Friday, July 30, 2010

समावर्तन का जुलाई 10 अंक

पत्रिका: समावर्तन, अंक: जुलाई2010, स्वरूप: मासिक, संपादकः रमेश दवे, पृष्ठ: 64, मूल्य:25रू.(.वार्षिक 250रू.), ई samavartan@yahoo.com मेलः , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोनः 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान उज्जैन म.प्र.
समावर्तन का समीक्षित अंक अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान उत्कृष्ट रचनाओं से परिर्पूण है। अंक में ख्यात आलोचक डाॅ. धनंजय वर्मा पर संग्रह योग्य सामग्री का प्रकाशन किया गया है। प्रमुख शैलेन्द्र कुमार शर्मा द्वारा लिखा गया है। ख्यात वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र पर एकाग्र इस अंक में उनकी चुनी हुई कविताएं, कहानी सीमा व अन्य सामग्री का प्रकाशन किया गया है। उनका आत्मसंघर्ष व अलका सिन्हा से साक्षात्कार पाठक को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करता है। सुनीता जैन व अमिताभ मिश्र की कविताएं आज के समाज पर विचार करती प्रतीत होती है। वक्रोक्ति के अंतर्गत ख्यात कवि विष्णु नागर पर सामग्री पठनीय व सहेज कर रखने योग्य है। उनसे बातचीत में उनके साहित्यिक जीवन की यात्रा के पढ़ावों के संबंध में उपयोगी जानकारी हासिल होती है। डाॅ. सूर्यबाला व बी.एल. आच्छा, हरीश कुमार सिंह, मृदुल कश्यप का व्यंग्य सार्थक व्यंग्य की श्रेणी की रचनाएं हैं। इनमें समाज के लिए कुछ न कुछ नया करने की प्रेरणा है। कार्टूनिस्ट सुधीर दर पर एकाग्र रचनाएं उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं से पाठक को परिचित कराती है। पत्रिका की कहानी मरजीवा(इंदिरा दांगी) समाज के संघर्ष व उसके दुख दर्द को अपनी वाणी प्रदान करती है। मोहम्मद आरिफ, राजेन्द्र सिंह साहिल की लघुकथाएं पठनीय बन पड़ी हैं। सतीश मेहता का आत्म कथ्य व ख्यात आलोचक डाॅ. ्रप्रभाकर श्रोत्रिय का उनपर एकाग्र लेख उनके जीवन से नजदीकी से परिचित कराता है। जवाहर चैधरी व सूर्यकांत नागर के लेख व विनय उपाध्याय की उनसे बातचीत पत्रिका की सार्थकता व स्वीकार्यता बढ़ाती है। कमलेश्वर साहू की कविताएं व राग तेलंग का लेख साहित्य से साहित्य को जोड़कर नया करने की प्रेरणा देते हैं। अग्रिम पंक्ति की इस पत्रिका का स्तर हर पाठक वर्ग के लिए संग्रह योग्य व पठनीय है।

Wednesday, July 28, 2010

जनतंत्र की सौगंध तुमको-‘साहित्य परिक्रमा’

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रबंध संपादकः जीत सिंह जीत, संपादकः मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 64, मूल्य:15रू.(.द्विवार्षिक 100रू.), ई मेलः shridhargovind@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोनः 0751.2422942, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क ग्वालियर
साहित्य की ख्यात पत्रिका साहित्य परिक्रमा के 42 वें इस अंक में पाठकों की रूचि को ध्यान मंे रखते हुए सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित आलेखांेे में गोस्वामी तुलसीदास(सोहनलाल रामरंग), आलोचना का सौन्दर्य विमर्श(डाॅ. कन्हैया सिंह), साहित्य संस्कृति का अंश है(डाॅ. विपिन आशर), काव्य लेखन में पसरी संवेदनशीलता(डाॅ. कृष्णमोहन पाण्डेय), प्रमुख हैं। प्रायः सभी कहानियां बाजारवाद की अपेक्षा पुरानी पीढी को वरीयता देने के साथ साथ नई पीढ़ी का भी पर्याप्त रूप से मार्गदर्शन करती हैं। इन रचनाओं में अइया(डाॅ. कामिनी), ढलान से गुजरते हुए(कुंदा जोगेलकर) एवं आशंकाओं के घेरे(कुंवर किशोर टण्डन) को शामिल किया जा सकता है। राधेलाल नवचक्र व सनत कुमार जैन की लघुकथाएं भी मनोरंजन के साथ साथ कुछ नया देते हुए मार्गदर्शन करती हैै। नरेन्द्र कोहली, डाॅ. बद्री प्रसाद पंचोली एवं राज चड्ढ़ा के व्यंग्य स्तरीय व विचार योग्य हैं। मधुर गंज मुरादाबादी सहित दयाकृष्ण विजयवर्गीय, शत्रुध्न प्रसाद, डाॅ. नसीमा निशा, सलीम अश्क, द्वारकालाल गुप्त, रमेश चंद्र शर्मा चंद्र, तनय चित्रांश, सुनीति वैस, राजकिशोर वाजपेयी, जगन्नाथ विश्व, डाॅ. ओम प्रकाश भाटिया की कविताएं प्रभावशाली व मनन योग्य हंै। श्री कैलाश चंद्र पंत का आलेख शंकर शरण की पुस्तक बुद्धिजीवियों की अफीम साम्यवार कुछ गहन विमर्श सामने लाता है। पत्रिका में प्रकाशित पुस्तक/संग्रह समीक्षा सहित अन्य रचनाएं भी उपयोगी व विचार योग्य हैं। जनतंत्र पर नए सिरे से विचार करता हुआ संपादकीय विशेष रूप से पढ़ने योग्य है।

