Sunday, November 28, 2010

अरे! मैं तो अप्रवासी था(संपादकीय)-‘वागर्थ’

पत्रिका: वागर्थ, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 120, मूल्य:20रू.(वार्षिक 200रू.), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 033.32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता
पत्रिका का समीक्षित अंक इसके पूर्ववर्ती अंकों के समान संग्रह योग्य है। अंक में वर्ष 2010 में साहित्य के नोबल पुरस्कार पर ख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी जी का लेख काफी कुछ कहता है। नद दुलारे वाजपेयी जी का सामाजिक सदभाव व समरसता पर लेख तथा मकबूल फिदा हुसैन से सीमा चैधुरी की बातचीत इस समरसता पर विस्तार से विचार करती है। स्त्री की आवाज के अंतर्गत चंद्र किरण सौनेरेक्सा का लेख काफी मायने रखता है। ख्यात कथाकार उदयप्रकाश, स्वप्निल श्रीवास्तव, शोभा सिंह व प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताएं समाज में व्यापप्त असमानताओं पर विचार लोगों को एक दूसरे के करीब लाने में तत्पर दिखाई देती हैं। दोनों कहानियां(बनियान-उमेश अग्निहोत्री, रणनीति-प्रमोद कुमार अग्रवाल) भी समाज व समाजिकता के लिए प्रयासरत हैं। राम मेश्राम की ग़ज़लें तथा अनुभूति के अंतर्गत विजयदेव नारायण शाही(प्रस्तुति-कमल किशोर गोयनका) पत्रिका की अनोखी तथा संग्रह योग्य प्रस्तुति है। आलोचना पसंद करने वाले पाठकों के लिए प्रो. मैनेज र पाण्डेय का लेख हिंदी आलोचना और मुक्ति का सवाल एक पठनीय व मनन योग्य लेख है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं, पत्र आदि भी स्तरीय हैं। हमेशा की तरह संपादकीय एक गंभीर चिंतन मनन योग्य लेख की तरह है।

Saturday, November 27, 2010

प्रगति वार्ता का नया अंक

पत्रिका: प्रगति वार्ता, अंक: 55-वर्ष 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: डाॅ. रामजन्म मिश्र, सच्चिदानंद, पृष्ठ: 48, मूल्य:20रू.(वार्षिक 240रू.), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 06436.222467, सम्पर्क: प्रगति भवन चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज 816100 झारखण्ड
पत्रिका के समीक्षित अंक में डाॅ. मोहनानंद मिश्र व डाॅ. हरपाल सिंह के आलेख साहित्य व संस्कृति का अच्छा लेखा जोखा प्रस्तुत करते हैं। दिवाकर पाण्डेय, रेखा चतुर्वेदी, किशनलाल शर्मा तथा ज्ञानदेव मुकेश की कहानियां प्रभावित करती हैं। डाॅ. रामजन्म मिश्र का संस्मरण तथा मोहन द्विवेदी, अंकुश्री की कविताएं अच्छी हैं। जयकांत सिंह व अनीता रश्मि के आलेख भी उल्लेखनीय हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी ठीक ठाक हैं।

Thursday, November 25, 2010

मृत्युशास्त्र ही पढ़ने योग्य है(संपादकीय)-‘साहित्य सागर’

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य:20रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
साहित्य सागर का समीक्षित अंक ख्यात रचनाकर्मी राजेन्द्र मिलन पर एकाग्र है। अंक मंे प्रकाशित अन्य रचनाओं में ब्रजबिहारी निगम, रमेश सोबती, माधवशरण द्विवेदी, पशुपति नाथ उपाध्याय, श्रीमती भारती राउत व नर्मदा प्रसाद त्रिपाठी की रचनाएं व आलेख प्रभावित करते हैं। सनातन कुमार वाजपेयी, आचार्य भगवत दुबे, जयसिंह आर्य, रामसहाय बरैया, चन्द्रसेन विराट, दामोदर शर्मा, मनोज जैन मधुर, कमला सक्सेना, गिरिमोहन गुरू एवं पे्रमलता नीलम की कविताएं आज के वातावरण को सटीक अभिव्यक्ति प्रदान करती है। पुष्पारानी गर्ग व प्रभात दुबे की लघुकथाएं भी स्तरीय व पठनीय हैं। डाॅ. राजेन्द्र मिलन पर प्रो. शरदनारायण खरे का लेख व उनके लेखन पर विभिन्न अभिमत अच्छी जानकारी प्रदान करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी समयानुकूल व उपयोगी हैं।

