Tuesday, June 29, 2010

आपके लिए साहित्यजगत से ‘प्रोत्साहन’

पत्रिका: प्रोत्साहन, अंक: 75वर्ष 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: श्रीमती कमला सेतपाल, पृष्ठ: 26, मूल्य:15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं, वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 022.26365138, सम्पर्क: ई-3/307, इन्लैक्सा नगर, यारी रोड़, वर्सोवा, अंधेरी पश्चिम, मुम्बई 400.061
स्व. श्री जीवित राम सेतपाल जी द्वारा स्थापित यह पत्रिका अपनी विविधतापूर्ण सामग्री के कारण जानी पहचानी जाती है। पत्रिका के समीक्षित अंक में किशन शर्मा, कृष्णा अग्रिहोत्री, के आलेख समाज की वस्तु स्थित से परिचय कराते हैं। पत्रिका में सुरेश आनंद, टेक चंद्र गुलाटी, नरेन्द्र कुमार एकांत, देवेन्द्र कुमार मिश्रा, राम दलाल, प्रो. श्यामलाल कौशल व राजेन्द्र ग्रोवर की कविताएं समसामयिक अभिव्यक्ति हैं। इस अंक में जीविराम जी सेतपाल की लघुकथाएं प्रकाशित की गई हैं। जिन्हें पढ़कर सेतपाल जी की रूचि व समाज के प्रति सह्दयता परिचित हुआ जा सकता है। पत्रिका छोटी होते हुए भी संग्रह योग्य व पठनीय है।

Saturday, June 26, 2010

साहित्य का ‘हमसफर’

पत्रिका: हमसफर, अंक: 04 वर्ष 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: तारिक असलम तस्लीम, पृष्ठ: 04, मूल्य:80रू.वार्षिक, ई मेल: humsafareditor@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 9670146864, सम्पर्क: भारतीय साहित्य सृजन संस्थान, प्लाट-04, सेक्टर-02, हारून नगर कालोनी, फुलवारी शरीफ, पटना 801.505 बिहार
बिहार की राजधानी पटना से प्रकाशित इस लघुपत्रिका में अमृता प्रीतम की कविता अल्लाह, तारिक असलम(जिंदगी एक नाव है), सिद्धेश्वर(मृगतृष्णा), डाॅ. प्रेमचंद्र पाण्डेय(एक और पारो) प्रमुख रूप से प्रकाशित की गई है। अन्य समाकालीन कविताओं में केदार नाथ सिंह की कविता दाने, परवीन शाकिर की सिर्फ एक लड़की, प्रो. सोनवने राजेन्द्र(बोझा ढोने के लिए), कुलभूषण कालड़ा(झूठ की आड़ में) एवं भावना(बदलाव) अच्छी कविताओं में शुमार की जा सकती हैं।

शब्द की उत्सवलीला-‘समावर्तन’

