Sunday, April 10, 2011

समाज और सोच का ‘पाठ’

पत्रिका: पाठ, अंक: जनवरी-मार्च 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: देवांशु पाल, पृष्ठ: 36, मूल्य: 20रू(वार्षिक 80रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 07752.226086, सम्पर्क: गायत्री विहार, विनोबा नगर, बिलासपुर छ.ग.
हिंदी साहित्य में लघु पत्रिकाओं का योगदान प्रशंसनीय रहा है। उसी क्रम में पाठ ने अपनी भूमिका कुशलतापूर्वक निभायी है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित लेखों में अपने जीवन के अंत समय तक(प्रभा दीक्षित) तथा समकालीन काव्य दायित्व का विमर्श(कमलकिशोर श्रमिक) भले ही नामी गिरामी लेखकों द्वारा न लिखे गए हों पर उनमें निहित विषय की निष्पक्षता प्रभावित करती है। साहित्य की दिशा के सवाल पर ख्याल साहित्यकार शंभु बादल से राजेन्द्र परदेसी की बातचीत में विषय पर वर्तमान संदर्भो में विचार किया गया है। गोविंद प्रसाद उपाध्याय की कहानी अंधेरे की परछाई मनुष्य के आम जीवन मंे आ रहे उतार चढ़ाव को अच्छे ढंग से विश्लेषित करती है। सुभाष रस्तोगी, संजीव कुमार, विज्ञान व्रत, विनय मिश्र तथा पंकज परिमल की कविताएं वर्तमान विकास को रोजी रोटी से जोड़ती है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित ख्यात कवयित्री सुजाता शिवेन की ओडिया कविता ‘कहां है?’ अंक की विशिष्ट रचना है। (मेरे द्वारा लिखी गई यह समीक्षा जनसंदेश कानपुर में प्रकाशित है।)

No comments:

Post a Comment