Friday, December 30, 2011

शब्दशिल्पियों के आसपास

पत्रिका: आसपास, अंक: दिसम्बर 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 24, मूल्य: 5रू (वार्षिक: 50रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com ,वेबसाईट: www.dharohar.net, फोन/मोबाईल: 0755.2775129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, कोटरा, भोपाल म.प्र.
समाचार प्रधान पत्रिका शब्दशिल्पियों के आसपास के समीक्षित अंक में दुष्यंत कुमार अलंकरण के समाचार को प्रमुख रूप से प्रकाशित किया गया है। अंक में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार यह अलंकरण इस बार ख्यात साहित्कार, पत्रकार एवं लेखिका मृणाल पाण्डेय को दिया गया है। पांच दिवसीय पुस्तक पर्व का समाचार साहित्य जगत के पाठाकों के लिए जानकारीपरक है। ख्यात गायक स्व. भूपेन हजारिका, इंदिरा गोस्वामी पर पत्रिका में मार्मिक ढंग से सामग्री का प्रकाशन किया गया है। ख्यात कवि विष्णु खरे तथा वरिष्ठ कथाकार विद्यासागर नौटियाल को मिले पुरस्कारों के समाचार के साथ साथ अन्य समाचार त्वरित रूप से पाठकों को साहित्यिक गतिविधियों को पहुंचा रहे हैं, यह इस छोटी सी पत्रिका की खासियत है। पत्रिका के अन्य समाचार साहित्यकारों, लेखकों तथा साहित्य के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी व संदर्भ योग्य हैं।

ख्यात पत्रिका ‘संबोधन’ का नया अंक

पत्रिका: संबोधन, अंक: अक्टूबर दिसम्बर 2011,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कमर मेवाड़ी, पृष्ठ: 92, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09829161342, सम्पर्क: पो. कांकरोली, जिला राजसमंद 313324 राजस्थान
हिंदी साहित्य में पिछले 46 वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रही पत्रिका संबोधन का प्रत्येक अंक विशिष्ठ होता है। समीक्षित अंक भी प्रसिद्ध विद्वान आचार्य निरंजन नाथ पर एकाग्र है। उन के समग्र व्यक्तिव पर पत्रिका ने उपयोगी व जानकारी परक सामग्री का प्रकाशन किया है। प्रकाशित प्रमुख रचनाओं में उनके व्यक्तित्व पर लिखे गए आलेखों को सम्मलित किया जा सकता है। इनके प्रमुख लेखक हैं - भगवती लाल व्यास, वेद व्यास, बालकवि बैरागी, महेन्द्र भागवत, अफजल खां अफजल तथा जीतमल कच्छारा। पत्रिका की अन्य रचनाओं में उनकी कहानियां, कविताएं तथा अन्य रचनाएं सम्मलित हैं। इसके अतिरिक्त माधव नागदा, पल्लव, हुसैनी बोहरा तथा राजेन्द्र परदेसी के आलेख विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। पत्रिका का अन्य आकर्षण इसका ऋुटिहीन मुद्रण तथा आकर्षक ले आउट है।

साहित्य की ‘‘जमीन’’

पत्रिका: ज़मीन, अंक: 28, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: पवन कुमार मिश्र, प्रमोद त्रिवेदी, पृष्ठ: 40, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: एफ-1, जलश्री कालोनी, उदयन मार्ग, उज्जैन म.प्र.
साज सज्जा में साधारण किंतु रचनात्मक रूप से असाधारण इस पत्रिका का समीक्षित अंक अत्यधिक प्रभावित करता है। अंक में रवीन्द्रनाथ टैगोर की जन्मशती पर प्रकाशित आलेख भारतीयता और भारतीय राष्ट्र(चिन्मय मिश्र) अपने आप में अद्वितीय है। अज्ञेय जी के साहित्य पहलू को लेकर लिखा आलेख अज्ञेय प्रेरक व्यक्तित्व(पूर्णचंद्र रथ) अज्ञेय की रचनाओं पर आधुनिक ढंग से विचार करता है। इसके अतिरिक्त नासिर अहमद सिंकदर का आलेख व अशोक पाराशर की कहानी फिर आई गाड़ी तथा श्रीराम दवे की कविताएं पाठकों पर विशिष्ठ छाप छोड़ती है। पत्रिका का यह अंक साहित्य के नए विद्यार्थियों के लिए सहेज कर रखने योग्य है।

