Friday, December 30, 2011

शब्दशिल्पियों के आसपास

पत्रिका: आसपास, अंक: दिसम्बर 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 24, मूल्य: 5रू (वार्षिक: 50रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com ,वेबसाईट: www.dharohar.net, फोन/मोबाईल: 0755.2775129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, कोटरा, भोपाल म.प्र.
समाचार प्रधान पत्रिका शब्दशिल्पियों के आसपास के समीक्षित अंक में दुष्यंत कुमार अलंकरण के समाचार को प्रमुख रूप से प्रकाशित किया गया है। अंक में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार यह अलंकरण इस बार ख्यात साहित्कार, पत्रकार एवं लेखिका मृणाल पाण्डेय को दिया गया है। पांच दिवसीय पुस्तक पर्व का समाचार साहित्य जगत के पाठाकों के लिए जानकारीपरक है। ख्यात गायक स्व. भूपेन हजारिका, इंदिरा गोस्वामी पर पत्रिका में मार्मिक ढंग से सामग्री का प्रकाशन किया गया है। ख्यात कवि विष्णु खरे तथा वरिष्ठ कथाकार विद्यासागर नौटियाल को मिले पुरस्कारों के समाचार के साथ साथ अन्य समाचार त्वरित रूप से पाठकों को साहित्यिक गतिविधियों को पहुंचा रहे हैं, यह इस छोटी सी पत्रिका की खासियत है। पत्रिका के अन्य समाचार साहित्यकारों, लेखकों तथा साहित्य के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी व संदर्भ योग्य हैं।

ख्यात पत्रिका ‘संबोधन’ का नया अंक

पत्रिका: संबोधन, अंक: अक्टूबर दिसम्बर 2011,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कमर मेवाड़ी, पृष्ठ: 92, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09829161342, सम्पर्क: पो. कांकरोली, जिला राजसमंद 313324 राजस्थान
हिंदी साहित्य में पिछले 46 वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रही पत्रिका संबोधन का प्रत्येक अंक विशिष्ठ होता है। समीक्षित अंक भी प्रसिद्ध विद्वान आचार्य निरंजन नाथ पर एकाग्र है। उन के समग्र व्यक्तिव पर पत्रिका ने उपयोगी व जानकारी परक सामग्री का प्रकाशन किया है। प्रकाशित प्रमुख रचनाओं में उनके व्यक्तित्व पर लिखे गए आलेखों को सम्मलित किया जा सकता है। इनके प्रमुख लेखक हैं - भगवती लाल व्यास, वेद व्यास, बालकवि बैरागी, महेन्द्र भागवत, अफजल खां अफजल तथा जीतमल कच्छारा। पत्रिका की अन्य रचनाओं में उनकी कहानियां, कविताएं तथा अन्य रचनाएं सम्मलित हैं। इसके अतिरिक्त माधव नागदा, पल्लव, हुसैनी बोहरा तथा राजेन्द्र परदेसी के आलेख विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। पत्रिका का अन्य आकर्षण इसका ऋुटिहीन मुद्रण तथा आकर्षक ले आउट है।

साहित्य की ‘‘जमीन’’

पत्रिका: ज़मीन, अंक: 28, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: पवन कुमार मिश्र, प्रमोद त्रिवेदी, पृष्ठ: 40, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: एफ-1, जलश्री कालोनी, उदयन मार्ग, उज्जैन म.प्र.
साज सज्जा में साधारण किंतु रचनात्मक रूप से असाधारण इस पत्रिका का समीक्षित अंक अत्यधिक प्रभावित करता है। अंक में रवीन्द्रनाथ टैगोर की जन्मशती पर प्रकाशित आलेख भारतीयता और भारतीय राष्ट्र(चिन्मय मिश्र) अपने आप में अद्वितीय है। अज्ञेय जी के साहित्य पहलू को लेकर लिखा आलेख अज्ञेय प्रेरक व्यक्तित्व(पूर्णचंद्र रथ) अज्ञेय की रचनाओं पर आधुनिक ढंग से विचार करता है। इसके अतिरिक्त नासिर अहमद सिंकदर का आलेख व अशोक पाराशर की कहानी फिर आई गाड़ी तथा श्रीराम दवे की कविताएं पाठकों पर विशिष्ठ छाप छोड़ती है। पत्रिका का यह अंक साहित्य के नए विद्यार्थियों के लिए सहेज कर रखने योग्य है।

हिंदी साहित्य में साक्षात्कार

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: नवम्बर 2011,स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल:sahityaacademy.bhopal@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2554782, सम्पर्क: .प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल
मध्यप्रदेश से प्रकाशित साहित्य की इस प्रमुख पत्रिका का प्रत्येक अंक संग्रह योग्य रचनाओं से युक्त होता है। उसी तारतम्य में समीक्षित अंक भी उपयोगी व जानकारीपरक है। अंक में वरिष्ठ साहित्यकार व हिदी विद्वान डाॅ. श्रीराम परिहार से बातचीत साहित्य जगत में उनके योगदान के साथ साथ वर्तमान हिंदी साहित्य पर भी प्रकाश डालती है। पत्रिका का प्रमुख आकर्षण इसके आलेख हैं। उनमें से कुछ प्रमुख आलेखों में मृदुला सिंहा, हेमंत गुप्त, प्रेमशंकर रघुवंशी, ब्रजकिशोर झा, प्रो. उषा यादव, जगत सिंह विष्ट एवं कृष्ण गोस्वामी के आलेख प्रमुख हैं। राजकुमार व नीलम चैरे की कविताएं नए विषयों को उठाती हुई अपनी बात वेबाक ढंग से पाठकों के समक्ष रखने में पूरी तरह से सफल रही है। रमेश चंद्र शर्मा तथा तालेवर मधुकर के गीत ग़ज़ल बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर सके हैं। वैसे भी आजकल गीत तथा हिंदी ग़ज़लों में घिसे पिटे तथा पुराने प्रतीकों के कारण आकर्षण लगभग नहीं रह गया है। पत्रिका की कहानियों में प्रमोद भार्गव, जसवंत सिंह एवं योगेश दीक्षित की कहानी प्रभावित करती है। पत्रिका का संपादकीय ‘एक कृति जिसका शताब्दी वर्ष है’ अच्छा चिंतन योग्य आलेख बन पड़ा है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

Wednesday, December 28, 2011

साहित्य की ख्यात पत्रिका समावर्तन

पत्रिका: समावर्तन, अंक: 04, वर्ष: 09, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, पृष्ठ: 102, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन .प्र.
साहित्य जगत की इस ख्यात पत्रिका का प्रत्येक अंक पठनीय व ज्ञानवर्धक रचनाओं से युक्त होता है। समीक्षित अंक में ख्यात कवि मैथिली शरण गुप्त के सृजन कर्म पर विशिष्ठ सामग्री का प्रकाशन किया गया है। उनकी रचनाओं के साथ साथ अज्ञेय, सुषमा प्रियदर्शनी, प्रभाकर श्रोत्रिय तथा संपादक रमेश दवे के उपयोगी व नवीन विचारों से युक्त आलेखों का प्रकाशन किया गया है। रवीन्द्र स्पप्निल प्रजापति की कहानी ‘प्यार और एक दूसरी लड़की’ नए ढंग से लिखी गई समसामयिक कहानी है जिसमें आज का समाज तथा उसके आसपास का वातावरण अपने नए रूप में उभर कर सामने आया है। निरंजन श्रो.ित्रय द्वारा चयनित महेश चंद्र पुनेठा की कविताएं सच से सामना कराने में पूर्णतः सफल रही है। राजकुमार कुम्भज, दुष्यंत तिवारी एवं सुभाष गौतम कबीर की कविताएं भी सार्थक प्रस्तुति कही जा सकती है। पं. गोकुलोत्सव जी महाराज पर एकाग्र पत्रिका का दूसर ा खण्ड ज्ञानवर्धक व संग्रह योग्य है। इस भाग में गजानन शर्मा, प्यारे लाल श्रीमाल, इब्राहिम अली, नीता माथुर तथा सूर्यकांत नागर की उनसे बातचीत प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार भी नवीनता लिए हुए हैं। अंक हर दृष्टिकोण से उपयोगी व पठनीय है।

Sunday, December 25, 2011

मासिक पत्रिका शुभ तारिका का नया अंक

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: 12, वर्ष: 39, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 64, मूल्य: 15रू (वार्षिक: 150रू.), ई मेल: urmi.klm@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0171.2631068, सम्पर्क: कृष्णदीप ए 47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी 133001 हरियाणा
प्राचीन ख्यात साहित्यिक पत्रिका शुभ तारिका का यह अंक अच्छी व जानकारीपरक रचनाओं से युक्त है। अंक में राधेश्याम योगी, श्लेष कुमार चंद्राकर, भवानीशंकर मिश्र, संतोष सूपेकर, आलोक भारती, पूर्णिमा मिश्रा व पवित्रा अग्रवाल की लघुकथाओं का प्रकाशन किया गया है। अरविंद अवस्थी, शिवदत्त डोगरे, सुनील कुमार, भगवान प्रसाद उपाध्याय, आलोक तिवारी, सीताराम पाण्डेय तथा लोचक सक्सेना की कविताएं प्रभावित करती हैं। रामशंकर चंचल व मुक्ता मदान की कहानियां समसामयिक प्रस्तुति हैं, लेकिन अनूप घई के व्यंग्य में कुछ कमियां रह गई है जिसके कारण यह व्यंग्य इस विधा के स्तर को नहीं स्पर्श कर सका है। डा. महाराज कृष्ण जैन के पत्रकारिता पर विचार साहित्य व पत्रकारिता छात्रों के लिए जरूरी व उपयोगी हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी प्रभावित करती है।

Saturday, December 24, 2011

कर्नाटक से ‘‘भाषा स्पंदन’’

पत्रिका: भाषा स्पंदन, अंक: 25, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. सरगु कृष्णमूर्ति, संपादक: डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ: 64, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100रू.), मेल:karnatakahindiacademy@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 080.25710355, सम्पर्क: 853, 8वां क्रास, 8 वां ब्लाक, कोरमंगला, बेंगलूर 560.095 कर्नाटक
बेंगलूर से प्रकाशित हिंदी साहित्य की इस महत्वपूर्ण पत्रिका का प्रत्येक अंक संग्रह योग्य होता है। समीक्षित अंक में भी अच्छी पठनीय व संग्रह योग्य रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। आलेखों में डाॅ. नीरा प्रसाद, राजेन्द्र गौतम, शंभू रतन अवस्थी, डाॅ. परमानंद पांचाल, सत्यकाम पहारिया, कमलकांत सक्सेना, गोस्वामी, अशोक कुमार शेरी, अन्नपूर्णा श्रीवास्तव एवं डाॅ. मंगल प्रसाद के आलेख हिंदी साहित्य व भाषा की दशा व दिशा पर गंभीरतापूर्वक प्रकाश डालते हैं। प्रकाशित कहानियों में नई राह(राजेन्द्र परदेसी), कयामत(जसविंदर शर्मा), अभागन(रामशंकर चंचल), कंधा(इंद्र सेंगर) तथा खानदान(पंकज शर्मा) प्रमुख हैं। कृष्ण कुमार यादव, कमल किशोर, भानुदत्त त्रिपाठी, प्रतिभा, राजेन्द्र परदेसी, कुमार शर्मा, अनिल, मोहन तिवारी, आकांक्षा यादव, उर्मिलेश तथा आदित्य शुक्ल की कविताएं, गीत व ग़ज़ल प्रभावित करते हैं।

