Wednesday, August 24, 2011

साहित्य में ‘समर लोक’

पत्रिका: समर लोक, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मेहरून्निसा परवेज, पृष्ठ: 96, मूल्य: 20रू (वार्षिक 100 रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2430210, सम्पर्क: -7/837, शाहपुरा, भोपाल .प्र.
विगत 13 वर्ष से मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित समर लोक का समीक्षित अंक लघुकथा विशेषांक है। पत्रिका के इस अंक में लघुकथा के साथ साथ अन्य कहानियों को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। अंक में मंटो, खांडेकर, प्रेमचंद, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, माखनलाल चतुर्वेदी, जगदीश चंद्र मिश्र, लक्ष्मीकांत बेनबरूआ, विष्णु प्रभाकर जैसे ख्यात व प्रतिष्ठित कथाकारों के साथ साथ वर्तमान समय मंे लगातार पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे लघुकथा लेखकों को भी समुचित स्थान दिया गया है। इनमें प्रमुख रूप से रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, हसन जमाल, आलोक सातपुते, ईश्वर चंद्र सक्सेना, बलराम, सुरेश शर्मा, हेमंत गुप्ता, पूर्णिमा विलसन, दीपक शर्मा, संतोष सुपेकर, सुदर्शन, हरीश तिवारी, दीपक चैरसिया एवं अनुराग शर्मा प्रमुख हैं। इन सभी लघुकथाओं में कलेवर का ध्यान रखते हुए विषय वस्तु को केन्द्र बनाया गया है लेकिन केन्द्रीय भाव की अनदेखी नहीं की गई है। यह इन प्रायः इन सभी कथाकारों को पढ़कर समझा जा सकता है। अन्य रचनाओं में मनोहर शर्मा, शीला मिश्र, शिवप्रसाद सिंह, अखिलेश शुक्ल, रमेश मनोहरा, हीरालाल नागर, सुदर्शन प्रियदर्शनी तथा शैलजा सक्सेना की कहानियां पठनीय व विचार योग्य हैं। पत्रिका की कविताएं, आलेख, संस्मरण सहित अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती हैं।

Friday, August 12, 2011

प्रबुद्ध पाठकों के लिए ‘शुभ तारिका’

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: जुलाई 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 64, मूल्य: 12रू (वार्षिक: 120रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133001 हरियाणा

कहानीलेखन महाविद्यालय अम्बाला से नियमित रूप से प्रकाशित इस पत्रिका में सहेजने योग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जाता है। इस अंक मंे भी अनेक जानकारीपरक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। लघुकथाओं में लक्ष्मी रूपल, चंद्र भानु आर्य, किशन लाल शर्मा, संतोष सुपेकर, चेतन आर्य, देशपाल सिंह सेंगर की कहानियां रूचिपरक हैं। प्रेम कुमार, सुरेश चंद शर्मा, दीप पन्धा, उपकार सिंह, मलिक अगवानपुरी तथा नीरजा की कविताएं प्रभावित करती है। लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत रामगोपाल वर्मा के व्यक्तित्व को आकर्षक ढंग से प्रकाश्ािित किया गया है। श्रीकांत व्यास का व्यंग्य तथा अर्पणा चतुर्वेदी की कहानी भी स्तरीय व रूचिकर है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, समाचार आदि भी जानकारीपरक हैं।

Thursday, August 11, 2011

साहित्य का ‘‘एक और अंतरीप’’

पत्रिका: एक ओर अंतरीप, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: प्रेमकृष्ण शर्मा, पृष्ठ: 128, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100 रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09414055811, सम्पर्क: 1, न्यू कालोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर 302006 राजस्थान