पत्रिका: समावर्तन, अंक: जून 10,स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, पृष्ठ: 114, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
म.प्र. से प्रकाशित अग्रणी मासिक साहित्यिक पत्रिका समावर्तन का समीक्षित अंक ख्यात कथाकार, लेखक, विचारक एवं शिक्षाविद् रमेश दवे जी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर एकाग्र है। पत्रिका में उनके द्वारा संपादकीय के स्थान पर लिखे गए अन्तर्मुख से उनके संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। उनकी कविताएं, कहानियां निबंध व अन्य रचनाएं उनसे और भी अधिक गहराई तक परिचित कराती है। उनके समग्र पर लिखे गए आलेखों में श्याम संुदर निगम, कृष्णदत्त पालीवाल, गिरीश रस्तोगी, ख्यात आलोचक परमानंद श्रीवास्तव, ज्योत्सना मिलन, वरिष्ठ आलोचक प्रो. रमेशचंद्र शाह, निबंधकार, संपादक व लेखक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय के लेख सहेजकर रखने योग्य हैं । इन आलेखों से पाठक श्री रमेश दवे से परिचित तो होगें ही साथ ही साहित्य जगत की विगत पचास वर्ष की गतिविधियों की जानकारी भी प्राप्त कर सकेगें। उर्मिला शिरीष से उनकी बातचीत सिर्फ बातचीत न होकर साहित्य की वर्तमान से लेकर अतीत तक की गतिविधियों पर गहन दृष्टि डालने का जरिया बन पड़ा है। वरिष्ठ लेखक प्रमोद त्रिवेदी, कुमार विनोद, सुधा श्रीवास्तव, प्रदीप कांत की कविताएं लगता है श्री रमेश दवे जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल रही हैं। परशुराम शुक्ल व सुदिन श्रीवास्तव की ग़ज़लें एवं तारिक असलम तस्नीम की कहानी पठनीय है। डाॅ योगेन्द्र नाथ शुक्ल, संतोष सुपेकर एवं राधेश्याम पाठक उत्तम की लघुकथाएं पत्रिका को विस्तार देती है। ख्यात शास्त्रीय संगीत गायक अजय चक्रवर्ती से प्रभात कुमार भट्टाचार्य की बातचीत भारतीय शास्त्रीय संगीत से गहराई तक परिचित कराती है। निवेदिता शर्मा सुरेश पण्डित, राग तेलंग के कलालेख भारतीय कला-संस्कृति एवं पाठकों के मध्य सेतु का कार्य करते हैं। ब्रज श्रीवास्तव, भालचंद्र जोशी, एंव मीनाक्षी जोशी की संग्रह/पुस्तक समीक्षाएं इन्हें पढ़ने के लिए पे्ररित करती हैं। महेश मलिक की सुरीली दस्तक विनय उपाध्याय के मार्फत पाठकों में संभावना जगाती है कि कला जगत भी तकनीक से कम महत्वपूर्ण नहीं है। समावर्तन के सहेजने योग्य इस अंक पर पूरी पत्रिका टीम बधाई की पात्र है।

Friday, June 25, 2010

बच्चों के लिए-‘अभिनव बालमन’

पत्रिका: अभिनव बालमन, अंक: अपै्रल-जून10,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: निश्चल, पृष्ठ: 48, मूल्य:15रू.(वार्षिक 50रू.), ई मेल: abhinavbalmann@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09719007153, सम्पर्क: 17/238, जेड़ 12/59,पंचनगरी, कासनी गेट, अलीगढ़, उ.प्र.
बच्चों के लिए प्रकाशित पत्रिका अभिनव बालमन का यह अंक ग्रीष्म ऋतु में बच्चों के मनोरंजन के लिए सामग्री लिए हुए है। अंक में बाल रचनाकारों सहित अनेक ख्यात व नवोदित रचनाकारों की रचनाएं शामिल की गई है। इनमें प्रमुख है - प्रेम किशोर पटाखा, ए. कीर्तिवर्धन, घमंडी लाल अग्रवाल, कमल सिंह चैहान, राधेलाल नवचक्र, ज्ञानेन्द्र राज, कपिल कुमार, डाॅ. अभिलेष शर्मा, डाॅ. रमेश चंद्र शर्मा, उषा यादव एवं निश्चल। बच्चों में मुकुल, देवाशीष, हर्ष, पायल, शुभम, आशीष, नेहा, लखन, मानसी, उमा भारती, दीप्ती, ललित, मयंक एवं प्रियंका की रचनाएं सभी बाल पाठकों को अवश्य ही पसंद आएगी। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं, पत्र आदि भी बच्चों का मनोविज्ञान समझते हुए पत्रिका में सम्मलित किए गए हैं।

नाट्य जगत से ‘इप्टा वार्ता’

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: 38,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 8, मूल्य: उपलब्ध नहीं (उपलब्ध नहीं), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 0761.2417711, सम्पर्क: पी.डी.4, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर, जबलपुर 02, म.प्र.
नाट्य समाचार पत्रिका के इस अंक में पाठकों के लिए उपयोगी समाचारों का प्रकाशन किया गया है। मुखपृष्ठ पर भोपाल में आयोजित लघुभारत रंग महोत्सव का समाचार प्रमुखता से विस्तृत विवरण के साथ प्रकाशित किया गया है। भोपाल से आशा सिंह द्वारा प्रेषित यह समाचार रंगमंच के संबंध में उपयोगी व सार्थक जानकारी प्रदान करता है। श्रीमती गुलवर्धन(गुलदी) को पद्म श्री पुरस्कार का विश्लेषण युक्त समाचार अच्छी टिप्पणियों के साथ प्रकाशित है। ख्यात नाट्य समालोचक देवेन्द्र राज अंकुर का आलेख शौकिया रंगमंच की समस्याएं इलाहाबाद में रंगमंच की पूर्व गतिविधियों पर प्रकाश डालता है। रंग खजाना एवं रंग खबर के समचार भी उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। जबलपुर म.प्र. से प्रकाशित यह पत्रिका नाट्य जगत की खबरें प्रकाशित कर रही प्रमुख पत्रिका है जिसे अधिक से अधिक पाठकों तक पहुुंचना चाहिए।

