Thursday, September 30, 2010

पत्रिका ‘काफ़िया’ का नया अंक आपके लिए

पत्रिका: काफिया, अंक: 05 वर्ष.2010, स्वरूप: मासिक, प्रबंध संपादक: फ़कीर चंद जालंधरी, प्रधान संपादक: मधुसूदन, पृष्ठ: 40, मूल्य: उपलब्ध नहीं(.वार्षिक उपलब्ध नहीं ), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 09815888058, सम्पर्क: काफ़िया भवन 5, रमेश कालोनी, जालंधर पंजाब,
ग़ज़ल विधा पर एकाग्र पत्रिका के इस अंक में प्रगतिशील विचारधारा से युक्त कुछ अच्छी ग़ज़लों का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका के इस अंक में तुली फकीर चंद जलंधरी, राजेन्द्र तिवारी, अखिलेश तिवारी, इक़बाल हुसैन इकबाल, ख्याल खन्ना एवं विपिन विहारी की ग़ज़लें प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पठनीय है।

गहन विमर्श की गंभीर पत्रिका-‘पूर्वग्रह’

पत्रिका: पूर्वग्रह, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ: 132, मूल्य:30रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bharatbhavan.org/ , फोन/मो. 0755.2660239, सम्पर्क: भारत भवन न्यास, जे. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स भोपाल म.प्र.

पत्रिका पूर्वग्रह ने संपादक श्री प्रभाकर श्रोत्रिय के मार्गदर्शन में नया आकार ग्रहण किया है। जिससे इसकी रचनात्मकता के साथ साथ पाठकों के द्वारा स्वीकार्यरता में वृद्धि हुई है। अंक में स्मरण के अंतर्गत ख्यात साहित्यकार संपादक विजय बहादुर सिंह का आलेख शमशेर की शमशेरियत तथा प्रयाग शुक्ल जी का लेख मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता(ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल के समग्र पर एकाग्र) पत्रिका की अत्यंत महत्वपूर्ण व संग्रह योग्य रचनाएं हैं। अन्य आलेखों में कबीर काव्य की उत्तर मीमांसा(श्रीकांत उपाध्याय), भाषिक संप्रेषण और कविता की संप्रेषणीयता(कृपाशंकर सिंह) एवं छद्म प्रगतिशीलता और तीसरी भक्ति का्रंति(विनोद शाही) में विषयों पर गहन गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। कृति विमर्श के अंतर्गत प्रकाशित आलेख संबंधित कृतियांे का विश्लेषण करने के साथ साथ उनकी पाठकों के लिए उपयोगिता भी स्पष्ट करते हैं जिसकी आज अत्यधिक आवश्यकता है। इसके अंतर्गत अपने अपने अजनबी(रमेश दवे), कबीर अध्ययन की एक नई दिशा(प्रभात त्रिपाठी), एक रक्षिता के जीवन में नारीवादी हस्तक्षेप(मोहन कृष्ण वोहरा), साम्राराज्यवादी शक्तियों के प्रतिरोध की दो क्लासिक्स(पुष्पपाल सिंह) एवं कभी अकेले में मुक्ति नहीं(कुमार विश्वबंधु) में वह सब कुछ है जो हिंदी के शोध छात्र से लेकर गंभीर पाठक के लिए उपयोगी है। ध्रुव शुक्ल, अनामिका, कुमार वीरेन्द्र एवं विस्वाव शिम्बोसर्का की कविताएं बदलते समाज की जरूरतों पर अपने विचार रखती हुई कुछ नया करने की अपेक्षा करती है। क्षमा कौल की कहानी, कमल वशिष्ठ का रंगमंच पर आलेख एवं वसंग निरगुणे का लोक कथाओें पर आलेख पत्रिका की उपलब्धि कही जा सकती है। अन्य रचनाएं एवं पुस्तक समीक्षाएं पठनीय होने के साथ साथ जानकारीपरक भी हैं।

Wednesday, September 29, 2010

‘केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका’ का नया अंक

पत्रिका: केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका, अंक: जनवरी2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. एस. चंद्रशेखर नायर, पृष्ठ: 22, मूल्य:20रू.(.आजीवन 1000रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0471.2541355, सम्पर्क: श्री निकेतन, लक्ष्मीनगर, पोस्ट पट्टम पालस, तिरूवनन्तपुरम, 615.004 केरल
यह जानकर अत्यधिक आत्मिक शांति मिलती है कि केरल से भी हिंदी साहित्य की कोई पत्रिका निकलती है। चंद्रशेखर नायर द्वारा संपादित पत्रिका के इस अंक में के.बी. पाजी द्वारा लिखित मार्मिक आलेख मधुर संकल्पों को पीछे छोड़कर प्रकाशित किया गया है। यह आलेख पत्रिका के आजीवन सदस्य शरतचंद्र पर एकाग्र है। पुष्पेन्द्र दुबे का आलेख पंत और बिनोबा के विचारों का तुलनात्मक आकलन अत्यधिक विचारवान लेख है। बद्रीनारायण तिवारी ने आचार्य रामानुज संक्षिप्त किंतु उपयोगी व पठनीय लेख लिखा है। दलित कहानीकार प्रेमचंद्र(चंद्रभान सिंह यादव), भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक ऋषि अगस्तय(एम.शेषन), सामाजिक स्तरीकरण एवं संबोधन शब्द(सिंधु एस.एल.), हिंदी साहित्य के विकास में सरस्वती का योगदान(आशाराणी), एक इंच मुस्कानःएक नया प्रयोग(सविता पी.एस.) गैर हिंदीभाषी लेखकों द्वारा हिंदी में मौलिक रूप से लिखे गए आलेख हैं इनका स्तर हिंदी की अच्छी व स्तरीय रचनाओं से कहीं अधिक स्तरीय है। बी.गोविंद शेनाय की लघुकथा, आचार्य विष्णुदत्त का आलेख व डाॅ. वीरेन्द्र शर्मा की अक्षरगीता प्रभावित करती है।