Tuesday, November 23, 2010

कथाबिंब का नया अंक

पत्रिका: कथा बिंब, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, सम्पादक: माधव सक्सेना अरविंद, मंजुश्री, पृष्ठ: 52, मूल्य:15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: kathabimb@yahoo.com , वेबसाईट: http://www.kathabimb.com/ , फोन/मो. 25515541, सम्पर्क: ए-10, बसेरा आॅॅफ दिन क्वारी रोड़, देवनार मुम्बई 400088
कथाप्रधान त्रैमासिकी कथाबिंब के समीक्षित अंक मंे अच्छी व पठनीय कहानियों का प्रकाशन किया गय हैै। इनमें प्रमुख हैं - फंदा क्यो?(डाॅ. सुधा ओम ढीगरा), पिताजी चिंता न करे(चंद्रमोहन प्रधान), चूल्हे की रोटी(सुरेन्द्र अंचल), सइयां निकस गए(डाॅ. वासुदेव) एवं सरहद के पार(डाॅ. संदीप अवस्थी)। पत्रिका की सबसे अच्छी रचना डाॅ. सुधा ओम ढीगरा की कहानी ‘फंदा क्यो?’ है। कहानी का कथानक बहुत ही मार्मिक है व पाठक को मन की गहराइयों तक आंदोलित करता है। दिनेश पाठक शशि, जसविंदर शर्मा, विकास रोहिल्ला, की लघुकथाएं उल्लेखनीय हैं। डाॅ. भावना शेखर, राही शंकर व उमाश्री की कविताएं आज के संदर्भो से भलीभांति जुड़ी हुई प्रतीत होती है। अन्य कविताएं, ग़ज़लें आदि केवल खानापूर्ति लगती है। ख्यात व्यंग्यकार एवं व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय से सुश्री मधुप्रकाश की बातचीत अच्छी व समसामयिक होने के साथ साथ आज के साहित्यिक वातावरण की गहन पड़ताल करती है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं आदि भी पढ़ने योग्य हैं।

Monday, November 22, 2010

बस अब और कुछ नहीं-‘केवल सच’

पत्रिका: केवल सच, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: ब्रजेश मिश्र, पृष्ठ: 62, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: , वेबसाईट: http://www.kewalsach.com/ , फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: पूर्वी अशोक नगर, रोड़ नं. 14, कंकड़बाग, पटना 800020 बिहार
पत्रिका केवल सच बिहार की राजधानी पटना से विगत पांच वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रही है। समीक्षित अंक पत्रिका का संपादकीय संग्रह अंक है। पत्रिका नेे विगत पांच वर्ष में जो भी संपादकीय प्रकाशित किए हैं उन्हें पुनः प्रकाशित किया गया है। इनमें से प्रमुख है- बस एक और आंदोलन, हावी होती पश्चिमी सभ्यता, क्या हम आजाद हैं?, कौन है अपना और पराया, राजनीतिक उल्लू, झूठ बोल कौवा काटे, राम बड़े या रावण, न्यायालय और बढ़ता अपराध, दिल है कि मानता नहीं, अब और नहीं, जागते रहो जैसे उच्च कोटि के विचार योग्य संपादकीय का पुनः प्रकाशन पत्रिका का स्वर व उसकी दिशा की जानकारी देता है।

Sunday, November 21, 2010

क्या साहित्य बचेगा?-‘समावर्तन’

