Tuesday, June 28, 2011

समय के साखी का नया अंक

पत्रिका: समय के साखी, अंक: अप्रैल 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. आरती, पृष्ठ: 52, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 220 रू.), मेल: samaysakhi@gmail.com ,वेबसाईट: www.samaykesakhi.in , फोन/मोबाईल: 9713035330, सम्पर्क: बी-308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हास्पिटल के पास, भोपाल 3, .प्र.
पत्रिका के इस अंक में सेवाराम त्रिपाठी द्वारा ख्यात साहित्यकार स्व. कमला प्रसाद जी पर व्यक्त पत्रिका की सबसे उपयुक्त व अच्छी रचना है। इसके अतिरिक्त कमल किशोर गोयनका जी का प्रेमचंद जी के पत्रों पर आलेख नवोदित रचनाकारों के लिए उपयोगी है। मोहन सगोरिया, वसंत सकरगाए तथा अरविंद अवस्थी की कविताएं प्रभावित करती है। कमल कपूर मनीष कुमार सिंह तथा संदीप अवस्थी की कहानियों की विषय वस्तु तथा कथानक भले ही पुराना हो पर प्रस्तुति तथा प्रवाह पाठकों को बांधे रखता है। इसके अतिरक्ति प्रभा दीक्षित का आलेख व बच्चन लाल बच्चन की ग़ज़ल एवं अनिल गौड़ की लघुकथाएं स्तरीय हंै।

Monday, June 27, 2011

साहित्य सागर का जून अंक

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: जून 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 240 रू.), ई मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांगे्रस नगर, बाग मुगलिया भोपाल म.प्र.
साहित्स सागर पत्रिका का यह अंक गीतकार कमला सक्सेना पर एकाग्र है। अंक में उनके लेखन व शैली व उपयोगी जानकारी का प्रकाशन किया गया है। उनके रचनकर्म पर संजय सक्सेना, डाॅ. फिरोजा, कैलाश पंत, हुकुमपाल सिंह, राजश्री रावत, सत्यनारायण भटनागर तथा जगदीश किंज्लक ने विस्तार से विचार व्यक्त किए हैं। आलेख हिंदी कविता में ग्रीष्म ऋतु पढ़कर लगता है कि यह कविता की अपेक्षा एक विशिष्ठ विचारधारा का पोषण अधिक करता है। रमेश कुमार शर्मा, उपेन्द्र पाण्डेय तथा हरिवल्लभ श्रीवास्तव को छोड़कर अन्य कवियों की कविताएं महज खानापूर्ति ही अधिक लगती है। सनातन कुमार वाजपेयी की कहानी ‘तिरस्कार का अंागन’ ठीक ठाक है। भवेश दिलशाद की तीर्थ यात्रा रिपोर्ट प्रभावित करती है इसे पत्रिका की उपयोगी व अच्छी जानकारीपरक रचना कहा जा सकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं साधारण हैं।