Sunday, December 18, 2011

‘‘हिंदी चेतना’’ का प्रेम जनमेजय पर एकाग्र विशेषांक

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: 52, वर्ष: 13, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 84, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: hindichetna@yahoo.ca ,वेबसाईट: www.vibhom.com , फोन/मोबाईल: (905)475-7165 , सम्पर्क: 6, Larksmere Court, Markham, Ontario, L3R, 3R1,
कनाड़ा से प्रकाशित हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘‘हिंदी चेतना’’ द्वारा प्रतिवर्ष संग्रह योग्य, पठनीय विशेषांकों का प्रकाशन किया जाता रहा है। इस वर्ष पत्रिका का विशेषांक हिंदी साहित्य के प्रख्यात व्यंग्यकार, संपादक प्रेम जनमेजय पर एकाग्र है। सामान्यतः किसी साहित्यकार पर विशेषांक प्रकाशित करने का जोखिम पत्रिकाएं कम ही लेती है। क्योंकि इससे कभी कभी पत्रिका की लोकप्रियता में कमी आने का अंदेशा बना रहता है। जब साहित्यकार कोई व्यंग्यकार हो, तथा वर्तमान में सृजनरत हो तो पत्रिका की स्वीकार्यरता अधिक प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है। लेकिन यह प्रसन्नता की बात है कि हिंदी चेतना सभी स्थापित मानदण्ड़ों पर खरी उतरी है। पत्रिका ने बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रेम जनमेजय जी के साहित्यिक अवदान पर आलेखों का प्रकाशन किया है।
पत्रिका का प्रमुख आकर्षण ख्यात रचनाकार, उपन्यासकार पंकज सुबीर से उनकी बातचीत है। इस वार्ता में साहित्य जगत में व्यंग्यविधा तथा उसके दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला गया है। एक प्रश्न के उत्तर में वे स्वंय स्वीकार करते हैं कि, ‘‘ मैं बहुत ही आशावान व्यक्ति हूं और व्यंग्यकार के रूप में नकारात्मक दृष्टि होने के बावजूद सकारात्मक दृष्टिकोण रखता हूं।’’ यह सच है कि किसी भी विधा में सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है अन्यथा साहित्य अपने उद्दश्यों से भटककर समाज को द्ग्भ्रिमित करेगा। अन्य रचनाकारों लेखकों ने उनके सृजन,लेखन, संपादन, व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर विस्तार से अपने विचार रखे हैं। उनमें प्रमुख हंै--
डाॅ. मनोज श्रीवास्तव -- प्रेम जनमेजय ऐसे व्यंग्यकार हैं जो भले ही बड़ी मात्रा में न लिखते होें, किंतु वे जब भी लिखते हैं, उनका व्यंग्य पिछली रचना से दो कदम आगे, पुनरावृत्ति मुक्त और पहल से अधिक तराशा हुआ होता है।
प्रदीप पंत -- प्रेम (ढाई आखरवाला) के जितने रंग होते हैं, प्रेम जनमेजय के भी उतने ही हैं, बल्कि अनेक विरोधी रंग भी हैं।
सूरज प्रकाश -- उन्होंने अपने हिस्से के संघर्ष किए हैं लेकिन कभी भूले से भी उनका जिक्र करना पसंद नहीं किया।
डाॅ. अशोक चक्रधर -- प्रेम के अंदर विश्लेषण शक्ति रखने वाला एक श्रेष्ठ रचनात्मक और संवेदनशील लेखक है।
मनोहर पुरी -- वह अपने मित्रों सहयोगियों और साहित्यपे्रमियों से सहयोग लेने में कोई गुरेज नहीं करते परंतु उनकी दृष्टि व्यावसायिकता से कोसों दूर रहती है।
सूर्यबाला -- सादगी की छटा उनकी सहज प्रवाही बातों में विद्यमान रहती है। बड़ों के लिए एक अक्रत्रिम सम्मान भाव तथा छोटों के लिए स्नेह संरक्षण का विश्वसनीय संबल।
तरसेम गुजराल -- प्रेम जनमेजय बाजारवादी शक्तियों की नृशंसता, बर्बरता और आतंक से बाखूबी परिचित हैं।
यज्ञ शर्मा -- प्रेम जनमेजय की कर्मठता का प्रमाण है उनके लेखन की व्यापकता।
डाॅ. नरेन्द्र कोहली -- प्रेम के साथ अपने संबंध को किसी रिश्ते में बांधने में मुझे कठिनाई का अनुभव होता है। .... इस प्रकार सोचता हूं कि वह मुझे अपने पुत्र कार्तिकेय और अपनी पीढ़ी के बीच की पीढ़ी का लगता है।
उषा राजे सक्सेना -- प्रेम जनमेजय एक सह्दय, उदार मनुष्य हैं, जिनकी सदाश्यता में अनेक लेखक जन्म लेते हैं, पनपते हैं और फिर सघन वृक्ष बनकार दूसरों को छाया देते हैं।
अनिल जोशी -- (प्रेम जनमेजय से साक्षात्कार) ‘‘मेरा नाम प्रेम है, पेे्रम चोपड़ा नहीं। साहित्य में जीवंतता साश्वत तथ्यों से आती है, सनसनी से नहीं।’’ अनिल जोशी के प्रश्न ‘आप सिर्फ नाम के प्रेम हैं?’ के उत्तर में।
गिरीश पंकज -- पे्रेम जी का व्यंग्य अपनी मौलिक स्थापनाओं के कारण अलग से पहचाना जाता है।
ज्ञान चतुर्वेदी -- मुझे अपनी इस मित्रता पर गर्व है। ‘पे्रेम को दुनियादारी की खासी समझ है और इस दुनिया की भी।’
महेश दर्पण -- वह स्वयं को नहीं दूसरों को सामने या केंद्र मंे रखने में विश्वास रखते हैं।
अजय अनुरागी -- व्यंग्य के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे उनके प्रयास उल्लेखनीय हैं।
प्रताप सहगल -- प्रेम के दोनांे नाटक, व्यंग्य नाटक की दुनिया में नया दखल है।
प्रो. हरिशंकर आदेश -- प्रेम जनमेजय संज्ञा है एक ऐसे व्यक्ति की जो साक्षात् प्रेम की प्रेममूर्ति है।
अविनाश वाचस्पति -- प्रेम व्यंग्य में और व्यंग्य प्रेम में कुछ इस कदर घुलमिल गया है कि यह घुलना मिलना मिलावट नहीं है।
राधेश्याम तिवारी -- अपने निजी जीवन में प्रेम जनमेजय को मैंने जितना आत्मीय पाया, एक लेखक के रूप में भी वे मुझे उतने ही आत्मीय लगे।
अजय नावरिया -- प्रेम जनमेजय केवल सांसारिक जीव ही नहीें है बल्कि एक उदार क्षमाशील, संवेदनशील और परदुःखकातर मनुष्य भी हैं।
वेदप्रकाश अमिताभ -- प्रेम जनमेजय का व्यंग्य कहीं हथौड़ा बनकर टूटा है तो कहीं आलपिन तीक्ष्ण चुभन का अहसास देता है।
लालित्य ललित -- (वार्ताकार) व्यंग्य लेखन पर उसकी दशा पर क्यसा कहेंगे? ‘‘ पूरे हिंदी साहित्य की दिशा ही सही नहीं है। मूल्यांकन का आधार कृति कम कृतिकार अधिक है ....। ’’
इन महत्वपूर्ण विचारों के साथ ही प्रमुख संपादक श्याम त्रिपाठी ने स्पष्ट किया है कि, ‘‘प्रेम जी के इतने अधिक प्रेमी होगें इसका मुझे गुमान ही नहीं था।’’ कथन प्रेम जनमेजय की साहित्यजगत में सह्दयता तथा लोकप्रियता को सामने लाता है। संपादक सुधा ओम ढीगरा ने पत्रिका की रीति नीति के संबंध में लिखा है, ‘‘हिंदी चेतना की टीम किसी वादविवाद, राजनीति या गुटबंदी, विचारधार व विमर्श से परे होकर स्वतंत्र सोच व विचार से कार्य करती है। प्रेम जनमेजय विशेषांक उसी सोच का परिणाम है।
पत्रिका का समीक्षित अंक वर्तमान हिंदी साहित्य को नई दिशा देने में कामयाब होगा। इसी कामना के साथ अच्छे, पठनीय अंक के लिए बधाई।

Friday, November 11, 2011

साहित्य का एक और ‘पुष्पक’

पत्रिका: पुष्पक , अंक: 01, वर्ष: 15, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 112, मूल्य: 75रू (वार्षिक: 250 रू.), ई मेल: mishraahilya@yahoo.in ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 040.23703708, सम्पर्क: 93 सी, राजसदन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद आंध्र प्रदेश

साहित्य के क्षेत्र में विख्यात पत्रिका पुष्पक के समीक्षित अंक में समाज के विकास व उन्नति का संदेश देकर उसे विकास की मुख्य धारा में लाने वाली कहानियों का प्रकाशन किया गया है। एल.एन. अग्रवाल, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, शांति अग्रवाल की कहानियों मेें इसे महसूस किया जा सकता है। अशोक जैन, रामशंकर चंचल, रामनिवास मानव, सुरेन्द्र मिश्र, पवित्रा अग्रवाल, प्रेमबहादुर कुलश्रेष्ठ की लघुकथाएं अच्छी व ध्यान देने योग्य हैं। सुरेश चंद्र, जया उपाध्याय, कुंज बिहारी गुप्ता, विजय विशाल, ज्ञानेद्र साज, ज्योति नारायण, रमा द्विवेदी, ऋषभ देव शर्मा, अभिराम सत्यज्ञ, विनीता शर्मा, मीना मुथा, ओम रायजादा, कुंदन सिंह सजल, आशा सैली, बी.पी. दुबे, सुषमा भण्डारी, आर, शांता सुंदरी एवं मागेलाल तायल की कविताएं, ग़ज़लें तथा नवकविताएं प्रभावित करती हैं। सरिता सुराणा जैन, नरेश शर्मा का व्यंग्य तथा सुरेश उजाला, नृपेन नाथ गुप्त, संपत देवी मुरारका, प्रेमकुमारी कटियार, प्रो. उषा सिन्हा, विनोदिनी गोयनका, सीता मिश्रा, अशोक कुमार शैरी, पंवार राजस्थानी, जगदीश चंद्र शर्मा, नम्रता बजाज, प्रेमचंद्र सहजबाला की रचनाएं पठनीय व साहित्य के शोधार्थियों के लिए उपयोगी हैं।

Saturday, November 5, 2011

पत्रिका ‘‘शुभ तारिका’’ का नया अंक

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: अक्टूबर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 34, मूल्य: 12रू (वार्षिक: 120रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी अंबाला छावनी ब133001 हरियाणा

साहित्यिक पत्रिका शुभ तारिका का समीक्षित अंक साहित्यिक रचनाओं से युक्त है। अंक में प्रकाशित लघुकथाएं मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य का संकेत करती है। शराफत अली खान, रमेश चंद्र, ओम प्रकाश, नरेन्द्र नाथ, साबिर हुसैन, किशनलाल शर्मा, नरेन्द्र कौर छाबड़ा, सत्यनारायण एवं शमीम की लघुकथाओं का भाव आज के मानव को अभिव्यक्ति देना है। ख्यात साहित्यकार डाॅ. महाराजकृष्ण जैन से संबंधित जानकारी साहित्य के नए जिज्ञासुओं के लिए उपयोगी है। माला वर्मा, दिव्या लंघवाल, राजीव कुमार, अकेला चंद्र, शैलजा पाठक, हितेश कुमार शर्मा की कविताएं प्रभावित करती है। शैल वर्मा की कहानी व अर्जुन सिंह का व्यंग्य अच्छी रचना कही जा सकती है। अनूप घई पर एकाग्र लेखक परिशिष्ठ लेखक के संबंध में उपयोगी जानकारी प्रदान करता है। पत्रिका के अन्य स्थाई स्तंभ, समीक्षाएं, आलेख तथा समाचार भी जानकारीपरक हैं।

Wednesday, November 2, 2011

साहित्य में ‘‘हिंदी चेतना’’

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: जुलाई सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 68, ई मेल: hindichetna@yahoo.ca ,वेबसाईट: http://www.vibhom.com/ , फोन/मोबाईल: 905.4757165, सम्पर्क: 6 Larksmere Court, Markhem, Ontario, L3R 3R1

हिंदी प्रचारिणी सभा कैनेड़ा द्वारा विगत 13 वर्ष से निरंतर प्रकाशित हो रही पत्रिका हिंदी चेतना अकेली ऐसी पत्रिका है जिसने दुनिया के हिंदीप्रेमियों को भारत से जोड़े रखने का अहम कार्य किया है। पत्रिका पाठकों को मोगरे की खुशबू, गेंदे की सुनहरी आभा, मक्के की रोटी और सरसों का साग तथा पलाश के सौन्दर्य से बांधे रखकर हिंदी साहित्यजगत में अहम स्थान हासिल कर चुकी है। अंक में प्रकाशित कहानियों में फरिश्ता(पंकज सुबीर), कच्चा गोश्त(ज़कीबा जुबेरी) तथा केतलीना(अर्चना पेन्यूल) में निहित खुशबू को इन रचनाओं को पढ़कर महसूस किया जा सकता है। पत्रिका की संपादक डाॅ. सुधा ओम ढीगरा का लेख ‘अमरीका के हिंदी कथा साहित्य में अमेरिकी परिवेश शोध छात्रों के साथ साथ सामान्य पाठक के लिए समान रूप से उपयोगी है। आलेख से अमरीका में रह रहे हिंदी कथाकारों के सृजन की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। ओंमकारेश्वर पाण्डेय हिंदी को वैश्विक मुद्दों से जोड़े जाने की जरूरत बताते हुए आज के संदर्भ में उसकी उपादेयता पर भी विचार करते हैं। प्रकाशित कविताओं, ग़ज़लों, गीतों में कृष्ण कुमार यादव, सर्वेश आस्थाना, अलका सैनी, भगवत शरण, अमित कुमार सिंह, प्रकाश वर्मा, नित्यानंद तुषार, नरेन्द्र व्यास, रमेश रौनक, विजया सती, रेखा भाटिया, दीपक मशाल एवं अमित कुमार शर्मा ने कविता/ग़ज़ल विधा की मर्यादाओं का पालन करते हुए वर्तमान को अतीत से जोड़कर नवीन ढंग से विचार किया है। सुधा भार्गव की बाल कहानी नाग देवता बच्चों के साथ साथ अधिक उम्र के पाठकों का मनोरंजन करने में पूरी तरह से सक्षम है। सुकेश साहनी, सतीश राज तथा श्याम संुदर अग्रवाल की लघुकथाएं आमजन को अभिव्यक्ति देती दिखाई पड़ती है। हिंदी को दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने का भाव लिए हुए प्रमुख संपादक श्याम त्रिपाठी जी का संपादकीय पठनीय व ज्ञानवर्धक है। साहित्य सृजन व पठन को ध्यान में रखते हुए संपादक सुधा जी का आखिरी पन्ना पत्रिका के आगामी अंक की प्रतीक्षा व उत्सुकता को जगाने मेें पूर्ण रूप से सहायक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार भी प्रभावित करते हैं। हिंदी चेतना की साज सज्जा, कलेवर तथा सामग्री संयोजन काबिले तारीफ है। हिंदी साहित्य जगत में ऐसी पत्रिकाएं गिनी चुनी हैं जो आधुनिक तकनीक व नवाचारों का उपयोग कर हिंदी के लगातार विकास तथा विस्तार में लगी हुई हैं।