हिंदी साहित्य में साक्षात्कार

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: नवम्बर 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल:sahityaacademy.bhopal@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2554782, सम्पर्क: .प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल
मध्यप्रदेश से प्रकाशित साहित्य की इस प्रमुख पत्रिका का प्रत्येक अंक संग्रह योग्य रचनाओं से युक्त होता है। उसी तारतम्य में समीक्षित अंक भी उपयोगी व जानकारीपरक है। अंक में वरिष्ठ साहित्यकार व हिदी विद्वान डाॅ. श्रीराम परिहार से बातचीत साहित्य जगत में उनके योगदान के साथ साथ वर्तमान हिंदी साहित्य पर भी प्रकाश डालती है। पत्रिका का प्रमुख आकर्षण इसके आलेख हैं। उनमें से कुछ प्रमुख आलेखों में मृदुला सिंहा, हेमंत गुप्त, प्रेमशंकर रघुवंशी, ब्रजकिशोर झा, प्रो. उषा यादव, जगत सिंह विष्ट एवं कृष्ण गोस्वामी के आलेख प्रमुख हैं। राजकुमार व नीलम चैरे की कविताएं नए विषयों को उठाती हुई अपनी बात वेबाक ढंग से पाठकों के समक्ष रखने में पूरी तरह से सफल रही है। रमेश चंद्र शर्मा तथा तालेवर मधुकर के गीत ग़ज़ल बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर सके हैं। वैसे भी आजकल गीत तथा हिंदी ग़ज़लों में घिसे पिटे तथा पुराने प्रतीकों के कारण आकर्षण लगभग नहीं रह गया है। पत्रिका की कहानियों में प्रमोद भार्गव, जसवंत सिंह एवं योगेश दीक्षित की कहानी प्रभावित करती है। पत्रिका का संपादकीय ‘एक कृति जिसका शताब्दी वर्ष है’ अच्छा चिंतन योग्य आलेख बन पड़ा है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

Wednesday, December 28, 2011

साहित्य की ख्यात पत्रिका समावर्तन

पत्रिका: समावर्तन, अंक: 04, वर्ष: 09, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, पृष्ठ: 102, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन .प्र.
साहित्य जगत की इस ख्यात पत्रिका का प्रत्येक अंक पठनीय व ज्ञानवर्धक रचनाओं से युक्त होता है। समीक्षित अंक में ख्यात कवि मैथिली शरण गुप्त के सृजन कर्म पर विशिष्ठ सामग्री का प्रकाशन किया गया है। उनकी रचनाओं के साथ साथ अज्ञेय, सुषमा प्रियदर्शनी, प्रभाकर श्रोत्रिय तथा संपादक रमेश दवे के उपयोगी व नवीन विचारों से युक्त आलेखों का प्रकाशन किया गया है। रवीन्द्र स्पप्निल प्रजापति की कहानी ‘प्यार और एक दूसरी लड़की’ नए ढंग से लिखी गई समसामयिक कहानी है जिसमें आज का समाज तथा उसके आसपास का वातावरण अपने नए रूप में उभर कर सामने आया है। निरंजन श्रो.ित्रय द्वारा चयनित महेश चंद्र पुनेठा की कविताएं सच से सामना कराने में पूर्णतः सफल रही है। राजकुमार कुम्भज, दुष्यंत तिवारी एवं सुभाष गौतम कबीर की कविताएं भी सार्थक प्रस्तुति कही जा सकती है। पं. गोकुलोत्सव जी महाराज पर एकाग्र पत्रिका का दूसर ा खण्ड ज्ञानवर्धक व संग्रह योग्य है। इस भाग में गजानन शर्मा, प्यारे लाल श्रीमाल, इब्राहिम अली, नीता माथुर तथा सूर्यकांत नागर की उनसे बातचीत प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार भी नवीनता लिए हुए हैं। अंक हर दृष्टिकोण से उपयोगी व पठनीय है।

