Saturday, October 30, 2010

नामवर सिंह हमारे युग के एक फिनीमिनन हैं(राजेन्द्र यादव)-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: मई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू. (वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. (0120)4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोयड़ा उ.प्र.
पत्रिका पाखी का यह अंक हिंदी के ख्यात आलोचक-वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. नामवर सिंह जी पर एकाग्र है। इसके पूर्व भी उन पर तीन चार अंक प्रकाशित हो चुके हैं। डाॅ. नामवर सिंह जी पर अंक निकालना अत्यधिक साहस व जोखिम का कार्य है। इसलिए प्रायः अन्य साहित्यिक पत्रिकाएं भले ही किसी विधा विशेष या अन्य रचनाकार पर अंक निकाल लें पर डाॅ. नामवर सिंह जी पर उन्हें प्रायः कठिनाइयों का सामना ही करना पड़ता है। समीक्षित अंक में उन पर स्थापित तथा स्थापित होने की दिशा में अग्रसर लेखकों द्वारा लेख लिखे गए हैं। सुरेश शर्मा द्वारा लिखे गए उनके जीवन परिचय में वर्ष दर वर्ष उनकी साहित्यिक यात्रा को पाठक तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। आकलन के अंतर्गत विश्वनाथ त्रिपाठी, प्रो. निर्मला जैन, खगेन्द्र ठाकुर, कमला प्रसाद, रघुवीर चैधरी, नंद किशोर नवल, ए. अरविंदातन, राजेन्द्र कुमार, विमल कुमार, कमेन्द्रु शिशिर एवं राजीव रंजन गिरि के लेख हैं। प्रायः सभी लेखों से यह झलकता है कि जो लेखक उनके करीब हैं, उन्होंने और करीब आने का प्रयास किया है। कुछ लेखकों ने उनके आभामण्डल में आने की जुगाड़ भी इस बहाने की है। स्तंभ ‘पुस्तक के बहाने’ में उनकी कुछ कृतियों पर आलेख लिखे गए हैं। इन्हें भगवान सिंह, पुरूषोत्तम अग्रवाल, प्रो. रामवक्ष, सुधीर रंजन सिंह, राकेश बिहारी, वैभव सिंह एवं वैकटेश कुमार ने लिखा है। कुछ लेख पुस्तकों की समीक्षा जैसे लगते हैं तो वहीं कुछ में लेखक भी स्वयं अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर रचना का विशेषज्ञ बनने की घोषणा करता दिखाई देता है। इस वजह से इन लेखों की सरसता प्रभावित हुई है। हालांकि आलोचनात्मक लेखों में सरसता की अपेक्षा प्रायः नहीं की जाती है। लेकिन आम पाठक के लिए भी कुछ न कुछ स्पेस होना ही चाहिए। उनके शिष्यों भगवान सिंह व तरूण कुमार ने लेखों में अपने व्यक्तिगत संबंध व अनुभवों को ही अधिक विस्तार दिया है। डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव का लेख तथा परिचर्चा ‘हमारे समय में नामवर’ पत्रिका की उपलब्धि कही जा सकती है। संस्मरण खण्ड के अंतर्गत राजेन्द्र यादव, गुरूदयाल सिंह, काशीनाथ सिंह, भारत भारद्वाज एवं आलोक गुप्ता सहित अन्य लेखकों ने उनकी अपेक्षा उनसे अपने निजी संबंधों का खुलासा ही अधिक किया है। बकलम खुद के अंतर्गत ‘जीवन क्या जिया’ व ‘रचना और आलोचना के पथ पर’ उनके ऐसे लेख हैं जो साहित्यप्रेमी वर्षो याद रखेंगे। महावीर अग्रवाल, की डायरी में वाया नामवर सिंह जी साहित्य के संबंध मंे संग्रह योग्य जानकारी मिलती है। श्री नामवर सिंह जी की कलम से के अंतर्गत उनके कुछ लेखों का पुुनः प्रकाशन पत्रिका को अधिक व्यापक बनाने की दिशा में किया गया एक अच्छा प्रयास है। ख्यात कथाकार, हंस के संपादक राजेन्द्र यादव व आलोचक समीक्षक विजेन्द्र नारायण सिंह के लेख प्रकाशित कर संपादक ने अच्छी साहसिकता का परिचय दिया है। इस तरह के कुछ गिने चुने लेख ही पत्रिका को अभिनंदन गं्रथ की संज्ञा प्रदान करने से मुक्त करते हैं। अच्छा होता कि यदि पाखी इस आयोजन से दो तीन माह पूर्व पाठकों को भी इसमें शामिल कर उनके विचार भी प्रकाशित करती। प्रश्न प्रकाशित कर उनके उत्तर मंगवाकर पाठकांे को भी सीधे तौर पर इस आयोजन में शामिल करने पर पत्रिका संग्रह योग्य व शोधार्थियों के लिए उपयोगी हो जाती। लेकिन फिर भी पहल, पूर्वग्रह व वसुधा के आयोजन के पश्चात यह प्रयास वैश्विक स्तर पर माक्र्सवाद के अवसान की बेला में स्वागत योग्य है। सफलता के पैमाने पर पत्रिका को दस में से छः अंक दिए जा सकते हैं। इसलिए पत्रिका के संपादक व उनकी टीम बधाई की पात्र है।

Thursday, October 28, 2010

‘साहित्य सागर’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 54, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग:उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161 बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया भोपाल म.प्र
साहित्य की सेवा में निरंतर लगी हुई यह पत्रिका हमेशा कुछ नया करने के प्रयास में रहती है। इसी श्रृंखला में पत्रिका ने यह अंक शास्त्री रामगोपाल चतुर्वेदी ‘निश्चल’ को समर्पित कर उनपर एकाग्र किया है। पत्रिका के समीक्षित अंक में सनातन कुमार वाजपेयी, प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र, आशा सक्सेना, मदनप्रसाद सक्सेना, प्रो. शरदनारायण खरे, जगदीश शरण मधुप के जानकारीपरक आलेखोें का प्रकाशन किया गया है। चतुर्वेदी जी पर एकाग्र सभी रचनाएं आकर्षक व जानकारीपरक है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार व पत्र आदि भी अच्छे व रोचक हैं।