Monday, October 31, 2011

साहित्यकारों की जरूरत पाखी

पत्रिका: पाखी, अंक: अक्टूबर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: पे्रम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250 रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in ,वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मोबाईल: 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेंडेंट मीडिया इनीशिएटिव सोसायटी, बी. 107, सेक्टर 63, नोएडा 201303

साहित्य की प्रमुख पत्रिका का समीक्षित अंक साहित्यिक रचनाओ के साथ साथ अन्य सामाजिक, सांस्कृतिक समसामयिक रचनाओं से युक्त है। अंक में विजय, सी. भास्कर राव, प्रदीप पंत, नसीम साकेती, पंकज सुबीर एवं काजल पाण्डेय की समसामयिक विचारों से युक्त कहानियों का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका में प्रकाशित प्रदीप सौरभ का उपन्यास अंश ‘‘देश भीतर देश’’ आज की परिस्थितियों का नए नजरिए से देखने का सफल प्रयास है। जिसे उपन्यास को पूरा पढ़कर और भी अच्छी तरह से जाना समझा जा सकता है। कालम बात जो नागवार गुजरी के अंतर्गत प्रकाशित विचारों में मन्नू भण्डारी, तेजेन्द्र शर्मा, साधना अग्रवाल, नज्म सुभाष तथा मधु के साहित्येतर लघु आलेख, इन आलेखकारों का अपना नजरिया है। यह आवश्यक नहीं है कि पत्रिका का पाठक इन विचारों से इत्तेफाक रखे ही। इस अंक में प्रकाशित मृत्यंुजय प्रभाकर व ओम नागर की कविताएं अधिक प्रभावित नहीं कर सकीं हैं। आदित्य विक्रम सिंह, भारत यायावर, राजीव रंजन गिरि तथा विनोद अनुपम के स्तंभ की सामग्री अच्छी कही जा सकती है। लेकिन खेद का विषय है कि ये आलेख लगातार टाइप्ड होते जा रहे हैं। जिसकी वजह से आलेखों की गंभीरता बुरी तरह से प्रभावित हुई है। पत्रिका में प्रकाशित लघुकथाएं, समीक्षाएं तथा अन्य रचनाएं भी भले ही साहित्य की श्रेणी में न आतीं हों लेकिन पढ़ने योग्य हैं।

Sunday, October 30, 2011

साहित्य का समावर्तन

पत्रिका: समावर्तन, अंक: अक्टूबर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, पृष्ठ: 86, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250 रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 07342524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.

साहित्य जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका समावर्तन का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार लेखिका सुधा अरोड़ा पर एकाग्र है। पत्रिका ने उनके समग्र व्यक्तित्व को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। उनका आत्मकथ्य, कविताएं तथा अन्य रचनाएं साहित्य के नए जानकारों के लिए संजोकर रखने योग्य है। पत्रिका के संपादक रमेश दवे तथा प्रज्ञा रावत के लेख उनके लेखन व सामाजिक जीवन के संबंध में बहुत कुछ उजागर करते हैं। अन्य रचनाओं में निरंजन श्रोत्रिय द्वारा चयनित अपर्णा मनोज की कविताएं इस विधा के प्रति समपर्ण का भाव जाग्रत करती है। प्रणव कुमार बंधोपाघ्याय का यात्रा विवरण, परिधि शर्मा की कहानी तथा कमलेश्वर साहू व राजेन्द्र नागदेव की कविताएं अच्छी व सरसता लिए हुए हैं। वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चैबे पर एकाग्र खण्ड में आफाक अहमद, सविता भार्गव, सुधीर पचैरी, आलेख तथा महेन्द्र गगन से बातचीत पत्रिका के अन्य आकर्षण हैं। प्रताप सिंह सोढी की लघुकथाएं, गिरीश रस्तोगी, ओम प्रभाकर के लेख, विनय उपाध्याय के कालम सहित अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती हैं।

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का अक्टूबर अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: अक्टूबर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. बि. रामसंजीवैया, मनोहर भारती, पृष्ठ: 62, मूल्य: 5रू (वार्षिक: 50 रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 080.23404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट आॅफ कार्ट रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर कर्नाटक

पत्रिका का समीक्षित अंक प्रधान सचिव व पत्रिका के प्रधान संपादक डाॅ. बि. रामसंजीवैया पर आंशिक रूप से एकाग्र है। अंक में उनके समग्र्र व्यक्तित्व पर संक्षिप्त किंतु उपयोगी आलेख मनोहर भारती जी ने लिखा है। पत्रिका के अन्य आलेखों में मित्रेश कुमार गुप्त, रामशरण युयुत्सू, मोहन भारतीय, दर्शन सिंह रावत, रामशरण यादव के आलेख प्रभावित करते हैं। हरीश कुमार शर्मा, रंजना अरगड़े, अमित पटेल व हितेश कुमार शर्मा के लेखों में अन्य समाजिक विषयों पर प्रकाश डाला गया है। सुनीता पचैरी, सुंदरलाल कथूरिया तथा रामनिवास मानव की कविताएं प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व जानकारियां भी उपयोगी व सार्थक हैं।

Friday, October 28, 2011

पत्रिका ‘‘युग वंशिका’’ का प्रवेशांक

पत्रिका: युग वंशिका, अंक: जुलाई 2011, स्वरूप: वार्षिक, संपादक: नित्यानंद तुषार, पृष्ठ: 88, मूल्य: 30रू (वार्षिक: उपलब्ध नहीं), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0120.2742464, सम्पर्क: प्रारंभ प्रकाशन, आर 64, सेक्टर 12, प्रताप विहार, ग़ाजियाबाद उ.प्र.

समीक्षित अंक पत्रिका युग वंशिका का प्रवेशांक है। सामान्यतः किसी पत्रिका के प्रवेशांक में जो कमियां होती हैं प्रायः वही सब इसमें भी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पत्रिका साहित्यजगत के जानकारों के लिए अनुउपयोगी है। सरसरी तौर पर अंक देखकर यह कहा जा सकता है कि भविष्य में यह पत्रिका साहित्य जगत के शीर्ष पर अवश्य काबिज होगी। इस अंक में जीवन सरकार, रज्जन त्रिवेदी, विपिन बिहारी, सदानंद झा, जसवंत सिंह विरदी, रजनी गुप्त, कुंवर आमोद, दिवा भट्ट एवं किसलय पंचैली की कहानियों का प्रकाशन किया गया है। इनमें से कुछ कथाकार जाने पहचाने तथा शेष साहित्य जगत में लगभग नए हैं। लेकिन फिर भी बिपिन बिहारी, रजनी गुप्त एवं किसलय पंचोली की कहानियां सशक्त हैं। काजल पाण्डे का लघु उपन्यास ‘‘सच झूठ के बीच’’ एक वडी विषयवस्तु को प्रस्तुत करता है। प्रताप दीक्षित का व्यंग्य ख्यात व्यंग्यकार स्व. श्री रवीन्द्रनाथ त्यागी की सी भाषा के कारण प्रभावित करता है। नचिकेता, वीरेन्द्र आस्तिक, चन्द्रसेन विराट, यशोधर राठौर के गीतों में इस विधा के आधुनिक स्वरूप से दर्शन होते हैं। रंजना श्रीवास्तव तथा रश्मि रमानी की कविताएं समसामयिक हैं। निदा फाजली, नित्यानंद तुषार की ग़ज़लों को छोड़कर अन्य ग़ज़लें प्रभावित नहीं कर सकी हैं। पत्रिका का यह प्रवेशांक है इसमें साहित्य की अन्य विधा जैसे संस्मरण, रेखाचित्र, डायरी, रिपोतार्ज आदि विधाएं भी सम्मिलित की जाना चाहिए था। उम्मीद है साहित्य समाचार अगले अंक से अवश्य ही प्रकाशित किए जाएंगे?

Thursday, October 27, 2011

संबोधन का जुलाई-सितम्बर अंक

पत्रिका: संबोधन, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कमचर मेवाड़ी, पृष्ठ: 190, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 02952223221, सम्पर्क: पोस्ट कांकरोली, जिला राजसमंद राजस्थान

पत्रिका संबोधन का समीक्षित अंक महिला कथाकार विशेषांक है। अंक में प्रायः प्रत्येक वर्ग की प्रतिनिधि रचनाओं को स्थान दिया गया है। अंक की कहानियों में प्रमुख साम्य यह है कि वे इन कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियां है। इन कहानियों को पुनः पढ़ना एक सुखद अनुभव है। युवा समीक्षक आलोचक पल्लव का समीक्षात्मक लेख पत्रिका में प्रकाशित कहानियों पर संक्षेप में प्रकाश डालता है। इन कहानियों में एक प्लेट सैलाब(मन्नू भण्डारी), इमाम साहब(नासिरा शर्मा), प्रेम(ममता कालिया), भूख(चित्रा मुदगल), कांसे का ग्लास(सुधा अरोडा), प्रमुख स्त्री के बीच(ज्योत्सना मिलन), गृह प्रवेश(मालती जोशी), चीख(उर्मिला शिरीष), स्वयं से किय ाग या वादा(स्वाति तिवारी), केयार आॅफ स्वात घाटी(मनीषा कुलश्रेष्ठ), अललटप्पू(सुषमा मुनीन्द्र), अपनी तरफ लौटते हुए(जयश्री राय) तथा जिसे में फोन नहीं करती(इंदिरा दांगी) प्रमुख हैं। वहीं दूसरी ओर सीमा थापक, मीनाक्षी स्वामी, शाइस्ता फ़ाखरी, रूचि बागड़देव तथा नीता श्रीवास्तव की कहानियों में वह पैनापन नहीं लगा जिसके लिए कहानी विधा जानी पहचानी जाती है। पत्रिका का कलेवर, साज सज्जा सादगीपूर्ण है व सहज ही आकर्षित करता है।

Monday, October 24, 2011

साहित्य, कला एवं सामाजिक संस्कारों की पत्रिका ‘संस्कृति’

पत्रिका: संस्कृति, अंक: 18 पूर्वाद्ध वर्ष 2010, स्वरूप: अर्द्धवार्षिक, संपादक: भारतेश कुमार मिश्र, पृष्ठ: 105, मूल्य: केवल नि शुल्क सीमित वितरण के लिए, ई मेल: editorsanskriti@gmail.com ,वेबसाईट: http://www.indiaculture.nic.in/ , फोन/मोबाईल: 011.23383032, सम्पर्क: केन्द्रीय सचिवालय, ग्रंथागार, द्वितीय तल, शास्त्री भवन, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद मार्ग, नई दिल्ली 110001(भारत)

कला, साहित्य एवं सामाजिक संस्कारों की प्रमुख पत्रिका संस्कृति का प्रत्येक अंक सराहनीय होता है। समीक्षित अंक भी गंभीर, गहन विश्लेषण युक्त रचनाओं से युक्त है। अंक में ख्यात आलोचक समीक्षक रमेश कुंतल मेघ का आलेख सौन्दर्य बोध को नए सिरे से परिभाषित करता है। रामशरण युयुत्सू, अनिल कुमार तथा भालचंद्र जोशी के लेख क्षेत्रीय संस्कृति तथा सरोकारों की अच्छी प्रस्तुति कही जा सकती है। नरेश पुण्डरीक ने बुंदेलखण्ड तथा अश्विनी कुमार ने झारखण्ड को नए सिरे से सजाया सवांरा है। राजेन्द्र कुमार दीक्षित, परमानंद पांचाल, देवेन्द्र नाथ ओझा एवं लीला मिश्र ने हमारी ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर को विश्लेषित कर उन्हें पाठकों की मुख्य पसंद बना दिया है। लोकेश चंद्र, मीना सिंह, कृपाशंकर सिंह तथा वीरेन्द्र सिंह यादव अपने अपने विषयों के साथ अच्छी तरह से न्याय कर सके हैं। वैदिक समाज और साहित्य में स्त्री की भूमिका(श्रुतिकांत पाण्डेय), भरमौर की जनजातिय संस्कृति(डाॅ. जगत सिंह), विवाह की विचित्र परंपराए(योगेश चंद्र शर्मा) एवं रवीन्द्र नाथ झा के आलेख पठनीय व संग्रह योग्य हैं। सुदर्शन वशिष्ठ, प्रदीप शर्मा तथा सुमित पी.बी. ने स्पष्ट व सारगर्भित विश्लेषण अपने अपने आलेखों में किया है। पत्रिका का कलेवर, साज सज्जा तथा प्रस्तुतिकरण प्रभावित करता है। इस अमूल्य पत्रिका को प्रत्येक पाठक पढ़कर सहेजना चाहेगा।

Sunday, October 23, 2011

साहित्यकारों की सम्पर्क पत्रिका ‘‘आसपास’’ का नया अंक

पत्रिका: आसपास, अंक: अक्टूबर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 32, मूल्य: 5रू(वार्षिक: 50 रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com ,वेबसाईट: http://www.dharohar.com/ , फोन/मोबाईल: 07552776129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.