Tuesday, September 28, 2010

सत्-साहितय शोध मासिकी-‘साहित्य सागर’

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 240रू.), ई मेल: kksaxenasahityasagar@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया भोपाल म.प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात साहित्यकार सुखदेव सिंह कश्यप पर एकाग्र है। अंक में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर चंद्रसेन विराट, सूर्यकांत नागर, चंद्रभान भारद्वाज, सतीश दुबे, गिरेन्द्र सिंह भदोरिया प्राण ने सार्थक आलेख लिखे हैं। महेन्द्र अग्रवाल, सत्यनारायण सक्सेना एवं हर्षवर्धन पाठक के आलेख प्रभावित करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व सामग्री उपयोगी है।

Monday, September 27, 2010

पाखी: पहली पारी, अपूर्व जोशी, 24 शानदार अंक, रिटायर्ड फार मिशन आफ्टर 2010

पत्रिका: पाखी, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 240रू.), मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट/ब्लाग: www.pakhi.in , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर-61, नोएडा 201303
पाखी का समीक्षित अंक अपूर्व जोशी के संपादन में प्रकाशित होने वाला अंतिम अंक है। उन्होंने संपादकीय में स्पष्ट किया है कि आगामी अंक से संपादन प्रेम भारद्वाज करेंगे। उनके मन में कुछ नई योजनाएं हैं जिसके चलते वे संपाकीय से मुक्त होना चाहते हैं। वे अपनी योजनाएं स्पष्ट कर देते तो पाठकों को अपार संतुष्टि मिलती।
समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में समाज से किसी वजह से छिटके हुए लोगों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त की गई हैं। इस भाव को आदमी का बच्चा(जयश्री राय), सड़क जाम(दिलीप कुमार), सारी मां(स्मिता श्रीवास्तव) एवं केशव बाबू क्यों केशव बाबू हैं(उन्मेष कुमार सिन्हा) की कहानियों में महसूस किया जा सकता है। जयश्री राय ने कहानी आदमी का बच्चा में स्पष्ट किया है कि आज आम आदमी किस कदर बाजारवादी मानसिकता से बंधा हुआ है। स्मिता श्रीवास्तव ‘सारी मां’ के माध्यम से मां की ममता को अपने जन्म लेने की पीड़ा से व्यक्त करना प्रारंभ करती हैं। उसके पश्चात वे मां के माध्यम से इस ममता की मूर्ति के प्रति अपनी सद्भावनाएं प्रगट करती हैं। अमरकांत की कहानी ‘जिंदगी और जोंक’ उस दौर की कहानी है जब जीवन में पीड़ा जोंक के रूप में विद्यमान थी। तब से लेकर आज तक हालातों में कोई तब्दीली नहीं आई है। निशांत, मनोज कुमार झा, कुमार अनुपम, रोहित प्रकाश, आतुतोष चंदन, मृत्यंुजय प्रभाकर एवं मंजुलिका मिश्रा की कविताएं जीवन के संघर्ष एवं पीड़ा को नए ढंग से पेश करती दिखाई पड़ती हैं। इन कविताओं में न तो बाजारवाद की चमक है और न ही प्राचीन भारतीय परंपरा को तोड़ने की कोई महत्वाकांक्षा। इनमें समाज से जिंदगी में समय के अनुरूप रद्दोबदल करने की कामना है। कृष्ण बिहारी और स्वतंत्र मिश्र के आलेख राय प्रकरण पर आखों देखा हाल जैसे लगते हैं। अब इसे बिभूतिनारायण जी एवं रवीन्द्र कालिया जी की माॅफी के समाप्त माना जाना चाहिए। इसी में साहित्य और हिंदी भाषा की भलाई है। राजीव रंजन गिरी ने पल्लव जी के संपादन में प्रकाशित पत्रिका बनास की एक तरह से समीक्षा ही की है। जिसमें उपन्यास सृजन व उसकी ग्राहयता पर काफी कुछ लिखा गया है। इस बार पुण्य प्रसून वाजपेयी का आलेख ‘पीपली लाईव से लुटियन लाइव’ नए बोतल में पुरानी शराब जैसा लगा। इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो उल्लेखनीय हो। विनोद अनुपम ने अलबत्ता ‘सिनेमा के संत का अवसान’ नामक अच्छा लेख लिखा है। प्रेम भारद्वाज का आलेख ‘मेरी मुश्किलों का हल’ में वे भले ही कोई हल न ढूंढ सके हो लेकिन आने वाले समय में पाखी का संपादन करते हुए अच्छी वजनदार रचनाओं(नामी गिरामी नामों से प्रभावित हुए बगैर) का ढूंढना ही होगा। उप संपादक प्रतिभा कुशवाहा अब ब्लाग एक्सपर्ट हो गई है। उन्होंने ‘नारायण नारायण .. ’ जपते हुए विभूति नारायण राय प्रकरण का न्यायोचित समाधान दिया है।
पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी प्रभावित करती हैं। अब वन डाउन संपादक प्रेम भारद्वाज जी की धुआधार पारी का इंतजार है।