पत्रिका: समावर्तन, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, समग्र संपादक: रमेश दवे, सम्पादक: मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ: 102, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य जगत के शीर्ष पर स्थापित हो चुकी इस पत्रिका ने अपने अथक परिश्रम से पाठकों को साहित् य सुलभ कराया है। समीक्षित अंक आंशिक रूप से ख्यात कवि केदार नाथ सिंह पर एकाग्र है। पत्रिका के संपादक रमेश दवे से उनकी बातचीत साहित्य के कुछ अनसुझे प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास करती हैे। केदार नाथ सिंह जी का आलेख ‘क्या साहित्य बचेगा?’ व उनकी बेटी संध्या सिंह का लेख मेरे बाजी संगह योग्य जानकारी उपलब्ध कराते हैं। डाॅ. नामवर सिंह, दूधनाथ सिंह व अरूण कमल के लेख भी उनकी कविताओं के साथ साथ उनके समग्र व्यक्तित्व पर भलीभांति प्रकाश डाल सके हैं। ‘मैं जिद्दी ढंग का आशावदी हूं’ साक्षात्कार प्रत्येक नवलेखक के लिए पठनीय है। पत्रिका की व्यंग्य केन्द्रित भाग के अंतर्गत ख्यात व प्रतिष्ठित व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी पर अच्दी सामग्री संजोयी गई हैै। व्योमेश शुक्ल, अरूण शीतांश, पवन जैन की कविताएं आज के संदर्भो से जुड़कर नया कुछ कर सकने के लिए प्रयासरत दिखाई देती है। पत्रिका की एकमात्र कहानी ‘सप्तश्रंृगी(सतीश दुबे) एक अच्छी व पठनीय कहानी है। इस बार का रंगशीर्ष सिरेमिक को विभिन्न रूपों में ढालकर दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देने वाली युवा कलाकार शम्पा शाह पर एकाग्र है। राजुला शाह, दीपाली दरोज व नवीन सागर, अनंत गंगोला, मुदिता भण्डारी उनके व्यक्तित्व की विशेषताएं बहुत अच्छी तरह से पाठकों के सामने लाते हैं। राग तेलंग, सुशील त्रिवेदी व विनय उपाध्याय के स्तंभ हमेशा की तरह पत्रिका की उपयोगिता बनाए रखने में सहायक रहे हैं।

Saturday, November 20, 2010

डूब जाने के विरूद्ध(संपादकीय)-‘कथन’

पत्रिका: कथन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संस्थापक संपादक: रमेश पाध्याय, सम्पादक: संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ: 98, मूल्य:25रू.(वार्षिक 100रू.), ई मेल mailto:kathanpatrika@hotmail.comtmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25768341, सम्पर्क: 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार नयी दिल्ली 110068
कथा प्रधान त्रैमासिकी कथन अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान पठनीय रचनाओं से युक्त है। अंक में प्रकाशित कहानियां आम आदमी को समस्याओं के दलदल से निकालकर विकास की मुख्य धारा में लाने की छटपटाहट लिए हुए है। किस्सा अनजाने द्वीप का(जोसे सारामागो, अनु. जितेन्द्र भाटिया), बाजार में बगीचा(सी. भास्कर राव), झूठ(महेश दर्पण), दूसरा जीवन(प्रभात रंजन) तथा दीनबंधु बाबू का मकान(रूपलाल बेदिया) कहानियों में उपरोक्त कथन की सत्यता परखी जा सकती है। ऋतुराज, लीलाधर मंडलोई, लाल्टू तथा प्रदीप जिलवाने की कविताओं में बाज़ारवाद के दुष्परिणामों से जन साधारण के अप्रभावित रहने का आग्रह है। इसे लीलाधर मंडलोई की ‘अपराध का धंधा’ तथा ‘रिश्तों की नमी’ कविताओं से अच्छी तरह से जाना जा सकता है। लगभग यही स्वर प्रदीप जिलवाने की कविता ‘आभास’ में भी दिखाई देता है। वरिष्ठ कवि राजेश जोशी महेश चंद्र पुनेठा की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए उन्हीं दुष्परिणामों से सचेत रहने का आग्रह करते हैं जो हमारी संस्कृति में बाजारवाद से प्रविष्ट हुए हैं। समाज के दलित श्रमजीवी वर्ग को पुनेठा बाजारीकरण के दुष्परिणामों से सचेत रहने का आग्रह करते हैं। आदित्य निगम से पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय की बातचीत समाज के नए नजरिए पर एकाग्र है। प्रश्न ‘सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जाने वाला कोई भी आंदोलन वर्तमान समाज की समस्याओं को हल करने के लिए भविष्य की ओर देखता है .....।’ के उत्तर में श्री आदित्य निगम का कहना है कि, ‘‘मसलन माक्र्स के समय को आप देखें तो माक्र्स के पास भविष्य के वे खयाल नहीं थे जो सोवियत रूस के वजूद में आने के बाद माक्र्सवादियों को हासिल हुए।’’ इस उत्तर से लगता है कि माक्र्स का भविष्य के संबंध में कोई चिंतन ही नहीं था। पर माक्र्स का चिंतन भविष्य को लेकर भी उतना ही सटीक था जितनी उन्होंने वर्तमान में परिवर्तन की अपेक्षा समाज से की है। विचार स्तंभ के अंतर्गत मिहिर शाह, रमेश उपाध्याय, मुकुल शर्मा व गोहर रजा ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनिश्चितता पर विचार संग्रह योग्य हैं। पंजाबी के सुप्रसिद्ध कवि परविंदरजीत की कविता ‘‘जन साधारण’’ के अंश ‘मेरी फ्रिकों में वह सब कुछ शामिल है , जो इंसान को इंसान से करता है खारिज’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं व यही कविता का केन्द्रीय भाव भी है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ, पत्र समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Tuesday, November 16, 2010