साहित्यिक पत्रिका एक और अंतरीप का पुनः प्रकाशन इस अंक के साथ प्रारंभ किया गया है। यह इससे पूर्व लगातार 19 वर्ष तक प्रकाशित होती रही है। समीक्षित अंक में पत्रिका ने भले ही अपेक्षाकृत नए रचनाकारों को चुना हो पर रचनाओं के स्तर से किसी तरह का समझौता नहीं किया है। अंक में वरिष्ठ कवि गोविंद माथुर कुछ चुनी हुई कविताओं पर संपादक अजय अनुरागी ने विस्तृत रूप से विचार किया है। उनकी कविताओं में ‘बचा हुआ पे्रम’, काम से लौटती स्त्रियां’ तथा युवा कवि जैसी कविताएं साहित्य के गंभीर पाठक के साथ साथ नए व गैरहिंदी भाषी पाठक के लिए समान रूप से कविता की समझ विकसित करने में सहायक है। ख्यात पत्रिका अक्सर के संपादक व विख्यात साहित्यकार हेतु भारद्वाज जी से नरेन्द्र इष्टवाल की बातचीत के प्रश्नों के साथ साथ उत्तरों में भी अपना अलग अंदाज व नवीनता है। लेखक और नैतिकता के सवाल पर उनका कहना है कि, ‘लेखक समाज से अलग नागरिक नहीं है कि उसे किसी अलग प्रकार की नैतिकता निभाने की जरूरत न हो।’ नैतिकता से जुड़े इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने विस्तृत रूप से दे कर अपने विचार रखे हैं। कवि शताब्दी पर राम निहाल गंुजन का आलेख संक्षिप्त से ही सही कवियों को उनकी कविता के साथ साथ साहित्य अनुशीलन के लिए भी याद करता है। भवानी सिंह की कहानी पड़ौसी तथा भगवान अटलानी की कहानी कुछ और नहीं में समय के साथ साथ व्यक्तिगत मानवीय चिंतन को भी आधार बनाने का प्रयास किया गया है। लेकिन इससे कहानी की सरसता में किसी प्रकार की रूकावट नहीं आई है यह कहानी प्रेमियों को सुखद लगेगा। विजय तथा पूरन सिंह की कहानी भी स्तरीय व पठनीयता से भरपूर है। राजकुमार कुम्भज, विजय सिंह नाहटा, डाॅ. सत्यनारायण, वसंत जेतली तथा सलीम खां की कविताएं नयी व आधुनिक रूप से जीवन यापन करने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करने की क्षमता से युक्त है। विमर्श के अंतर्गत सभी आलोचनात्मक आलेख प्रभावित करते हैं। डाॅ. त्रिभुवन राय, विनोद शाही, डाॅ. रंजना जायसवाल तथा शिप्रा शर्मा के लेख साहित्य पर भिन्न व व्यापक दृष्टिकोण से विचार करते दिखाई देते हैं। मेरा व्यंग्य ‘एक अच्छी आत्मकथा’ को भी पत्रिका में प्रमुख रूप से स्थान दिया गया है। पाठकों को इसकी विषयवस्तु तथा विचार प्रवाहता अवश्य ही पसंद आएगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं। संपादक प्रेमकृष्ण शर्मा का यह कहना कि, ‘लघु पत्रिका निकालना या साहित्य रचना करना कोई विलासिता नहीं है।’ पत्रिका की मंशा तथा उसकी विचारधारा को संक्षेप में व्यक्त कर देता है। पत्रिका के पुनः प्रकाशन प्रारंभ करने के लिए कथाचक्र परिवार की ओर से हार्दिक बधाई व मंगलकामनाएं।

Wednesday, August 10, 2011

पाठ का 27 वां अंक

पत्रिका: पाठ , अंक: जुलाई-अगस्त वर्ष 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: देवांशु पाल, पृष्ठ: 80, मूल्य: 20 (वार्षिक 100रू.) , ई मेल: उपलब्ध नहीं, वेबसाईट:उपलब्ध नहीं , फोन/मो. , सम्पर्क: गायत्री विहार, विनोबा नगर, बिलासपुर छतीसगढ़

इस लघु पत्रिका का प्रत्येक अंक अच्छी जानकारीपरक रचनाओं से युक्त होता है। इस अंक में रामचंद सरोज की लम्बी कविता एक विशिष्ट रचना कही जा सकती है। संवाद के अंतर्गत विनोद शाही से सरसेम गुजराल की बातचीत में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए विकास को जमीन दिया जाना महत्वपूर्ण माना गया है। आलेखों में रामनिवास गुंजन, अनिता पालीवाल एवं शिवप्रसाद शुक्ल के लेख साहित्य से जुड़े विषयांे पर गहन दृष्टिकोण है। टिप्पणी के अंतर्गत ख्यात लेखक व साहित्यकार अलीक का लेख हम लड़ेगें प्रभावित करता है। बहुत दिनों पश्चात उनकी कोई रचना साहित्यिक पत्रिका में पढ़ने में आयी है। सभी कहानियां भले ही नए विषयों को लेकर न लिखी गई हों पर उनकी मंशा के केन्द्र में वर्तमान समाज की दयनीय दशा को सुधारने का विशिष्ट भाव महसूस किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से विजय व शीतेन्द्र नाथ चौधुरी की कहानियां विचारणीय है। विलास गुप्ते का लेख भविष्य में नाटक की आहट रंगमंच की दुनिया पर तार्किक ढंग से अपना मत रखता है। वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र की डायरी कोहरा कहानी एवं कविता विधा से अलग हटकर लिखने के बारे में विचार कर रहे युवा लेखकों के लिए मार्गदर्शक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व लेख आदि भी प्रभावित करते हैं।

Saturday, August 6, 2011

साहित्यिक पत्रिका कथन

पत्रिका: कथन, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ:98, मूल्य: 25रू(वार्षिक:100रू.), ईमेल: kathanpatrika@hotmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 011.25268341, सम्पर्क: 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063