Thursday, June 24, 2010

साहित्य की प्रगति के लिए ‘प्रगतिशील आकल्प’

पत्रिका: प्रगतिशील आकल्प, अंक: 35,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. शोभनाथ यादव, पृष्ठ: 20, मूल्य:केवल आजीवन सदस्यता स्वीकार्य (आजीवन 1000रू.), ई मेल: drshobnathyadav@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 28376109, सम्पर्क: पंकज क्लासेस, पोस्ट आॅफिस बिल्ंिडग, जोगेश्वरी (पूर्व) मुम्बई 400060
टैब्लाइड आकार में मुम्बई से प्रकाशित यह पत्रिका साहित्य जगत की प्रगतिशीलता की जानकारी उपलब्ध करा रही है। समीक्षित अंक में सुरेन्द्र तिवारी जी का आत्म संघर्ष पठनीय है यह उनकी रचनाशीलत के प्रवाह को दिशा देने में लोगों के योगदान पर विचार करता है। कहानियों में तेलुगु कहानी प्राथमिकताएं(अंबल्ला जनार्दन-अनुवादः डाॅ. के.बी. नरसिंह राव), एक मुलाकात(गोवर्धन यादव), आम आदमी(शैल अग्रवाल) आम लोगों के जीवन की यातनाओं व वेदनाओं को बड़ी शिद्दत के साथ व्यक्त करती हैं। उषा यादव का आलेख साहित्य के मर्म तक पहंुचता साहित्य और परिवेश एक संग्रह योग्य प्रस्तुति है। पत्रिका में प्रकाशित प्रेम शंकर रघुवंशी की लम्बी कविता जामला आज केे प्रगतिशील समाज का आईना है। उषा यादव की कुछ ग़ज़लें पढ़ी जाने योग्य हैं। सतीश दुबे, सिद्धेश्वर एवं जसवीर चावला की लघुकथाएं पाठकों को अवश्य पसंद आएंगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, पत्र व स्थायी स्तंभ भी पढ़ने योग्य हैं।

Sunday, June 20, 2010

हंस का ‘हंसा जाए अकेला’

पत्रिका: हंस, अंक: जून10,स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य:25रू. (वार्षिक 250रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.hansmonthly.com/ , फोन/मो. 011.23270377, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002
कथाप्रधान मासिक हंस के इस अंक में प्रकाशित रचनाएं वर्तमान में मानव के मध्य चल रही अंधी प्रतिस्पर्ध का दर्द व्यक्त करती हैं। अंक की कहानियां पढ़कर इस कथन की पुष्टि हो जाती है। प्रकाशित कहानियों में नींद का ज़र्द लिबास(जाहिदा हिना), गांठ(दलपत चैहान), रस प्रवाह(नीलम कुलश्रेष्ठ), अपनी अपनी गोट(जोतिन्दर सिंह सोहेल) शामिल हैं। कविताओं में किरण अग्रवाल, मनीष मिश्रा, रंजना श्रीवास्तव व महेश चंद्र पुनेटा की कविताएं प्रभावशाली हैं। हंस में विगत कुछ माह से कविताओं का स्तर बहुत अधिक सुधरा है यह जानकार प्रसन्नता होती है। बीच बहस में के अंतर्गत प्रकाशित रचनाओं में सुधीर विद्यार्थी, खुशीराम यादव, अनवर सोहेल, सीमा शर्मा व हसन जमाल के विचार पत्रिका का स्वर मुखरित करते हैं। लघुकथाओं में पूरन सिंह, योगेन्द्र शर्मा, मंशा याद व सुशांत सुप्रिय ने कुछ अलग हटकर प्रयोग किए हैं जिनसे लघुकथाओं का स्वर प्रभावी हो गया है। संजय राज की ग़ज़ल तथा सुरेश सेन का आलेख किताबें जिन्होंने मुझे बिगाड़ा पठनीय व जानकारीप्रद है। ख्यात कथाकार स्व. मार्कण्डेय से आनंद प्रकाश की बातचीत कथा विधा के साथ साथ साहित्य की पिछली उपलब्धियों पर विचार करती दिखाई देती है। रेतघड़ी स्तंभ के अंतर्गत डाॅ. राही मासूम रज़ा, मृदुला सिन्हा व गीता गैरोला द्वारा पे्रषित समाचार देश भर की प्रमुख साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी देते हैं। पत्रिका की समीक्षाएं अन्य स्थायी स्तंभ व संपादकीय पूर्ववर्ती अंकों के समान विचार योग्य हैं।