Monday, July 26, 2010

प्रासंगिकता का प्रश्न-‘मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका’

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: जून 10, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादकः डाॅ.वी. रामसंजीवैया, गौरव संपादकः डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 48, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेलः brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोनः 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58 वेस्ट आॅफ कार्ड रोड, राजाजी नगर, बेंगलूरू 560.010 कर्नाटक
दक्षिण से प्रकाशित यह पत्रिका लगातार कम मूल्य में पाठकोपयोगी सामग्री उपलब्ध करा रही है। समीक्षित अंक में प्रकाशित आलेखों में - आज प्रश्न है प्रासंगिकता का(एस.पी. केवल), आज के विकास में हिंदी की भूमिका(कैलाश चंद्र जासवाल), अपने देश की राष्ट्रभाषा हिंदी होगी(प्रभुलाल चैधरी), हिंदी की आधुनिक रूप में उपयोगिता(श्रीमती मंजूनाथ), राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की महत्ता(डाॅ. महेश चंद्र शर्मा), हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का हिंदी साहित्य के विकास में योगदान(डाॅ. श्रीमती के. शांति), हिंदी की सांस्कृतिक परंपरा(गणेश गुप्त), कामायनी और तुलसीदास प्रबंधकाव्यों का तुलनात्मक अध्ययन(डाॅ. श्याम नंदन प्रसाद), यशपाल की कहानियों की भाषिक संरचना(डाॅ.बी.एल. नरसिंहम शिवकोटि), भारतवर्ष का अंग्रेजीकरण(डाॅ.मित्रेश कुमार गुप्त), राष्ट्रधर्मी अस्तित्ववादी चेतना(डाॅ. रंजना अरगडे), साहित्य के सौन्दर्य निकष पर कृष्णकांत के गीत(डाॅ. सूर्य प्रसाद शुक्ल) एवं कबीर की माया और तुलसी दर्शन(प्रो. ए. लक्ष्मीनारायण) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त चद्रभान राही की कहानी, जसविंदर शर्मा की लघुकथाएं एवं ओम रायजाद की ग़ज़ल एवं नरेन्द्र सिंह सिसौदिया की कविता प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं एवं पत्र-समाचार आदि भी इसे पाठक के लिए रूचिकर बनाते हैं।

Sunday, July 25, 2010

केवल 5रू. में इतना कुछ- ‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: जून 10, स्वरूप: मासिक, संपादकः रणजीत ंिसंह राणा,, पृष्ठ: 56, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 60रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोनः उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश पिं्रटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला 5, हिमाचल प्रदेश
पत्रिका के समीक्षित अंक में पाठकों के ज्ञानार्जन के लिए उपयोगी आलेखों का प्रकाशन प्रमुखता से किया जाता है। इस अंक मंे सुमित्रा नंदन पंत का काव्य संसार(डाॅ. लीमचंद), हिंदी कविता में राष्ट्रीय चेतना(डाॅ. रामनाराण सिंह मधुर), मीडिया और नारी(विजय लक्ष्मी भारद्वाज), कबीर और मानवतावाद(सुरेश उजाला) एवं रश्मिरथी में दलित चेतना पठनीय व संग्रह योग्य आलेख हैं। कहानियों में कंगन(रणीराम गढवाली), घर छोड़ने से पहले(डाॅ. आदर्श) एवं हरकारा(डाॅ. गुलाबचंद कोटडिया) सामाजिक चेतना की कहानियां हैं। नरेन्द्र कुमार उदास, प्रत्यूष गुलेरी, जसविंदर शर्मा एवं देवांशु पाल की लघुकथाएं भी पाठक को नए चिंतन की ओर ले जाती हैं। डाॅ .लीला मोदी, अरूण कुमार शर्मा, अशोक दर्द एवं रमेश सोबती की कविताएं अच्छी व पठनीय हैं। डाॅ. अशोक गौतम का व्यंग्य व ओम प्रकाश सारस्वत की समीक्षाएं भी पत्रिका के स्तर के अनुरूप हैं।

संवाद पत्रिका ‘आसपास’ का जुलाई अंक

पत्रिका: आसपास, अंक: जुलाई10, स्वरूप: मासिक, संपादकः राजुरकर राज, पृष्ठ: 12, मूल्य:5रू.(.वार्षिक 50रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.dharohar.net/ सम्पर्क: एच.03, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल म.प्र.
रचनाकारों की पसंदीदा संवाद पत्रिका आसपास का समीक्षित अंक उनके मध्य संवाद स्थापित करने का अच्छा माध्यम बनता जा रहा है। अंक में संग्रहालय की हाल ही में तैयार वेबसाइट, सिंधी साहित्य अकादमी का प्रभार मराठी भाषी को, पुलिस महानिदेशक आमजन तक पहुंचा रहे हैं साहित्य जैसे समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किए गए हैं। सम्मान के अंतर्गत ख्यात ग़ज़लकार शहरयार को डी.लिट., कपिल कुमार का अभिनंदन आदि जानकर प्रसन्नता हुई। हलचल के अंतर्गत प्रेमचंद जयंती पर संगोष्ठी, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन माॅरिशस में, जबलपुर में परसाई भवन का उद्घाटन आदि समाचार हमारे आसपास की हलचल व गतिविधों की जानकारी देते हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार प्रसंगवश आदि भी प्रभावित करते हैं।