Sunday, June 26, 2011

साहित्य के लिए साक्षात्कार

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: अप्रैल2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल, , पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250 रू.), मेल: sahityaacademy.bhopal@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2554782, सम्पर्क: साहित्य अकादमी, .प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाण गंगा भोपाल .प्र.
इस अंक में ख्यात साहित्यकार डाॅ. सुधेश से जगन्नाथ पण्डित की बातचीत साहित्य के उन अनझुए पहलुओं पर विमर्श है जिनके बारे में अधिकांशतः विचार नहीं किया जाता है। जैस वैचारिक प्रबिद्धता को लेकर काफी कुछ कहा गया है लेकिन डाॅ. सुधेश स्पष्ट करते हैं कि वैचारिक प्रतिबद्धता तथा विचारधारा दोनों एक नहीं है। इलेक्ट्रनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव को लेकर वे चिंतित दिखाई देते हैं क्योंकि इससे आम पाठक साहित्य के कट रहा है। प्रो. राजाराम के आलेख कला और विचार: भारतीय समकालीन संदर्भ’ में लिखा है कि प्रयोग वादी सारे रचनाकार जैसे माने, मनोने, मातीस, पिकासो, जेक्सन पोलाक तथा अन्य प्रखर बौद्धिक थे। यह भी सच है कि योरोपिय क्लासिकी कला परंपरा तथा धर्म गुरूओं से लोहा लेने के कारण एक तरह से परंपरा का क्षरण हुआ है।
सुरेन्द्र सिंह पवार ने अपने आलेख ‘पवांर राजभोज’ में राजा भोज की रीति नीति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। माताचरण मिश्र की कहानी ‘गंगादास’ वर्तमान शोर सराबे से उपजे उब की कहानी है। डाॅ. लता अग्रवाल की कहानी ‘सिंदूर का सुख’ में कहीं से भी ऐसा नहीं लगा कि विषय वस्तु में नवीनता है व इसका कथानक जन सामान्य को प्रेरित करता है। शिवनारायण जौहरी, कुमार सुरेश, डाॅ. मधुरेश नंदन कुलश्रेष्ठ, राजेन्द्र अग्रवाल व ऋषिवंश,सुरजीत पवार की कविताओं की अपेक्षा नई कलम कु. आस्था पुरी की कविताओं में अधिक पैनापन व समाजबोध दिखाई देता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं आदि भी इसके पूर्ववर्ती अंकों के समान एक रूटीन प्रकाशन है। व्यक्ति और दंश को लेकर लिखा गया संपादकीय पत्रिका की सबसे अधिक उपयोगी व सारगर्भित विचार कहें जा सकते हैं।

Saturday, June 25, 2011

पत्रिका हिमप्रस्थ का अप्रैल अंक

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: अप्रैल2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 6 रू.(वार्षिक 50 रू.), मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग पे्रस परिसर, घोड़ा चैकी शिमला 5
कम कीमत में उच्च कोटि का साहित्य उपलब्ध कराने वाली यह पत्रिका अपने आप में अनूठी है। इसका प्रत्येक अंक विशिष्ट सामग्रीयुक्त होता है। इस अंक में भी ख्यात साहित्यकारों निर्मल वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी , केदारनाथ अग्रवाल पर एकाग्र सामग्री का प्रकाशन किया गया है। हेमराज कौशिक, रामसिंह यादव, विनादे चंद्र पाण्डेय, राजेन्द्र परदेसी, रमाकांत, देशराज सिरसवाल तथा केशव चंद्र के लेख व निबंध साहित्यजगत के लिए विशेष उपलब्धि कही जा सकती है। डाॅ. सुरेश उजाला का ख्यात विद्वान डाॅ. भीमराव अम्बेड़कर पर एकाग्र लेख पत्रिका की विशेष रूप से उल्लेखनीय रचना है। पदम गुप्त व डाॅ. आदर्श की कहानी तथा पुष्पेश कुमार गुप्त तथा प्रसून गुलेरी की लघुकथाएं अच्छी व प्रभावशाली है। अरूण कुमार शर्मा, प्रो. आदित्य, कुंवर दिनेश, पूजा ठाकुर, प्रोमिला भारद्वाज, प्रदीप शर्मा, यादवेन्द्र शर्मा तथा कृष्णा ठाकुर की कविताएं समसामयिक तथा विषय वस्तु के स्तर पर विशिष्ठ कही जा सकती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पठनीय सामग्री प्रत्येक पाठक के ज्ञानवर्धन में सहायक है।

Friday, June 24, 2011

बच्चों की पत्रिका मोरंगे

पत्रिका: मोरंगे, अंक: जून 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बच्चों के द्वारा, पृष्ठ: 24, मूल्य: प्रकाशितत नहीं, ई मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: ग्रामीण शिक्षा केन्द्र, 3/39, हाउसिंग बोर्ड, सवाईमाधोपुर राजस्थान
यात्रा फाउंडेशन आस्टेªलिया के सहयोग से बच्चों के लिए बच्चों के द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका ज्ञानवर्धन जानकारी प्रदान करती है। अंक में पूजा, अनूप, आरती गुर्जर, बुद्धिराम, हरबीर, राजेन्द्र की अच्छी व रोचक कविताएं प्रकाशित की गई है। महक समूह, तरंग समूह, अनुज समूह तथा चरतलाल की लघुकथाएं प्रभावशाली है। विष्णु गोपाल, विनोद प्रजापत की लम्बी कहानियों में बच्चों के लिए बहुत कुछ है। पत्रिका की अन्य रचनाएं , पत्र आदि उपयोगी व बच्चों के लिए शिक्षाप्रद हैं।