Wednesday, October 27, 2010

वाणी प्रकाशन समाचार

पत्रिका: वाणी प्रकाशन समाचार, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अरूण माहेश्वरी, पृष्ठ: 20, मूल्य: 5रू.(वार्षिक उपलब्ध नहीं), ई मेल: vaniprakashan@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.vaniprakashan.in/ , फोन: 011.23273167, सम्पर्क: वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज नई दिल्ली 110.002
देश के प्रमुख व ख्यातिप्राप्त साहित्यिक पुस्तक प्रकाशन समूह की यह मासिक समाचार प्रकाशन पत्रिका है। अंक में नवीनतम प्रकाशनों के समाचार प्रकाशित किए गए हैं। कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशनों से उपयोगी समाग्री भी पत्रिका अपने अंकों में प्रकाशित करती है। पत्रिका के मुख पृष्ठ पर काव्यशास्त्र के विविध आयाम शीर्षक के पश्चात यूनानी अभिजात्य चिंतन तथा कृष्णलाल शर्मा का आलेख ‘त्रासदी में करूणा-भय और कथार्सिस’ प्रकाशित किया गया है। काव्यशास्त्र पर एकाग्र ख्यात आलोचक व इग्नू की पूर्व प्राध्यापक प्रो. निर्मला जैन की पुस्तक ‘नयी समीक्षा का उदय’ पर लिखा गया लेख इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करने में पूर्णतः सक्षम है। शब्दों का उचित प्रयोग(किशोरीदास वाजपेयी), भाषा मानक और परिनिष्ठित(महेन्द्रनाथ दुबे) से संबंधित जानकारी वर्तमान में हिंदी साहित्य के वैश्विक स्वरूप व उसके स्तर की ओर संकेत करती है। नए प्रकाशन के अंतर्गत विवाह की प्रासंगिकता(डाॅ. के.एम. मालती) व अज्ञेय के जन्मशती पर पुस्तक ‘अज्ञेय:कवि और काव्य’(डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद), अज्ञेय की कविता परंपरा और प्रयोग(रमेश ऋषिकल्प) एवं अज्ञेय एक अध्ययन(भोला भाई पटेल) पर लिखे गए आलेख इनके संबंध में संक्षेप में बहुत ही उपयोगी जानकारी देते हैं। अज्ञेय व उनके कथा साहित्य पर गोपाल राय की पुस्तक कहानी में रूचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए अनिवार्य प्रतीत होती है। ओम प्रभाकर के संग्रह काले अक्षर भारतीय, एक था शैलेन्द्र(राजेन्द्र यादव) व भरोसे की बहन(श्यौरराज सिंह बैचेन) की पुस्तकंे व उनपर लिखे गई जानकारी यह सिद्ध करती है कि हिंदी अब विश्व की अन्य भाषाओं का मार्गदर्शन करने की स्थिति में आ गई है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ख्यात ग़ज़ल गो शहरयार से बातचीत, भारतीय लेखक को पाकिस्तान का सम्मान समाचार पत्रिका के स्वरूप को और अधिक व्यापकता प्रदान करते हैं।

Tuesday, October 26, 2010

नारी चेतना की प्रगतिशील पत्रिका-‘नारी अस्मिता’

पत्रिका: नारी अस्मिता, अंक: जून-नबम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. रचना निगम, पृष्ठ: 56, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: 15, गोयागेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी-ब्लाक, द्वितीय तल, एस/3, प्रतापनगर वडोदरा 390.004 गुजरात
देश भर में नारी चेतना जाग्रत करने के लिए प्रयासरत पत्रिका का समीक्षित अंक अनेक पठनीय आलेखों से युक्त है। अंक में रूखसाना सिद्दकी, श्रीमती रेनू सक्सेना, डाॅ. शकुन्तला कालरा, मोहिनी राजदान, पूनम गुजराती व अनीता पारीख के लेख नारी सशक्तिकरण के विचार को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। सभी कहानियां आज के समाज व उसमें महिला की लगातार बदलती भूमिका पर गंभीरतापूर्वक प्रकाश डालती है। इसे कहानियों शुरूआत(संतोष श्रीवास्तव), तुम्हारा अमि(अनुभव शर्मा ऐनी), जब जागो तभी सवेरा(नीलिमा टिक्कू) व हादसे के बाद(मुन्नूलाल) में महसूस किया जा सकता है। वीणापांणी जोशी, सूर्यकांत पाण्डेय, जयश्री राय की कविताएं नयापन लिए हुए हैं। लघुकथाओं में कुछ भी नया नहीं है। विचारमंच के अंतर्गत आयोजित चर्चा में आत्महत्या विषय पर विचार किया गया है। इस पर पत्रिका द्वारा आयोजित परिचर्चा में कुछ अच्छे विचार सामने आते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ व समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Sunday, October 24, 2010