Wednesday, June 16, 2010

कुछ अलग हैं कमलेश्वर की कहानियां-‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: 02,स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य:5रू. (वार्षिक 50रू.), ई मेल: himprasthahp@hp , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला-5
पत्रिका का समीक्षित अंक विचार योग्य आलेखों से युक्त है। अंक में -निराला के कथा साहित्य मंे सत्य की अवधारणा(दिनेश कुमारी), कुछ अलग हैं कमलेश्वर की कहानियां(प्रो. विश्वंभर अरूण) हिंदी गद्य लेखन और खड़ी बोली(एच.एस. श्रीमान), शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में दलित चेतना(कमल कृष्ण) एवं नई कविता दिशा भ्रम या दिशाबोध(सुरेन्द्र अंचल) विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। कहानियों में प्रेम पचीसी(डाॅ. मनोज श्रीवास्तव) एवं तुम अध्यापक नहीं हो चंद्रकांत(रामकुमार आत्रेय) आज के वातावरण में व्याप्त त्रास कुंठा अच्छी तरह व्यक्त कर सकी हैं। लघुकथाओं में आकांक्षा यादव, अखिलेश शुक्ल, पंकज शर्मा एंव नरेश कुमार प्रभावित करते हैं। मुकेश चंद्र नेगी, कमल सिंह चैहान एवं साहिल की ग़ज़ल अच्छी व पठनीय रचनाएं हैं। ख्यात कवि व रचनाकार राजेन्द्र परदेसी की कविताएं ताना-बाना, न कहने से, विविधता एवं अवश्य हुआ होेगा विचार योग्य विषयों का गंभीर प्रस्तुतिकरण है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार भी प्रभावित करते हैं।

Monday, June 14, 2010

छेड़ मत दिल को कि पर्दे चाक हैं-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: जून10,स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू. (वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: www.pakhi.in , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर-63, नोएडा 201303 उ.प्र.
पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक सार्थक कहानियांे का अंक है। इसमें किस्साकोताह(ए.असफल), पेंच-पाना(लता शर्मा), एक लेखक की पार्टी(अपूर्व जोशी) तथा स्पेसीमैन(जीलानी बानो) की कहानियां प्रकाशित की गई हैं। इनमें ए. असफल व पाखी के संपादक अपूर्व जोशी की कहानियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कहानियों को वर्तमान बौद्धिक यथार्थ की कहानियां कहा जा सकता है। आजादी के बाद के दशकों में देश के साहित्य व उसके वातावरण को उजागर करती अपूर्व जोशी की कहानी यदि अंग्रेजी लिखी गई होती तो उसके पाठक इसे हाथों हाथ लेते। उनकी कहानी का अंश ‘पचास के दशक में जब हिंदी साहित्यकारों की एक पीढ़ी विदा सी हो रही थी और नई पीढ़ी, नई कहानियों के साथ, बिल्कुल नए तेवर, नए अंदाज में जन्म ले चुकी थी, उन्हीं दिनों जगन की मसें भीगने लगी थी। जवानी फनफना कर सिर उठा रही थी और घर की काम वाली बाई छोटे बाबू के कमरे में ज्यादा समय दे सफाई करने लगी थी।’ पचास के दशक व उसके बाद की साहित्यिक पार्टियों की परिणति के संबंध में सब कुछ कह जाता है। स्वयंप्रकाश जी की कहानी चैथा हादसा वर्तमान सदी की युवा पीढ़ी के साथ न्याय करती दिखाई देती है। कविताओं में ऋतुराज, रामकुमार आत्रेय, अंशु मालवीय, नरेश कुमार टांक, ज्योति किरण व शिरोमणि महतो ने विविधतापूर्ण वातावरण का सृजन किया है। राजेश रेड्डी व कमलेश कमल की ग़ज़लें भी ग़ज़ल की कसौटी पर खरी उतरती हैं। विजय शर्मा का लेख दारियो फोःएक आंदोलन नई जानकारियां प्रदान करता है। पीढ़ियां आमने सामने की सार्थक चर्चा कुछ विचारणीय प्रश्न उत्पन्न करती है जिसके लिए अलग से मंथन की आवश्यकता है। सुंदर चंद ठाकुर के उपन्यास अंश पत्थर में दूब के अंश उपन्यास के कथ्य के बारे में अधिक जानकारी नहीं दे सकेे हैं। लेखक को कोई दूसरा भाग जिससे उपन्यास के शिल्प व उसके कथ्य के बारे में जानकारी मिल उसे भेजना चाहिए था। राजीव रंजन गिरि, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद अनुपम तथा रवीन्द्र त्रिपाठी के स्तंभ हमेशा की तरह गंभीर विश्लेषणात्मक चिंतन प्रस्तुत करते हैं। उप संपादक प्रतिभा कुशवाहा के ब्लाॅगनामा का आलेख ‘मम्मी चलो चांद पर जाएं’ ब्लाॅग जगत में बच्चों पर लेखन के बारे में विस्तार से जानकारी देता है। पत्रिका की मीमांसा, बीज तथा लघुकथाएं व समाचार भी विचारणीय व पठनीय हैं। पत्रिका के इस अंक में संपादकीय की कमी महसूस हुई।