Thursday, June 23, 2011

प्रोत्साहन का नया अंक

पत्रिका: प्रोत्साहन, अंक: जून 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कमला जीवितराम सेतपाल, , पृष्ठ: 36, मूल्य: 15रू (वार्षिक: 60रू.), मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 022.26365138, सम्पर्क: -3, 307, इन्लैक्स नगर, यारो रोड़, वर्सोवा, अंधेरी पश्चिम, मुम्बई 400061
पत्रिका के इस अंक में Ramshanker चंचल की कहानी अभागिन एक अच्छी व प्रभावशाली रचना है। देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कहानी पागल पत्नी भी प्रभावित करती है। व्यंग्य बेचारे नेताजी (सुरेश प्रकाश शुक्ल) भी पठनीय व हास्यपरक है। सुभाष सोनी, सरोज व्यास, शशिकांत पशीने, सुभाष सोनी व अखिलेश निगम की ग़ज़लें समसामयिक हैं। रामचरण यादव, सुधा भार्गव व पूरन सिंह की लघुकथाएं अधिक प्रभावित नहीं कर सकीं है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी ठीक ठाक है।

Monday, June 20, 2011

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: जूर्न 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. बि. रामसंजीवैया, मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य: 5रू (वार्षिक: 50 रू.), मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आफ कार्ड रोड़, राजानी नगर बैगलूर कर्नाटक
दक्षिण भारत से हिंदी साहित्य व भाषा के उत्थान के लिए निरंतर प्रकाशित हो रही इस पत्रिका के प्रयास पशंसा के योग्य हैं। सामान्य रूप से पत्रिका में हिंदी भाषा के विकास व उसके दक्षिण भारत में प्रचार प्रसार के लिए अच्छी सामग्री का प्रकाशन किया जाता है। अंक में हिंदी:कल आज और कल(राकेश कुमार), हिंदी कल से आज तक (बी. वै. ललिताम्बा), हिंदी का कल और प्रौद्योगिकी(शिवम शर्मा) जैसे लेख हिंदी के प्रति पत्रिका की चिंता को जाहिर करते हैं। टी.जी. प्रभाकर प्रेेमी, संतोष, क्रांति अययर, मुख्तार अहमद के साहित्यिक लेख पत्रिका के स्तर के अनुरूप हैं। कल्पेश पटेल व मैत्री सिंह ने भी अपने अपने आलेखों में समाज में गिरती मानवीयता पर विचार किया है। पी.सी. गुप्ता की कविताएं तथा डाॅ. मोहन तिवारी की ग़ज़ल उल्लेखनीय हैै। पत्रिका की अन्य रचनाएं भले ही उत्तर भारत की पत्रिकाओं के समान न हो पर उनका स्वर राष्ट्रीयता व देश प्रेम की भावना जाग्रत करता है।