‘वागर्थ’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका: वागर्थ, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 120, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 200 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bhartiyabhasaparishad.com/ , फोन/मो. 033.329306, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता
हिंदी साहित्य की अग्रणी पत्रिका के अक्टूबर अंक में विचार योग्य व अच्छी विश्लेषण सामग्री का प्रकाशन किया गया है। समीक्षित अंक में उदयप्रकाश जी अपने ब्लाॅग पर मेघा पाटकर की कविता ‘अंतर’ और ‘उत्तर पाठिकता’ को विशेष रूप से स्थान दिया है। कृष्ण कुमार रत्तू का लेख लौटेगा क्या कभी डोलना का चेहरा पठनीय व जानकारीप्रद है। गांधी और हिंद स्वराज पर वीरेन्द्र कुमार वरनवाल तथा हितेन्द्र पटैल के लेख स्वराज पर नए सिरे से विचार करते दिखाई पड़ते हैं। लोक विमर्श के अंतर्गत लेख पर्यावरण एवं विकास(सुभाष शर्मा) व बड़े लोग बड़ा भ्रष्टाचार(गिरीश मिश्र) विमर्श के माध्यम से आम पाठक को भारतीय समाज की बुराईयों व उसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह भी करते हैं। मुद्राराक्षस का लेख ‘क्या सारे बड़े कवि एक ही बड़ी कविता लिख रहे है’ तथा कृपाशंकर सिंह ‘कविता का तिलिस्म’ आलेख में कवि एवं कविता पर आज के संदर्भ में विचार करते हैं। दिलीप शाक्य की लम्बी कविता तथा ज्ञानेन्द्रपति, सुनीता जोशी व मिथलेश कुमार की कविताएं ै बाज़ारवाद के दुष्परिणामों को पहचान चुकी हैं। यही कविता का एक प्रमुख उद्देश्य भी है कि वह तत्कालीन समाज को सचेत करता रहे। कहानियों में जिंदगी अफसाना नहीं(समाल बिन रजाक), तस्मैं श्री गुरूवै नमः(दामोदर दत्त दीक्षित), अर्जन्या(हरि मृदुल) एवं अर्जन्या(प्रमोद भार्गव) में भी आशावादी समाज के लिए संदेश दिया गया है। पत्रिका धर्मयुग पर पद्मा सचदेव को लेख व चित्रा मुदगल का आलेख कहानियां लिखतीं कहानियां प्रत्येक नव रचनाकार का मार्गदर्शन करती हैं। अकील अहमद अकील की उर्दू ग़ज़ल के साथ साथ जहीर कुरेशी, भारत यायावर, विनय मिश्र व महेश कटारे सुगम की ग़ज़लें प्रभावित करती हैं। कवि गोपाल सिंह नेपाली पर राजीव श्रीवास्तव के लेख में विवरण की अपेक्षा विस्तार अधिक आ गया है जिससे लेख बिखर सा गया है। अन्य अंकों की तरह पत्रिका का संपादकीय विचार व विश्लेषण युक्त है।

Saturday, October 23, 2010

‘शुभ तारिका’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका:शुभ तारिका, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 34, मूल्य: 12रू.(वार्षिक 120 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्ण दीप ए 47, शास्त्री कालोनी, अंबाला छावनी 133.001 हरियाणा
विगत 38 वर्ष से लगातार साहित्य की सेवा कर रही पत्रिका शुभ तारिका के इस अंक में अच्छी व विविधतापूर्ण रचनाओं को स्थान दिया गया है। अंक में महावीर उत्तरांचली, चंद्र भानु आर्य, पवन चैधरी मनमौजी, चेतन आर्य, किशनलाल शर्मा व लेखराम शर्मा की लघुकथाएं प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका में इस बार लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत दिलीप भाटिया को स्थान दिया गया है। हितेश शर्मा, कुलभूषण कालड़ा, अशोक सिंह व खत्री कुमार की कविताएं प्रभावित करती हैं। गुलनाज की कहानी बसेरा का कथ्य व शिल्प आज की समस्याओं पर विस्तार से प्रकाश डालता है। अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि भी पठनीय हंै।

Friday, October 22, 2010

वर्तमान साहित्य में ‘समय के साखी’

पत्रिका:समय के साखी, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. आरती, पृष्ठ: 60, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 220 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 09713035330, सम्पर्क: बी 308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल 462003 म.प्र.
समय के साखी के समीक्षित अंक में कुछ अच्छी सार्थक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका का स्वर तो प्रगतिवादी है लेकिन पत्रिका बाज़ारवाद को पूरी तरह से खारिज भी नहीं करती है। यह इस पत्रिका के इस समीक्षित अंक में महसूस किया जा सकता है। अंक में सुधीर विद्यार्थी व अर्चना द्विवेदी के आलेख भी इसी बात की पुष्टि करते हैं। प्रेमशंकर रघुवंशी, कैलाश पचैरी, नरेन्द्र गौड़, जितेन्द्र धीर व राहुल आदित्य राय अब भूमंडलीकरण में प्रगति का स्वर ढूंढ रहे हैं। चित्रा मुदगल की कहानी ‘अपनी वापसी’ पुनः पढ़कर अच्छा लगा। अमलेन्द्रु उपाध्याय, कृष्ण कुमार यादव के लेख भी पत्रिका का स्वर प्रखर करते हंैं। अन्य रचनाएं,समीक्षाएं भी ठीक ठाक हैं।

माक्र्स की क्रांतिगंध बनाम गांधी की शान्ति गंध(संपादकीय)-‘‘समावर्तन’’

पत्रिका:समावर्तन, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 90, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य एवं नाटकों के लिए समर्पित पत्रिका के इस अंक में ख्यात कवि राजेश जोशी व प्रसिद्ध चित्रकार विष्णु चिंचालकर पर एकाग्र है। अंक में कवि राजेश जोशी के समग्र व्यक्तित्व व उनके जीवन संघर्ष पर गंभीर लेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें संपादक रमेश दवे, केदार नाथ सिंह, सुधीर रंजन सिंह के लेख प्रमुख ध्यान देने योग्य हैं। उर्मिला शिरीष व विजय कुमार से उनकी बातचीत साहित्य का गहन गंभीर विश्लेषण करती है। निरंजन श्रोत्रिय की कवि अमित मनोज की कुछ चुनी हुई कविताएं, सत्यमोहन शर्मा, सदाशिव कौतुक, व कुमार सुरेश की कविताएं अच्छी है। सतीश श्रोत्रिय व सुरेश शर्मा की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। चंद्रभान राही की कहानी ‘बेटा’ का शिल्प व कनक तिवारी का आलेख प्रभावित करते हंै। विष्णु चिंचालकर पर सूर्यकांत नागर, प्रभु जोशी, दिलीप विष्णुपंत, शाहिद मिर्जा के लेख विष्णु जी की कला का संतुलित व संश्लेषित विश्लेषण करते हैं। पिलकेन्द्र अरोड़ा, राग तेलंग, प्रेम शशांक व रमेश खत्री के लेख व विनय उपाध्याय का सतंीा अन्य पठनीय रचनाएं हैं।

Thursday, October 21, 2010

समय का सृजनात्मक संवाद-‘‘मानसरोवर’’