अंधेरे और उजाले के बाहुपाश मे(संपादकीय)-‘साहित्य परिक्रमा’

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रबंध संपादक: जीत सिंह जीत, सम्पादक: मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 64, मूल्य:15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: shridhargovind@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0751.2422942, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर म.प्र.
अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका संस्थान के सजग पहरी श्रीधर गोविंद जी के अथक परिश्रम से दिनप्रति दिन निखरती जा रही है। समीक्षित अंक में प्रकाशित प्रायः सभी आलेख अपनी विषय वस्तु के साथ भलीभांति न्याय कर सके हैं। रामकथा परंपरा एवं प्रवाह(डाॅ. गिरजाशंकर गौतम), कबीर-काव्य और विश्वबंधुत्व का भाव(प्रो. चमनलाल गुप्ता), हिंदी शोध में स्तालिनवार(अशोक कुमार ज्योति) तथा डाॅ. रमानाथ त्रिपाठी कृत रामकथा में नारी विमर्श(रामविलास अग्रवाल) आलेख आज के युवा रचनाकारों का मार्गदर्शन कर उन्हें साहित्य के साथ गहराई तक जुड़ने की पे्ररणा देते हैं। तेलुगु कहानी ‘रेल के इंजन ने सीटी दी’(ऐता चंद्रैया, अनु. ओम वर्मा) तथा विश्वमोहन तिवारी जी का ललित निबंध मेरा नाती सिद्ध करते हैं कि अब हिंदी साहित्य विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य से कमतर नहीं है। प्रायः सभी कहानियां आमज न को अभिव्यक्ति देती हैं। इनमें प्रमुख हैं- बेंत(महेश मिश्र), हम किस ओर(अंजु उबाना) तथा अभागिन(सरोज गुप्ता)। इस बार की लघुकथाओं पर कुछ अधिक परिश्रम किए जाने की आवश्यकता थी। लेकिन फिर भी अखिलेश निगम अखिल तथा सीताराम गुप्ता ने इनके साथ अच्छा निर्वाह किया है। कृष्ण चराटे का व्यंग्य अच्छा व मनन योग्य है। कुमार रवीन्द्र, देवेन्द्र आर्य, कुलभूषण कालड़ा, मीना खोंड़, यतीन्द्र तिवारी, विजय त्रिपाठी, अली अब्बास, आचार्य भगबत दुबे, तेजराम शर्मा, नरेन्द्र लाहड़, श्रीमती सुबोध चतुर्वेदी तथा नलिनीकांत की कविताएं भी आमजन के उन अछूते विषयों पर दृष्टिपात करती हैं जिनपर गंभीरतापूर्वक विचार किए जाने की आवश्यकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार भी प्रभावित करते हैं।