साहित्य सागर का समाजसेवी स्वराज ग्रोवर पर एकाग्र अंक

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: जुलाई 10, स्वरूप: मासिक, संपादकः कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 2250रू.), ई मेल: kksaxenasahitasagar@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
साहित्य सागर का समीक्षित अंक होशंगाबाद की ख्यात समाज सेवी श्रीमती स्वराज ग्रोवर पर एकाग्र है। अंक में उनके व्यक्तित्व पर उल्लेखनीय सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में डाॅ. ब्रहमजीत गौतम, साज जबलपुरी, श्याम बिहारी सक्सेना, डाॅ. गार्गीशंकर मिश्र मराल व कमलकांत सक्सेना के आलेख प्रभावित करते हैं। स्वराज ग्रोवर पर एकाग्र आलेखों से उनके व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों के दर्शन होते हैं। उन के समग्र पर लिखे गए आलेखों में प्रमुख रूप से पं. गिरिमोहन गुरू, प्रो. नीलम खरे, सी.के. दीक्षित, डाॅ.शरद नारायण खरे, डाॅ. लता अग्रवाल एवं अन्य प्रसिद्ध लोगों के उनके संबंध में विचार उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने में पूर्णतः सफल रहे हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं व समाचार भी पिछले अंकों की तरह पठनीय बन पड़े हैं।

Saturday, July 24, 2010

थाली में जूठन, जूठन पर जुर्माना-‘साक्षात्कार’

पत्रिका: साक्षत्कार, अंक: 358,359, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादक: देवेन्द्र दीपक, संपादकः आनंद सिन्हा पृष्ठ: 120, मूल्य:30रू.(.वार्षिक 250रू.), ई मेल: sahitya_academy@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0755.2554782, सम्पर्क: साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, वाण गंगा, भोपाल-03, म.प्र.
पाठकों के मध्य लोकप्रिय पत्रिका साक्षात्कार के समीक्षित अंक में गिरीश रस्तोगी से उषा जायसवाल की बातचीत में उनके समग्र व्यक्तित्व के साथ साथ नाट्य विधा पर समुचित रूप से प्रकाश डाला गया है। सतीश मेहता, शंकर शरण, कृष्णदत्त पालीवाल एवं कमला प्रसाद चैरसिया वर्तमान समाज व उसे संदर्भ को अच्छी तरह उभारने में सफल रहे हैं। विजेन्द्र, प्रभात त्रिपाठी, प्रमोद त्रिवेदी की कविताएं व ओमप्रकाश सारस्वत के गीत पढ़ने में आनंद की अनुभूति कराते हैं। आस्टेªलिया की चर्चित लेखिका कार्मल बर्ड के उपन्यास का अनुवाद कुछ बोझिल सा हो गया है। लेकिन विद्या गुप्ता का यात्रा वृतांत तथा राजकिशोर राजन की कविताएं किसी भी वाद प्रतिवाद से परे हैं। पत्रिका की समीक्षाएं, पत्र, समाचार व अन्य रचनाएं भी उल्लेखनीय हैं। बस आवश्यकता है तो इस बात की कि पत्रिका नियमित रूप से निश्चित समय पर प्रकाशित होती रहे।

Friday, July 23, 2010

राजस्थान के लोकरंगों से रंगी पत्रिका ‘मोरंगे’

पत्रिका: मोरंगे, अंक: जनवरी-फरवरी10, स्वरूप: द्वैमासिक, संपादक: प्रभात, पृष्ठ: 48, मूल्य:उपलब्ध नहीं,, ई मेल: graminswm@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: www.graminshiksha.in , फोन/मो. 07462.233057, सम्पर्क: ग्रामीण शिक्षा केन्द्र, 3/155, हाउसिंग बोर्ड, सवाईमाधोपुर,
राजस्थानयात्रा फाउंडेशन आस्टेªलिया के वित्तीय सहयोग से प्रकाशित हो रही पत्रिका मोरंगे का समीक्षित अंक राजस्थानी साहित्य व संस्कृति से रचनाओं से परिपूर्ण है। अंक में मोनिका शर्मा, एकराज मीणा, मैना गुप्ता, राजेश कुमावत, अनूप मीणा, दिनेश शुक्ला, रेणु गूर्जर, नवीन अरोड़ा, वेणी प्रसाद शर्मा, चैथमल सेनी एवं अन्य, श्यामा चैधरी, भारती शर्मा, कर्मा-प्रियंका व अन्य, दशरथ नायक, रामधणी,सीमा, बीना, आदि के सुुंदर लोकगीतों व स्थानीय संस्कृति से युक्त रसपूर्ण रचनाआंे को स्थान दिया गया है। नरसी जी कौ भात जैसी प्राचीन लोक कथा को पत्रिका में नवीन रूप में धवले मीणा ने लिखकर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया है। लोक कवि व गायक धवले जी से बातचीत द्वारा उनके जीवन में उतार चढ़ाव की काफी कुछ जानकारी हासिल होती है। संपादक प्रभात का लोकगीतों पर एकाग्र संपादकीय भी पठनीय है।

Wednesday, July 21, 2010

साहित्य का दस्तावेज-‘वागर्थ’