पत्रिका: मानसरोवर, अंक: पावस अंक 2010, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: विनोद कुशवाहा, देवेन्द्र सोनी, पृष्ठ: 38, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 9425043026, 9827624219, सम्पर्क: मानसरोवर साहित्य समिति, पर्व एल.आई.जी. 85, न्यास कालोनी, इटारसी म.प्र.
मध्यप्रदेश की रेलनगरी इटारसी से प्रकाशित पत्रिका मानसरोवर संभवतः एक ऐसी पत्रिका है जो ऋतुओं के आधार पर प्रकाशित की जाती है। पत्रिका के समीक्षित अंक मंे सावित्री शुक्ल, ब्रजमोहन सिं ठाकुर, विनय दुबे, श्रीराम निवारिया व कमलेश चैधरी की कविताएं प्रकाशित की गई हैं। अजय कुलश्रेष्ठ का लेख, कमलेश् ा बख्शी, मालती कुशवाहा व नीति अग्रिहोत्री की कहानियां पत्रिका को व्यापक बनाती है। ब्रजकिशोर पटेल व अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं तथा अजय गंगराडे की रचना पत्रिका का अन्य आकर्षण है।

Wednesday, October 20, 2010

चिंतन की मासिक पत्रिका-‘‘प्रगति वार्ता’’

पत्रिका: प्रगति वार्ता, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: सच्चिदानंद, पृष्ठ: 60, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240 रू.), ई मेल: pragativarta@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 06436.222467, सम्पर्क: प्रगति भवन, चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज 816.109 झारखण्ड
साहित्य चिंतन की प्रमुख पत्रिका प्रगति वार्ता का समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- गंगा और बनारस(अरविंद कुमार सिंह), लोक संस्कृति की लय है कजरी(कृष्ण कुमार यादव), आस्था-अनास्था(प्रभात दुबे) एवं सामाजिक चेतना के प्रबुद्ध(प्रो. यशवंत कुमार लक्ष्मण) शामिल हैं। व्यक्तित्व के अंतर्गत रामनिहाल गंुजन का लेख सर्वाधिक सुरूचिपूर्ण व पठनीय है। राम अधीर व देवेन्द्र कुमार देवेश की कविताएं अच्छी व समसामयिक हैं। यू.एस. तिवारी का संस्मरण मेरे गुरू हरिशंकर परसाई संस्मरण जैसा कहीं से नहीं लगता है। आज बहुत से लेखक व्यंग्य लिख रहे हैं। लेकिन पता नहीं उनके अनुसार व्यंग्य वे किसे मानते हैं? समझ से परे है। प्रगति वार्ता में भी जो व्यंग्य प्रकाशित किए गए हैं वे उस कोटि के व्यंग्य नहीं हैं जिन्हें अब तक पाठक पढ़ता रहा है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी ठीक ठाक हैं।

‘‘मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका’’ का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: सितम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 कर्नाटक
कर्नाटक में हिंदी के प्रति आम जन में रूची जाग्रत कर रही यह पत्रिका अब हिंदी साहित्य जगत की एक अग्रगामी पत्रिका बन गई है। इसका त्रुटिविहीन व साफ सुथरा मुद्रण आकर्षित करता है। समीक्षित अंक में आलेख - हिंदी राष्ट्र की भाषासेतु है(प्रभुलाल चैधरी), राष्ट्रभाषा का स्वाधीनता से संबंध(मित्रेश कुमार गुप्त), शताब्दी के आइने में हिंद स्वराज(गणेश गुप्त), भारत और वैश्विक सांस्कृतिक समीकरण(डाॅ. अमर सिंह वधान), महान हिंदी सेवीःभारतेन्द्रु हरीशचंद्र(विनोद कुमार पाण्डेय) तथा साहित्यकार स्मृतिशेष कैसे बनते हैं?(प्रो. बी.वै. ललिताम्बा) पठनीय व शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं। जसविंदर शर्मा की कहानी, बी. गोविंद शैनाय की लघुकथाओं में ताजगी है। श्याम गुप्त एवं लालता प्रसाद मिश्र की कविताओं को अच्छी कविताओं मंे शामिल किया जा सकता है।

Tuesday, October 19, 2010

क्या आप पढ़ना चाहेंगे केवल 5 रू. में ‘‘हिमप्रस्थ’’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: सितम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घौड़ा चैकी, शिमला 5 हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश की खुबसूरत वादियों से निकली साहित्य की बयार को देश भर में महसूस करा रही यह पत्रिका केवल 5 रू. में उपलब्ध है। आज महंगाई के समय में इतनी कम कीमत में उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध कराना साहसिक कदम है। फिर भले ही वह हिमप्रस्थ जैसी शासकीय पत्रिका ही क्यों न हो। समीक्षित अंक में विष्णु प्रभाकर का उपन्यास अर्द्धनारीश्वर(राम निहाल गुंजन), चम्बा की रानी सुनयना और ढोलक गायन(ब्रहमदत्त शर्मा), सुनीता जैन की कहानियों में नारी स्वरूप(योगिता चैहान) एवं जगदीश चन्द्र के उपन्यासों में दलित वर्ग का स्वरूप आलेख प्रभावित करते हैं। पवन चैहान की कहानी ‘इंतजार’ ठीक ठाक है। योगेन्द्र शर्मा की कहानी ‘मास्टर जी’ में कहीं कहीं अनावश्यक विस्तार हो गया है जो कथारस लेने मंे बाधा बनता है। पंकज शर्मा व जोगेश्वरी संधीर की लघुकथाएं अच्छी व समयानुकूल हैं। अरविंद ठाकुर, स्नेहलता, रामचंद्र सोलंकी व पियूष गुलेरी की कविताएं उल्लेखनी हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पठनीय व विचार योग्य हैं।