Monday, November 15, 2010

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य:5रू.(वार्षिक 50रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 (कर्नाटक)
मैसूर हिंदी प्रचार परिषद द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में हमेशा अच्छे व संग्रह योग्य आलेखों को स्थान दिया जाता है। समीक्षित अंक में जीवन और कला...(एस.पी. केवल), भारती का भारतदर्शन(डाॅ. एम.शेषन), हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा(हितेश कुमार शर्मा), हिंदी अंक अस्पृश्य क्यों?(देवेन्द्र भारद्वाज), विश्व भाषा हिंदी(दिलीप शा. घवालकर), अकबर काल में हिंदी का उत्थान(डाॅ. अमर सिंह बधान), समरांगण उपन्यास में चित्रित विविध आयाम(एम. नारायण रेड्डी), जयशंकर प्रसाद की कृतियों में नारी विषयक दृष्टिकोण(मिरगणे अनुराधा), अर्श पर नारी(प्रेमलता मिश्रा) तथा नारी तुम केवल श्रद्धा हो(प्रदीप निगम) लेख सार्थक व अपने अपने विषयों का अच्छा प्रतिपादन करते हैं। पत्रिका का सबसे अच्छा व विश्लेषणात्मक आलेख प्रगतिवादी रचनाकर्मी: केदारनाथ अग्रवाल है। गोविंद शेनाय, इन्द्र सेंगर तथा दिलीप भाटिया की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। नरेन्द्र सिंह सिसोदिया, प्रकाश जीवने, मधुर, रामगोपाल वर्मा, वाई.एस. तोमर यशी तथा लालता प्रसाद मिश्र की कविताएं आज की कविताओं से अलग हटकर हैं। शोधपरक आलेख स्मृति शेष-2 डी.आर.(प्रो.बी.वै. ललिताम्बा) मंे नए ढंग से विचारों को शोध छात्रों के लिए प्रस्तुत किया गया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी स्तरीय हैं।

Sunday, November 14, 2010

हिंदी साहित्य के ‘हिमाचल मित्र’