Sunday, June 19, 2011

साहित्यिक पत्रिका 'पे्रणा' का नारी अस्मिता पर एकाग्र नया अंक

पत्रिका: peraranaa, अंक: जनवरी मार्च2011अप्रैल में प्रकाशित, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: अरूण तिवारी, , पृष्ठ: 204, मूल्य: 50रू (वार्षिक: 200 रू.), मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2422109, सम्पर्क: -74, पैलेस आरचर्ड, फेज 3, सर्वधर्म के पीछे, कोलार रोड़ भोपाल .प्र.
त्रैमासिक
पत्रिका पेरेणा का प्रत्येक अंक विशेषांक के समान होता है। इस अंक में भी यही विशेषता दिखाई देती है। इसे नारी अस्मिता अंक दो के रूप में प्रकाशित किया गया है। पहले अंक को साहित्य जगत में भरपूर समर्थन मिला था। उसी स्तर की रचनाएं भी इस अंक में शामिल की गई है। प्रमुख आलेखों में श्रीमती कमल कुमार, अनिता सिंह एवं डाॅ. लता सुमन के लेख साहित्य में स्त्री पात्रों की अच्छी व्याख्या करते हैं। पत्रिका के अंक में नारी विषयक कहानियां भी अच्छी तरह से प्रस्तुत की गई है। इनमें विशेष रूप से शुभकामना(सुषमा मुनीन्द्र), दुनिया(सुमित्रा महरोल) तथा अस्तित्व(नीलमणि शर्मा) का केनवास आधुनिक विषय वस्तु से होता हुआ हमारे गौरवशाली अतीत की ओर ले जाता है। ख्यात कवि लाल्टू की कुछ कविताएं जैसे ‘कविता नहीं’, तीन सौ युवा लड़कियां’, चैटिंग प्रसंग में नयापन है। पदमजा शर्मा, परशुराम शुक्ल तथा राधेलाल विजघावने की कविताएं भी अच्छी व ध्यान देने योग्य हैं। नवल जायसवाल, कमल किशोर गोयनका, प्रमोद भार्गव व विनय उपाध्याय के लेखों में साहित्य के साथ साथ समाज के विभिन्न वर्गो पर भी दृष्टिपात किया गया है। इस अंक की लघुकथाएं प्रभावित नहीं कर सकीं हंै। ख्यात साहित्यकार व प्रगतिशील आंदोलन के तत्कालीन स्तंभ स्वर्गीय कमलाप्रसाद जी पर एकाग्र स्मरण खण्ड पत्रिका की एक विशिष्ठ उपलब्धि है। अन्य रचनाएं भी पढ़ने व विचार करने योग्य हैं। समीक्षा जनसंदेष टाइम्स में दिनांक 19.06.2011 को published हो चुकी है।

त्रैमासिकी : संबोधन

पत्रिका: संबोधन, अंक: अप्रैल-जून 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: क़मर मेवाड़ी, , पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80 रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं, ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 02952223221, सम्पर्क: पो. कांकरोली, जिला राजसमंद, राजस्थान

पत्रिका के इस अंक में ख्यात कवि विद्यासागर नौटियाल से महावीर रवाल्टा की बातचीत प्रभावित करती है। विष्णु चंद शर्मा का लेख आप जो कहिए जा वह बाजार से ला देता हूं मैं रचना अपने आप में अनूठी है। सुशांत सुप्रिय, विनीता जोशी, मीरा पुरवार, नीना जैन की कविताएं आज के सामाजिक संदर्भो पर एक नजरिया है। ग़ज़लों में रामकुमार सिंह व सुरेश उजाला ने नए अंदाज में अपनी बात कहने का प्रयास किया है। हबीब कैफी की कहानी ‘वाणी में प्रकाश’ आज कल की नई कहानियों से अलग हटकर सामाजिक संबंधों की पुर्नव्याख्या है। वेद व्यास का आलेख ‘राजस्थान में 2010 का साहित्य’ में वहां के साहित्य की संक्षिप्त किन्तु अच्छी विवेचना की गई है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी प्रभावित करती है। समीक्षा जनसंदेष टाइम्स में दिनांक 19.06.2011 को प्रकाषित हो चुकी है।

Friday, June 17, 2011

बच्चों के लिए ‘बाल वाटिका’

पत्रिका: बाल वाटिका, अंक: जून 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: भैरूलाल गर्ग, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू(वार्षिक 240रू.), मेल: balvatika96@gmail.com , वेबसाईट: not avilable , फोन/मो. 01482.250401, सम्पर्क: नंद भवन कावखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा राजस्थान
बच्चों के लिए समर्पित पत्रिका बाल वाटिका का यह अंक बाल रचनाओं से स्मृद्ध है। अंक में रंजू उन्याल, विनोद चंद्र पाण्डेय, रमेश चंद पंत, भगवत प्रसाद पाण्डेय, शशि भूषण बड़ोली, विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी के लेखों में बाल मनोविज्ञान का पूरा पूरा ध्यान रखा गया है। विद्यासागर नौटियाल, अरूण बहुखेड़ी, श्याम सिंह शशि, दिनेश चमौला एवं राजीव सक्सेना की कहानियां बाल मन को अच्छी तरह से समझ सकीं है। राज सक्सेना, धनसिंह मेहता, मित्रेश कुमार गुप्ता, महेंद्र प्रताप पाण्डेय, राष्ट्रबंधु, रामनिवास मानव एवं माधव गिरि मधुवन की कविताएं बच्चों के विकास में सहायक हैं। कालिका प्रसाद सेमवाल, रतन सिंह किरमोलिया, ख्याल सिंह चैहान एवं लीला मोदी के विविध विषयों पर एकाग्र लेख बच्चों के साथ साथ अधिक उम्र के पाठकों के लिए भी समान रूप से उपयोगी हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती है।