पत्रिका: वागर्थ, अंक: जून2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 122, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 200रू.), ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bhartiyabhashaparishad.com/ , फोन/मो. 033.32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017
ख्यात साहित्यिक पत्रिका वागर्थ का जून 10 अंक प्रायः देश भर में देर से प्राप्त हुआ है। इस अंक में भी दस्तावेज के अंतर्गत प्रकाशित आलेख अपनी अलग छाप छोड़ते हैं। इनमें तुम्हारी जात पात की क्षय(राहुल सांकृत्यायन) व एक महापुरूष और एक जनकवि(कुबेरनाथ राय) प्रमुख है। ओड़िया के प्रतिष्ठित कवि सीताकांत महापात्र से साक्षात्कार(शंकरलाल पुरोहित से बातचीत) में उन्होंने कहा है- काल प्रवाह है, स्त्रोत है, धारा है कुछ भी कहा जाए एक ही है। अपनी बात में उन्होंने काल से संबंधित अवधारणा को सैद्धांतिकी का रूप दिया है। कविता के संबंध में उनके विचार हर भाषा व साहित्य के पाठकों को जानना चाहिए। हमीदा सालिब का मजाज़ लखनवी पर संस्मरण (अनुवाद-परवेज़ गौहर) में इस क्रांतिकारी शायर के कई रूप देखने में आते हैं। ध्रुव शुक्ल, प्रेमशंकर रघुवंशी, शहंशाह आलम, शैलेष, जितेेन्द्र श्रीवास्तव एवं रामजी यादव की कविताएं गंभीर होते हुए भी दुरूह नहीं है। शहरयार की डायरी पर दिलीप शाक्य की टिप्पणी एवं कांतिकुमार जैन का ललित निबंध जित देखो तित बांस ही बांस पढ़ कर सहेजने योग्य रचनाएं हैं। बुरहानपुर पर सुरेश मिश्र से बहुत ही परिश्रम से इतिहास लिखा है। रामविलास जी शर्मा के पत्र तन्मय शर्मा के बहाने(विजय मोहन शर्मा) पढ़कर रामविलास जी के विचारों को और भी निकटता से जाना जा सकता है। इस अंक की कहानियां ताला चाबी कहां है दी(मिथिलेश अकेला) एवं जश्न(लोकबाबू) अन्य रचनाओं की अपेक्षा कुछ कमजोर लगीं। इनकी अपेक्षा असमिया कहानी शून्यता की स्वप्न गाथा(गीताली वोरा, अनुवाद-दिनकर कुमार) एवं मलयालम कहानी बंजर भूमि (माधवी कुट्टी, अनुवाद-संतोष अलेक्स) अधिक सशक्त रचनाएं हैं। मुनव्वर राणा की ग़ज़ल तो प्रभावशाली है ही अखिलेश तिवारी भी कहीं से कम नहीं ठहरते। उन्होंने भी ग़ज़ल विधा का सही निर्वाहन किया है। पत्रिका की समीक्षाएं, अन्य रचनाएं व पत्र आदि भी वागर्थ पढ़ने के आनंद में वृद्धि करते हैं। पत्रिका का संपादकीय भी जानकारीप्रद व गंभीर चिंतन योग्य है।

Tuesday, July 20, 2010

अश्लीलता मुद्दा नही(ब्लागनामा)-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: जुलाई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू.(.वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर-61, नोएडा 201303
अग्रिम पंक्ति मंे स्थान बना चुकी साहित्यिक पत्रिका का समीक्षित अंक भी इसके पूर्ववर्ती अंकों के समाना रचनात्मकता से परिपूर्ण है। अंक में प्रकाशित कहानियां पाठकों को वर्तमान मंे रखते हुए भी अतीत से जोड़े रखती है। इनमें प्रमुख हैं- तरंगों के प्रेत(राकेश कुमार सिंह), कैरम की गोटियां(अचला बंसल), कहानी के बाद कहानी(मुकुल जोशी) एवं सोमेश भैया(दिनेश पाठक)। अंक में प्रकाशित कविताएं उत्तर आधुनिकता से आगे तो आगे बढ़ती है पर नई सदी के मानव की अदम्य इच्छा की अपेक्षा हकीकत को पुरजोर ढंग से व्यक्त करती है। रामजी यादव, रमेश प्रजापति, केशव त्रिपाठी, रमेश कुमार वर्णवाल व संजीत कुमार की कविताएं इस बात की साक्षी हैं। मृत्युंजय मिश्र, भानुमित्र तथा इंदु श्रीवास्तव की ग़ज़लें ग़ज़ल विधा के पैरामीटर पर सटीक बैठती हैं। लक्ष्मण सिंह विष्ट ‘बटरोही’ व दिनेश कर्नाटक के आलेख एक सार्थक बहस को लेकर अंजाम तक पहुचाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। अरूण कुमार प्रियम के आलेख में परिपक्वता की कुछ कमी दिखाई दी। राजीव रंजन गिरि, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद अनुपम, रवीन्द्र त्रिपाठी एवं पे्रम भारद्वाज अपने अपने आलेखों को गहन विश्लेषण तक ले जा सके हैं। प्रतिभा कुशवाहा ने ब्लाॅगनामा में एक बहुत ही संवेदनशील तथा गंभीर विषय को अपने आलेख का आधार बनाया है। अश्लीलता के मुद्दे पर गंभीर बहस की आवश्यकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी इसे आम पाठक की उत्कृष्ठ पत्रिका का दर्जा प्रदान करते हैं। पत्रिका के संपादकीय में प्रकाशित अज्ञेय जी की कविता ‘क्योंकि मैं’ वह सब कुछ कह देती है जो विवाद से परे है।