रचनाकर्मियों की संवाद पत्रिका का समीक्षित अंक जानकारीपरक समाचारों से युक्त है। अंक में ख्यात ग़ज़ल गो शहरयार को ज्ञानपीठ पुरस्कार का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। मध्यप्रदेश की राजधनी भोपाल में शुरू हो रहे हिंदी विश्वविद्यालय में तकनीकि शिक्षा की पढ़ाई का समाचार हिंदी के साथ साथ तकनीक से जुडे़ पाठकों के लिए उपयोगी है। उच्च न्यायालय के हिंदी में पारित प्रस्ताव तथा भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाया जाए हिंदी दिवस का समाचार पत्रिका के अन्य आकर्षण हैं। इंटरनेट पर हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार, देवेद्र दीपक व भारद्वाज को दीनदयाल उपाध्याय सम्मान एवं मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा देश के 16 साहित्यकारों के सम्मान से संबंधित समाचार शब्दधर्मियों के मध्य संवाद स्थापित करने में पूर्णतः सक्षम है। रीयूनियन द्वीप फ्रांस में पहली बार हिंदी दिवस व नेशनल बुक ट्रस्ट के नए निदेशक का समाचार भी साहित्यजगत के लिए उपयोगी है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार, पत्र आदि भी उपयोगी व जानकारी परक हैं।

Saturday, October 22, 2011

‘‘समय के साखी’’ का नागार्जुन जन्मशती अंक

पत्रिका: समय के साखी, अंक: 15 वर्ष: 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: आरती, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू(वार्षिक: 225 रू.), ई मेल: samaysakhi@gmail.com ,वेबसाईट: , http://www.samaykesakhi.in/ फोन/मोबाईल: 09713035330, सम्पर्क: बी-308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला अस्पताल के पास, भोपाल 3, म.प्र.

पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात प्रगतिशील कवि नागार्जुन पर एकाग्र है। अंक में उनके समग्र व्यक्तित्व पर सारगर्भित आलेखों का प्रकाशन किया गया हैै। प्रमुख आलोचक रामप्रकाश त्रिपाठी, सुरेश पंडित, रमाकांत शर्मा, सूर्यकांत नागर, मधुरेश जी एवं माधव हाड़ा के आलेख नागार्जुन की कविताओं का विश्लेषणपरक मूल्यांक न करते हैं। ख्यात कवि सर्वश्री ओमप्रकाश भारती, महेश पुनेठा, मोहन सगोरिया तथा कुमार सुरेश ने उनकी कविताओं पर अन्य रचनाओं पर विचार रखे हैं। नागार्जुन की कलम से कालम के अंतर्गत उनकी कुछ चुनी हुई कविताएं प्रकाशित की गई है। इन कविताओं के माध्यम से साहित्य के नए पाठकों का नागार्जुन से पुनः परिचय कराया गया हैै। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

Friday, October 21, 2011

नारी अस्मिता का नया अंक

पत्रिका: नारी अस्मिता, अंक: जून-नवम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: रचना निगम, पृष्ठ: 64, मूल्य: 25रू(वार्षिक: 100रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0255.6545817, सम्पर्क: 15, गोयागेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी-ब्लाक, द्वितीय तल, एस/3, प्रतापनगर बड़ोदरा गुजरात

देश की सर्वाधिक लोकप्रिय स्त्री विषयक पत्रिका का समीक्षित अंक साहित्यिक एवं सामाजिक रचनाओं से भरपूर है। अंक में कमलेश शर्मा, पूनम गुजराती, वसंती पवार, रेखा भंसाली एवं सुमन जे, शर्मा के सामाजिक महत्वयुक्त आलेखों का प्रकाशन इस अंक में किया गया है। शुक्ला चैधरी तथा लीला मोदी के आलेख साहित्येत्तर विषयों की अच्छी प्रस्तुति है। प्रकाशित कहानियों में मां मुझे बचाओ(कविता रायजादा), धूप छांव(सुदेश बत्रा) एवं अब्दुल्ला का ताजमहल(अनीता पंडा) अच्छी रचनाओं में शुमार की जा सकती है। श्रीमती संतोष खन्ना से साक्षात्कार अच्छा व प्रभावी है। प्रायः सभी लघुकथाएं ठीक ठाक हैं। अंक की कविताएं अन्य रचनाओं की तरह अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पायी हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

Monday, October 17, 2011

समकालीन अभिव्यक्ति का नया अंक

पत्रिका: समकालीन अभिव्यक्ति, अंक: सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ: 64, मूल्य: 15रू(वार्षिक: 60रू.), ई मेल: samkaleen999@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 011.26645001, सम्पर्क: फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984 वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30

पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक नारी विशेषांक है। अंक में महिला रचनाकारों की कहानियों, कविताओं तथा आलेखों का समावेश इस अंक में किया गया है। इंदिरा राय, रंजना सिंह, मीरा चंद्रा तथा कमल कपूर ने कहानियों के पात्रों के साथ पूरी तरह से न्याय किया है। जिससे प्रायः सभी कहानियों में प्रवाह आ गया है। लता सुमंत, आकांक्षा यादव, कृष्णा श्रीवास्तव तथा हर्ष नंदिनी भाटिया के आलेखों मंे भी नारी जीवन तथा उसके संघर्ष को व्यक्त किया गया हैै। मीनू बैस, इंदिरा शर्मा, पूनम यादव, राजकुमारी रश्मि, सवर्णा दीक्षित, प्रियंका, रश्मि मिश्रा तथा सरोज वशिष्ठ की कविताएं भी स्त्री विषयक दृष्टिकोण सामने रखती है। प्रो. वंशीधर त्रिपाठी से साक्षात्कार तथा राजी सेठ से सुदर्शन नारंग के छः प्रश्न पत्रिका की विशिष्ठ रचनाएं हैं। पत्रिका की समीक्षाएं, पत्र तथा समाचार भी श्रेष्ठ हैं।

Sunday, October 16, 2011

हिंदी साहित्य में ‘तटस्थ’ के 39 वर्ष

पत्रिका: तटस्थ, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कृष्णबिहारी सहल, पृष्ठ: 64, मूल्य: 38रू (वार्षिक: 150रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 01572253439, सम्पर्क: विवेकानंद विला, पुलिस लाईन के पीछे, सीकर राजस्थान

लघुपत्रिका दौर की 39 वर्ष पुरानी यह पत्रिका रचनात्मकता व विविधता में किसी व्यवसायिक पत्रिका से कमतर नहीं है। समीक्षित अंक में ख्यात कवि श्रीकांत जोशी की काव्य यात्रा पर मणिशंकर आचार्य का आलेख उनके व्यक्तित्व पर भलीभांति प्रकाश डालता है। कहानी सारा जहां हमारा(चंद्रप्रकाश पाण्डेय), वटवृक्ष(सरला अग्रवाल), पत्थर हुए लोग(तारिक असलम तस्लीम) में रोचकता के साथ साथ समयानुकूल विशिष्टताएं भी दिखाई पड़ती हैं। कृष्ण कुमार यादव का आलेख तथा ओंमकारनाथ चतुर्वेदी का व्यंग्य मां बहुत भूख लगी है अच्छी रचनाएं हैं। श्रीकांत जोशी, हरदयाल, राजेन्द्र परदेसी, शकूर अनवर, देवेद्र कुमार मिश्रा, मनोज सोनकर, रमेश सोबती तथा नंद चतुर्वेदी जी की कविताओं में पाठक के लिए बहुत कुछ है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र भी प्रभावित करते हैं।

Saturday, October 15, 2011

साहित्य के लिए आवश्यक 'पंजाबी संस्कृति'

पत्रिका: पंजाबी संस्कृति, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: राम आहूजा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू(वार्षिक: 80रू.), ई मेल: ram_ahuja@hotmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0124.2582115, सम्पर्क: एन-115, साउथ सिटी, गुडगांव(हरियाणा)

हरियाणा से प्रकाशित हिंदी साहित्य की यह पत्रिका हिदंी व पंजाबी दोनों में एक साथ रचनाआंे का प्रकाशन करती है। इस अंक में श्रीकांत व्यास व वीर सावरकर के लेख धर्मक्षेत्र के अंतर्गत प्रकाशित किए गए हैं। समसामयिक आलेखों में सबसे बड़ा योद्धा(राम आहूजा), ज्ञान के मोती(जवाहर लाल जौहर) एवं जीवन में शिक्षा का महत्व(मानसी बाधवा) अच्छी रचनाएं हैं। लीला मोदी की कहानी नौ कन्या तथा हमारे अपने(मनीष कुमार सिंह) विशेष रूप से प्रभावित करती है। वहीं दूसरी ओर उसकी तरक्की(चित्रेश) अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में असफल रही है। इस कहानी पर अभी और कार्य किया जाना चाहिए था। मदन लाल वर्मा, सुर्कीति भटनागर, महेश राणा, वाहिद फराज, सरोज व्यास सलिल, राज कुमारी शर्मा, ओम प्रकाश बजाज, रमेश मनोहरा, राम निवास मानव, चांद शर्मा एवं अश्विनी टांक की कविताओं में नवीनता के साथ साथ समय के संघर्ष का स्वर दिखाई पड़ता है। राम निवास, श्याम लाल कौशल एवं सुरेन्द्र मंथन की लघुकथाओं को छोड़कर अन्य लघुकथाओं में कथावस्तु के स्तर पर शून्य ही झलकता है। पत्रिका का सिरायकी खण्ड भी उपयोगी व पठनीय रचनाआंे से परिपूर्ण है। अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Tuesday, October 11, 2011

एक और ‘साहित्य अभियान’

पत्रिका: साहित्य अभियान, अंक: सितम्बर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: सनत, पृष्ठ: 22, मूल्य: 10रू(वार्षिक: 120रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 9301492734, सम्पर्क: साहित्य निकेतन, जूट मिल थाने के पीछे, हनुमान मंदिर के पास, रायगढ़ (छतीसगढ़)
सृजनात्मक सोच युक्त साहित्य अभियान का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से युक्त है। अंक में सुजीत कर, सनत कुमार नायक एवं प्रमोद जोशी केे विचारयुक्त आलेख प्रभावित करते हैं। शिक्षा, शिक्षक एंव विद्याथी परिचर्चा वर्तमान शैणक्षिक वातावरण में समसामयिक है व अच्छी सारगर्भित विवेचना प्रस्तुत करती है। रामधारीसिंह दिनकर, सीताराम गुप्ता, सनत कुमार नायक, तुकाराम कंसारी, श्याम नारायण श्रीवास्तव एवं मनीषा दिव्य भारद्वाज की कविताओं का स्वर समाज के पिछड़ों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। कृष्ण कुमार यादव, हसमुख रामदेपुत्रा सहित अन्य लेखकों की लघुकथाएं भी पठनीय व ध्यान देने योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी अपेक्षित स्तर की हैं व प्रभावित करती हैं।