पत्रिका कथन का वर्तमान अंक साहित्य के भौगोलिक स्वरूप से जुड़ी हुई चिंताओं को सामने लाता है। इस अंक की लगभग प्रत्येक रचना बाजारवाद और भारत में अमरीका की नकल से उपजे कुप्रभावों पर अपना मत व्यक्त करती प्रतीत होती है। ख्यात साहित्यकार चंद्रबलि सिंह पर कथाकार व कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय का संस्मरण लेख ‘‘याद रहेगी वह लाल मुस्कान’’ विचारधारा में विचारों की प्रमुखता स्पष्ट करता है। अंक की कहानियां शाप मुक्ति(कमलकांत त्रिपाठी), अनिकेत(जीवन सिंह ठाकुर) एवं हमारा बचपन(रजनीकांत शर्मा) भारतीय ग्रामीण परिवेश व दूर दराज के कस्बों-गांवों की जीवन शैली को अपने केन्द्र में रखकर पाठकों के सामने लाती है। ज्ञानेन्द्रपति, विजेन्द्र, रामदरश मिश्र, यश मालवीय, नीलोत्पल तथा हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे नाम हिंदी कविता में नए नहीं है। हर तिनके की उजास, हम खड़े हैं कटे पेड़ के नीचे, लौट पड़ें, तथा अधूरे प्रेम का अंधेरा जैसी कविताओं की अंतर्रात्मा व भाव विशेष रूप से आकर्षित करता है। ग्रैहम स्विफ्ट की अंग्रेजी कहानी का अनुवाद जितेन्द्र भाटिया ने बहुत ही कुशलता से किया है। इसकी वजह से ही इस कहानी को पढ़ने में मूल कहानी का सा आनंद प्राप्त होता है। प्रसिद्ध कवि हरिओम राजौरिया की कविताओं में लिखना, हार गए, खाते पीते, कहां जाएं में (मंडलोई जी के अनुसार) भाषा की सादगी व वाक्य रचना का पेटर्न प्रभावशाली है। ख्यात कथाकार एवं कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय की कहानी त्रासदी माय फुट में अजय तिवारी ने ‘‘अमरीका का भारत के प्रति दृष्टिकोण’’ केन्द्र में रखकर विचार किया है। ख्यात वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन से पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय की बातचीत वर्तमान खोजी पत्रकारिता व उसके परिणामों पर समसामयिक दृष्टिकोण है। संज्ञा उपाध्याय द्वारा पारदर्शिता से संबंधित प्रश्न के उत्तर में सिद्धार्थ वरदराजन ने कहा है, ‘‘कुछ बातों को छोड़ दें भारत का सूचना कानून एक संतु लित कानून है। लेकिन इसके बारे में सरकार की या सरकारी इरादों की नियत फेरबदल करके इसे निष्प्रभावी बनाने की कोशिश में है। एक सामान्य पाठक के लिए इस प्रश्न के उत्तर में यह समझना कठिन हो जाता है कि जब सूचना का अधिकार संतुलित कानून है तो फिर आखिर क्यों वरदराजन उसमें खामियों को पुरजोर तरीके से सामने ला रहे हैं? उन्हें इस प्रश्न का उत्तर अधिक विस्तार से देते हुए अपनी बात स्पष्ट करना चाहिए थी। इस आधे अधूरे उत्तर से कथन का पाठक शायद ही संतुष्ट हो सके? मुकुल शर्मा, संतोष चौबे ने साहित्येत्तर विषयों पर लिखे लेख किसी नए विचार अथवा दृष्टिकोण को सामने नहीं लाते हैं। लेकिन फिर भी इनमें सरसता के कारण पाठक के लिए ग्राहय हैं। जवरीमल्ल पारख, उत्पल कुमार के स्तंभ की सामग्री हमेशा की तरह रूचिकर है। अंक की अन्य पाठ्य सामग्री जानकारीपरक तथा ज्ञानवर्धक है।

Friday, August 5, 2011

साहित्यप्रेमियों के लिए ‘हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका: हिंदुस्तानी जबान, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सुशीला गुप्ता, पृष्ठ: 64, मूल्य: 10रू.(वार्षिक 120 रू.), ई मेल: hp.sabha@hotmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 22812871, सम्पर्क: महात्मा गांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महात्मा गांधी बिल्ंिडग, 7, नेताजी सुभाष रोड़ मुम्बई 400.002

हिंदी व उर्दू जबान में विगत 43 वर्ष से निरंतर प्रकाशित इस पत्रिका का प्रत्येक अंक गांधीवादी साहित्य के साथ साथ आम पाठकों को हिंदी से जुडे विभिन्न विषयों पर जानकारीपरक लेख उपलब्ध कराता है। समीक्षित अंक में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पर एकाग्र आलेख पत्रिका की विशेष उपलब्धि है। इंद्रनाथ चौधरी तथा रणजी त सिंह साहा ने उनके समग्र व्यक्तित्व पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त भारतीय साहित्य की अवधारणा(डॉ. नरहरि प्रसाद दुबे), सर्वहारा वर्ग के समर्थकःकेदारनाथ अग्रवाल(डॉ. अमर सिंह वधान), राही की शायरी(राजेन्द्र वर्मा) एवं सूफी कविता और भारतीय विचारधारा(रजनीथ एम) शोधार्थियों के साथ साथ आम साहित्यप्रेमियों के लिए विशिष्ट महत्व के हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, पुस्तक समीक्षाएं तथा पत्र-समाचार आदि स्तरीय हैं। पत्रिका का उर्दू खण्ड भी अच्छी पठनीय सामग्री उपलब्ध करा रहा है।