Thursday, August 11, 2011

साहित्य का ‘‘एक और अंतरीप’’

पत्रिका: एक ओर अंतरीप, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: प्रेमकृष्ण शर्मा, पृष्ठ: 128, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100 रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09414055811, सम्पर्क: 1, न्यू कालोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर 302006 राजस्थान

साहित्यिक पत्रिका एक और अंतरीप का पुनः प्रकाशन इस अंक के साथ प्रारंभ किया गया है। यह इससे पूर्व लगातार 19 वर्ष तक प्रकाशित होती रही है। समीक्षित अंक में पत्रिका ने भले ही अपेक्षाकृत नए रचनाकारों को चुना हो पर रचनाओं के स्तर से किसी तरह का समझौता नहीं किया है। अंक में वरिष्ठ कवि गोविंद माथुर कुछ चुनी हुई कविताओं पर संपादक अजय अनुरागी ने विस्तृत रूप से विचार किया है। उनकी कविताओं में ‘बचा हुआ पे्रम’, काम से लौटती स्त्रियां’ तथा युवा कवि जैसी कविताएं साहित्य के गंभीर पाठक के साथ साथ नए व गैरहिंदी भाषी पाठक के लिए समान रूप से कविता की समझ विकसित करने में सहायक है। ख्यात पत्रिका अक्सर के संपादक व विख्यात साहित्यकार हेतु भारद्वाज जी से नरेन्द्र इष्टवाल की बातचीत के प्रश्नों के साथ साथ उत्तरों में भी अपना अलग अंदाज व नवीनता है। लेखक और नैतिकता के सवाल पर उनका कहना है कि, ‘लेखक समाज से अलग नागरिक नहीं है कि उसे किसी अलग प्रकार की नैतिकता निभाने की जरूरत न हो।’ नैतिकता से जुड़े इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने विस्तृत रूप से दे कर अपने विचार रखे हैं। कवि शताब्दी पर राम निहाल गंुजन का आलेख संक्षिप्त से ही सही कवियों को उनकी कविता के साथ साथ साहित्य अनुशीलन के लिए भी याद करता है। भवानी सिंह की कहानी पड़ौसी तथा भगवान अटलानी की कहानी कुछ और नहीं में समय के साथ साथ व्यक्तिगत मानवीय चिंतन को भी आधार बनाने का प्रयास किया गया है। लेकिन इससे कहानी की सरसता में किसी प्रकार की रूकावट नहीं आई है यह कहानी प्रेमियों को सुखद लगेगा। विजय तथा पूरन सिंह की कहानी भी स्तरीय व पठनीयता से भरपूर है। राजकुमार कुम्भज, विजय सिंह नाहटा, डाॅ. सत्यनारायण, वसंत जेतली तथा सलीम खां की कविताएं नयी व आधुनिक रूप से जीवन यापन करने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करने की क्षमता से युक्त है। विमर्श के अंतर्गत सभी आलोचनात्मक आलेख प्रभावित करते हैं। डाॅ. त्रिभुवन राय, विनोद शाही, डाॅ. रंजना जायसवाल तथा शिप्रा शर्मा के लेख साहित्य पर भिन्न व व्यापक दृष्टिकोण से विचार करते दिखाई देते हैं। मेरा व्यंग्य ‘एक अच्छी आत्मकथा’ को भी पत्रिका में प्रमुख रूप से स्थान दिया गया है। पाठकों को इसकी विषयवस्तु तथा विचार प्रवाहता अवश्य ही पसंद आएगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं। संपादक प्रेमकृष्ण शर्मा का यह कहना कि, ‘लघु पत्रिका निकालना या साहित्य रचना करना कोई विलासिता नहीं है।’ पत्रिका की मंशा तथा उसकी विचारधारा को संक्षेप में व्यक्त कर देता है। पत्रिका के पुनः प्रकाशन प्रारंभ करने के लिए कथाचक्र परिवार की ओर से हार्दिक बधाई व मंगलकामनाएं।

1 comment:

  1. Nice post.

    सारे झगड़े-फ़साद और ख़ून ख़राबे इसी बात की वजह से हैं कि आदमी अपने लिए हर तरह से सुरक्षा चाहता है और दूसरों को वही चीज़ देने के लिए तैयार नहीं है।
    ‘ब्लॉगर्स मीट वीकली 3‘

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