Sunday, December 25, 2011

मासिक पत्रिका शुभ तारिका का नया अंक

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: 12, वर्ष: 39, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 64, मूल्य: 15रू (वार्षिक: 150रू.), ई मेल: urmi.klm@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0171.2631068, सम्पर्क: कृष्णदीप ए 47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी 133001 हरियाणा
प्राचीन ख्यात साहित्यिक पत्रिका शुभ तारिका का यह अंक अच्छी व जानकारीपरक रचनाओं से युक्त है। अंक में राधेश्याम योगी, श्लेष कुमार चंद्राकर, भवानीशंकर मिश्र, संतोष सूपेकर, आलोक भारती, पूर्णिमा मिश्रा व पवित्रा अग्रवाल की लघुकथाओं का प्रकाशन किया गया है। अरविंद अवस्थी, शिवदत्त डोगरे, सुनील कुमार, भगवान प्रसाद उपाध्याय, आलोक तिवारी, सीताराम पाण्डेय तथा लोचक सक्सेना की कविताएं प्रभावित करती हैं। रामशंकर चंचल व मुक्ता मदान की कहानियां समसामयिक प्रस्तुति हैं, लेकिन अनूप घई के व्यंग्य में कुछ कमियां रह गई है जिसके कारण यह व्यंग्य इस विधा के स्तर को नहीं स्पर्श कर सका है। डा. महाराज कृष्ण जैन के पत्रकारिता पर विचार साहित्य व पत्रकारिता छात्रों के लिए जरूरी व उपयोगी हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी प्रभावित करती है।

Saturday, December 24, 2011

कर्नाटक से ‘‘भाषा स्पंदन’’

पत्रिका: भाषा स्पंदन, अंक: 25, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. सरगु कृष्णमूर्ति, संपादक: डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ: 64, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100रू.), मेल:karnatakahindiacademy@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 080.25710355, सम्पर्क: 853, 8वां क्रास, 8 वां ब्लाक, कोरमंगला, बेंगलूर 560.095 कर्नाटक
बेंगलूर से प्रकाशित हिंदी साहित्य की इस महत्वपूर्ण पत्रिका का प्रत्येक अंक संग्रह योग्य होता है। समीक्षित अंक में भी अच्छी पठनीय व संग्रह योग्य रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। आलेखों में डाॅ. नीरा प्रसाद, राजेन्द्र गौतम, शंभू रतन अवस्थी, डाॅ. परमानंद पांचाल, सत्यकाम पहारिया, कमलकांत सक्सेना, गोस्वामी, अशोक कुमार शेरी, अन्नपूर्णा श्रीवास्तव एवं डाॅ. मंगल प्रसाद के आलेख हिंदी साहित्य व भाषा की दशा व दिशा पर गंभीरतापूर्वक प्रकाश डालते हैं। प्रकाशित कहानियों में नई राह(राजेन्द्र परदेसी), कयामत(जसविंदर शर्मा), अभागन(रामशंकर चंचल), कंधा(इंद्र सेंगर) तथा खानदान(पंकज शर्मा) प्रमुख हैं। कृष्ण कुमार यादव, कमल किशोर, भानुदत्त त्रिपाठी, प्रतिभा, राजेन्द्र परदेसी, कुमार शर्मा, अनिल, मोहन तिवारी, आकांक्षा यादव, उर्मिलेश तथा आदित्य शुक्ल की कविताएं, गीत व ग़ज़ल प्रभावित करते हैं।