Sunday, September 26, 2010

साहित्यकारों के साथ साथ आम पाठक के ‘‘आसपास’’

पत्रिका: आसपास, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 16, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.dharohar.net/ , फोन/मो. 0755.2775129, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, भोपाल म.प्र.
सम्पर्क पत्रिका आसपास के इस अंक में वीरता के लिए पुलिस उप महानिरीक्षक एवं ख्यात साहित्कार अनुराधा शंकर सिंह को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मान का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। विचारणीय स्तंभ के अंतर्गत साहित्य और विजुअल मीडिया पर लिखा लेख काफी गंभीर है व आज के सदर्भ में मीडिया की जिम्मेदारी तय करता है। भारत भवन में प्रथम अंतराष्ट्रीय संवाद का आयोजन संबंधी समाचार मध्यप्रदेश में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों की जानकारी देता है। कवयित्री ममता तिवारी के कविता संग्रह के लोकापर्ण का समाचार उनके सृजन के संबंध में भी सार्थक व उपयोगी जानकारी देता है। मासिक साहित्यिक पत्रिका विचार आकलन के समाचार के साथ ही पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व संवाद हेतु प्रकाशित जानकारी आम पाठक के साथ साथ साहित्यकारों के लिए भी समान रूप से उपयोगी है।

Saturday, September 25, 2010

नए संकल्पों से ‘साक्षात्कार’

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: अपै्रल-मई 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रो. त्रिभुवन लाल शुक्ल़, पृष्ठ: 120, मूल्य:25रू.(.वार्षिक 250रू.), मेल: sahutya_academy@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0755.2554782, सम्पर्क: साहित्य अकादमी, .प्र. संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, बाणगंगा, भोपाल 3, .प्र.
मध्यप्रदेश से प्रकाशित महत्वपूर्ण पत्रिका साक्षात्कार के इस अंक में रचनाओं की विविधता स्वागत योग्य हैै। इस अंक में प्रेमशंकर रघुवंशी, वीरेन्द्र सिंह, ज्योतिष जोशी एवं यश मालवीय के लेख साहित्य के माध्यम से आम जीवन को स्पंदित करते हैं। ख्यात आलोचक प्रो. रमेश चंद्र शाह एवं समीक्षक आलोचक श्री परमानंद श्रीवास्तव की डायरी इस अंक का विशेष आकर्षण है। प्रकाश मंजु, कमलकिशोर भावुक, प्रीति, सत्यपाल, राग तेलंग एवं पुरूषोत्तम दुबे की कविताएं समाज की विसंगतियों विदू्रपताओं पर विचार करती हुई उन्हें दूर करने े उपाय भी सुझाती हैं। कृष्ण शलभ, योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ की कविताएं दूसरे ढंग से अपनी बात रखती हैं लेकिन इनका स्वर भी समाज के बीच कहीं से रास्ता निकलता दीखता है। कहानियों में हे राम(चंद्रप्रकाश जायसवाल), छत्तीस घंटे(इंदिरा दांगी) एवं दो नन्हें पंख(इंदु बाली) बाजारकरण के बीच ‘दबंग’ हो चुके आदमी से पार पाने की जद्दोजहद करती दिखाई देती हैं। इंदिरा दांगी ने अपनी कहानी छत्तीस घंटे में समाज सेवा का ढोग कर रहे उसी ‘दबंग’ आदमी की नियत व उसकी खोट को उजागर करने का सफल प्रयास किया है। आरनाॅल्ड फाइन की कहानी ‘बटुआ’ का अनुवाद बालकृष्ण काबर एतेश कर कथा के भावों को अच्छी तरह से पकड़ने में कामयाब रहे हैं। शकुनतला कालरा का यात्रा विवरण, राहुल झा(नई कलम) की कविताएं तथा स्तंभ धरोहर के अंतर्गत अज्ञेय की कविताएं पुनः पढ़कर मानसिक अवसादों से मुक्ति मिलती है। पत्रिका में ख्यात साहित्यकार कथाकार विवेकी राय जी से वेद प्रकाश अमिताभ की बातचीत उनके लेखन के द्वारा नवीन रचनाकारों का मार्गदर्शन करने में सफल रही है। संपादक प्रो. त्रिभुवनलाल शुक्ल की कथन, ‘किसी भी विधा की कोई सामग्री तभी साक्षात्कार का हिस्सा बन पाएगी, जब उसमें समाज को कुछ देने की सामथ्र्य होगी।’ पढ़कर तसल्ली मिलती है कि शीघ्र ही साक्षात्कार खोया हुआ स्थान पुनः प्राप्त कर लेगी।

Friday, September 24, 2010

शगुफ़्ता नियाज़ का ‘‘अनुसंधान’’