Friday, September 30, 2011

सरस्वती सुमन का लघुकथा अंक

पत्रिका: सरस्वती सुमन, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: आनंद सुमन सिंह, अतिथि संपादक: कृष्ण कुमार यादव, पृष्ठ: 180, मूल्य: प्रकाशित नहीं, मेल: saraswatisuman@rediffmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0135.2740060, सम्पर्क: 1, छिब्बर मार्ग,(आर्यनगर), देहरादून 248001
पत्रिका का समीक्षित अंक लघुकथा विशेषांक है। अंक में 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं को उनके परिचय के साथ प्रकाशित किया गया है। इसके अतिरिक्त लघुकथा विधा पर आलेख भी प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं। लघुकथाओं पर वैसे तो बहुत सी पत्रिकाओं के अंत पिछले कुछ वर्षो में प्रकाशित हुए हैं। पर सरस्वती सुमन का यह अंक रचनाओं की बुनावट तथा कसावट के कारण पाठकों को आकर्षित करता है। इसके साथ ही नए लघुकथाकारों को लघुकथा विधा से परिचित कराने के साथ साथ उन्हें लघुकथा लिखने के लिए प्रेरित करता है। अंक में अकेला भाई, अनिल कुमार, अनुराग, अब्ज, अशोक अज्ञानी, अशोक भाटिया, अशोक वर्मा, अशोक सिंह, अश्विनी कुमार आलोक, आकांक्षा यादव, भगवत दुबे, आनंद दीवान, आशा खत्री लता, आशीष दशोतर, उषा महाजन, दर्द ओमप्रकाश, कमल कपूर, कमल चोपड़ा, कपिल कुमार, कालीचरण प्रेमी, किशोर श्रीवास्तव, कुअंर बैचेन, कुमार शर्मा, कुलभूषण कालड़ा, कुंअर प्रेंमिल, कुंवर विक्रमादित्य एवं कौशलेन्द्र पाण्डेय की लघुकथाओं सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कृष्ण कुमार यादव, कृष्णानंद कृष्ण, कृष्णलता यादव, गोवर्धन यादव, घमंडी लाल अग्रवाल, जगतनंदन सहाय, जितेन्द्र सूद, जयबहादुर शर्मा, ज्योति जैन, जवाहर किशोर प्रसाद, तारा निगम, तारिक अस्लम तस्लीम, दीपक चैरसिया मशाल, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, नरेन्द्र कौर छाबड़ा, नमिता राकेश, नवनीत कुमार, नीतिपाल अत्रि, पंकज शर्मा, प्रकश सूना, प्रभात दुबे, पासर दासोत, पूरन सिंह, पुष्पा जमुआर, बलराम अग्रवाल, माला वर्मा, मिथिलेश कुमारी मिश्र, रमाकांत श्रीवास्तव, रश्मि बडथ्वाल, राजेन्द्र परदेसी, सत्यनारायण भटनागर, सतीश दुबे, समीर लाल, सुकेश साहनी, सुरेश उजाला, संतोष सुपेकर, हरिप्रकाश राठी एवं संतोष श्रीवास्तव की लघुकथाएं किसी भी बड़ी विशाल कैनवास युक्त कहानी की अपेक्षा अधिक प्रभावित करती है। प्रकाशित आलेखों में कमल किशोर गोयनका, बलराम अग्रवाल, श्याम सुंदर दीप्ति, रामनिवास मानव, माधव नागदा एवं रामेश्वर कांबोज हिमांशु के लेख लघुकथा विधा की चर्चा करते हुए उसे साहित्य में एक नवीन व प्रभावशाली विधा के रूप में प्रतिष्ठित करते दिखाई देते हैं।

समावर्तन का नया अंक

पत्रिका: समावर्तन, अंक: सितम्बर 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, पृष्ठ: 96, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: samavartan@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी, 129 दशहरा मैदान, उज्जैन .प्र.
अल्प समय में ही प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका समावर्तन के इस अंक में बहुत कुछ नया व पठनीय प्रकाशित किया गया है। अंक आंशिक रूप से ख्यात कथाकार मालती जोशी पर एकाग्र है। उनके समग्र व्यक्तिव पर प्रकाशित आलेखांे में सूर्यकांत नागर, मंगला रामचंद्रन, ज्योति जैन, सुधा अरोड़ा, राजेन्द्र सिंह चैहान एवं सच्चिदानंद जोशी के आलेख विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। निरंजन श्रोत्रिय जी द्वारा चयनित महेश वर्मा की कविताएं नयापन लिए हुए हैं। राधेलाल बिजघावने, सुदिन श्रीवास्तव, जहीर कुरेशी एवं भूमिका द्विवेदी की कविताओं में सार्थकता व समयानूकूल भाव छिपा हुआ हैै। श्याम मुुंशी की कहानी ‘किसकी मौत?’ एक अच्छी कहानी है। ललित सुरजन जी पर एकाग्र भाग में भी गहन गंभीर रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। उनके साहित्य से चुने हुए अंश तथा रमाकांत श्रीवास्तव, त्रिभुवन पाण्डेय के आलेखों में सुरजन जी से पाठक का व्यक्तिगत साक्षात्कार हो जाता है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, श्रीराम दवे, परमानंद श्रीवास्तव, विनय उपाध्याय की समीक्षाएं व आलेख पत्रिका के अन्य अंकों की तरह स्तरीय हैं।

Wednesday, September 28, 2011

‘शुभ तारिका’ के साथ

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: अगस्त 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 64, मूल्य: 12रू (वार्षिक: 120रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 9171.261083, सम्पर्क: कृष्णदीप, -47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी हरियाणा
पत्रिका के इस कहानी अंक में अच्छी व पठनीय कहानियों का समावेश किया गया है। अंक में इसके अतिरिक्त अन्य रचनाओं को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। प्रकाशित लघुकथाओं में सुरेन्द्र गगल, अखिलेश शुक्ल, राधेश्याम भारतीय, आनंदप्रकाश आर्टिस्ट की लघुकथाएं प्रभावित करती है। रूपाली दास, निर्मला जौहरी, श्याम विद्यार्थी, अब्बास खान, प्रियंका शर्मा, कुलभूषण कालड़ा एवं चिन्मय सागर की कविताएं नवीनता लिए हुए हैं। राधेश्याम जोशी, संजय जनागल, अलका सैनी, प्रदीप शर्मा, इंदिरा किसलय, राजेश पंकज तथा मनीष कुमार सिंह की कहानियों में वर्तमान समाज को संघर्ष से उबरने के लिए प्रेरित करने की दिशा में प्रयास निरूपित किया जा सकता है। लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत केदारनाथ सविता से संबंधित जानकारी ज्ञानवर्धक है। लोकसेतिया का व्यंग्य एक अच्छी रचना कही जा सकती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व लेख आदि भी रोचकता लिए हुए हैं।

Tuesday, September 27, 2011

साहित्य से ‘साक्षात्कार’

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: अगस्त 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 250रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2554782, सम्पर्क: .प्र. संस्कृति परिषद, वाण गंगा, भोपाल मध्यप्रदेश
साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय व रचनाकारों की प्रिय पत्रिका का समीक्षित अंक भविष्य में साहित्य के माध्यम से परिवर्तनशील रचनाकारों की रचनाओ से युक्त है। अंक में ख्यात कवि तथा साहित्य मर्मज्ञ नंद किशोर आचार्य जी से ब्रजरतन जोशी की बातचीत साहित्य के साथ साथ वर्तमान परिस्थितियों व उससे उत्पन्न विषमताओं पर गहन विमर्श है। आचार्य भगवत दुबे एवं सुरेन्द्र विक्रम उच्च कोटि के हैं। संपादक ने पता नहीं क्यों सत्यनारायण भटनागर की लघु कहानियों को अंक में स्थान दिया है। जबकि इन रचनाओं में न तो सरसता है और न ही वर्तमान से किसी प्रकार का संवाद ही है। मैं नदिया फिर भी प्यासी(सुरेन्द्र कुमार सोनी) तथा चलत े चलते(जीवन सिंह ठाकुर) कहानियां अपेक्षाकृत रूप से अधिक प्रभावशाली है। रश्मि रमानी की कविता तथा नरेश सांडिल्य के दोहे सटीक हैं। वहीं दूसरी ओर लगता हैै विनय मिश्र पूर्ण तन्मयता से लेखन नहीं कर पा रहे हैं। राजेन्द्र कुमार का यात्रा वृतांत अच्छा बन पड़ा है। नई कलम के अंतर्गत स्वाति आकांक्षा सिंह प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं प्रभावित करती है। शुक्ल जी के संपादन में पत्रिका में काफी निखार आया है, लेकिन अभी यह निखार रचना की उत्कृष्टता के रूप में आना शेष है।

Friday, September 23, 2011

साहित्य के ‘निकट’

पत्रिका: निकट, अंक: जून-अक्टूबर 2011, स्वरूप: अर्द्ध वार्षिक, संपादक: कृष्ण बिहारी, पृष्ठ: 144, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100 रू.), मेल: krishnabihari@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 971505429756, सम्पर्क: Po box no. 52088, Abudhabi, UAE
अमीरात से प्रकाशित इस पत्रिका ने प्रारंभ से ही हिंदी साहित्यजगत में अपनी पहचान बना ली है। इसके पांच अंक साहित्य की प्रत्येक विधा में प्रकाशित सामग्री विविधतापूर्ण व जानकारीपरक है। समीक्षित अंक में प्रकाशित रचनाओं का स्तर किसी भी प्रतिष्ठित भारतीय पत्रिका से कमतर नहीं है। इस अंक में प्रकाशित कहानियों में नेपथ्य का नरक(अपूर्व जोशी), ख़सम(हरि भटनागर), सुनो तो पुरबैया(जयश्री राय), आदमी और औत उर्फ बीच रात की डोरी(प्रमोद सिंह), हक(रवि अग्निहोत्री), ढलान पर कुछ पल(प्रताप दीक्षित), सड़क की ओर खुलता मकान(रूपसिंह चंदेल) एवं ससमाप्त(उर्मिला शिरीष), अनभिज्ञ(राजेन्द्र दानी) प्रमुख हैं। प्रत्येक कहानी समसामयिक परिस्थितियों वातावरण को लेकर रची गई है। इनमें समाज के प्रत्येक वर्ग को समुचित महत्व दिया गया है। प्रेमिला सिंह, मोहन सिंह कुशवाहा, उत्पल बनर्जी, मंजरी श्रीवास्तव, प्रदीप मिश्र, आशा श्रीवास्तव, कमलेश भट्ट, अनीता भुल्लर, श्रीप्रकाश श्रीवास्तव, परमिंदर जीत, वीरेन्द्र आस्तिक, यतीन्द्रनाथ राही तथा जगन्नाथ त्रिपाठी की कविताएं प्रभावित करती है। विज्ञान भूषण एवं अमरीक सिंह दीप की लघुकथाएं भी उपयोगी हैं। चंद्रशेखर दयानंद पाण्डेय, संजेश जोशी एवं राजेन्द्र राव के आलेखों में विषय की विविधता के साथ समकालीन परिस्थितियों का पर्याप्त ध्यान रखा गया है। पत्रिका का कलेवर, साज सज्जा व विविधतापूर्ण सामग्री प्रभावशाली है।

Thursday, September 22, 2011

साहित्य में ‘अक्सर’

पत्रिका: अक्सर, अंक: जून 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: हेतु भारद्वाज, पृष्ठ: 144, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100 रू.), मेल: aksar.tramasik@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मोबाईल: 0141.2760160, सम्पर्क: -243, त्रिवेणी नगर, गोपालपुरा बाईपास, जयपुर 302018 राजस्थान
हिंदी साहित्यजगत में प्रतिष्ठित इस पत्रिका के प्रत्येक अंक मंे नवीनता होती है। इस अंक में भी सार्थक साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में ख्यात कवि मलय जी की छः कविताएं मन की गहराइयों में उतरकर बहुत कुछ सोचने के लिए प्रेरित करती है। जनोक्ति कवि केदारनाथ अग्रवाल पर रणजीत के आलेख व कवि नंदबाबू की कविताओं पर रामनिहाल गुंजन ने गहरे चिंतन के बाद उत्कृष्ठ लेखन किया है। लक्ष्मण व्यास, मोहम्मद अजहर, लक्ष्मी शर्मा, अरूण कुमार के समीक्षात्मक आलेख सामाजिक व वर्तमान परिवेश के प्रति सचेत रहने का आग्रह करते दिखाई देते हैं। रूपलाल बेदिया की कहानी ‘अपेक्षा’ की अच्छी शुरूआत के पश्चात लगता है कथाकार ने इसे पूर्ण करने में शीघ्रता की जिससे पाठक इसका रसास्वादन करने में बाधा उत्पन्न हुई है। ओम नागर व निशांत की कविताएं सामान्य से विशिष्ठ की ओर ले जाती है। नंद भारद्वाज, विवेक कुमार मिश्रा, सरसेम गुजराल के समीक्षाआलेख अच्छे बन पड़े हैं व प्रभावित करते हैं। साहित्यिक पुरस्कारों को लेकर ख्यात कवि लेखक गोविंद माथुर का आलेख गहन पड़ताल है जिसे अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया गया है। दुर्गाप्रसाद अग्रवाल तथा वरूण कुमार तिवारी द्वारा लिखित पुस्तक समीक्षाएं इन संग्रहों/पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करने में सफल रही है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती हैं। ख्यात प्रगतिवादी लेखक चिंतक स्व. कमला प्रसाद जी पर एकाग्र समीक्षालेख एक पठनीय रचना है।

Sunday, September 18, 2011

समय के साखी का नया अंक

पत्रिका: समय के साखी, अंक: जुलाइ 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: आरती, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 220 रू.), ई मेल: samaysakhi@gmail.com ,वेबसाईट: http://www.samaysakhi.in/ , फोन/मोबाईल: 09713035330, सम्पर्क: बी-308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हॉस्पिटल के पास, भोपाल 03 म.प्र.