Monday, July 19, 2010

पाठकों को अवश्य ही रास आएगी ‘हंस’ की ऊंची उड़ान

पत्रिका: हंस, अंक: जुलाई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य:25रू.(.वार्षिक 2500रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.hansmonthly.in/ , फोन/मो. 011.41050047, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज नई दिल्ली .02
कथा प्रधान इस पत्रिका के समीक्षित अंक में जनसामान्य की भावनाओं को स्वर देने वाली कहानियों को स्थान दिया गया है। इनमें - एक बंूद सहसा उछली(अशोक गुप्ता), हिरकत(सुभाष शर्मा), गांगली उर्फ द ूसरा वामन अवतार(महावीर राजी), सौगात(उषा यादव) एवं रात के पहरी(बांग्ला कहानी/अमर मित्र, अनुवाद-रतनचंद रत्नेश) शामिल है। विचार योग्य लेखों में - नोबल प्राप्ति समाचार(गौतम सान्याल) एवं मध्यमवर्ग और साहित्य संस्कृति को शामिल किया जा सकता है। शेष आलेख पता नहीं क्या सोचकर हंस में शामिल किए गए हैं? जिंदा कहानी के अंतर्गत प्रकाशित कथा ‘कांच की बारीक दीवार ढहने के इंतजार में’ कहींे से भी जिंदा कहानी नहीं लगती है। इस बार की कविताएं अवश्य ही प्रभावित करती है। लगता है हंस की कविताओं व ग़ज़लों का स्तर दिन प्रतिदिन सुधरता जा रहा है। इनमें देवेन्द्र आर्य, अरूण आदित्य, शमीम हनफ़ी, अनिल पठानकोठी, सिद्धेश्वर रचनाओं का बहुत संुदर ढंग से निर्वाहन कर सके हैं। ‘बीच बहस में’ के अंतर्गत वरिष्ठ कथाकार लेखिका मैत्रेयी पुष्पा व नंदलाल जायसवाल के आलेख ही विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। शेष में कोई नवीनता नहीं दिखाई देती है। इस अंक में शीबा असलम फहमी का लेख आइए पर्दे और... पत्रिका की उड़़ान में सहायक हुआ है। पत्रिका की समीक्षाएं, पत्र समाचार व वरिष्ठ आलोचक लेखक नंद भारद्वाज का लेख पूर्व के अंकों की तरह प्रभावित करते हैं।