पत्रिका: अनुसंधान, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः शगुफ़्ता नियाज़, पृष्ठ: 80, मूल्य:40 रू.(.वार्षिक 150रू.), ई मेल: shaguftaniyaaz@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09412277331, सम्पर्क: बी-4, लिबर्टी होम्स, अब्दुल्लाह कालेज रोड़, अलीगढ़ 202002 उ.प्र.
अनुसंधान हिंदी के साथ साथ भारतीय भाषा व साहित्य के लिए गौरव है। पत्रिका के स्तरीय शोध आलेख शोधार्थियों एवं आम पाठकों की जिज्ञासा समान रूप से शांत करते हैं। अंक में प्रकाशित आलेखों में मिस्टर जिन्ना: इतिहास और पुनर्सृजन(डाॅ. परमेश्वरी शर्मा, राजिन्दर कौर), ब्रज का ऐतिहासिक एवं सांस्कृति स्वरूप(डाॅ. शिवचंद प्रसाद), सूरदास के सूरसागर मंें कृष्ण लीला(पूजा) एवं डाॅ. नामवर सिंह की माक्र्सवादी आलोचना(हरमन सिंह) प्रत्येक दृष्टि से विचार योग्य आलेख हैं। समकालीन कहानी का पारिस्थिक पाठ(डाॅ. शांति नायर), जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक: राष्ट्र के संदर्भ में नारी(बबिता के), महिला नाटक साहित्य: एक विकास यात्रा(अंबुजा एन. मलखेड़कर) तथा हरिवंशराय बच्चन: कवि के रूप में(गीताबहन के. झणकाट) अच्छे जानकारीपरक आलेखों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं। परंपरा और आधुनिकता के बीच हिचकोले लेती नारी: अमृता प्रीतम के उपन्यासों के संदर्भ मंे(गिरीश ए. सोलंकी), आत्म-साक्षी: लाभ और लोभ से साक्षात्(मृत्यंुजय पाण्डेय), महाभोज उपन्यास स्वातंत्रयोत्तर राजनीति का प्रामाणिक दस्तावेज(डाॅ. एन.टी. गामीत) तथा उद्योग और व्यवसाय: ऐतिहासिक पर्यवेक्षण(गीता) अपने अपने विषयों का अच्छा विश्लेषण कर सके हैं। पत्रिका का संपादकीय भारतीय नारी की दशा एवं दिशा पर काफी कुछ कहकर गंभीर बहस की मांग करता है। यह संग्रह योग्य अंक प्रत्येक हिंदी प्रेमी की डेस्क पर होना चाहिए।

Thursday, September 23, 2010

साहित्य में प्रासंगिकता सदैव विद्यमान रहती है-‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादकः रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ चैकी, शिमला 5
हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित पत्रिका हिमप्रस्थ देश भर की साहित्यिक प्रतिभाओं को प्रमुखता से स्थान देती रही है। पत्रिका के इस अंक में किन्नौर में विवाह प्रथा(दिनेश कुमारी), हिमाचल की संघर्ष यात्रा(देवेन्द्र गुप्ता), डाॅ. यशवंत सिंह परमार: एक स्मृति शेष(श्रीनिवास श्रीकांत), क्वींस बेटन रिले का रोमांचकारी सफर(शमा राणा), पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी कालजयी कहानीकार(जयकरण) एवं हिमाचल प्रदेश प्रगति एवं स्वाबलंबन की ओर अग्रसर(मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल) लेख आकर्षित करते हैं। कहानियांे में चाबी(डाॅ. दिनेश चमोला ‘शैलेश’) एवं धरती मां का शाप(साधुराम दर्शक) सहित हन्दा(जसविंदर शर्मा) अच्छी व पठनीय हैं। मदमोहन शर्मा एवं प्रेम बिज की लघुकथाएं स्तरीय हैं। वंदना राणा, वीणा रैना, डाॅ. आदर्श, पवन चैहान, रचना गौड़ भारती एवं देवांशु पाल की कविताएं आम आदमी को खास बनने के लिए प्रेरित करती हैं। डाॅ. ओमप्रकाश सारस्वत का व्यंग्य आम आदमी खास आदमी’ कुछ अधूरा सा लगता हैं। अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी पढ़ने योग्य हैं।

‘समावर्तन’ का ख्यात व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल पर एकाग अंक

पत्रिका: समावर्तन, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक अध्यक्ष: रमेश दवे, प्रधान संपादक: मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 90, मूल्य:25रू.(.त्रैवार्षिक 250रू.), मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन .प्र.
पत्रिका समार्वतन का समीक्षित अंक ख्यात व्यंग्यकार उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल जी पर एकाग्र है। शुक्ल जी हरिशंकर परसाई, रवीन्द्रनाथ त्यागी एवं शरद जोशी की परंपरा के व्यंग्यकार हैं। उनके समग्र लेखन व साहित्यिक यात्रा पर विनोद शाही, जवाहर चैधरी, रवीन्द्रनाथ त्यागी, गिरीश रस्तोगी, दामोदरदत्त दीक्षित ने सारगर्भित लेख लिखे हैं। श्रीलाल शुक्ल जी से साक्षात्कार के अंश नए लेखकों के उपयोगी हैं। अनिता सिंह चैहान,इन्दुप्रकाश कानूनगो तथा लघुकथाओं में प्रतापसिंह सोढ़ी एवं रामसिंह यादव प्रभावित करते हंै। ख्यात रंगकर्मी गिरजा देवी पर एकाग्र परिशिष्ट उपयोगी व संग्रह योग्य है। ख्यात आलोचक परमानंद श्रीवास्तव, राग तेलंग, संदीप राशिनकर के लेख रंग की छटाओं को बिखरने में पूर्णतः सफल रहे हैं। कमल किशोर गोयनका, प्रमोद त्रिवेदी एवं सूर्यकांत नागर के लेख पत्रिका की शानदार प्रस्तुति है। समावर्तन की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं एवं समाचार भी इसे एक स्तरीय साहित्यिक, कलात्मक पत्रिका का दर्जा प्रदान करते हैं।