Sunday, June 13, 2010

‘मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका’ का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: मई10, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. बि. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 48, मूल्य 5रू.. (वार्षिक 50रू.), ई मेल: brssmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूरू 560010 कर्नाटक
दक्षिण भारत से प्रकाशित यह पत्रिका हिंदी साहित्य एवं भाषा की परिपक्व पत्रिका है। इसका विविधतापूर्ण स्वरूप इसे सर्वस्वीकार्य बनाता है। इस अंक में डाॅ. एम. शेषन, डाॅ. बोढन मेहता बिहारी, अमित अश्विनी भाई पटेल, डाॅ. सूर्यप्रसाद शुक्ल, कांति अययर, प्रो. यशवंतकर एस.एल., प्रो. बी. वै. ललिताम्बा, डाॅ. टी.जी. प्रभाशंकर प्रेमी, विलास अं. सळुके एवं डाॅ. हेमवती शर्मा के आलेख हिंदी साहित्य एवं भाषा से परिचय कराते हैं। हितेश कुमार शर्मा का लेख एवं एस.पी. केवल की कहानी तथा जसविंदर शर्मा, बी. गोविंद शैनाय एवं प्रभाशंकर की लघुकथाएं पत्रिका की विविधातापूर्ण साहित्य प्रकाशित कर पाठके लिए लिए उसे सर्वसुलभ बनाने की मानसिकता उजागर करता है। राजेन्द्र परदेसी जी की कविता आभास ही दे दो मानव मन की अतल गहराइयों ें जाकर उदासी दूर करने व अपने कार्य मंे पूर्ण उर्जा व उत्साह से संलग्न होने की पे्ररणा देती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समाचार व समीक्षाएं भी पठनीय व उपयोगी हैं।

Friday, June 11, 2010

लघुकथाओं पर एकाग्र ‘साहित्य सागर’

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: जून10, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य 20रू.. (वार्षिक 250रू.), ईमेल: kksaxenasahityasagar@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलियां भोपाल 462.043 म.प्र.
पत्रिका साहित्य सागर का यह अंक लघुकथा एवं व्यंजना पर विधा पर केन्द्रित है। अंक में ख्यात लेखिका श्रीमती कुलतार कौर कक्कर पर आलेख व अन्य सामग्री प्रकाशित की गई है। प्रमुख आलेखों में डाॅ. यायावर, सनातन कुमार वाजपेयी के लेख शामिल हैं। रमेश मनोहरा, मदनप्रसाद सक्सेना, युगेश शर्मा, डाॅ. सरला अग्रवाल, डाॅ. शरद नारायण खरे, के.पी. सक्सेना दूसरे तथा डाॅ. पुष्पारानी गर्ग की लघुकथाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। श्रीमती कुलतार कौर कक्कर पर एकाग्र आलेखों में डाॅ.हुकुम पाल सिंह, दिवाकर शर्मा, श्यामबिहारी सक्सेना, मनोज जैन व डाॅ. राजश्री रावत के लेख उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर अच्छे ढंग से प्रकाश डालते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि भी इसे पठनीय व पाठकोपयोगी बनाते हैं।