पत्रिका: हिमाचल मित्र, अंक: जून-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कुशल कुमार, सलाहकार संपादक: अनूप सेठी, पृष्ठ: 108, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80 रू.), ई मेल: himachalmittra@gmail.com , वेबसाईट: http://www.himachalmittra.com/ , फोन/मो. 09869244269, सम्पर्क: डी-46/16, साई संगम, सेक्टर 48, नेरूल, नयी मुम्बई 400.706
आज देश भर में विभिन्न प्रादेशिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। यह वह समय है जब बढ़ती साक्षरता व सामाजिक जाग्रति की वजह से देश के साथ साथ विश्व का आम जन एक दूसरे के समीप आ चुका है। इस समय में हिंदी साहित्य जगत की पत्रिकाएं अपनी तरह से योगदान कर रही हैं। इस पुनीत कार्य में हिमाचल मित्र का योगदान उल्लेखनीय है। पत्रिका हिमाचल ही नहीं देशभर के साहित्य व कला जगत का प्रतिनिधित्व करती है। समीक्षित अंक में ख्यात बांसरी वादक राजेन्द्र सिंह गुरंग से बातचीत कला जगत के विस्तारित होते स्वरूप पर एक गंभीर चर्चा है। लोक संस्कृति के अंतर्गत हिमाचली लोक साहित्य में मुक्तक गीत(कृष्ण चंद्र महादेविया), हिमाचली कोकिलाःवर्षा कटोच(अशोक जेरथ) तथा लाहौल स्पिति के जनजातीय लोगों का विवाह समारोह(उरज्ञान छैरिंग मैलगपा) प्रकाशित लेख हिमाचल की लोक कला की विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। छत्तीसगढ़ की परंपरा व संस्कृति पर ख्यात कवि शरद कोकास का लेख ‘देश की हर शहर में एक छत्तीसगढ़ है’ लेख विचार योग्य व पठनीय आलेख है। ‘सतखसमी’ भले ही पहाड़ी गाली हो पर कहानी पढ़कर इसके कथ्य व शिल्प से भलीभांति परिचित हुआ जा सकता है। संुदर लोहिया एक ऐसे कहानीकार हैं जो अपने आसपास के समाज से कथानक लेकर उसे कथा में ढालने में सिद्धहस्त हैं। कुलदीप शर्मा, भास्कर चैधुरी, हंसराज भारती, सिद्धेश्वर सिंह की कविताएं विश्वास दिलाती हैं कि भले ही कविता विधा को लेकर कूुछ भी कहा जाए पर यह चिर अमर विधा है। यह बरसों पहले थी और कई साल बाद तक अस्तित्व में रहेगी। बद्री सिंह भाटिया की कहानियों में समाज के निचले तबके तथा कमजोर लोगों को मुख्य धारा में लाने का जज्बा दिखाई देता है। उनकी कहानी लाजवन्ती पढ़कर आप उक्त विचार की प्रासंगिकता समझ सकते हैं। एच.आर. हरनोट से बातचीत कथा विधा के साथ साथ साहित्य के विभिन्न पहलूओं पर विचार करती है। पहाड़ी कलम के अंतर्गत यश मालवीय, केशो ज्ञानी, धौलाधार की कविताएं व रेखा ढडवाल के गीत प्रभावित करते हैं। अनूप सेठी, गप्पी बरैबर, केशव चंद्र, की रचनाएं पहाड़ी जीवन से आम जन को जोड़ने में पूर्णतः सफल रहे हैं। शैलेन्द्र सिहं का हिमालय दर्शन व पत्रिका ने पहाड़ी लेखकों डाॅ. गौतम व्यथित तथा डाॅ. प्रत्यूष गुलेरी से सार्थक व सारगर्भित बातचीत की है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Saturday, November 13, 2010

समृद्ध संस्कृति ही समृद्ध राष्ट्र की पहचान होती है-‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य:5 रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (000)00000, सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला 5
शासकीय पत्रिकाओं में सबसे अलग किस्म की पत्रिका हिमप्रस्थ के समीक्षित अंक में समाज से जुड़े हुए विषयों पर आलेखों का प्रकाशन किया गया है। अंक में फारसी के दरबारी माहौल में खुसरों की हिंदवी कविता(कृपाशंकर सिंह), बदलते दौर में साहित्य के सरोकार(कृष्ण कुमार यादव), हिंदी पत्रकारिताःचुनौतियां एवं जन अपेक्षाएं(सुरेश उजाला), धरती धन न अपना में पंजाबी दलित वर्ग की स्थिति(पूजा कपूर) एवं नारी चेतना का सृजन(ललिता चैहान) विशेष रूप से ध्यान देने योग्य आलेख हैं। प्रदीप कंवर का यात्रा वर्णन कुछ अधिक गंभीर हो गया है जिससे उसकी सरसता प्रभावित हुई है। राजीव गुप्त एवं कालीचरण प्रेमी की लघुकथाएं ठीक ठाक कही जा सकती है। कहानियों में शहतूत पक गए हैं(संतोष श्रीवास्तव) अच्छी व लम्बे समय तक याद रखी जाने वाली कहानी है। सुरभि तथा निधि भारद्वाज की कहानी भी अच्छी है लेकिन कहीं कहीं इन कथाओं में कथातत्व विलोपित सा हो गया है। देवांशु पाल, यशोदा प्रसाद सेमल्टी, एल.आर. शर्मा तथा जया गोस्वामी की कविताएं समयानुकूल हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी अच्छी व पठनीय हैं।