Sunday, December 18, 2011

‘‘हिंदी चेतना’’ का प्रेम जनमेजय पर एकाग्र विशेषांक

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: 52, वर्ष: 13, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 84, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: hindichetna@yahoo.ca ,वेबसाईट: www.vibhom.com , फोन/मोबाईल: (905)475-7165 , सम्पर्क: 6, Larksmere Court, Markham, Ontario, L3R, 3R1,
कनाड़ा से प्रकाशित हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘‘हिंदी चेतना’’ द्वारा प्रतिवर्ष संग्रह योग्य, पठनीय विशेषांकों का प्रकाशन किया जाता रहा है। इस वर्ष पत्रिका का विशेषांक हिंदी साहित्य के प्रख्यात व्यंग्यकार, संपादक प्रेम जनमेजय पर एकाग्र है। सामान्यतः किसी साहित्यकार पर विशेषांक प्रकाशित करने का जोखिम पत्रिकाएं कम ही लेती है। क्योंकि इससे कभी कभी पत्रिका की लोकप्रियता में कमी आने का अंदेशा बना रहता है। जब साहित्यकार कोई व्यंग्यकार हो, तथा वर्तमान में सृजनरत हो तो पत्रिका की स्वीकार्यरता अधिक प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है। लेकिन यह प्रसन्नता की बात है कि हिंदी चेतना सभी स्थापित मानदण्ड़ों पर खरी उतरी है। पत्रिका ने बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रेम जनमेजय जी के साहित्यिक अवदान पर आलेखों का प्रकाशन किया है।
पत्रिका का प्रमुख आकर्षण ख्यात रचनाकार, उपन्यासकार पंकज सुबीर से उनकी बातचीत है। इस वार्ता में साहित्य जगत में व्यंग्यविधा तथा उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला गया है। एक प्रश्न के उत्तर में वे स्वंय स्वीकार करते हैं कि, ‘‘ मैं बहुत ही आशावान व्यक्ति हूं और व्यंग्यकार के रूप में नकारात्मक दृष्टि होने के बावजूद सकारात्मक दृष्टिकोण रखता हूं।’’ यह सच है कि किसी भी विधा में सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है अन्यथा साहित्य अपने उद्दश्यों से भटककर समाज को द्ग्भ्रिमित करेगा। अन्य रचनाकारों लेखकों ने उनके सृजन,लेखन, संपादन, व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर विस्तार से अपने विचार रखे हैं। उनमें प्रमुख हंै--
डाॅ. मनोज श्रीवास्तव -- प्रेम जनमेजय ऐसे व्यंग्यकार हैं जो भले ही बड़ी मात्रा में न लिखते होें, किंतु वे जब भी लिखते हैं, उनका व्यंग्य पिछली रचना से दो कदम आगे, पुनरावृत्ति मुक्त और पहल से अधिक तराशा हुआ होता है।
प्रदीप पंत -- प्रेम (ढाई आखरवाला) के जितने रंग होते हैं, प्रेम जनमेजय के भी उतने ही हैं, बल्कि अनेक विरोधी रंग भी हैं।
सूरज प्रकाश -- उन्होंने अपने हिस्से के संघर्ष किए हैं लेकिन कभी भूले से भी उनका जिक्र करना पसंद नहीं किया।
डाॅ. अशोक चक्रधर -- प्रेम के अंदर विश्लेषण शक्ति रखने वाला एक श्रेष्ठ रचनात्मक और संवेदनशील लेखक है।
मनोहर पुरी -- वह अपने मित्रों सहयोगियों और साहित्यपे्रमियों से सहयोग लेने में कोई गुरेज नहीं करते परंतु उनकी दृष्टि व्यावसायिकता से कोसों दूर रहती है।
सूर्यबाला -- सादगी की छटा उनकी सहज प्रवाही बातों में विद्यमान रहती है। बड़ों के लिए एक अक्रत्रिम सम्मान भाव तथा छोटों के लिए स्नेह संरक्षण का विश्वसनीय संबल।