Sunday, July 18, 2010

संबोधन का वरिष्ठ कवि विष्णु नागर पर एकाग्र अंक

पत्रिका: संबोधन, अंक: अप्रैल-जून10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: क़मर मेवाड़ी, अतिथि संपादक: हरे प्रकाश उपाध्याय, पृष्ठ: 170, मूल्य:20रू.(.त्रैवार्षिक 200रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 02952.223221, सम्पर्क: पो. कांकरोली, जिला राजसमंद, 313324 राजस्थान
विगत 44 वर्ष से निरंतर प्रकाशित साहित्य की ख्यात पत्रिका संबोधन का समीक्षित अंक वरिष्ठ कवि व व्यंग्यकार, पत्रकार विष्णु नागर पर एकाग्र है। पत्रिका ने नागर जी के संपूर्ण कृतित्व को विभिन्न रचनाकारों के आलेख के माध्यम से पाठकों के सामने लाने का सफल प्रयास किया है। इस प्रयास में ख्यात पत्रकार, लेखक व कवि हरे राम उपाध्याय ने बड़ी ही कुशलता से संपादित किया है। इस पत्रिका में रचना सामग्री का प्रस्तुतिकरण व रचनाकारों द्वारा व्यक्त निष्पक्ष विचार अद्योपरांत इसे पढ़ने के लिए विवश करते हैं।
साहित्यकारों, पत्रकारों व लेखकों द्वारा नागर जी के मार्फत वर्तमान साहित्यिक परिवेश पर किए गए विचार-
-हमने चाहा कि उनको युवा आंखों से देखा जाए। इस दायित्व के लिए हमने युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय से निवेदन किया जिसे उन्होंने सहर्ष मान लिया। (क़मर मेवाड़ी, संपादक संबोधन)
-मेरी नजर में रघुवीर सहाय के बाद नागर एकमात्र ऐसेे कवि हैं जिन्होंने बहुत सारी विधाओं में लिखा और पर्याप्त लिखा। अपनी अलग सिग्नेचर ट्यून में। उनकी जो काव्य भाषा और उसकी भावभंगिमा है, उससे उनको किसी परंपरा में डालकर देखना जटिल है। (हरे प्रकाश उपाध्याय, अतिति संपादक)
-नाम कमाने की इच्छा से कभी कुछ नहीं लिखा। लेकिन लिखो तो थोड़ा नाम भी हो जाता है।टांग खिचाई, गुटबाजी, उपेक्षा से घबराने की जरूरत नहीं अपना काम ईमानदारी से करते रहें। (साक्षात्कार में व्यक्त विचार)
-उनकी कहानियां मुझे एक हंगेरियन कहानीकार इश्वान अर्केन की याद दिलाती है। (अस़गर वजाहत)
-उनके लिए भारत का मतलब भारत के गरीब लोगों से है। भारत के स्मारकों से नहीं। (मधुसूदन आनंद)
-कविता लिखे बिना हमें लगता था कि हमारी मुक्ति नहीं है। कविता के जरिए हम वह सभी कुछ हासिल कर सकते हैं जो हमारे पास नहीं है।(नरेन्द्र गौड़)
-मुझ जैसे अड़पेंच इंसान के साथ निभती भी आ रही है। शायद यही इस विष्णु नागर नामक इंसान की खूबी है। (राजकुमार केसवानी)
-नागर जी कविता में जितने सहज हैं, व्यंग्य में उतने ही तीखे और पत्रकारिता वैसे ही प्रखर गंभीर।(प्रेमचंद गांधी)
-उनकी कहानिया, कविताएं और व्यंग्य पढ़ने के साथ साथ कुछ समय साथ रहकर मैंने उनकी भलमनसाहत को देखा है। (पवन करण)
-अपने काम को निपुणता से करना और कराना दोनांें ही मंे विष्णु जी को महारत हासिल है। (सुरेश नीरव)
-वे रचना चयन के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं करते। (अतुल चतुर्वेदी)
-विष्णु नागर/एक संज्ञा नहीं/ विशेषण भी नहीं/एक क्रिया है। (दुर्गा प्रसाद झाला)
-बहरहाल मैं आपकी जगह होऊं तो विष्णु जी की डांट सुनकर भी पुलकित हो जाऊं। (प्रियदर्शन)
-विष्णु नागर हमारे समय के ऐसे कवि हैं जो राजनीतिक मकसद को केन्द्र में रखते हैं। उनकी कविताएं दुनिया की दास्तान बनने के रास्ते पर गमन करती हैं और भाषा मनुष्य को संबोधित है बेहतर जीवन की कामना में डूबी। (लीलाधर मंडलोई)
-वे सार्थक व्यंग्य लेखन में विश्वास रखते हैं। (प्रेम जनमेजय)
-वे कहीं भावुक नहीं होते, हमेशा बौद्धिक उपक्रम से तार्किकता का सहारा लेते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनमें संवेदना का पूरी तरह अभाव है। (कर्मेेेन्दु शिशिर)
-उनके व्यंग्य का अभिप्राय अपने समय और समाज तथा राजनीति की विडंबनाओं पर चोट करना रहा है। (राम निहाल गुंजन)
-उनकी कविता मंे मनुष्य जीवन के वृतांत का सूक्ष्म पर्यवेक्षण देखने को मिलता है। (एकांत श्रीवास्तव)
-वे व्यक्तिगत राग द्वेषों और गुटबंदियों में नहीं फंसते। विचार के स्तर पर जरूर तेवर दिखलाते हैं मगर व्यक्ति के स्तर पर लगातार विनम्र बने रहते हैं। (मदन कश्यप)
-उनकी पुस्तक ‘ईश्वर की कहानियां’ साहित्य को लोकप्रिय बनाती हैं। ऐसी लोकप्रियता जिसमें साहित्य की गंभीरता शामिल है।(विमल कुमार)
-विष्णु नागर की कविता धीरे से कभी कभी तो ‘अंडरटोन’ होकर अपनी बात कहती है। जो कि बातें कम, बातों का सार अधिक होती हैं। (पंकज पराशर)
-उनकी पुस्तक ‘ईश्वर की कहानियां’ पर गिरिराज किराडू के विचार- ईश्वर की हत्या करने के एक सौ चालीस तरीके।
-हर बड़ा और विचारवान कवि एक विशिष्ठ कालबोध रखता है और अपने ढंग से उसे व्यक्त करता है। विष्णु नागर के यहां भी इस तरह की अभिव्यक्ति को होना स्वाभाविक है। (शिरीष कुमार मोर्य)-अपने डिक्शन और संपे्रषणीयता के मामले में वे औरों से अलग हैं। (विशाल श्रीवास्तव)
-उनके यहां टेªजेड़ी भी है और उसे बिलकुल अलग ढंग से देखने का नजरिया भी। (शशिभूषण द्विवेदी)
-उनकी रचनाएं अर्थ के स्तर पर कई विविधताओं को अपने में समेटे हुए हैं। (उमाशंकर चैधरी)
-गहराई में उतरना और अपने लेख को गंभीरता का टच देना विष्णु नागर की पत्रकारिता की जान है। (पंकज चैधरी)
-तालाब में डूबीं छह लड़कियां-एक आत्मालापी पाठ।(अविनाश मिश्र)
-विष्णु नागर जी की कविताएं उन्हें एक सचेत एवं संवदेनशील कवि के रूप में पेश करती हैं। (राजीव कुमार)
पत्रिका संबोधन के कुशल व सार्थक संपादन के लिए कमर मेवाड़ी व अतिथि संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय बधाई के पात्र हैं। कथाचक्र परिवार की ओर से विष्णु नागर जी की उपलब्धियांे पर अशेष शुभकामनाएं एवं आभार।

Tuesday, July 13, 2010

विश्व में हिंदी की प्रगति के लिए तत्पर -‘हिंदी चेतना’