Friday, November 12, 2010

‘हिंदुस्तान पेपर संदेश’ का संयुक्तांक

पत्रिका: संदेश, अंक: 72-73, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. प्रमथनाथ मिश्र, पृष्ठ: 32, मूल्य:उपलब्ध नहीं, (वार्षिक उपलब्ध नहीं), ई मेल: , वेबसाईट: http://www.hindpaper.in/ , फोन/मो. (033)22496911, सम्पर्क: हिंदुस्तान पेपर कारपोरेशन लिमिटेड, 75 सी, पार्क स्ट्रीट, कोलकाता 700016
यह पत्रिका हिंदुस्तान पेपर कारपोरेशन का मुखपत्र है। अंक में कारपोरेशन से संबंधित विचार व अन्य रचनाओं का समावेश किया गया है। प्रायः सभी लेखों में हिंदी व उसके राजभाषा स्वरूप पर विचार किया गया है। इनमें राकेश कुमार, कुसुम धीर, बसन्ती लाल बाबेल, दिग्विजय सिंह व अश्विनी कुमार के लेख प्रमुख हैं। पत्रिका में हिंदी के ख्यात आलोचक डाॅ. रामविलास शर्मा के दो लेखों को भी पत्रिका में प्रमुख रूप से स्थान दिया गया है। कृष्ण कुमार ग्रोवर, डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, डाॅ. प्रमथनाथ मिश्र, रवीन्द्र अग्निहोत्री तथा राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव का लेख भी उल्लेखनीय है।

Thursday, November 11, 2010

साहित्य का धंधा और सम्मान की चाह(संपादकीय)-‘अरावली उद्घोष’

पत्रिका: अरावली उद्घोष, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बी.पी. वर्मा ‘पथिक’, अतिथि संपादक: भागीरथ, पृष्ठ: 80, मूल्य:20रू. (वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (0294)2431742, सम्पर्क: 448, टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313.001(राजस्थान)
सामाजिक साहित्यिक, जनचेतना के लिए प्रतिबद्ध पत्रिका अरावली उद्घोष के समीक्षित अंक में प्रकाशित रचनाओं का मूल स्वर आदिवासियों के अस्तित्व की चिंता है। अंक में आदिवासियों पर आए अस्तित्व के संकट को लेकर परिचर्चा आयोजित की गई है। इस परिचर्चा से आदिवासियांे पुनर्वास व कल्याण के लिए सुझाव व उनसे जुड़ी समस्याओं पर विचार आए हैं। रामजी ध्रुव, साहू रामलाल गुप्ता, जे. आर. आर्मी, सुरेन्द्र नायक, चन्दालाल चकवाला, जवाहर सिंह मार्को, अमित पोया के साथ साथ भागीरथ जी के विचार उपयोगी व अमल में लाने योग्य हैं। कहानियों में थप्पड़(डाॅ. परदेशी राम वर्मा), त्रासदी....माय फुट(रमेश उपाध्याय) तथा वरेन्डा(केदार प्रसाद मीणा) अच्छी व समाज से जुड़ी हुई रचनाएं हैं। विशेष रूप से त्रासदी......माय फुट का कथानक भोपाल गैस त्रासदी की फिर से याद दिला देता है। कहानी पढ़कर गैस से पीड़ित लोगांे के दुख दर्द व उनकी पीड़ा से आम पाठक अपने आप को जुड़ा पाता है। गिरजा शंकर मोदी, अशोक सिंह, राजकुमार कुम्भज व हेमराज मीणा ‘दिवाकर’ की कविताएं अच्छी व आम जन को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। एन.जी. ओ. साम्राज्यवाद के चाकर(जेम्स पेत्रास तथा हेनरी वेल्तमेयर), अम्बेड़कर का सपना अभी अधूरा है(वेद व्यास), हम भ्रष्टाचार और शोषण को कैस खत्म कर सकते हैं(वी.टी. राजशेखर), आदिवासी नहीं जलाते रावण को(के.आर. शाह) तथा आदिवासी वीर छीतू किराड़ राजा(विद्या कालूसिंग) के लेख पठनीय व सहेजकर रखने योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Tuesday, November 9, 2010