Wednesday, September 22, 2010

राजस्थान से हिंदी साहित्य के लिए जरूरी ‘संबोधन’

पत्रिका: सम्बोधन, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः कमर मेवाड़ी, पृष्ठ: 92, मूल्य:20रू.(.त्रैवार्षिक 200रू.), ई मेल: not avilable , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09829161342, सम्पर्क: पो. कांकरोली जिला राजसमंद 313324 राजस्थान
44 वर्ष पुरानी राजस्थान से प्रकाशित साहित्यिक त्रैमासिकी संबोधन का समीक्षित अंक पहली नज़र में आकर्षित करता है। इतने लम्बे समय तक अनवरत रूप से पत्रिका प्रकाशन सचमुच साहस का विषय है। इस अंक में रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति की पांच कविताएं अपने आसपास के वातावरण को संबोधित करते हुए पाठक से संवाद करती चलती हैं। कृष्णा अग्निहोत्री से वेदप्रकाश की बातचीत साहित्य के नए मानदण्डों पर विचार करती दिखाई देती है। जयदेव पानेरी का आलेख तथा शीला इंद्र का संस्मरण पाठकों को इन विधाओं की ओर आकर्षित करते हैं। कुमार शिव,जितेन्द्र चैहान की कविताएं तथा अंजना संधीर, महेन्द्र प्रताप चांद एवं शबनम की ग़ज़लें इस विधा की नवीनतम तरीके से प्रस्तुति बन पड़ी है। मुकुल जोशी, दीप्ति गुप्ता एवं नसरीन बानो की कहानियां समाज मे नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे मानव से आग्रह करती है कि वह उन्नति के लिए उठ खड़ा हो तथा अपना व अपने पर्यावरण का विकास करे। बी. रामशेष की लघुकथाएं तथा पत्रिका की समीक्षाएं एवं अन्य रचनाएं प्रभावित करती हैं। का प्रस्तुतिकरण तथा साज सज्जा स्वागत योग्य है।

Sunday, September 19, 2010

शुभ तारिका का अगस्त अंक

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादकः उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 38, मूल्य:12रू.(.वार्षिक 120रू.), मेल: , वेबसाईट/ब्लाग : उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप, -47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, 133.001 हरियाणा
पत्रिका के समीक्षित अंक को साहित्य की सभी विधाओं पर एकाग्र किया गया है। अंक में घमंडीलाल अग्रवाल, हेमंत यादव, कमलेश ठाकुर, तपेश भौमिक, योगेन्द्र नाथ शुक्ल, श्याम सुंदर सुमन, राजन शर्मा, आकांक्षा यादव एवं राजीव नामदेव की लघुकथाएं प्रकाशित की गई हैं। अशोक अंजुम, अक्षय गोजा, आरती वर्मा, सुषमा अयैर, जगतनाथ सहाय एवं समीम देवबंदी की कविताएं प्रभावित करती हैं। जमुना बीनी की कहानी, डाॅ रमेश चंद्र का व्यंग्य एवं कमल चैपड़ा का आलेख पत्रिका में पाठकों को कुछ नया प्रदान करते हैं। साहित्यकार निर्मला जौहरी पर एकाग्र परिशिष्ट उनके लेखन संबंधी उपयोगी जानकारी देता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं एवं पत्र आदि भी स्तरीय हैं।