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: अप्रैल-जून10, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रमुख संपादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: डाॅ. सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 54, मूल्य:उपलब्ध नहीं, ई मेल: hindichetna@yahoo.ca , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.vibhom.com/ , फोन/मो. 905.475.7165, सम्पर्क:6, Larksmere Markham, Ontario, L3R, 3R1,
विश्व भर में अपनी विविधता पूर्ण साहित्यिक सामग्री एवं कलेवर के कारण विख्यात हिंदी चेतना का समीक्षित अंक पठनीय सामग्री से भरपूर है। पत्रिका में प्रकाशित रचनाएं हिंदी साहित्य जगत के विश्व समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हैं। अंक में प्रकाशित कहानियों में - उसके हिस्से का पुरूष(पुष्पा सक्सेना), खो जाते हैं घर(सूरज प्रकाश), खुल जा सिमसिम(सुषम वेदी) एवं तमाचे(प्रतिभा सक्सेना) है। अंक की कहानियां आम लोगों की जिंदगी के आसपास से गुजरती हुई उन्हें विकास की धारा में लाने का प्रयास करती दिखाई देती हंै। पत्रिका के व्यंग्य अपनी पैनी धार के साथ साथ पाठक के लिए चिंतन की पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत करते हैं। अथः अति उत्तर(पे्रम जनमेजय), अगले जन्म मोहे...(समीर लाल ‘समीर’) एवं प्रभु आप अपना नाम...(पाराशर गौड) इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह विधा समाज में आमूल चूल परिवर्तन लाने का प्रमुख हथियार है। कविताओं में रविकांत पाण्डेय, रचना श्रीवास्तव, सरस्वती माथुर, राजीव रंजन, योगेन्द्र शर्मा, नरेन्द्र टण्डन, ब्रजेश धारीवाल, बी.एल. श्रीवास्तव की कविताएं मानव मन को उझलनों से निकाल कर उन्नत भविष्य की ओर ले जाने का आग्रह करती दिखाई देती हैं। चांद शुक्ला की ग़ज़ल तथा सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, आचार्य संजीव सलिल, शशि पाधा एवं डाॅ. अफरोज ताज की रचनाएं उल्लेखनीय हैं। इंदिरा धीर बडेरा का प्रज्ञा परिशोधन अच्छी व शिक्षाप्रद जानकारी देता है जो किसी भी मनुष्य के चरित्र निर्माण के लिए आवश्यक है। साहित्यिक समाचार तथा अन्य रचनाएं पत्रिका को सर्वस्वीकार्य स्वरूप प्रदान करती हैं। प्रधान संपादक श्याम त्रिपाठी जी का संपादकीय हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए चिंतित दिखाई देता है तथा उसके विकास के लिए निरंतर कुछ न कुछ करने के लिए तत्पर हंै।

Monday, July 12, 2010

कविता का संकट : ‘पूर्वग्रह’

पत्रिका: पूर्वग्रह, अंक: 129 अप्रैल-जून10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ: 129, मूल्य:30रू.(वार्षिक 100रू.), ई मेल: bharatbhavantrust@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0755.2660239, सम्पर्क: भारत भवन न्यास, ज.स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स, भोपाल म.प्र.
कला संस्कृति के लिए समर्पित पत्रिका का यह अंक विविध पाथाकोउपयोगी सामग्री से युक्त है। अंक में कविता के वर्तमान संकट पर ‘क्या कविता संकट में है?’ पर परिचर्चा प्रकाशित की गई है। इस चर्चा में सुतिन्दर सिंह नूर, लीलाधर जगूड़ी, शशिकला त्रिपाठी एवं जयसिंह नीरद के कविता पर विचार प्रकाशित किए गए हैं। पठनीय आलेखों में- संस्कृत काव्यशास्त्रः युगीन नई स्थापनाएं(रेवाप्रसाद द्विवेदी), भारतीय विमर्शः परंपरा और आलोचना(कृष्णदत्त पालीवाल), शिलापट्ट का शिल्प समूह(रमेश कुंतल मेघ), नए साहित्यिक सिद्धांत का अंत(देवेन्द्र इस्सर) एवं भावों के लोकतंत्र का शुक्ल पक्ष(राजेन्द्र कुमार) प्रमुख हैं। जितेन्द्र नाथ पाठक ने रामचंद्र तिवारी:एक समीक्षादृष्टि आलेख में आलोचना के क्षेत्र में लेखक के योगदान पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। अतुलवीर अरोड़ा एवं महेन्द्र भानावत ने रंगमंच एवं लोक कला के विविध रूपों की सार्थक व्याख्या की है। पत्रिका का संग्रह योग्य व पठनीय आलेख डायरी के पन्नों से उस्ताद बिस्मिल्ला खां पर कुछ नोट्स(यतीन्द्र मिश्र) है। मोहन डेहरिया एवं राग तेलंग की कविताएं अपनी नवीनता के साथ साथ अपने शिल्प में आम जन की पीड़ा अभिव्यक्त करती है। पुस्तक समीक्षा खण्ड भी समीक्षकों की गहन दृष्टि व समीक्षित पुस्तकों की उपयोगिता से भलीभांति परिचित कराता है। इस खण्ड में रमेश दवे, प्रियदर्शन, परमानंद श्रीवास्तव, योजना रावत, रामेश्वर मिश्र पंकज एवं माधवेन्द्र की समीक्षाएं गहन विश्लेषण व्यक्त करती है।

Thursday, July 8, 2010

हैदराबाद से हिंदी साहित्य का ‘पुष्पक’