Monday, October 18, 2010

साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका: हंस, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.hansmonthly.in/ , फोन/मो. 011.41050647, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज नई दिल्ली 02
कथा प्रधान मासिक हंस के समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में से कुछ आज के वातावरण व युवा पीढ़ी की सोच पर सटीक बैठती हैं। रेडियो(रामधारी सिंह दिवाकर), बस एक कदम(जकीय जुबेरी), मुक्ति(नीलेन्दु सेन), फटी हुई बनियान(भवानी सिंह), उपकथा(दीपक शर्मा) तथा पहाड़े पहाड़े प्रेम के पत्थर(प्रमोद सिंह) की कहानियों में यह सोच दिखाई देती है। भोलानाथ कुशवाहा, सुहेल अख्तर, उपेन्द्र कुमार की कविताएं सार्थक रचनाएं हैं। शमशेर जी पर आलेख पढ़कर लगा कि लेखक ने केवल शमशेर बहादुर के समग्र का सतही तौर पर अध्ययन कर लेख लिख डाला है। अशोक अंजुम तथा डाॅ. ओम प्रभाकर की ग़ज़लें प्रभावशाली हैं। बहुत दिनों बाद हंस में अच्छा गीत (मदन केवलिया का गीत) पढ़ने में आया है। गंगा शरण शर्मा के हाइकू गीत भी ठीक ठाक हैं। पत्रिका की सबसे बेकार व प्रभावहीन रचना ‘‘कालम जिन्होंने मुझे बिगाड़ा’’ के अतंर्गत प्रकाशित की गई है। मंजरी श्रीवास्तव(मैं पैदाईशी बिगडैल हूं) पढ़कर लगता हैै कि हम सत्यकथा या मनोहर कहानियां पढ़ रहे हैं। हंस का अपना एक स्तर है, आज इस पत्रिका को विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य की प्रमुख पत्रिका माना जाता है। इसमें इस तरह के तर्कहीन, गैर साहित्यिक लेख प्रकाशित करने का कोई मतलब नहीं है। वहीं दूसरी ओर अब साहित्यिक पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इस स्थिति में दुनिया भर के लोग हिंदी साहित्य ये जुड़ रहे हैं। जब वे हंस में इस तरह की रचनाएं पढ़ेंगे तो हिंदी साहित्य के बारे मंे किस तरह की धारणाएं बनायेंगे यह सोचने वाली बात है। शीबा असलम फहमी ने बहुत दिन बाद विवादों से परे हटकर अपनी बात कहने के लिए एक गंभीर व सार्थक विषय चुना है इसके लिए वे बधाई की पात्र है। बीच बहस में के अंतर्गत प्रकाशित लेखों में केवल ‘‘मुझे इन प्रेतों से बचाओ’’’(विश्वनाथ) ही अच्छा व सारगर्भित है। हमेशा की तरह भारत भारद्वाज ने अपने स्तंभ के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ, समाचार आदि समयानुकूल व पठनीय हैं।

Sunday, October 17, 2010

चुप्पी तोड़ो - "समकालीन अभिव्यक्ति"

पत्रिका : समकालीन अभिव्यक्ति, अंक : अप्रैलसितम्बर 2010, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ : 64, मूल्य : 15रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल : , वेबसाईट/ब्लॉग : , फोन/मो. 011.26645001, सम्पर्क : फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30
पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक में कई पाठकोपयोगी रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित कहानियों में मेमना से मेमना सिंह(कुंवर पे्रमिल), डोली(अखिलेश निगम) तथा उससे उस तक(संतोष माझी) प्रमुख हैं। प्रो. वंशीधर त्रिपाठी, कैलाश चंद्र भाटिया व आकांक्षा यादव के लेख नवीनता लिए हुए हैं। डॉ. गंगाप्रसार वरसैया का व्यंग्य, अनिल डबराल का आलेख प्रस्तर पर बिखरा सौन्दर्य तथा बुद्धिप्रकाश कोटनाला का यात्रा वृतांत अच्छी रचनाएं कही जा सकती हैं। राग तेलंग, अशोक अंजुम तथा तेजराम शर्मा की कविताओं को छोड़कर अन्य कविताएं प्रभावहीन हैं। रामशांकर चंचल की लघुकथा ॔आदमी की नियत’ को छोड़कर अन्य लघुकथाएं महज चुटकुलेबाजी ही लगती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी अपनी उपयोगिता सिद्ध करने में काफी हद तक सफल रहे हैं।

Saturday, October 16, 2010

असली मित्रता को परिभाषित करता है ‘मित्र’-इप्टा वार्ता

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: अप्रैल2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 08, मूल्य: उपलब्ध नहीं , ई मेल: iptavarta@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://iptavarta.blogspot.com/ , फोन/मो. 0761.2417711, सम्पर्क: पी.डी. 4, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर जबलपुर 02, म.प्र.
मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाली यह कला जगत की महत्वपूर्ण समाचार पत्रिका है। समीक्षित अंक में मुख पृष्ठ पर समाचार ‘असली चिंता को परिभाषित करता है मित्र’ समाचार ‘मित्र’ नाटक की गहन व्याख्या करता है। अगले समाचार के रूप मंे ख्यात रंगकर्मी रेखा जी द्वारा बच्चों के बीच गुजारे गए समय का समाचार उनके मिलनसारिता व सहृदयता से परिचय कराता है। संपादक हिमांशु राय का लेख इप्टा का शुरूआती साथी चला गया इप्टा संस्था की गतिविधियों व उसके परिवार से परिचय कराता है। रेखा जैन से उषा आठवले की बातचीत कला जगत में उनके योगदान के बारे में अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान करती है। अन्य समाचारों में ‘इप्टा में रहकर सीखा अनुशासन, लगन और डिवोशन’ तथा ‘रंगआधारः भोपाल का ग्यारहवां नाट्य समारोह’ पठनीय व जानकारी परक हैं।

Friday, October 15, 2010

हिंदी सहित्य में ‘पंजाबी संस्कृति’ ?