Saturday, September 18, 2010

हिंदी राजभाषा कब बन पाएगी-दूर्वादल

पत्रिका: दूर्वादल, अंक: मई-अक्टूबर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः परमात्मानाथ द्विवेदी, पृष्ठ: 80, मूल्य:30रू.(.वार्षिक 1200रू.), ई मेल: durvadal@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 05542.284691, सम्पर्क: 703, रामबाग, गांधी नगर, बस्ती 272.001(उ.प्र.)
पत्रिका का समीक्षित अंक अच्छे व आकर्षक कलेवर के साथ पुनप्रकाशित हुआ है। पत्रिका का स्वरूप, रचनाएं तथा संपादन प्रभावित करता है। इस अंक में प्रकाशित साहित्यिक रचनाएं वर्तमान के संदर्भ तथा प्राचीन भारतीय साहित्य को अच्छी तरह से अभिव्यक्ति दे सकी है। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में नक्सली आतंवादः विहगावलोकन(कुलदीप नाथ शुक्ल), समसामयिक कविता का सामान्य परिदृश्य(स्व. हरिशंकर मिश्र), सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के नाटकों में राष्ट्रबोध(प्रो. मंजु त्रिपाठी), सूख रहा लोक संस्कृति का रस(माताप्रसाद त्रिपाठी) एवं हिंदी राजभाषा कब बन पाएगी(त्रिलोकी नाथ सिंह) में नवीनता के साथ साथ पठनीयता भी है। प्रकाशित कहानियों में लर्न एटीकेट(श्याम सुंदर चैधरी), लकीर(शिवकुमार यादव), नेम प्लेट(प्रमिला मजेजी) तथा लघुकथा डर(सुनीता जोशी) में आमजन के प्रति गहरी संवेदनाओं के दर्शन होते हैं। हरीश दरवेश, विभूतिधर द्विवेदी की ग़ज़लें, नज़्में तथा रामयज्ञ मोर्य के दोहे भी अच्छी रचनाएं हैं। किरन अग्रवाल, सुनीता जोशी, मंजूषा मिश्रा, संतोष कुमार तिवारी एवं सुशीला पुरी की कविताओं में जनचेतना का स्वर है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

Thursday, September 16, 2010

देश का भविष्य, देश की भाषा, देश के स्वाभिमान के साथ जुड़ा हुआ है-‘हिंदी चेतना’

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: जुलाई2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 78, ई मेल: hindichetna@yahoo.ca , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://hindi-chetna.blogspot.com/ , फोन/मो.ः (905)475-7165, सम्पर्क: 6 Larksmere Court, Markham, Ontario, L3R 3R1
पत्रिका का यह अंक नई साज सज्जा व कलेवर के साथ पाठकों के सामने आया है। अंक में प्रकाशित कहानियां विश्व समुदाय के सामने भारतीय समाज की पीड़ा को अभिव्यक्ति देती है। प्रमुख कहानियों में टेलीफोन लाईन(तेजेन्द्र शर्मा), पगड़ी(सुमन घई) एवं राम जाने(पंकज सुबीर) शामिल है। ख्यात लेखिका इंदिरा (धीर) वडेरा का प्रज्ञा परिशोधन पूर्ववर्ती अंकों की तरह आम आदमी की जिज्ञासा को शांत करने में पूर्णतः सफल रहा है। डाॅ. अंजना संधीर का स्तंभ ‘एक दरवाजा बंद हुआ तो दूसरा खुला’ एवं आत्माराम शर्मा का हिंदी ब्लाग पाठकों को नवीनतम जानकारियां उपलब्ध कराता है। सुधा गुप्ता का संस्मरण रिश्ता एवं शशि पाधा का दृश्य पटकथा पात्र आम पाठक के जेहन मंे कथात्मक रूप से अपनी अमिट छाप छोड़ता है। पत्रिका के दोनों व्यंग्य बहुत पहले से उन कदमों की आहट(समीर लाल समीर) एवं महानता को दौर(पे्रम जनमेजय) उत्कृष्ट रचनाएं हैं। इनमें व्यंग्य के माध्यम से आम भारतीय समाज की विसंगतियुक्त मनोवृत्तियों को उजागर किया गया है। जितेन्द्र सहाय का ललित निबंध दर्द क्लब समाज के दर्द एवं उसकी कसक को सरलता व सहजता के साथ प्रस्तुत कर सका है। जिंदा मुहावरे(डाॅ. एम. फ़ीरोजा खान) व दीपक मशाल की लघुकथाएं भी बारंबार पढ़ने योग्य हैं। बी. मरियम, इला प्रसाद, दिविक रमेश, गुलाम मुर्तजा, अदिति मजूमदार, वेद प्रकाश बटुक एवं प्रेम मलिक की कविताओं में विविधता होेते हुए भी वे समाज को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए प्रयासरत दिखाई देती हैं। काव्य संग्रह धूप से रूठी चांदनी(कवयित्री-डाॅ. सुधा ओम ढीगरा) की अच्छी व विश्लेषण युक्त समीक्षा डाॅ. पुष्पा दुबे ने की है। पुष्पा दुबे ने इन कविताओं के संबंध में बहुत सटीक बात कही है। काव्य संग्रह पढ़कर यह भलीभांति जाना समझा जा सकता है कि, ‘‘सुधा जी की काव्यनुभूतियां विस्तृत हैं। उनकी संवेदना स्त्री पीड़ा मेें मुखर होकर संबोधित होती है। इसलिए उनकी कविताओं में नारी संवेदना मूल स्वर बनकर उभरा है।’’ पत्रिका के प्रमुख संपादक श्याम त्रिपाठी जी का संपादकीय भारत में अंगे्रजी के दुष्प्रभावों व उसके उत्तरप्रभावों पर अच्छ ी तरह से प्रकाश डाल सका है। उनका कथन, ‘‘वे चीन जाते हैं तो चीनी सीखकर आते हंै, लेकिन भारत आते हैं तो उन्हें हिंदी सीखने की कोई जरूरत नहीं होती’’ स्पष्ट कर देता है कि भारत में हिंदी पूर्ण रूप से स्थापित होने के लिए आज भी संघर्षरत है।

Tuesday, September 14, 2010

साहित्य के लिए ‘गुंजन’