समय के साखी पत्रिका का यह अंक मिश्रित रचनाओं का एक अच्छा अंक है। अंक में प्रकाशित रचनाएं प्रत्येक साहित्यिक विधा का अनुमोदन करती है। अंक में राद्यवेन्द्र तिवारी, रश्मि रमानी, ओमप्रकाश अडिग, कुमार विश्वबंधु एवं रवि प्रताप सिंह की कविताएं प्रकशित की गई हैं। अशोक अंजुम का गीत व इन्दिरा दांगी की कहानी विशिष्ठ है। कृष्ण कुमार यादव के आलेख विजेन्द्र की कविता एक अच्छा शोधपरक आलेख है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र समाचार आदि भी जानकारीपरक हैं।

Saturday, September 10, 2011

साहित्य के लिए ‘कथा बिंब’

पत्रिका: कथाबिंब, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मंजुश्री, पृष्ठ: 56, मूल्य: 15रू (वार्षिक: 60रू.), ई मेल: kathabimb@yahoo.com ,वेबसाईट: www.kathabimb.com , फोन/मोबाईल: 25115541, सम्पर्क: ए-10, बसेरा ऑफ दिनक्वांरी रोड़, देवनार मुम्बई 400088

कथाप्रधान इस त्रैमासिकी में समसामयिक विषयों पर एकाग्र कहानियों व लघुकथाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित प्रमुख कहानियांे में उसका फैसला(पुष्पा सक्सेना), मोक्षदायिनी(सुभाष चंद गांगुली), वापसी(उषा भटनागर), टुटपंुजिया(गोविंद उपाध्याय) एवं बंद ताला(मीनाक्षी स्वामी) प्रमुख कहानियां है। संजय जनागल, सुरेंन्द्र गुप्त, पंकज शर्मा एवं सिराज अली की लघुकथाएं भी प्रभावित करती है। राजेन्द्र निशेष, प्रेमप्रकाश चौबे, मधुप्रसाद, किशोर काबरा, नसीम अख्तर, सुदर्शन प्रियदर्शनी की कविताएं, ग़ज़लें समाज के कमजोर वर्ग को साहित्य के माध्यम से अभिव्यक्ति देने का सटीक प्रयास है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार पत्र आदि भी उपयोगी व जानकारीपरक हैं।

Wednesday, August 24, 2011

साहित्य में ‘समर लोक’

पत्रिका: समर लोक, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मेहरून्निसा परवेज, पृष्ठ: 96, मूल्य: 20रू (वार्षिक 100 रू.), मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755.2430210, सम्पर्क: -7/837, शाहपुरा, भोपाल .प्र.
विगत 13 वर्ष से मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित समर लोक का समीक्षित अंक लघुकथा विशेषांक है। पत्रिका के इस अंक में लघुकथा के साथ साथ अन्य कहानियों को भी प्रमुखता से स्थान दिया गया है। अंक में मंटो, खांडेकर, प्रेमचंद, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, माखनलाल चतुर्वेदी, जगदीश चंद्र मिश्र, लक्ष्मीकांत बेनबरूआ, विष्णु प्रभाकर जैसे ख्यात व प्रतिष्ठित कथाकारों के साथ साथ वर्तमान समय मंे लगातार पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे लघुकथा लेखकों को भी समुचित स्थान दिया गया है। इनमें प्रमुख रूप से रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, हसन जमाल, आलोक सातपुते, ईश्वर चंद्र सक्सेना, बलराम, सुरेश शर्मा, हेमंत गुप्ता, पूर्णिमा विलसन, दीपक शर्मा, संतोष सुपेकर, सुदर्शन, हरीश तिवारी, दीपक चैरसिया एवं अनुराग शर्मा प्रमुख हैं। इन सभी लघुकथाओं में कलेवर का ध्यान रखते हुए विषय वस्तु को केन्द्र बनाया गया है लेकिन केन्द्रीय भाव की अनदेखी नहीं की गई है। यह इन प्रायः इन सभी कथाकारों को पढ़कर समझा जा सकता है। अन्य रचनाओं में मनोहर शर्मा, शीला मिश्र, शिवप्रसाद सिंह, अखिलेश शुक्ल, रमेश मनोहरा, हीरालाल नागर, सुदर्शन प्रियदर्शनी तथा शैलजा सक्सेना की कहानियां पठनीय व विचार योग्य हैं। पत्रिका की कविताएं, आलेख, संस्मरण सहित अन्य रचनाएं भी प्रभावित करती हैं।

Friday, August 12, 2011

प्रबुद्ध पाठकों के लिए ‘शुभ तारिका’

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: जुलाई 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 64, मूल्य: 12रू (वार्षिक: 120रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133001 हरियाणा

कहानीलेखन महाविद्यालय अम्बाला से नियमित रूप से प्रकाशित इस पत्रिका में सहेजने योग्य रचनाओं का प्रकाशन किया जाता है। इस अंक मंे भी अनेक जानकारीपरक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। लघुकथाओं में लक्ष्मी रूपल, चंद्र भानु आर्य, किशन लाल शर्मा, संतोष सुपेकर, चेतन आर्य, देशपाल सिंह सेंगर की कहानियां रूचिपरक हैं। प्रेम कुमार, सुरेश चंद शर्मा, दीप पन्धा, उपकार सिंह, मलिक अगवानपुरी तथा नीरजा की कविताएं प्रभावित करती है। लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत रामगोपाल वर्मा के व्यक्तित्व को आकर्षक ढंग से प्रकाश्ािित किया गया है। श्रीकांत व्यास का व्यंग्य तथा अर्पणा चतुर्वेदी की कहानी भी स्तरीय व रूचिकर है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, समाचार आदि भी जानकारीपरक हैं।

Thursday, August 11, 2011

साहित्य का ‘‘एक और अंतरीप’’

पत्रिका: एक ओर अंतरीप, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: प्रेमकृष्ण शर्मा, पृष्ठ: 128, मूल्य: 25रू (वार्षिक: 100 रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09414055811, सम्पर्क: 1, न्यू कालोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर 302006 राजस्थान

साहित्यिक पत्रिका एक और अंतरीप का पुनः प्रकाशन इस अंक के साथ प्रारंभ किया गया है। यह इससे पूर्व लगातार 19 वर्ष तक प्रकाशित होती रही है। समीक्षित अंक में पत्रिका ने भले ही अपेक्षाकृत नए रचनाकारों को चुना हो पर रचनाओं के स्तर से किसी तरह का समझौता नहीं किया है। अंक में वरिष्ठ कवि गोविंद माथुर कुछ चुनी हुई कविताओं पर संपादक अजय अनुरागी ने विस्तृत रूप से विचार किया है। उनकी कविताओं में ‘बचा हुआ पे्रम’, काम से लौटती स्त्रियां’ तथा युवा कवि जैसी कविताएं साहित्य के गंभीर पाठक के साथ साथ नए व गैरहिंदी भाषी पाठक के लिए समान रूप से कविता की समझ विकसित करने में सहायक है। ख्यात पत्रिका अक्सर के संपादक व विख्यात साहित्यकार हेतु भारद्वाज जी से नरेन्द्र इष्टवाल की बातचीत के प्रश्नों के साथ साथ उत्तरों में भी अपना अलग अंदाज व नवीनता है। लेखक और नैतिकता के सवाल पर उनका कहना है कि, ‘लेखक समाज से अलग नागरिक नहीं है कि उसे किसी अलग प्रकार की नैतिकता निभाने की जरूरत न हो।’ नैतिकता से जुड़े इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने विस्तृत रूप से दे कर अपने विचार रखे हैं। कवि शताब्दी पर राम निहाल गंुजन का आलेख संक्षिप्त से ही सही कवियों को उनकी कविता के साथ साथ साहित्य अनुशीलन के लिए भी याद करता है। भवानी सिंह की कहानी पड़ौसी तथा भगवान अटलानी की कहानी कुछ और नहीं में समय के साथ साथ व्यक्तिगत मानवीय चिंतन को भी आधार बनाने का प्रयास किया गया है। लेकिन इससे कहानी की सरसता में किसी प्रकार की रूकावट नहीं आई है यह कहानी प्रेमियों को सुखद लगेगा। विजय तथा पूरन सिंह की कहानी भी स्तरीय व पठनीयता से भरपूर है। राजकुमार कुम्भज, विजय सिंह नाहटा, डाॅ. सत्यनारायण, वसंत जेतली तथा सलीम खां की कविताएं नयी व आधुनिक रूप से जीवन यापन करने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करने की क्षमता से युक्त है। विमर्श के अंतर्गत सभी आलोचनात्मक आलेख प्रभावित करते हैं। डाॅ. त्रिभुवन राय, विनोद शाही, डाॅ. रंजना जायसवाल तथा शिप्रा शर्मा के लेख साहित्य पर भिन्न व व्यापक दृष्टिकोण से विचार करते दिखाई देते हैं। मेरा व्यंग्य ‘एक अच्छी आत्मकथा’ को भी पत्रिका में प्रमुख रूप से स्थान दिया गया है। पाठकों को इसकी विषयवस्तु तथा विचार प्रवाहता अवश्य ही पसंद आएगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं। संपादक प्रेमकृष्ण शर्मा का यह कहना कि, ‘लघु पत्रिका निकालना या साहित्य रचना करना कोई विलासिता नहीं है।’ पत्रिका की मंशा तथा उसकी विचारधारा को संक्षेप में व्यक्त कर देता है। पत्रिका के पुनः प्रकाशन प्रारंभ करने के लिए कथाचक्र परिवार की ओर से हार्दिक बधाई व मंगलकामनाएं।

Wednesday, August 10, 2011

पाठ का 27 वां अंक

पत्रिका: पाठ , अंक: जुलाई-अगस्त वर्ष 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: देवांशु पाल, पृष्ठ: 80, मूल्य: 20 (वार्षिक 100रू.) , ई मेल: उपलब्ध नहीं, वेबसाईट:उपलब्ध नहीं , फोन/मो. , सम्पर्क: गायत्री विहार, विनोबा नगर, बिलासपुर छतीसगढ़

इस लघु पत्रिका का प्रत्येक अंक अच्छी जानकारीपरक रचनाओं से युक्त होता है। इस अंक में रामचंद सरोज की लम्बी कविता एक विशिष्ट रचना कही जा सकती है। संवाद के अंतर्गत विनोद शाही से सरसेम गुजराल की बातचीत में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए विकास को जमीन दिया जाना महत्वपूर्ण माना गया है। आलेखों में रामनिवास गुंजन, अनिता पालीवाल एवं शिवप्रसाद शुक्ल के लेख साहित्य से जुड़े विषयांे पर गहन दृष्टिकोण है। टिप्पणी के अंतर्गत ख्यात लेखक व साहित्यकार अलीक का लेख हम लड़ेगें प्रभावित करता है। बहुत दिनों पश्चात उनकी कोई रचना साहित्यिक पत्रिका में पढ़ने में आयी है। सभी कहानियां भले ही नए विषयों को लेकर न लिखी गई हों पर उनकी मंशा के केन्द्र में वर्तमान समाज की दयनीय दशा को सुधारने का विशिष्ट भाव महसूस किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से विजय व शीतेन्द्र नाथ चौधुरी की कहानियां विचारणीय है। विलास गुप्ते का लेख भविष्य में नाटक की आहट रंगमंच की दुनिया पर तार्किक ढंग से अपना मत रखता है। वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र की डायरी कोहरा कहानी एवं कविता विधा से अलग हटकर लिखने के बारे में विचार कर रहे युवा लेखकों के लिए मार्गदर्शक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व लेख आदि भी प्रभावित करते हैं।

Saturday, August 6, 2011

साहित्यिक पत्रिका कथन

पत्रिका: कथन, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ:98, मूल्य: 25रू(वार्षिक:100रू.), ईमेल: kathanpatrika@hotmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 011.25268341, सम्पर्क: 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063

पत्रिका कथन का वर्तमान अंक साहित्य के भौगोलिक स्वरूप से जुड़ी हुई चिंताओं को सामने लाता है। इस अंक की लगभग प्रत्येक रचना बाजारवाद और भारत में अमरीका की नकल से उपजे कुप्रभावों पर अपना मत व्यक्त करती प्रतीत होती है। ख्यात साहित्यकार चंद्रबलि सिंह पर कथाकार व कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय का संस्मरण लेख ‘‘याद रहेगी वह लाल मुस्कान’’ विचारधारा में विचारों की प्रमुखता स्पष्ट करता है। अंक की कहानियां शाप मुक्ति(कमलकांत त्रिपाठी), अनिकेत(जीवन सिंह ठाकुर) एवं हमारा बचपन(रजनीकांत शर्मा) भारतीय ग्रामीण परिवेश व दूर दराज के कस्बों-गांवों की जीवन शैली को अपने केन्द्र में रखकर पाठकों के सामने लाती है। ज्ञानेन्द्रपति, विजेन्द्र, रामदरश मिश्र, यश मालवीय, नीलोत्पल तथा हरेप्रकाश उपाध्याय जैसे नाम हिंदी कविता में नए नहीं है। हर तिनके की उजास, हम खड़े हैं कटे पेड़ के नीचे, लौट पड़ें, तथा अधूरे प्रेम का अंधेरा जैसी कविताओं की अंतर्रात्मा व भाव विशेष रूप से आकर्षित करता है। ग्रैहम स्विफ्ट की अंग्रेजी कहानी का अनुवाद जितेन्द्र भाटिया ने बहुत ही कुशलता से किया है। इसकी वजह से ही इस कहानी को पढ़ने में मूल कहानी का सा आनंद प्राप्त होता है। प्रसिद्ध कवि हरिओम राजौरिया की कविताओं में लिखना, हार गए, खाते पीते, कहां जाएं में (मंडलोई जी के अनुसार) भाषा की सादगी व वाक्य रचना का पेटर्न प्रभावशाली है। ख्यात कथाकार एवं कथन के पूर्व संपादक रमेश उपाध्याय की कहानी त्रासदी माय फुट में अजय तिवारी ने ‘‘अमरीका का भारत के प्रति दृष्टिकोण’’ केन्द्र में रखकर विचार किया है। ख्यात वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन से पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय की बातचीत वर्तमान खोजी पत्रकारिता व उसके परिणामों पर समसामयिक दृष्टिकोण है। संज्ञा उपाध्याय द्वारा पारदर्शिता से संबंधित प्रश्न के उत्तर में सिद्धार्थ वरदराजन ने कहा है, ‘‘कुछ बातों को छोड़ दें भारत का सूचना कानून एक संतु लित कानून है। लेकिन इसके बारे में सरकार की या सरकारी इरादों की नियत फेरबदल करके इसे निष्प्रभावी बनाने की कोशिश में है। एक सामान्य पाठक के लिए इस प्रश्न के उत्तर में यह समझना कठिन हो जाता है कि जब सूचना का अधिकार संतुलित कानून है तो फिर आखिर क्यों वरदराजन उसमें खामियों को पुरजोर तरीके से सामने ला रहे हैं? उन्हें इस प्रश्न का उत्तर अधिक विस्तार से देते हुए अपनी बात स्पष्ट करना चाहिए थी। इस आधे अधूरे उत्तर से कथन का पाठक शायद ही संतुष्ट हो सके? मुकुल शर्मा, संतोष चौबे ने साहित्येत्तर विषयों पर लिखे लेख किसी नए विचार अथवा दृष्टिकोण को सामने नहीं लाते हैं। लेकिन फिर भी इनमें सरसता के कारण पाठक के लिए ग्राहय हैं। जवरीमल्ल पारख, उत्पल कुमार के स्तंभ की सामग्री हमेशा की तरह रूचिकर है। अंक की अन्य पाठ्य सामग्री जानकारीपरक तथा ज्ञानवर्धक है।