गांधी साहित्य एवं विचार की पत्रिका-‘हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका: हिंदुस्तानी जबान, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सुशीला गुप्ता, पृष्ठ: 120, मूल्य:10रू. (वार्षिक 40रू.), ई मेल: hp.sabha@hotmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (022)22812871, सम्पर्क: महात्मा गांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महा. गां. बिल्डिंग, 7 नेताजी सुभाष रोड़ मुम्बई 400002
गांधी साहित्य एवं विचार के प्रचार प्रसार मंे वर्षो से लगी पत्रिका के समीक्षित अंक में अच्छी व पढ़ने योग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। पत्रिका का साहित्य गांधी जी के विचारों को आज के संदर्भ में भी प्रस्तुत करता है। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में गांधी जी की सकारात्मक सोच(डाॅ. सुरेन्द्र वर्मा), गांधी जी के अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता(डाॅ. सत्यपाल श्रीवत्स), वैश्विक बदलावः स्त्री और कथा साहित्य(उर्मिला शिरीष), हिंदी कहानियों में बाल मजदूरी(सूर्या बोस), आधुनिक हिंदी ग़ज़ल का शिल्प(श्री विजय अरूण), भाषा को नहीं काव्य को बचाओ(जसप्रीत कौर जस्सी) एवं लोक साहित्य में स्वाधीनता की अनुगंूज(आकांक्षा यादव) प्रमुख हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार भी उपयोगी हैं।

Sunday, November 7, 2010

कादम्बिनी क्लब हैदराबाद का ‘पुष्पक’

पत्रिका: पुष्पक, अंक: 15, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 112, मूल्य:75रू. (वार्षिक 250रू.), ई मेल: mishraahilya@yahoo.in , वेबसाईट: , फोन/मो. (040)23703708, सम्पर्क: 93सी, राजभवन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद 500038 सी-7 आंध्रप्रदेश
पत्रिका पुष्पक के समीक्षित अंक मंे अच्छी व पठनीय रचनाओं को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। सभी कहानियां आज के वातावरण तथा अपसंस्कृति पर विचार करती दिखाई देती है। इनमें प्रमुख हैं - मानवता जीवित है(शांति अग्रवाल), पुराना प्रेमी(पवित्रा अग्रवाल), पिता की ममता(रमा द्विवेदी), शपथ(मधु भटनागर), सबका मालिक एक है(वी. वरलक्ष्मी)। लघुकथाओं में संजय कुमार द्विवेदी, विनादिनी गोयनका, सुधाकर आशावादी, विक्की नरूला, प्रेमबहादुर कुलश्रेष्ठ एवं जगदीश पाठक प्रभावित करते हैं। ए. अरविंदाक्षन, अहिल्या मिश्र, हीरालाल प्रसाद जनकवि, रामशंकर चंचल, देवेंन्द्र कुमार मिश्रा, अनिल अनवर, ज्ञानेंद्र साज, यासमीन सुल्ताना, सुरेंन्द्र अग्निहोत्री, कमल सिंह चैहान, शुभदा पाण्डेय, सराफ सागरी, चंपालाल बैड, मीना मुथा, डाॅ. सुरेश उजाला की कविताएं मानव को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती हैं। सत्यप्रकाश अग्रवाल एवं राजेन्द्र परदेसी के व्यंग्य अपने अपने तरीकों से समाज की कुरीतियों पर प्रहार करते हैं। प्रमुख लेखों में प्रेमचंद्र के कथा साहित्य में दलित स्त्री(शुभदा वांजपे), भारतीय समाज में स्त्री स्वतंत्रता(सरिता सुराणा जैन), नारी उत्पीड़नःशोर बनाम सच(लक्ष्मी नारायण अग्रवाल), साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति(राम शिव मूर्ति यादव), वैचारिक क्रांति क्यों और कैसे?(डाॅ. महेश चंद्र शर्मा) को शामिल किया जा सकता हैै। डाॅ. मोहन आनंद द्वारा लिखी गई जीवनी तथा डाॅ. सीता मिश्र का संस्मरण ‘महारानी कालेज’ भी उल्लेखनीय रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व समाचार प्रभावित करते हैं।