पत्रिका: पुष्पक, अंक: 12 सन् 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 116, मूल्य:75रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: misharaahilya@yahoo.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 040.23703708, सम्पर्क: 93सी, राजसदन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद 500.038
पत्रिका का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाआंें से युक्त है। अंक में सच्चाई की सीख(अहिल्या मिश्र), रसभरी(श्याम सखा श्याम), एक दूजेे के लिए(पवित्रा अग्रवाल), चबूतरा(प्रो. एस. शेषारत्नम्), मां की ममता(सरिता सुराणा जैन), मुल्तानी हाट का डाक्टर(कमला प्रसाद बेखबर), की समसामयिक कहानियां प्रमुखता से प्रकाशित की गई हैं। अंक में डाॅ. रमा त्रिवेदी, कृष्ण कुमार गोस्वामी, यासमीन सुल्ताना नकवी, प्रकाश सूना, रामगोपाल शर्मा दिनेश, डाॅ.शिवनंदन कपूर, सुषमा वैद, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, करूणेश अरोरा, अनुपमा दीप्ति, नलिनीकांत, राकेश खण्डेलवाल, ज्योति नारायण, कृपााशंकर शर्मा अचूक, राजेन्द्र बहादुर सिंह राजन, आर.सी. शर्मा एवं मधु शुक्ला की कविताएं आज के संदर्भ अच्छी तरह से उभार सकीं हैं। विनोदिनी गोयनका, शैलेश भारतवासी, डाॅ. दुर्गा नागवेणी, भगवान दास जोपट के आलेख व संपादक डाॅ. अहिल्या मिश्र की संग्रह समीक्षाएं पत्रिका के स्तर में अपेक्षित वृद्धि करती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, लघुकथाएं व पत्र आदि भी पठनीय व विचार योग्य हैं।

आपके लिए ‘समय के साखी’

पत्रिका: समय के साखी, अंक: मई 10, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. आरती, पृष्ठ: 60, मूल्य:20रू.(वार्षिक 220रू.), ई मेल: samaysakhi@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.samaykesakhi.in/ , फोन/मो. 9713035330, सम्पर्क: बी-308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल म.प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक उत्कृष्ट रचनाओं से परिपूर्ण है। अंक में ख्यात कथाकार रमेश दवे जी से साक्षात्कार प्रभावित करता है। उनकी कहानी सभ्यता आज के समाज व उसके वातावरण को सहज अभिव्यक्ति देती है। दीपक प्रकाश त्यागी का आलेख नयी कविता का काव्य चिंतन विषय वस्तु की विशद व्याख्या करने में सफल रहा है। राजीव नागदेव, हेमंत गुप्ता एवं सुबोध श्रीवास्तव की कविताएं भी अपने समय की सफल अभिव्यक्ति कही जा सकती है। विनोद साब की कहानी चालीस साल की लड़की एवं भवानी सिंह की कथा मकडियां भी कुछ नयापन लिए हुए हैं। पत्रिका की सबसे अधिक पठनीय रचना नाटक गंगाराम एम.बी.बी.एस. है जो प्रत्येक पाठका को अवश्य ही पसंद आएगी। शकूर अनवर व चंद्रमणि त्रिपाठी की ग़ज़लें भी उल्लेखनीय हैं। पत्रिका का व्यंग्य विधा पर एकाग्र संपादकीय इसे एक अच्छा व उपयोगी आलेख बनाता है। अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र एवं समाचार अपेक्षित स्तर के हैं।

Saturday, July 3, 2010

सृजन, संवाद और विचार का माध्यम-‘संचेतना’

पत्रिका: संचेतना, अंक: .01वर्ष 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: महीप सिंह, पृष्ठ: 56, मूल्य:20रू.(वार्षिक 75रू.), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25222888, सम्पर्क: एच 108, शिवाजी पार्क, पंजाबी बाग, नई दिल्ली-26,
ख्यात पत्रिका संचेतना के समीक्षित अंक में कथाकार व उपन्यासकार कुसुम अंसल के नवीन उपन्यास तापसी पर कृति विमर्श के अंतर्गत विचार किया गया है। उन्होंने स्वयं इसे कैसे व क्यों लिखा गया के अंतर्गत इसकी रचना प्रक्रिया पर अपने विचार रखे हैं। पत्रिका के संपादक महीप सिंह, ख्यात साहित्यकार रमेश दवे, मीरा सीकरी, सरोज वशिष्ठ एवं विजया ने उनके लेखन का विस्तार से विश्लेषण किया है। यशवंतकर संतोष कुमार लक्ष्मण ने अपने आलेख में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों पर अपनी बात रखी है। प्रवासी लेखिका उषा वर्मा से वंदना मुकेश की बातचीत में प्रवासी लेखकों की समस्याओं व उनके लेखन पर चर्चा अच्छी तरह पस्तुत की गई है। अब्दुल अलीम ने ख्यात उर्दू साहित्यकार ग़ज़ल गो नजीर अकबराबादी की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। कहानियों में जुम्मा(इकबाल अंसारी), गिद्ध और जानवर(कृष्णा श्रीवास्तव) एवं परिवर्तन(अखिलेश शुक्ल) आज के वातावरण में व्यप्त विसंगतियों की पड़ताल करती दिखाई देती हैं। सुनीता जैन, कुलभूषण कालड़ा, फूलचंद मानव, जसवंत सिंह विरदी, समीर बरन नंदी एवं मलविंदर सिंह की कविताएं प्रभावित करती हैं। हरि सिंह पाल का व्यंग्य, पूरन सिंह की लघुकथाएं पत्रिका को पूर्णता प्रदान करती हैं। अन्य रचनाएं समीक्षाएं व प्रतिक्रियाएं भी इसे एक सार्थक साहित्यिक पत्रिका बनाती है।