Thursday, June 10, 2010

पत्रिका ही नहीं संवाद का माध्यम ‘शब्द शिल्पियों के आसपास’

पत्रिका: आसपास, अंक: जून10, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 24, मूल्य 5रू.. (वार्षिक 50रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 0755.2772051, सम्पर्क: एच..03, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर, कोटरा, भोपाल म.प्र.
संवाद पत्रिका के इस अंक में जब्बार ढाकवाला कि सड़क दुर्घटना में निधन के समाचार के साथ साथ उनसे जुड़ी यादों को प्रमुख रूप से प्रकाशित किया गया है। नेशनल बुक ट्रस्ट के सहयोग से दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय में आयोजित पुस्तक पर्व की सविस्तार चर्चा जानकारीपरक है। देवास में नईम के स्मरण व भोपाल के रचनाकारों द्वारा बनाई गई नई वेबसाईट की जानकारी साहित्य के पाठकों को अतिरिक्त सूचना प्रदान करती है। ख्यात लेखक बलराम द्वारा लिखा गया आलेख सलाका सम्मान विचार हेतु पाठक की सुप्त इंद्रियों को जाग्रत करने में पूरी तरह सक्षम है। पाित्रका के अन्य स्थायी स्तंभ, जानकारियां, समाचार, सूचनाएं भी संवाद स्थापित करने का माध्यम बनती है।

Monday, June 7, 2010

सांस्कृतिक विचारों की प्रतिनिधि पत्रिका-‘संस्कृति’

पत्रिका: संस्कृति, अंक: 17, स्वरूप: अर्द्धवार्षिक, संपादक: भारतेश कुमार मिश्र, पृष्ठ: 96, मूल्य:निःशुल्क. (सीमित वितरण के लिए), ई मेल: editorsanskriti@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: www.indiaculture.nic.in , फोन/मो. 011.23383032, सम्पर्क: 209, डी. विंग, शास्त्री भवन, डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद मार्ग, नई दिल्ली 110.001
सांस्कृतिक विचारों की प्रतिनिधि पत्रिका संस्कृति विविधतापूर्ण आलेखों से युक्त है। पत्रिका मंे प्रकाशित रचनाएं देश ही नहीं विदेश में भी भारतीय कला संस्कृति व साहित्य का प्रचार प्रसार कर योगदान दे रही है। पत्रिका में प्रकाशित आलेखों में - दक्षखेड़ाः पांच हजार वर्ष पुरानी सभ्यता के अवशेष(ओम प्रकाश कादयान), प्राचीन भारत में काष्ठ कलाकृतियां(डाॅ. सर्जुन प्रसाद), बुद्ध प्रतिमा उदभव और विकास(डाॅ. ब्रजेश कुमार), मुरिया जनजाति का घोटुल(डाॅ. रामसंुदर श्रीवास्तव), लोक कथाओं की अंतप्रकृति(सुधीर निगम), पंडवानी की पताका फहराती तीजन बाई(महाबीर अग्रवाल), देव गढ़ की गुप्तकालीन कला(राजेन्द्र कुमार सिंह) शामिल है। पत्रिका का स्वर कला संस्कृति के संरक्षण को गति प्रदान करता है। उसे संपादक मंड़ल ने अपनी कलात्मकता से और भी अधिक निखारा है। अन्य उपयोगी रचनाओं में सुल्तानगंज की विलक्षण बौद्ध प्रतिमाएं(डाॅ. ओमप्रकाश पाण्डेय), पुरा संपदा का आगार मंदसौर(डाॅ. तारादत्त निर्विरोध), डीपाडीह के ऐतिहासिक संदर्भ(वेदप्रकाश अग्रवाल), असम में देवी पूजा की परंपरा(नवकांत शर्मा), भारत में देवदासी प्रथा(डाॅ. गरिमा श्रीवास्तव), मुगलकाल में भारतीय चित्रकला(रामकृष्ण) व विष्णुपुर की मृण्मयी धरोहर(अखिलेश झा) को रखा जा सकता है। पत्रिका वर्णन के साथ साथ खोजपरक विश्लेषण करते हुए रचनाओें को संुदर ढंग से प्रस्तुत करती है। अनामिका पाठक, सीताराम गुप्ता, डाॅ. रीतारानी पालीवाल, डाॅ. महीप सिंह, डाॅ. अवधेश मिश्र एवं डाॅ. सर्वेश पाण्डेय के आलेखों में इसे महसूस किया जा सकता है। पत्रिका का कलेवर व प्रस्तुतिकरण आकर्षक व नयानाभिराम है। यह सच्चे अर्थो में भारतीय कला जगत को समूचे विश्व के सामने भारतीय संस्कृति व कला का दर्शन कराती है।

