Wednesday, February 16, 2011

संवाद से पहले और बाद "कथन"

पत्रिका : कथन, अंक : जनवरीमार्च11, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ : 98, रेखा चित्र/छायांकन : जानकारी नहीं, मूल्य : 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल : kathanpatrika@hotmail.com , वेबसाईट : उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25268341, सम्पर्क : 107, अक्षरा अपार्टमेंटस, ए3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली 110063
कथाप्रधान त्रैमासिकी कथन के समीक्षित अंक में कहानियों के साथ साथ कहानी के आंदोलन की जरूरत पर एक संवाद प्रकाशित किया गया है। ख्यात कथाकारसाहित्कार एवं कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय से अशोक कुमार पाण्डेय की बातचीत पर आधारित इस परिचर्चा से कहानी विधा के लिए आंदोलन की आवश्यकता पर विचार किया गया है। इस परिचर्चा में योगेंद्र आहूजा, मनीषा कुलश्रेष्ठ, मनोज कुलकर्णी, प्रियदर्शन, प्रभात रंजन एवं राकेश बिहारी ने भाग लिया है। परिचर्चा के अंत में श्री उपाध्याय जी ने नाम की अपेक्षा आंदोलन की आवश्यकता पर बल दिया है। आज कहानी के साथ साथ समस्त साहित्य पर पुर्नविचार करने व सकारात्मक आंदोलन की जरूरत है। क्योंकि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में आम भारतीय टी.व्ही. पर साहित्य के नाम पर दिखाए जाने वाले सस्ते एवं फूहड़ मनोरंजन को ही साहित्य समझ बैठा है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित कहानियों में जिस मिट्टी से बने हैं हम(इसाबेल अलेन्दे्रअनु. जितेन्द्र भाटिया), समाधि लेख(केन सारोविबा, अनु. रमेश उपाध्याय) तथा इक्कीसवीं सदी के लिए(तौफिक अल हाकिम, अनु. रमेश उपाध्याय) प्रकाशित की गई है। इन अनुदित कहानियों के कारण अंक कुछ बोझिल सा हो गया है। किसी भी पत्रिका में एक से अधिक अनुदित रचनाएं होने पर पाठकों का क्रम भंग होता है। वैसे भी अनुवाद में कितना भी ध्यान रखा जाए वह दुरूह हो ही जाता है। फिर भी समाधि लेख एक अच्छी कहानी है जिसका कथानक प्रभावित करता है। जवरी मल्ल पारख का लेख (स्तंभपरदे पर) ॔॔यह रात भी गुजर जाएगी’’ फिल्मों में उठाए गए विभिन्न मुद्दों जैस भ्रष्टाचार, शिक्षा आदि पर एक अच्छा विश्लेषण है। वरिष्ठ कवि साहित्यकार लीलाधर मंडलोई ने संग्रह ॔अब भी’(चंद्रेश्वरउदभावना प्रकाशन) की समीक्षा इतने अच्छे ंग से की है कि इस संग्रह को पॄने की इच्छा वलवती हो जाती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं। आज हिंदी वैश्विक भाषा का स्वरूप धारण कर चुकी है। इस स्थिति में पत्रिका को भारतीय सीमा से बाहर निकालने की जरूरत है।अमरीका, कनाड़ा, मॉरिशस, फिजी, सूरिनाम तथा दुनिया के अन्य देशों में रचनाकार हिंदी में अच्छा व विश्व स्तरीय लिख रहे हैं। उन्हें भी भारतीय साहित्यिक पत्रिकाओं में पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। उम्मीद है संपादक संज्ञा उपाध्याय ध्यान रखेंगी।

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