Tuesday, June 7, 2011

साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन अभिव्यक्ति’

पत्रिका: समकालीन अभिव्यक्ति अंक: मार्च2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ: 64, मूल्य: 15रू (वार्षिक: 60 रू.), मेल:samkaleen999@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 011.26645001, सम्पर्क: 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30
इस पत्रिका के प्रत्येक अंक में विशुद्ध साहित्य से संबंधित अच्छी रचनाएं प्रकाशित की जाती है। इस अंक में श्याम कुमार पोकरा, मदन मोहन प्रसाद तथा रूपलाल बेदिया की कहानियां प्रकाशित की गई है। रूपलाल बेदिया की कहानी झाड़ियों की ओर से आती खुशबू की नवीनता तथा प्रस्तुतिकरण कहानी की विशेषता है। ख्यात कवियों की जन्मशती पर प्रकाशित इस पत्रिका के लेखों में कोई नयापन नहीं है। डाॅ. नलिन तथा श्रीरामप्रसाद ने बिना किसी अतिरिक्त अनुसंधान अथवा प्रयास के पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री को अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। जिससे इन लेखों से कोई नई बात सामने नहीं आती है। वरूण कुमार तिवारी, संदीप अवस्थी को छोड़कर अन्य कवियों की कविताएं अप्रभावी हैं। पत्रिका के इस अंक में बी.पी. कोटनाला का यात्रा वृतांत ‘लद्दाख की गोद में खेलती बहुरूपणी सिंधु’ अच्छी व रचना है। जिसे पढ़कर पाठक को भी लद्दाख यात्रा का अनुभव होता है। अशोक अंजुम की ग़ज़ल तथा अशोक जैन पोरवाल की लघुकथा ठीक ठाक हैं। पत्रिका के अन्य स्तंभ, रचनाएं व पत्र आदि अन्य पत्रिकाओं की तरह से महज खानापूर्ति ही करते हैं। (समीक्षा जनसंदेष टाईम्स में दिनांक 05.06.2011 को प्रकाशित हो चुकी है।)

Monday, June 6, 2011

पंजाबी के साथ साथ हिंदी के विकास के लिए प्रयासरत ‘पंजाबी संस्कृति’

पत्रिका: पंजाबी संस्कृति, अंक: मार्च 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: राम आहूजा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80 रू.), मेल: ram_ahuja@hotmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0124.4227455, सम्पर्क: एन 115, साऊथ सिटी 1, गुड़गांव 122001, हरियाणा
हरियाणा के औद्योगिक नगर गुड़गांव से हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए डाॅ. राम आहूजा के नेतृत्व में उनकी टीम के प्रयास प्रशंसनीय हैं। पत्रिका में हिंदी के साथ साथ सिरायकी खण्ड भी प्रकाशित किया जाता है। इस अंक में हिंदी की कुछ रचनाएं विशेष महत्व की हैं। उनमें रविकांत खरे तथा अजय कुमार झा के लेख समाज के विभिन्न मुददों को सामने लाते हैं। दिलीप भाटिया का लेख समय की उपयोगिता पर विचार करता है। दोनों कहानियों का स्वरूप साहित्यिक न होते हुए भी पाठक उनसे संवेदनात्मक अनुभव प्राप्त कर सकता है। इंदु बाली की कहानी ‘मानो या न मानों’ तथा कहानी ‘दिशाहारा’(सुरेन्द्र मंथन) में यह अनुभव महसूस किया जा सकता है। रामनिवास मानव, रमेश कुमार सोनी, देवी नागरानी को छोड़कर अन्य कवियों की कविताएं अपेक्षित प्रभाव नहीं डाल सकी हैं। पंकज शर्मा, सरला अग्रवाल, ओमप्रकाश बजाज की लघुकथाएं भी सामान्य ही हैं। दिनेश चंद्र दुबे का व्यंग्य ‘उनका स्टिंग आपरेशन’ प्रभावित करता है। यह व्यंग्य वर्तमान मीडिया जगत में चल रहे अनावश्यक स्टिंग आपरेशन की खबर लेता है। पत्रिका के अन्य स्तंभ, सिरायकी खण्ड तथा रचनाएं भी अपेक्षित स्तर की हैं। हिंदी साहित्य का हरियाणा तथा पंजाब में प्रचार प्रसार करने के लिए पत्रिका का प्रयास सराहनीय है।