Sunday, June 6, 2010

साहित्य के सृजन के लिए आन लाईन गाथा- सृजनगाथा

पत्रिका: सृजनगाथा, अंक: जून 10, स्वरूप: प्रतिदिन अपडेटेड़, संपादक: जयप्रकाश मानस, पृष्ठ: आनलाईन उपलब्ध, वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.srijangatha.com/
छतीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर से इंटरनेट पर प्रतिदिन अपडेट हो रही यह पत्रिका अपने आप में अद्वितीय है। पत्रिका में स्थायी स्तंभ, वीडियो सामग्री दैनिक साहित्यिक समाचार के साथ साथ साहित्यिक रचनाएं भी बिना Justify Fullकिसी भेदभाव व विचारधारा के अंतर के प्रकाशित की जा रही हैं। इन रचनाओं में रचनाकारों के नाम की अपेक्षा उनका गुणवत्ता स्तर देखा जाता है। इस पत्रिका में स्थान पाना किसी भी रचनाकार के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पत्रिका को विश्व भर में इंटरनेट के माध्यम से देखा जाता है। इस माह प्रकाशित प्रमुख रचनाओं में मैं क्या हूं(मनोज सिंह), ज्ञानसिंह और नक्काली जाति के लोग(गिरीश पंकज), सामाजिक सरोकार और युवाओं की भूमिका(उमाशंकर मिश्र), मूक फिल्मों के 100 साल(अनिल सिन्हा), अंडमान निकोबार में स्मृद्ध होती हिंदी(कृष्ण कुमार यादव), सुभाष काक की कविताएं, पानी मंहगा सस्ता खून(संजय कुमार चैरसिया), बालकृष्ण शर्मा नवीन की संपादकयी टिप्पणियां(अनिल सौमित्र), हिंदी पुस्तक प्रकाशनका मकड़जाल(अखिलेश शुक्ल), कहानी असीम(अनुराग शर्मा) व गांव के घर की याद(डाॅ. धमेन्द्र पारे) सहित अन्य उल्लेखनीय रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। अभी तो लगभग पूरा माह शेष है, इसमें पाठकों को अन्य उपयोगी रचनाएं व समाचार पढ़ने के लिए उपलब्ध होगें। वेब साईट पर उपलब्ध अमूल्य साहित्य का पाठकों को अवश्य ही लाभ उठाना चाहिए।

Saturday, June 5, 2010

संवाद स्थापित करता ‘समकालीन साहित्य’

पत्रिका: समकालीन अभिव्यक्ति, अंक: 33, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ: 64, मूल्य:15रू. (वार्षिक 50रू.), ई मेल: वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 26645001, सम्पर्क: फलैट नं. 5, तृतीय तल, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली साहित्यिक पत्रिका समकालीन साहित्य विविधतापूर्ण रचनाओं को प्रकाशित करती रही है। इस अंक में गोवर्धन यादव, डाॅ. कृष्णा श्रीवास्तव, तारिक असलम तसलीम की कहानियां प्रमुखता से प्रकाशित की गई हैं। आलेखों में हरीलाल मिलन, डाॅ. गायत्री देवी तथा डाॅ. राजनाथ मिश्र प्रभावित करते हैं। अनिल डबराल का चेराॅपूंजी पर आलेख पठनीय व अच्छी रचना है। आशीष दशोत्तर, प्रदीप गर्ग, भोला प्रसाद आग्नेय, विजय रंजन की कविताएं तत्कालीन व्यवस्था के विरूद्ध आवाज बुलंद करती दिखाई पड़ती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व स्थायी स्तंभ भी प्रभावित करते हैं।