Friday, August 5, 2011

साहित्यप्रेमियों के लिए ‘हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका: हिंदुस्तानी जबान, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सुशीला गुप्ता, पृष्ठ: 64, मूल्य: 10रू.(वार्षिक 120 रू.), ई मेल: hp.sabha@hotmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 22812871, सम्पर्क: महात्मा गांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महात्मा गांधी बिल्ंिडग, 7, नेताजी सुभाष रोड़ मुम्बई 400.002

हिंदी व उर्दू जबान में विगत 43 वर्ष से निरंतर प्रकाशित इस पत्रिका का प्रत्येक अंक गांधीवादी साहित्य के साथ साथ आम पाठकों को हिंदी से जुडे विभिन्न विषयों पर जानकारीपरक लेख उपलब्ध कराता है। समीक्षित अंक में गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पर एकाग्र आलेख पत्रिका की विशेष उपलब्धि है। इंद्रनाथ चौधरी तथा रणजी त सिंह साहा ने उनके समग्र व्यक्तित्व पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इसके अतिरिक्त भारतीय साहित्य की अवधारणा(डॉ. नरहरि प्रसाद दुबे), सर्वहारा वर्ग के समर्थकःकेदारनाथ अग्रवाल(डॉ. अमर सिंह वधान), राही की शायरी(राजेन्द्र वर्मा) एवं सूफी कविता और भारतीय विचारधारा(रजनीथ एम) शोधार्थियों के साथ साथ आम साहित्यप्रेमियों के लिए विशिष्ट महत्व के हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, पुस्तक समीक्षाएं तथा पत्र-समाचार आदि स्तरीय हैं। पत्रिका का उर्दू खण्ड भी अच्छी पठनीय सामग्री उपलब्ध करा रहा है।

Sunday, July 31, 2011

पत्रिका हिमप्रस्थ का जून 2011 अंक

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: जून 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 6 रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: , ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी शिमला 5

विगत 57 वर्ष से केवल 5 रू कीमत पर उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध करवाना हर किसी के वश की बात नहीं है। लेकिन इस पत्रिका ने यह साबित किया है कि इस महंगाई के समय में भी अच्छा साहित्य कम कीमत पर प्रकाशित किया जा सकता है। पत्रिका के इस अंक में गौतम शर्मा, लीला भण्डारी, श्रीनिवास, रामनारायण सिंह मधुर, विजय कुमार पुरी, विश्म्भर लाल सूद, आर.के. शुक्ला, विवेक निझावन तथा सुशील कुमार फुल्ल के उपयोगी व जानकारीपरक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। भानुप्रताप कुठियाला, संदीप शर्मा एवं शंकर सुल्तानपुरी की कहानियांे में हिमाचल के जनजीवन को महसूस किया जा सकता है। जसविंदर शर्मा की लघुकथाएं अधिक प्रभावित करती हैं। सुरेश आनंद, मीना गुप्ता, दिनेश चमोला, रमेश सोबती तथा सुमन बाला की कविताओं में आज के समाज का परिवर्तित रूप दिखाई देता है। विजय तेलंग का व्यंग्य व श्रीकांत की पुस्तक समीक्षा अच्छी है व पाठकों को एक नये संग्रह से परिचित कराती है।

Saturday, July 30, 2011

साहित्य के साथ ‘‘भाषा स्पंदन’’

पत्रिका: भाषा स्पंदन, अंक: 24, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डॉ. सरगुकृष्णमूर्ति, डॉ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100), ई मेल: karnatakahindiacademy@yahoo.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09886241853, सम्पर्क: कर्नाटक हिंदी अकादमी, 853 आठवां क्रास, 8वां ब्लाक, कोरमंगला, बेंगलूरू, कर्नाटक 560.095

हिंदी साहित्य के साथ साथ भाषा के विकास के लिए कर्नाटक से प्रकाशित यह पत्रिका निरंतर प्रयत्नशील है। पत्रिका के प्रत्येक अंक में नवीनतम जानकारी तथा सामग्री का प्रकाशन लगातार किया जा रहा है। इस अंक में प्रकाशित लेखों में मोहन भारतीय, रवि शर्मा, रामफेर त्रिपाठी, प्रो. आशा कपूर, राजेन्द्र परदेसी, नारायण सिंह, सुरेश उजाला, डॉ. आकांक्षा यादव एवं नितिन वाजपेयी के लेख प्रमुख हैं। मनीष कुमार सिंह की कहानी बड़ी कोठी के बाशिंदें नये परिवेश के अंतर्गत बुनी गई एक विस्तृत कथानक की कहानी है। अक्षत गोजा, महेन्द्र अग्रवाल, ओम नागर, रा.सा.ला. शर्मा, कृष्ण कुमार यादव, खुर्शीद नवाब, जयंत थोरात, जुबेदा अनवर, सुरेश उजाला एवं दिनेश त्रिपाठी की कविताएं उल्लेखनीय है। अखिलेश शुक्ल का व्यंग्य ‘‘हारे को हरिनाम है’’ वर्तमान संदर्भ मंे एक सटीक व्यंग्य है। पत्रिका में प्रकाशित प्रतिक्रियाएं, संपादकीय आदि भी अच्छे व जानकारीपरक हैं।

साहित्यिक पत्रिका शुभ तारिका का हिमांक विशेषांक

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: अर्प्रैल011, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 38, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी नहीं, मूल्य: 12रू.(वार्षिक 120), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालानी अंबाला छावनी 133001 हरियाणा

पत्रिका का समीक्षित अंक हिंमांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक को हिमाचल अंक भी कहा गया है। इस अंक में अनंत आलोक, आशा शैली, प्रतीक्षा भाटिया, धर्मपाल साहिल, अनिल कुमार जैन, मृदुला हालन, कमलेश ठाकुर, गीता जैन, वीरेन्द्र गोयल, मुहम्मद सुलेमान, सीताराम त्रिपाठी, उत्तम चंद्र शर्मा, चिन्मय सागर, रमेश प्रसून, प्रमीला गुप्ता एवं अशोक दर्द के आलेखों का प्रकाशन किया गया है। प्रायः सभी आलेखों में हिमाचल की संस्कृति, रहन सहन, खान पान आदि का विस्तृत रोचक विवरण प्रस्तुत किया गया है। सुदर्शन ठाकुर का संस्मरण तथा उषा मेहता एवं देवचंद्र मस्ताना की लोककथाएं पढ़ने में आनंदित करती हैं। पंकज बटु एवं विनोद धब्याल की कहानियां वहां की संस्कृति व जीवन शैली को कथानक के माध्यम से सामने लाती है। राजेन्द्र मानव, लेखराम शर्मा, एवं गंगाराम राजी की लघुकथाओं में एक अच्छी कथा के समान पैनापन है। प्रकाशित कविताओं में रामगोपाल शर्मा, शेर सिंह मेरूपा, दीनदयाल वर्मा, रत्नचंद्र निर्झर, नलिनी विभा, उदयभानु हंस, तेजराम शर्मा, कपिल बाली वाले, टी.सी. सावन एवं अरूण कुमार शर्मा की कविताएं अच्छी व पठनीयता से भरपूर हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व संपादकीय भी प्रभावित करते हैं।

Thursday, July 28, 2011

वर्तमान साहित्य की साक्षी -- पत्रिका ‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: जुलार्ह 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 96, मूल्य: 20रू(वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakihi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनीशियेटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएड़ा 201303 उ.प्र.

पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक पूर्व के अंकों के समान कहानियों व अन्य विधा की रचनाओं से भरपूर है। अंक में प्रकाशित कहानियों में स्वप्नजीवी(वल्लभ डोभाल), कच्चे आम की महक(संजय कुमार कुंदन), अतरघट(राजकमल), बंद मुट्ठी(स्वाति तिवारी), बेटी बेचवा(जयश्री राय) एवं सात फेरों की शरण में(आद्या प्रसाद पाण्डेय) प्रमुख हैं। जयश्री राय एवं स्वाति तिवारी को छोड़कर अन्य रचनाकारों की कहानियों में यह पढ़कर बड़ा अजीब सा लगता है कि आखिर क्यों कहानियों को आजकल वर्तमान समाज का विश्लेषण करने की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है? पत्रिका की कविताएं कहानियों की अपेक्षा अधिक असरदार है। नीलाभ, पूनम सिंह, चंद्रसेन यादव, अश्वघोष एवं संजय सुमन की कविताएं सिद्ध करती हैं कि कविता केवल कविता न होकर सामाजिक परिवर्तन का विशिष्ठ माध्यम है। पत्रिका के इस अंक में अरसे बाद एक अच्छी ग़ज़ल पढ़ने में आयी है जिसे प्रेमरंजन अनिमेष ने लिखा है, यह ग़ज़ल इस विधा के पैरामीटर पर भी काफी हद तक ठीक है। राजकुमार एवं वीरेन नंदा के लेख ठीक ठाक कहे जा सकते हैं। प्रसन्ना, राजीव रंजन गिरि, विनोद अनुपम के स्तंभ की सामग्री में भी नयापन है। कथाकार अखिलेश का स्मरण लो वह दिखाई पड़े हुसैन पत्रिका की उपलब्धि कही जा सकती है। अजीत कुमार एवं राजेन्द्र रावत की लघुकथाएं भी प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी स्तरीय हैं।

Wednesday, July 27, 2011

हिंदी साहित्य के ‘निकट’

पत्रिका: निकट, अंक: नवम्बर, अंक 4, स्वरूप: अर्द्धवार्षिक, संपादक: कृष्ण बिहारी, पृष्ठ: 84, मूल्य: 50रू (वार्षिक 100 रू.), ई मेल: krishnatbihari@yahoo.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 00971505429756, सम्पर्क: P.O. Box No. 52088, Abudhabi, UAE

संयुक्त अरब अमीरात से प्रकाशित पत्रिका निकट केवल 4 वर्ष में ही देश की प्रमुख साहित्य पत्रिकाओं की श्रेणी में शामिल हो गई है। पत्रिका का समीक्षित अंक महिला विशेषांक है। पत्रिका का संपादक मंडल तथा विश्व में ब्यूरों प्रमुख जाने माने लेखक व साहित्यकार हैं, इससे पत्रिका की गंभीरता व उसकी स्वीकार्यता का पता चलता है। ख्यात लेखिका नासिरा शर्मा से अमरीक सिंह दीप की बातचीत साहित्य के साथ साथ वर्तमान साहित्यिक रूझान की ओर भी संकेत करती है। उन्होंने लेखन की विचारधारा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में स्पष्ट किया है, ‘‘लेखक के नजरिए से मैंने धर्म और विचारधाराओं को समझने की कोशिश जरूरत के अनुसार की है। मगन इनसे प्रभावित होकर लेखन कभी नहीं किया है।’’ यह बात नासिरा जी जैसी कथाकार ही कह सकती हैं, अन्यथा लेखक तो बातों को शब्दजाल में लपेटकर बात को गोलमोल कर जाते हैं। पत्रिका की एक नहीं सभी कहानियां विशिष्ठ हैं। उनमंें समाज की बुनावट को समझने की चेष्टा के साथ साथ आधुनिक परिवेश को भारतीय संदर्भ में व्यक्त करने का सफल प्रयास महिला विषयक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए दिखाई देता है। जया जदवानी, रजनी गुप्त, गीताश्री, इला प्रसाद, विजय शर्मा, सुधा ओम ढीगरा, उषा राय एवं अर्चना पून्थूली जैसे रचनाकारों के नाम नए नहीं है। लता शर्मा व राजवंश राय की लघुकथाएं लघु होते हुए भी विस्तृत केनवास को नेपथ्य में समेटती है। अंजना संधीर, रचना श्रीवास्तव, जोराम आनिया ताना, सुशीला पुरी, रेखा मैत्रा एवं प्रज्ञा पाण्डेय की कविताओं में भी भारतीय समाज के कल्याण का भाव दिखाई देता है। आकांक्षा पारे व बलवंत कौर के लेख स्तरीय व पठनीय हैं। पत्रिका का कलेवर व साज सज्जा प्रभावित करती है।

Tuesday, July 26, 2011

साहित्य परिक्रमा का गुजराती साहित्य विशेषांक

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जुलाई-सितम्बर 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 128, मूल्य: 15रू (द्वैवार्षिक 100 रू.), ई मेल: shridhargovind@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 09425407471, सम्पर्क: राष्ट्रोस्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर म.प्र.