पत्रिका: गंुजन, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: जितेन्द्र चैहान, पृष्ठ: 96, मूल्य:50रू.(.वार्षिक 5अंक 250रू.),ईमेल:jchouhan@webdunia.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://patrikagunjan.blogspot.com/ , फोन/मो. 09165904583, सम्पर्क: पार्वती प्रकाशन, 73 ए, द्वारिकापुरी इंदौर म.प्र. 452.009
गुंजन म.प्र. से प्रकाशित होने वाली एक और साहित्यिक पत्रिका है। पत्रिका अनियतकालीन होते हुए भी वर्ष में इसके पांच अंक प्रकाशित किए जाते हैं। समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियां काठ का सपना(मुक्तिबोध) व पिंजरा(जयश्री राय), अच्छी रचनाएं हैं। पिछले लगभग एक वर्ष से जयश्री राय की यह चैथी कहानी पढ़ने में आई है जिसमें नवीनता के साथ साथ समाज के उत्पीड़न को व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। पत्रिका में कृष्ण बलदेव वैद्य की डायरी, निसार अहमद से साक्षात्कार व उनका आत्म कथ्य तथा विष्णु खरे का आलेख लौटना निसार अहमद का अन्य प्रभावशाली रचनाएं हैं। सुबोध होलकर, नरेन्द्र गौड़, जितेन्द्र श्रीवास्तव, संजय अलंग की कविताएं समाज को केन्द्र में रखते हुए बाजारवाद के दुष्प्रभावों से सचेत करती दिखाई देती है। स्वप्निल शर्मा, नवीन माथुर पंचैली, प्रदीप मिश्र के आलेखों को पढ़कर इनमें कुछ नयापन दिखाई नहीं देता है। एक तरह से इनमें लकीर को पीटने का ही प्रयास किया गया है। लगभग सभी लघुकथाओं में कोई नया विचार या दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता है। राधेश्याम पाठक, छगनलाल सोनी, प्रतिभा पुरोहित, अनुरूपा चैधुले, रेखा चमोली, बीना क्षत्रिय की कविताएं समाज व आसपास के वातावरण के प्रति खीज अथवा क्षोभ की अभिव्यक्ति लगती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं ठीक ठाक है। यह बात बड़ी अखरने वाली है कि पत्रिका केवल अपने सदस्यों की रचनाएं ही प्रकाशित करती है। इससे हो सकता है भविष्य में अच्छी रचनाएं पत्रिका को न मिल सके। फिर भी एक अच्छे व सुंदर कलेवर युक्त इस प्रकाशन का स्वागत किया जाना चाहिए।

Saturday, September 11, 2010

साहित्य के सुखदायक है ‘सुखनवर’

पत्रिका: सुखनवर, अंक: जुलाई-अगस्त2010, स्वरूप: द्विमासिक, संपादक: अनवारे इस्लाम, पृष्ठ: 48, मूल्य:255रू.(.वार्षिक 170रू.), ई मेल: sukhanwar12@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.sukhanwarpatrika.blogspot.com/ , फोन/मो. 09893663536, सम्पर्क: सी-16, सम्राट कालोनी, अशोका गार्डन, भोपाल 462.023 म.प्र.
हिंदी एवं उर्दू भाषा एवं साहित्य की साक्षा संस्कृति का साहित्य प्रकाशित कर रही यह पत्रिका अन्य हिंदी साहित्यिक पत्रिकाओं से हटकर है। इस अंक में सुरेश पंडित व डाॅ. सुधा दीक्षित के लेख साहित्य के साथ साथ भारतीय राजनीतिक दृष्टिकोण भी व्यक्त करते हैं। भगवान दास जैन, बलवीर राठी, निगार अजीम, शकी ल जमाली, सुमन अग्रवाल, वसीम मलिक, मंगल नसीम की ग़ज़लें अच्छी व पठनीय हैं। हरिशंकर अग्रवाल एवं जंगबहादुर श्रीवास्तव के गीत पत्रिका के स्तर में वृद्धि करते हैं। फ़रहत जहां, अंजुम उस्मानी एवं एजाज़ अहमद की कहानियों में आज के समाज व उसकी विसंगतियों पर विचार कर उन्हें दूर करने का आग्रह किया गया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व साक्षात्कार भी स्तरीय व पठनीय हैं।

Friday, September 10, 2010

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का ‘अगस्त 2010 अंक’

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: अगस्त2010, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादकः डाॅ.बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 56, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर कर्नाटक
दक्षिण की प्रमुख हिंदी पत्रिका मैसूर हिंदी प्रचार परिषद के समीक्षित अंक में आलेखों व अन्य रचनाओं का प्रस्तुतिकरण प्रभावित करता है। अंक में प्रेम की तीव्र अनुभूति और कालजयी साहित्य(एस.पी. केवल), हिंदी विश्व पटल पर(अनिरूद्ध सिंह सेंगर), हिंदी को आपका अपनत्व चाहिए(मोहन भारतीय), हिंदी से कैदियों के जीवन में जागी नई उमंग(अनिल सावले) उल्लेखनीय रचनाएं हैं। अन्य पठनीय रचनाओं में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली का प्रयोग(पी. के. जयलक्ष्मी), धूूमिल काव्य में विद्रोही चेतना(अमर सिंह वधान), डाॅ. फर्डिनाॅण्ड किटेल(प्रो. बी.के. ललिताम्बा), साहित्य के सामाजिक सरोकार प्रभावित करते हैं। प्रियंका सोनी, अंजु दुआ जैमिनी, एस.के. जैन लाॅगपुरिया, भानुदत्त त्रिपाठी मधुरेश, सतीश वर्मा, लालता प्रसाद मिश्र लाल की कविताएं आज के समाज की विसंगतियों को उजागर करने में सफल रही हैं।