पत्रिका: पंजाबी संस्कृति, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: डाॅ. राम आहूजा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू.(.वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0124.2582115, सम्पर्क: एन 115, साउथ सिटी, गुड़गांव 122.001 हरियाणा
साहित्यिक पत्रिका पंजाबी संस्कृति के समीक्षित अंक में कुछ अच्छी व संग्रह योग्य रचनाआंे का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं - संतोष(ओमप्रकाश बजाज), कहानी रक्षा कवच(जसविंदर सिंह विरदी), खुशियों वाली नदी(श्याम झंवर श्याम) शामिल हैं। मुकेश शर्मा, महेश राजा व प्रो. शामलाल कौशल की लघुकथाएं भी अच्छी हैं। पुरूषोत्तम यकीन, विनोद शर्मा, सुकीर्ति भटनागर एवं कंुदन सिंह सजल की कविताएं समसामयिक विषयों पर लिखी गई अच्दी कविताएं हैं। पत्रिका का सिरायकी खण्ड भी प्रभावित करता है।

Sunday, October 10, 2010

हिंदी साहित्य की स्वागत योग्य "पाण्डुलिपि"

पत्रिका : पाण्डुलिपि, अंक : जुलाईसितम्बर 2010(प्रवेशांक), स्वरूप : त्रैमासिक, प्रमुख संपादक : अशोक सिंघई, कार्यकारी संपादकः जयप्रकाश मानस, पृष्ठ : 380, मूल्य : 25रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल : pandulipatrika@gmail.com , वेबसाईट/ब्लॉग : http://www.pramodvarma.com/ , फोन/मो. 094241.82664, सम्पर्क : सिंघई विला, 7 बी, सड़क 20, सेक्टर 5, भिलाई नगर, 490006(छतीसग़)
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर ( CG) का प्रकाशन
पाण्डुलिपि पत्रिका के प्रवेशांक को देखकर यह कहा जा सकता है कि शीघ्र ही यह पत्रिका देश की प्रथम पंक्ति की साहित्यिक पत्रिका होगी। यद्यपि प्रवेशांक में वे सभी कमियां है जो किसी भी पत्रिका के प्रवेशांक में होती हैं। लेकिन इससे पत्रिका के स्तर में कोई कमी नहीं आई है। रचनात्मक रूप से पत्रिका समृद्ध है व उसकी सामग्री उपयोगी तो है ही पठनीय व संग्रह योग्य भी है। अंक में धरोहर के अंतर्गत ख्यात आलोचक लेखक प्रमोद वर्मा का आलेख हम कूं मिल्या जियावनहारा में ख्यात व्यंग्यकार परसाई जी पर संस्मरण में वर्मा जी ने उस दौर की वस्तुस्थितियों पर प्रकाश डाला है। विरासत के अंतर्गत पदुम लाल पुन्नालाल बख्शी, हजारी प्रसाद द्विवेदी के आलेख पुनः पॄकर साहित्य का नवीन पाठक हिंदी के प्रति अपनी सही राय बनाने में सफल रहा है। रवीन्द्र नाथ टैगोर, अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, प्रमोद वर्मा एवं हरि ठाकुर की कविताएं साहित्य के अतीत में ले जाती हैं। सुदर्शन की कहानी हार की जीत, फैज अहमद फैज की ग़ज़लें, हरिशंकर परसाई तथा लतीफ घोघी का व्यंग्य पत्रिका के भविष्य की योजनाओं पर संकेत करता है। नोम चामस्की का आलेख गैर टिकाऊ अविकास तथा खगेन्द्र ठाकुर का लेख पहला गिरमिटिया : जीवन की कला संग्रह योग्य हैं। पाब्लो नेरूदा, हेराल्ड प्रिंटर, स्तेफान स्पेण्डर, ओल्गा खर्लामिनोवा तथा रानी जयचंद्र की कविताओं का अनुवाद भी कुछ कमियों के साथ स्वीकार किया जा सकता है। अशोक वर्मा, रंजना जायसवाल, राजकुमार कुम्भज, लाला जगदपुरी, कुमार नयन, अनामिका, श्याम अविनाश, मोहन राणा, नवल किशोर शर्मा, भास्कर चौधुरी, प्रेमशंकर रघुवंशी, विनोद शर्मा, केशव तिवारी, निर्मल आनंद, विश्वजीत सेन, सुनील श्रीवास्तव, महेश चंद्र पुनेठा, युगल गजेन्द्र, त्रिलोक महावर, केशव शरण, अशोक सिंह, जयश्री राय, खनीजा खानम, रमेश सिन्हा, सरजू प्रकाश राठौर, सौमित्र महापात्र, वीरेन्द्र सारंग, वसंत त्रिपाठी, जनार्दन मिश्र, सुनीता जैन, रमेश प्रजापति एवं संजय अलंग की कविताएं पत्रिका का स्वरूप विस्तृत बनाती हैं तथा इस बात के लिये आस्वस्त करती हैं कि पाण्डुलिपि भविष्य में काव्य विधा पर विशेष सामग्री प्रकाशित करेगी। डॉ. ओम प्रभाकर, ज्ञानप्रकाश विवेक, इब्राहम खान गौरी अश्क, डॉ. श्याम सखा श्याम की ग़ज़लें अच्छी व पठनीय हैं। ख्यात कवि अशोक वाजपेयी, गीतकाल निदा फाजली, प्रसिद्ध कवि चंद्रकांत देवताले, ह्षिकेश सुलभ से साक्षात्कार स्तरीय हैं। प्रकाश कांत, राजेश झरपुरे, नरेन्द्र पुण्डरीक, संतोष श्रीवास्तव, संदीप कुमार, विनोद साब, विक्रम शाह ठाकुर, राधा कृष्ण सहाय, वासुदेव, सीतेश कुमार द्विवेदी, भगवती प्रसाद द्विवेदी, शैलेन्द्र तिवारी एवं आशा पाण्डेय की कहानियां अच्छी व गहन अध्ययन की मांग करती है। चीड़ों पर बिखरी हुई निर्मल चांदनी(अखिलेश शुक्ल) तथा कारमेल बीच यू.एस. ए.(रमणिका गुप्ता) डायरियां भी इस विधा में अपनी बातें बहुत अच्छी तरह से कह सकीं हैं। श्रीलाल शुक्ल, शंकर पुणतांबेकर, प्रेम जनमेजय के व्यंग्य तथा विनोद शंकर शुक्ल का व्यंग्य आलेख पॄने में रूचिकर हैं। डॉ. बालेन्दु शेखर तिवारी का व्यंग्य आलोचना लेख व्यंग्य कविताओं के जीवन मूल्यों की फिर से व्याख्या सफलतापूर्वक कर सका है। डॉ. अनिल कुमार, कृष्ण कुमार यादव व दिनेश माली के विविध विषयों पर लेख प्रभावित करते हैं। अश्विनी कुमार पंकज की कहानी गाड़ी लोहारदगा मेल में उन्होंने इस विधा के साथ कुछ नवीन प्रयोग किए हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं तथा समीक्षाएं भी अपेक्षित स्तर की हैं। पत्रिका का यह प्रवेशांक है इसलिए इसमें जो भी कमियां हैं उम्मीद की जाना चाहिए कि अगले अंकों में वे दूर हो जाएंगी। केवल यह कहकर की पाण्डुलिपि में ेर सारी कमियां हैं इसके महत्व व साहित्य मे सार्थकता को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। पाठकों को पत्रिका के आगामी अच्छे अंकों की प्रतीक्षा अवश्य रहेगी।