Sunday, June 5, 2011

कनाड़ा से प्रकाशित अनूठी साहित्यिक पत्रिका ‘हिंदी चेतना’

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: अप्रैल-जून 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: श्याम त्रिपाठी, डाॅ. सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 96, मूल्य: प्रकाशित नहीं, ई मेल: ,वेबसाईट: फोन/मोबाईल: ;905द्ध 475.7165ए सम्पर्क: 6, Larksmere Court, Markham, L3R, 3R1, Ontario, Canada
हिंदी चेतना कनाड़ा से निरंतर प्रकाशित हो रही एक अनूठी साहित्यिक पत्रिका है। पत्रिका का प्रत्येक अंक विशेषांक के समान होता है। इसकी साज सज्जा तथा कलेवर विशेष रूप से आकर्षित करता है। इस अंक में प्रायः सभी रचनाएं भारत से प्रकाशित हो रही साहित्यिक पत्रिकाओं से कम नहीं है। अंक में तीन कहानियों को स्थान दिया गया है। वो एक पल(नीना पाल), छोटा दर्द बड़ा दर्द(शैलजा सक्सेना) तथा उत्तरायण(सुदर्शन प्रियदर्शनी) की बुनावट तथा शिल्प पाठकों को अंत तक बांधे रखते हैं। देवेन्द्र पाल गुप्ता, सीताराम गुप्ता तथा प्रीत अरोरा के लेख साहित्येत्तर विषयों पर गहन विमर्श है। जिनमें वर्तमान वैश्विक ढांचे के नीचे दब कर असहाया हो रही मानवता को पुर्नस्थापित करने की मंशा दिखाई देती है। निर्मल गुप्त, अनिल श्रीवास्तव, पंकज त्रिवेदी, मधु वाष्णैय, दीपक मशाल, भारतेन्दु श्रीवास्तव, अलका सैनी तथा जयप्रकाश मानस की कविताओं की अन्तर्वस्तु मानव जगत के लिए जीवन दायी है। यू.के. के कवि दीपक मशाल ने दो बातें कविता में बारीक रिश्तों को जोड़ने के लिए सांसों की आवाजाही को आवश्यक मानते हैं। वहीं दूसरी ओर पाण्डुलिपि तथा सृजनगाथा के संपादक जयप्रकाश मानस ‘मां की रसोई’ से आनंदित होते हैं। अनिल प्रभाकुमार ने ‘पिरामिड़ की ममी की विवेचना आज के संदर्भ में अलग ढंग से की है। रचना श्रीवास्तव, आकांक्षा यादव तथा महेश द्विवेदी की लघुकथाएं भी घर परिवार तथा राजनीति रिश्तों की महीन बुनावट से विश्व बिरादरी की ओर झांकने का प्रयत्न करती दिखाई पड़ती हैं। तीनों पुस्तकों की समीक्षाओं का विशिष्ठ अंदाज प्रभावित करता है। विशेष रूप से कौन सी जमीन....(कथाकार-सुधा ओम ढीगरा) कथासंग्रह की समीक्षा टेम्स से गंगा तक अनवरत जल प्रवाह का प्रभावशाली विश्लेषण है। प्रमुख संपादक श्री श्याम त्रिपाठी के अनुसार, ‘हमारा सुख चैन, दुख दर्द मात्रभूमि के साथ साक्षा है, लेकिन खेद की बात है कि हमारा साहित्य एक नहीं जबकि भाषा एक है। हमें इन दूरियों को मिटाना होगा और साहित्य को पान की तरह स्वादिष्ट बनाना होगा।’ उनकी भाषा व साहित्य के प्रति यह चिंता वास्तव में प्रत्येक हिंदी भाषा व साहित्यप्रेेमी की चिंता होना चाहिए, अन्यथा हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ में उसका उचित स्थान दिलाना संभव नहीं हो सकेगा। (समीक्षा जनसंदेष टाईम्स में दिनांक 05.06.2011 को प्रकाषित हो चुकी हे।)