तरसेम गुजराल -- प्रेम जनमेजय बाजारवादी शक्तियों की नृशंसता, बर्बरता और आतंक से बाखूबी परिचित हैं।
यज्ञ शर्मा -- प्रेम जनमेजय की कर्मठता का प्रमाण है उनके लेखन की व्यापकता।
डाॅ. नरेन्द्र कोहली -- प्रेम के साथ अपने संबंध को किसी रिश्ते में बांधने में मुझे कठिनाई का अनुभव होता है। .... इस प्रकार सोचता हूं कि वह मुझे अपने पुत्र कार्तिकेय और अपनी पीढ़ी के बीच की पीढ़ी का लगता है।
उषा राजे सक्सेना -- प्रेम जनमेजय एक सह्दय, उदार मनुष्य हैं, जिनकी सदाश्यता में अनेक लेखक जन्म लेते हैं, पनपते हैं और फिर सघन वृक्ष बनकार दूसरों को छाया देते हैं।
अनिल जोशी -- (प्रेम जनमेजय से साक्षात्कार) ‘‘मेरा नाम प्रेम है, पेे्रम चोपड़ा नहीं। साहित्य में जीवंतता साश्वत तथ्यों से आती है, सनसनी से नहीं।’’ अनिल जोशी के प्रश्न ‘आप सिर्फ नाम के प्रेम हैं?’ के उत्तर में।
गिरीश पंकज -- पे्रेम जी का व्यंग्य अपनी मौलिक स्थापनाओं के कारण अलग से पहचाना जाता है।
ज्ञान चतुर्वेदी -- मुझे अपनी इस मित्रता पर गर्व है। ‘पे्रेम को दुनियादारी की खासी समझ है और इस दुनिया की भी।’
महेश दर्पण -- वह स्वयं को नहीं दूसरों को सामने या केंद्र मंे रखने में विश्वास रखते हैं।
अजय अनुरागी -- व्यंग्य के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे उनके प्रयास उल्लेखनीय हैं।
प्रताप सहगल -- प्रेम के दोनांे नाटक, व्यंग्य नाटक की दुनिया में नया दखल है।
प्रो. हरिशंकर आदेश -- प्रेम जनमेजय संज्ञा है एक ऐसे व्यक्ति की जो साक्षात् प्रेम की प्रेममूर्ति है।
अविनाश वाचस्पति -- प्रेम व्यंग्य में और व्यंग्य प्रेम में कुछ इस कदर घुलमिल गया है कि यह घुलना मिलना मिलावट नहीं है।
राधेश्याम तिवारी -- अपने निजी जीवन में प्रेम जनमेजय को मैंने जितना आत्मीय पाया, एक लेखक के रूप में भी वे मुझे उतने ही आत्मीय लगे।
अजय नावरिया -- प्रेम जनमेजय केवल सांसारिक जीव ही नहीें है बल्कि एक उदार क्षमाशील, संवेदनशील और परदुःखकातर मनुष्य भी हैं।
वेदप्रकाश अमिताभ -- प्रेम जनमेजय का व्यंग्य कहीं हथौड़ा बनकर टूटा है तो कहीं आलपिन तीक्ष्ण चुभन का अहसास देता है।
लालित्य ललित -- (वार्ताकार) व्यंग्य लेखन पर उसकी दशा पर क्यसा कहेंगे? ‘‘ पूरे हिंदी साहित्य की दिशा ही सही नहीं है। मूल्यांकन का आधार कृति कम कृतिकार अधिक है ....। ’’
इन महत्वपूर्ण विचारों के साथ ही प्रमुख संपादक श्याम त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि, ‘‘प्रेम जी के इतने अधिक प्रेमी होगें इसका मुझे गुमान ही नहीं था।’’ कथन प्रेम जनमेजय की साहित्यजगत में सह्दयता तथा लोकप्रियता को सामने लाता है। संपादक सुधा ओम ढीगरा ने पत्रिका की रीति नीति के संबंध में लिखा है, ‘‘हिंदी चेतना की टीम किसी वादविवाद, राजनीति या गुटबंदी, विचारधार व विमर्श से परे होकर स्वतंत्र सोच व विचार से कार्य करती है। प्रेम जनमेजय विशेषांक उसी सोच का परिणाम है।
पत्रिका का समीक्षित अंक वर्तमान हिंदी साहित्य को नई दिशा देने में कामयाब होगा। इसी कामना के साथ अच्छे, पठनीय अंक के लिए बधाई।