Friday, October 8, 2010

साहित्यिक पत्रिका ‘नागफनी’ का प्रवेशांक

पत्रिका: नागफनी, अंक: अगस्त-अक्टूबर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सपना सोनकर, पृष्ठ: 60, मूल्य: 15 रू.(.वार्षिक 60रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0135.6457809, सम्पर्क: दून ब्ल्यु कार्टेज, मसूरी 248.179 उत्तराखण्ड
साहित्यिक पत्रिका नागफनी का यह प्रवेशांक है। किसी पत्रिका के प्रवेशांक में अमूमन जो कमियां होती हैं वही सब इसमें भी है। लेकिन यह उत्तराखण्ड से प्रकाशित हो रही है व संपादक तथा अन्य सहयोगियों का प्रवेशांक के रूप मेें पहला कदम है इसलिए इसकी कमियों पर विचार न कर खूबियों को ध्यान में लाना आवश्यक हो जात है। अंक में रूपनारायण सोनकर, सुधीर सागर, मूलचंद सोनकर, मुकेश मानस, बी.एल. सोनकर, आर.एल. वणकर एवं अनिता भारती के आलेखों को स्थान दिया गया है। ख्यात कथाकार प्रेमचंद के नाम के आगे मंुशी का इस्तेमाल अब नहीं किया जाता है, पत्रिका ने पता नहीं क्यों पुरातन परंपरा का उपयोग किया है। रूपनारायण सोनकर की कहानी में ऐसा क्या है? जिसकी वजह से वह प्रेमचंद की ख्यात कहानी कफन के आगे की कहानी है। ओमप्रकाश वाल्मिकी की आत्मकथा जूठन एक ऐसी रचना है जिसमें समाज के दलित व शोषित वर्ग की पीढ़ी व्यक्त की गई है। जूठन जैसी रचनाएं हिंदी साहित्य में गिनी चुनी ही हैं। मूलचंद सोनकर, रजनी अनुरागी, रूपनारायण सोनकर व ओम प्रकाश वाल्मिकी की कविताएं प्रभावित करती हंैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं अभी प्रारंभिक अवस्था में है। फिर भी साहित्य जगत में एक और पत्रिका का आगमन हुआ है यह आश की जाना चाहिए कि भविष्य में नागफनी में अच्छी रचनाएं पढ़ने में आएंगी। पत्रिका की अनुक्रमणिका व विवरण के फोंट साइज में वृद्धि की जाना चाहिए। कलेवर तथा साज सज्जा के लिहाज से अभी काफी कुछ किया जाना शेष है।

Thursday, October 7, 2010

हिंदी साहित्य के पथ पर ‘‘व्यंग्य यात्रा’’

पत्रिका: व्यंग्य यात्रा, अंक: अपै्रल-सितम्बर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: प्रेम जनमेजय, पृष्ठ: 120, मूल्य: 20 रू.(.वार्षिक 100रू.पांच अंक), ई मेल: vyangya@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25264227, सम्पर्क: 73, साक्षर अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110.063
व्यंग्य साहित्य की प्रधान पत्रिका व्यंग्य यात्रा का यह अंक पंजाबी व्यंग्य साहित्य एवं ख्यात व्यंग्यकार शंकर पुणतांबेकर पर एकाग्र है। अंक में पंजाबी व्यंग्य पर संग्रह योग्य सामग्री का प्रकाशन किया गया है। इसके अंतर्गत के.एल. गर्ग, मंगल कुलजित, कन्हैया लाल कपूर, प्यारा सिंह दाता, गुरदेव चैहान, बलदेव सिंह व भगवान दास कहार के आलेख पंजाबी में लिखे गए व्यंग्य साहित्य व उसकी उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। शंकर पुणतांबेकर जी पर पत्रिका के संपादक प्रेम जनमेजय, सुधीर ओखवे, हरीश नवल, ओमप्रकाश शर्मा के लेख व पुणतांबेकर जी की व्यंग्य रचनाएं आज भी उतनी ही उपयोगी व समसामयिक हैं जितनी पूर्व में थीं। ख्यात व्यंग्यकार स्व. श्री जब्बार ढाकवाला को याद करते हुए ज्ञान चतुर्वेदी, लालित्य ललित व विनोद साब के लेख अच्छे हैं। अन्य व्यंग्यों में हरिपाल त्यागी, अनिल जोशी, मनोज श्रीवास्तव, ओम प्रकाश सारस्वत, गजेन्द्र तिवारी , अरविंद मिश्र, पिलकेन्द्र अरोड़ा व सुभाष राय में काफी अधिक गहराई व समाज के लिए कुछ न कुछ सकारात्मक संदेश है। शेष अन्य रचनाएं लगता है पत्रिका के पृष्ठ भरने के लिए प्रकाशित कर दी गई है। व्यंग्य विधा पर श्री शंकर पुणतांबेकर से तेजपाल चैधरी की बातचीत पत्रिका की सर्वश्रेष्ठ रचना कही जा सकती है जिसके माध्यम से पाठक को इस विधा पर उपयोगी जानकारी मिलती है। पत्रिक की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी अच्छी हैं। पत्रिका लगातार संयुक्त अंक के रूप में प्रकाशित हो रही है। इस महत्वपूर्ण पत्रिका को नियमित रूप से संपादक को प्रकाशित करना चाहिए भले ही इसके पृष्ठ कम ही हों।