Wednesday, September 8, 2010

बच्चों के लिए ‘अभिनव बालमन’

पत्रिका: अभिनव बालमन, अंक: जुलाई-सितम्बर10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः निश्चल, पृष्ठ: 48, मूल्य:15रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: abhinavbalmann@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09719007153, सम्पर्क: शारदायतन, 17/239 जेड़ 13/59, पंचनगरी अलीगढ़ उ.प्र.
पत्रिका का अंक बच्चों में पठन पाठन के प्रति रूचि जाग्रत करने में सहायक है। अंक में बाल रचनाकारों को प्रमुख रूप से स्थान दिया जाता है। इस अंक में भी श्रेष्ठा, आफरीन, अवनी, नेनसी जितेन्द्र, नेहा, परी, दीप्ती, मुकुल, कनिका, मयंक, पूनम, सुशांत, तान्या, उर्वशी आदि की रचनाएं शामिल की गई हैं। वरिष्ठ रचनाकारों में राकेश चक्र, गोपाल बाबू शर्मा, संजय कुमार, निश्चल, घमण्डीलाल, डाॅ. ब्रजनंदन वर्मा, योगेश कुमार, रश्मि बडवाल, शिवहरि गोस्वामी, सतीश नैन की रचनाएं बच्चों के लिए शिक्षाप्रद व ज्ञानवर्धक हैं। पत्रिका के विभिन्न स्तंभ के आलेख/रचनाएं भी बच्चों के बौद्धिक विकास में पूरी तरह से सहायक हैं। पत्रिका का कलेवर बच्चों को प्रभावित करता है।

Tuesday, September 7, 2010

ग़ज़ल समय के लिए सोचती है-‘समय के साखी’

पत्रिका: समय के साखी, अंक: जून-जुलाई10, स्वरूप: मासिक, संपादकः डाॅ. आरती, पृष्ठ: 66, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 220रू.), ई मेल: samaysakhi@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.samaykesakhi.in/ , फोन/मो. 9713035330, सम्पर्क: बी-308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल म.प्र. पत्रिका का समीक्षित अंक ग़ज़ल विधा पर एकाग्र है। अंक में विशेष रूप से दुष्यंत जी की ग़ज़लांे व उनपर एकाग्र रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। उनकी ग़ज़लें, पत्र, संस्मरण तथा उनपर एकाग्र आलेख उपयोगी व शोधरत छात्रों के लिए मार्गदर्शक हैं। किशन तिवारी, मोहन सगोरिया, मधु शुक्ला, अनुशपन उपयोगी हैं। ज़हीर कुरेशी पर एकग्र खण्ड व उनसे पारितोष मालवीय की चर्चा अच्छी बन पड़ी है। जीवन सिंह, शिवशंकर मिश्र, राजेन्द्र वर्मा व मेयार सनेही ने बहुत ही बारीकी से आलेखों में ज़हीर कुरेशी के मार्फत ग़ज़ल विधा के अतीत वर्तमान व भविष्य पर विचार किया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, आलेख भी प्रभावित करते हंै।

Sunday, September 5, 2010

स्त्री को स्त्री ही कहें तो बेहतर-‘कथन’

पत्रिका: कथन, अंक: जुलाई-सितबर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ: 98, मूल्य:25रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल: kathanpatrika@hotmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 011.25268341, सम्पर्क: 107, साक्षर अपार्टमेंटस, ए-3 पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110.065
साहित्य व संस्कृति के लिए समर्पित पत्रिका कथन के समीक्षित अंक में समाज के विभिन्न वर्गो की स्थिति का आकलन कर उनके उत्थान के लिए आग्रह करती कहानियों का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित कहानियों में मोक्ष(लक्ष्मी शर्मा), अंधी बहरी आस्था(उर्मिला शिरीष) एवं सब मिले हुए हैं(श्याम जागिड़) शामिल हैं। संतोष चैबे, मनोहर बिल्लौरे, मदन केशरी, श्रीराम दवे, रेखा चमोली एवं आशीष त्रिपाठी की कविताएं भी आज के वातावरण व अपसंस्कृति से लोगों को सचेत करती दिखाई देती है। आशुतोष दुबे की कविताएं तथा रज़ा हैद र का व्यक्ति चित्र पाठकों को बांधे रखने में पूर्णतः सफल रहे हैं। वंृदा करात के पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय की बातचीत स्त्री सशक्तिकरण के संदर्भ में कुछ नए प्रश्नों के साथ समाधान सुझाती है। सविता सिंह व उर्वशी बुटालिया के स्त्री सशक्तिकरण सबंधी विचार महज खानापूर्ती है, उनमें कुछ भी नयापन नहीं दिखा। जवरीमल पारख का स्तंभ परदे पर अवश्य ही समाज और पर्दे पर स्त्री की भूमिका पर गहन विचार प्रस्तुत कर सका है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।