प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका साहित्य परिक्रमा का समीक्षित अंक 46 वां अंक है। इसे गुजराती साहित्य विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक में गुजराती साहित्य की रचनाओं को अच्छे व पठनीय अनुवाद के साथ देवनागरी लिपि में प्रकाशित किया गया है। अंक का संयोजन व प्रस्तुतिकरण आकर्षित करता है। अंक में भक्ति साहित्य में गुजरात के योगदान पर विशेष सामग्री का प्रकाशन किया गया है। नरसिंह मेहता, गंगासती दयाराम, भ्वन शंकर एवं भवन दुला काम की रचनाएं प्रासंगिक हैं व पत्रिका की उपयोगिता पर विचार स्पष्ट करती है। झवेरचंद मेधानी, जयंत पाठक, झीणाभाई देसाई, उमाशंकर जोशी, राजेन्द्र शाह, मनोज खंडेरिया, माधव रामानुज, चिनु मोदी, निरंजन भगत रावजी पटेल, जगदीश जोशी, राजेन्द्र शुक्ल, पन्ना नायक, महेन्द्र सिंह जडेजा की कविताओं के अनुवाद सटीक व पठनीयता से भरपूर हैं। इनके अनुवाद क्रांति कनाटे तथा पारूल मशर द्वारा किए गए हैं। मीनाक्षी चंदाराणा, पारूल मशर, वंदना शांतुइंदु एवं निर्झरी मेहता ने स्वयं अनुवाद कर कविता की मूल भावना को हिंदी में ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने में शतप्रतिशत सफलता हासिल की है। सितांशु यशचंद्र की कविता ‘‘यों मुस्कुराते रहो’’ का मूल भाव पाठक के मन को असीम शांति प्रदान करता है। हसिल बूच, चंद्रकांत बक्षी, माय डियर जयु, इला आरब मेहता, हिमांशी शैलत, अश्विन चंद्रराणा की अच्छी कहानियां चुनकर उनके अनुवाद को सरसता प्रदान करने में संपादक को सफलता हासिल हुई है। सामान्यतः अनुवाद प्रायः दुरूह व भारी भरकम हो जाते हैं लेकिन इस पत्रिका में प्रायः सभी अनुवाद भाषा एवं भाव दोनों स्तर पर पाठकों को बांधे रखने में सफल कहे जा सकते हैं। सुरेश जोशी, गुणवंत शाह व शिरीष पांचाल के अनुवाद को यदि अनुवाद न लिखा जाता यह रचनाएं हिंदी की रचनाएं ही समझ में आती है जिससे इनके अनुवाद के कुशल स्तर का पता चलता है। अन्य लेखों में चिनु मोदी, लव कुमार देसाई, शिवदान गढ़वी, मीनाक्षी एवं अश्विन चंद्रराणा, बलवंत जानी, बंसीधर के लेख विशिष्ठ कहे जा सकते हैं। मनुभाई पंचोली व दिनकर जोशी के उपन्यास अंश के साथ साथ भगवत कुमार शर्मा की आत्मकथा एवं वंदना शांतुइंदु, निर्झरी मेहता की रचनाएं पत्रिका के भारतीय भाषा एंव साहित्य की अनूठी पत्रिका का दर्जा प्रदान करती है। संपादकीय ‘आंख का पानी’ इस अंक के संबधं में पाठकों को रचनाएं पढ़ने से पूर्व ही बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है। अच्छा व सहेजने योग्य अंक प्रकाशित करने के लिए अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास बधाई का पात्र है।

साक्षात्कार का नया अंक

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: मई 2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 122, मूल्य: 25रू (वार्षिक 200 रू.), ई मेल: sahityaacademy@gmail.com ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 0755ण्2554782, सम्पर्क: साहित्य अकादमी म.प्र. संस्कृति परिषद, वाण गंगा, भोपाल म.प्र.

म.प्र. से प्रकाशित वर्षो पुरानी यह पत्रिका अब नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है। अंक में ख्यात साहित्य मर्मज्ञ डॉ. प्रेम भारती से कमला प्रसाद चौरसिया की बातचीत विशिष्ठ है। सच्चे साहित्य को लेकर भारती जी का कहना है कि जो मूल्यों के क्षरण को रोके वही सच्चा साहित्य है। यह कथन वर्तमान संदर्भ में पूर्णतः सत्य है। अंक में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में भाषा के विकास में जन और अभिजन की भूमिका(श्याम सुंदर घोष), मेरे स्त्री पात्रों का संसार(सूर्यबाला), सप्तसूत्रीय समीक्षा के सूत्रधारःडॉ. नंददुलारे वाजपेयी(योगेन्द्र नाथ शर्मा) एवं तेलुगु साहित्य पर अरविंद का प्रभाव(एस. शेषारत्नम्) के साथ साथ उदय प्रताप सिंह व डॉ. श्रीराम परिहार के आलेख संग्रह योग्य हैं। डॉ. नीरजा माधव, ओम प्रभाकर, कुंअर सिंह टण्डन एवं अंजनी शर्मा की कविताएं बाजारीकरण के विरूद्ध आम आदमी की झटपटाहट व्यक्त करती है। मृदुला सिन्हा की कहानी मुआवजा तथा मंगला जोशी की कहानी साधु और सरपंच में कथानक भले ही प्राचीन हो पर इन कहानियों में प्रस्तुतिकरण में नवीनता है। पत्रिका का संपादकीय शिक्षा विद्या और साहित्य विद्या अद्वितीय व सहेजकर रखने योग्य है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं। पत्रिका अंक दर अंक निखरती जा रही है यह साहित्य के पाठकों के लिए संतोष का विषय है।

Sunday, July 24, 2011

मॉरिशस के विश्व हिंदी समाचार

पत्रिका: विश्व हिंदी समाचार, अंक: मार्च 2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: गंगाधर सिंह सुखलाल, पृष्ठ: 20, मूल्य: प्रकाशित नहीं, ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 230.6761196,

मॉरिशस से प्रकाशित इस पत्रिका में दुनिया भर के साहित्यिक समाचार प्रकाशित किए जाते हैं। इस अंक में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर संदेश का प्रकाशन किया गया है। इसी अवसर पर मॉरिशस गणराज्य के महामहिम सर अनिरूद्ध जगन्नाथ के विचार भी महत्वपूर्ण हैं। इस पुनीत अवसर पर विश्व हिंदी पत्रिका 2010 का भी लोकापर्ण किया गया। इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय हिंदी प्रतियोगिता का आयोजन किए जाने का समाचार भी सुंद ढंग से प्रकाशित किया गया हैै। पत्रिका के माध्यम से यह जानकर सुखद लगता है कि दुनिया भर में इस दिवस को धूमधाम से मनाया जाता है। पत्रिका के पृष्ठ 4 एवं 5 पर दोहा, न्यूयार्क, बेइजिंग, कैरो, देहरादून, ओमान, कुबैत, सूरीनाम तथा नोएडा में इस दिवस को मनाने का समाचार आकर्षक प्रस्तुति है। विश्व हिंदी सचिवालय की तीसरी वर्षगांठ का समाचार इस संस्था के कियाकलापों के संबंध में बहुत कुछ स्पष्ठ करता है। सचिवालय द्वारा इस अवसर पर दो दिवसीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 11 एवं 12 फरवरी कोे किया गया। आयोजन का विस्तृत समाचार गोष्ठी की सफलता के संबंध में जानकारी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त सूचना प्रोद्योगिकी में हिंदी की बढ़त, मॉरिशस में हिंदी बाल चित्र समारोह, संस्था कथ यूके सम्मानित, अंतर्राष्ट्रीय पुश्किन सम्मान कवि आलोक श्रीवास्तव को मिला समाचार भी पत्रिका को जानकारी परक व ज्ञानवर्धक बनाते हैं। पत्रिका के संपादक गंगाधर सिंह सुखलाल का कथन, ‘हिंदी कौन बोलता है? इस छोटे से प्रश्न में हिंदी के वैश्विक रूप के उद्घाटन की कुंजी निहित है।’ संपादकीय का केन्द्रीय बिंदु है जिसपर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। पत्रिका का कलेवर, साज सज्जा व आकर्षक प्रस्तुति प्रभावित करती है।

अनूठी साहित्यिक पत्रिका व्यंग्य यात्रा

पत्रिका: व्यंग्य यात्रा, अंक: जून2011, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: प्रेम जनमेजय, पृष्ठ: 112, मूल्य: 20रू (वार्षिक: 80 रू.), ई मेल: ,वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 011.25264227, सम्पर्क: 73, साक्षर अपार्टमेंट, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110.063

व्यंग्य विधा पर एकाग्र साहित्य की इस पत्रिका का प्रत्येक अंक किसी न किसी व्यंग्यकार पर आंशिक रूप से एकाग्र होता है। समीक्षित अंक भी श्रेष्ठ व्यंग्यकार हरीश नवल पर एकाग्र है। अंक में उनके समग्र व्यक्तित्व पर त्रिकोणीय के अंतर्गत अच्छे व सारगर्भित लेखों का प्रकाशन किया गया हैै। पत्रिका के संपादक प्रेम जनमेजय ने उनके विशिष्ठ अंदाज को अपने लेखन का आधार बनाया है। इस लेख में उनके समूचे लेखन को संक्षेप में समेटने का प्रयास किया गया है। सुभाष चंदर एवं नरेन्द्र मोहन के आलेख के नवल जी पर एकाग्र संस्मरणात्मक आलेख अच्छे हैं व प्रभावित करते हैं। मधुसूदन पाटिल व सविता राणा ने भी अपने अपने आलेखों में नवल जी के व्यक्तित्व के अनछुए पहलूओं पर विचार किया है। पाथेय के अंतर्गत मराठी की चुनी हुई श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं का प्रकाशन किया गया हैै। श्रीपाद कृष्ण कोल्हटकर, रामगणेश गडकरी एवं पु.ल. देशपाण्डे की रचनाएं व्यंग्य की अंतर्रात्मा के साथ भलीभांति न्याय कर सकी हैं। मराठी व्यंग्य पर उषा दामोदर कुलकर्णी, मीरा वाडे एवं श्याम सुुंदुर घोष के लेख सहेज कर रखने योग्य हैें। व्यंग्य रचनाओं में प्रदीप पंत, सुशील सिद्धार्थ, समीर लाल समीर, सुधीर ओखडे, उमा बंसल एवं लाल्यित ललित के व्यंग्य सटीक कहे जा सकते हैं। नरेश सांडिल्य, नवल जायसवाल, विश्वनाथ एवं उपेंद्र कुमार की व्यंग्य कविताएं भले ही नागार्जुन के व्यंग्य स्तर को न स्पर्श कर सकीं हो पर अपनी छाप छोड़ने मेें बहुत हद तक सफल कही जा सकती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व आलेख भी स्तरीय हैं जिनमें साहित्य के विशुद्ध पाठक के लिए काफी कुछ है।

Friday, July 22, 2011

आपके ‘आसपास’

पत्रिका: आसपास, अंक: जुलाई2011, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 22, मूल्य: 5रू (वार्षिक 50 रू.), ई मेल: ,वेबसाईट http://www.dharohar.com/ , फोन/मोबाईल: 0755ण्2775129, सम्पर्क: एच.3, उद्ववदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.

समाचार प्रधान पत्रिका के इस अंक में विविधतापूर्ण समाचारों का प्रकाशन किया गया है। अंक में शताब्दी वर्ष के अंतर्गत हिंदी के ख्यात कवि बाबा नागार्जुन पर उषा किरण द्वारा लिखित जानकारीपरक आलेख प्रकाशित किया गया है। राष्ट्रकवि दादा माखनलाल चतुर्वेदी जी पर रेनू तिवारी का आलेख एवं ममता तिवारी के कविता संग्रह पर चर्चा अच्छी जानकारी है। माधवराव सपे्र संग्रहालय से संबंधित जानकारी प्रदेश स्तर पर संग्रहालयों की उपयोगिता व उनकी स्थापना के उद्देश्यों पर प्रकाश डालती है। अन्य स्थायी स्तंभ सम्मान/पुरस्कार, हलचल, लोकापर्ण/प्रकाशन आदि भी साहित्यकारों से संबंधित जानकारी सहज ही प्रदान करते हैं।