Wednesday, October 6, 2010

शोधपरक पत्रिका ‘‘वाङ्मय’’ का नया अंक

पत्रिका: वाङ्मय, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. एम. फ़ीरोज़ अहमद, पृष्ठ: 72 , मूल्य:40रू.(.वार्षिक 150रू.), ई मेल: vagmaya2007@yahoo.co.in , वेबसाईट ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0941227331, सम्पर्क: बी-4, लिबर्टी होम्स, अब्दुल्लाह काॅलेज रोड़, अलीगढ़ 202002 उ.प्र.
शोध छात्रों एवं साहित्य के गंभीर पाठकों के लिए उपयोगी इस पत्रिका मंे गंभीर व ज्ञानवर्धक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं - देह और देश के दोराहे पर अज़ीजुन(डाॅ. परमेश्वरी शर्मा, राजिन्दर कौर), नगाड़े की तरह बजते शब्द(शांति नायर), रामचरित मानस की काव्य भाषा में रस का स्वरूप(वंदना शर्मा), साहित्य सम्राटःमंुशी प्रेमचंद्र(डाॅ. मजीद शेख), मीराकंात एक संवेदनशील रचनाकार(अंबुजा एन. मलखेडकर), काला चांदःएक विवेचन(मो. आसिफ खान, भानू चैहान) के आलेखों में हिंदी साहित्य की विचारधाराओं व चिंतन को संक्षिप्त किंतु सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया गया है। समसकालीन परिपे्रक्ष्य में हिंदी की दशा एवं दिशा(डाॅ. रिपुदमन सिंह यादव), डाॅ. राही मासूम रज़ा के कथा साहित्य में विवाह के प्रति बदलते दृष्टिकोण(सलीम आय मुजावर) एवं मन्नू भण्डारी की कहानियों में आधुनिक मूल्यबोध(डाॅ. एन.टी. गामीत) विवरण तथा विश्लेषण का अच्छा समन्वय दिखाई देता है। हालांकि यह आलेख विशुद्ध रूप से शोध आलेख नहीं हैं किंतु शोध छात्रों के लिए संदर्भ का कार्य अवश्य ही करेंगे। संजीव ठाकुर, अलकबीर, मधू अग्रवाल एवं विजय रंजन की कविताएं विशेष रूप से प्रभावित करती है। अशफाक कादरी एवं नदीम अहमद नदीम की लघुकथाएं सामान्य सी लगीं। जय श्री राय की कहानी ‘उसके हिस्से का सुख’ एक अच्छी व याद रखने योग्य कहानी है। आजकल जयश्री राय लगातार अच्छी कहानियां लिख रहीं हैं। मूलचंद सोनकर के लेख में तल्खी अधिक व समन्वय कम दिखाई देता है।

Sunday, October 3, 2010

‘‘अरावली उदघोष’ का आदिवासी संस्मरण अंक

पत्रिका: अरवली उदघोष, अंक: जून 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बी.पी. शर्मा ‘पथिक’, अतिथि संपादक: हरिराम मीणा, पृष्ठ: 88, मूल्य: 20 रू.(.वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 0294.2431742, सम्पर्क: 448, टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313001 राजस्थान
विगत 22 वर्ष से लगातार देश भर के आदिवासियों के लिए संघर्षरत पत्रिका अरावली उद्घोष का यह अंक आदिवासी संस्मरण अंक है। देश के विभिन्न अंचलों में फैले आदिवासियों को विकास की मुख्य धारा में लाकर उनका कल्याण करना पत्रिका का ध्येय है। इसलिए पत्रिका समय समय पर आदिवासियों की पीड़ा व्यक्त कर उन पर विचार करने के लिए विशेषांक निकालती है। इसी श्रंखला में इस अंक मे आदिवासियों से संबंधित संस्मरणों, डायरियों तथा विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन किया गया हैै। सभी संस्मरण सहेज कर रखने योग्य हंै व प्रभावित करते हैं। मिजोरम में वे कुछ दिन(श्री प्रकाश मिश्र), दहकते बुलबुले(सुरेन्द्र नायक), मेरे लड़कपन के अविस्मरणीय नायक(भागीरथ), सावधान नीचे आग है(केदार प्रसाद मीणा), आदिवासियों की गोत्र भूमि....(मिनीप्रिया आर.) जैसे संस्मरणों में आदिवासियों से संबंधित विभिन्न रीति रिवाजों, परंपराओं तथा उनके संयमित-संतुलित जीवन पर विचारात्मक विश्लेषण किया गया है। अन्य संस्मरणों जैसे - लो आज गुल्लक तोड़ता हूं(राकेश कुमार सिंह), अंडमान की यात्रा 1 व 2 (नवजोत भनोत, बजरंग बिहारी तिवारी), मेरा सिंह भूमि का भ्रमण(विभूति भूषण महोपाध्याय), कितनी दूर है अभी रोशनी(स्वधीन) तथा अपातानियों के बीच एक शाम(राघवेन्द्र) में आदिवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली समस्याओं को उठाकर उनके समाधान सुझाने का प्रयास किया गया है। ऐस थे स्व. भैरोलाल कालाबादल(ख्यालीराम मीणा), जमीनी जंग के सहरिया(डाॅ. रमेश चंद्र मीणा) एवं प्रभाष जोशी एवं जनसत्ता का तीसरा पाठक(महादेव टाप्पो) में लेखक आदिवासियों को लेकर अति संवेदनशील हो जाता है व वह चाहता है कि किसी तरह से उनके कल्याण की तरफ सरकारें गंभीरता से ध्यान दें। उनसे मिला अपनापन(अखिलेश शुक्ल), काजू बादाम खाने वाली गांधी जी की बकरी(लक्ष्मणगायकवाड़), बस्तर में कुछ दिन(चंद्रकांत देवताले) के संस्मरण कथा से लगते हैं व आदिवासियों की निजी जिंदगी में झांककर उनके संस्कारों से आम पाठक को परिचित कराते हैं। श्रीमती रचना गौड़ एवं स्वामी वाहिद काजमी की कहानियां संस्मरणात्मक कहानियां हैं जिनमे आदिवासी जीवन व उनक संघर्ष के दर्शन होते हैं। अतिथि संपादक हरिराम मीणा जी का गहन विश्लेषण युक्त संपादकीय समीक्षित अंक का सार प्रस्तुत करता है। एक अच्छी पत्रिका का उत्कृष्ट अंक देने के लिए पत्रिका की टीम बधाई की पात्र है।