्र कुमार जैन, बी.बी. कुमार ने अपने अपने लेखों में विस्तार की अपेक्षा सुगठित ढंग से विषयवस्तु का निर्वाह किया है। स.ही. वातस्यायन, पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु, कुमार विमल के आलेख सामाजिक सांस्कृतिक ढंग से विषय को पाठक के सामने रखने में पूरी तरह से सफल रहे हैं। सचिता नागदेव का संस्मरण, शम्पा शाह का लोक आलेख तथा तेजी ग्रोवर की कविताएं पत्रिका के अन्य आकर्षण हैं। अन्य रचनाएं, समीक्षांए तथा संपादकीय भी प्रभावित करते हैं।