Monday, May 31, 2010

नाट्य विधा के लिए ‘रंग अभियान’

पत्रिका: रंग अभियान, अंक: 19 आमंत्रण अंक, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: डाॅ. अनिल पतंग, पृष्ठ: 56, मूल्य:15रू. (8 अंकों का मूल्य 100रू.), ई मेल: rang.abhiyan@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09430416408, सम्पर्क: नाट्य विद्यालय, बाघा, पो. सुहदनगर, जिला -बेंगूसराय851218(बिहार)
नाट्य विधा पर प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका उन गिनी चुनी पत्रिकाओं में से है जो इस विधा को पाठकों तक पहुंचा रही है। समीक्षित अंक में प्रकाशित रचनाओं में धरोहर के अंतर्गत आलेख पुरूष जो महिला बनते हैं(डाॅ. महेन्द्र भानावत) एवं नाटक निदेशक की भूमिका(सत्येन्द्र सरत्) पाठकों के लिए जानकारीप्रद रचनाएं हैं। नाट्य अभिनय सम्राट प्यारेमोहन सहाय पर प्रकाशित किया गया आलेख व साक्षात्कार अभिनेता के अभिनय सहित विविधता पूर्ण जीवन पर प्रकाश डालता है। ओम प्रकाश मंजुल ने बच्चों के रंगअभियान के अंतर्गत बच्चें के लिए उपयोगी रचना की प्रस्तुति की है। प्रमुख नाट्यालेखों में कुशेश्वर, नयन कुमार राही, राजेन्द्र सिंह गहलोत के लेख विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं तथा स्थायी स्तंभ भी इसे जन-उपयोगी बनाते हैं। देश में नाट्य विधा पर किए जा रहे इस महत्वपूर्ण कार्य पर और अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
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Sunday, May 30, 2010

आदिवासी कल्याण के लिए-‘अरावली उद्घोष’

पत्रिका: अरावली उद्घोष, अंक: मार्च2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: वी.पी. वर्मा ‘पथिक’, पृष्ठ: 80, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: not avilable , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 02942431742, सम्पर्क: 448,टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313001(राजस्थान)
पत्रिका का समीक्षित अंक आदिवासी कहानी विशेषांक द्वितीय है। अंक में आदिवासी जीवन व उनकी संस्कृति पर एकाग्र रचनाओ का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- समर्पण(विजयकांत), शालवन में तबदील होती लड़की(भवानी सिंह), सलीब(बिपिन बिहारी), समायोजन(सुरेन्द्र नायक), बेस(रत्नकुमार सांभरिया), एक बित्ता जमीन(डाॅ. कृष्णचंद्र टुडू), दूल्हा ढेके पर(चन्दालाल चकवाला), वही चप्पलें(भारत दोषी) एवं उड़ान(डाॅ. लखनलाल पाल)। इन कहानियों का शिल्प आधुनिक होते हुए भी आदिवासी कल्याण के लिए तड़प दिखाई देती है। पत्रिका में प्रकाशित लघुकथाओं में भवानीे सिंह हिरवानी, अशफाक कादरी एवं तारिक असलम ‘तस्नीम’ की लघुकथाएं मानव जीवन के विभिन्न पक्षों पर बारीकी से विचार करती हैं। साहित्य और सरोकार के अंतर्गत वेद व्यास, डाॅ. साजिद मेवाली, डाॅ. यशोदा मीणा एवं ख्यात लोक गायक धवले मीणा से बातचीत उल्लेखनीय हैं। संपादक लेखिका रमणिका गुप्ता का आलेख सत्ता में अविश्वास ने ही जन्म दिया है नक्सलवाद को पत्रिका का स्वर मुखर करता है। वर्षो से आदिवासियों के विस्थापन का दर्द-तड़प तथा उनके पुनर्वास की मांग करती रचनाओं में ‘हमारी दुनिया हमारे लोग’ विशेष स्तंभ के अंतर्गत पत्रिका के संपादक व रचनाकार हरिराम मीणा का लेख पाठकों के विचार के लिए नए आयाम देता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार, पत्र आदि इसे पठनीय व संग्रह योग्य बनाते हैं। पत्रिका के अतिथि संपादक शंकरलाल मीणा का संपादकीय चिंतन और चेतना के खत्म होने के खतरे के वक्त में आम जीवन पर नए सिरे से विचार करने की ओर पुरजोर तरीके से संकेत करता है।

Saturday, May 29, 2010

कर्नाटक से हिंदी साहित्य एवं भाषा का स्पंदन-‘भाषा स्पंदन’

पत्रिका: भाषा स्पंदन, अंक: 19, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. सरगु कृष्णमूर्ति, संपादक: डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ: 48, मूल्य:20रू.(वार्षिक 200रू.), ई मेल: karnatakahindiacademy@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09886241853, सम्पर्क: कर्नाटक हिंदी अकादमी, विनायक, 127, एम.आई.जी./के.एच.बी., 5वां ब्लाॅक, कोरमंगला, बेंगलुरू 560.095 कर्नाटक
कर्नाटक राज्य से हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए समर्पित यह पत्रिका दक्षिण में अपने अथक परिश्रम से हिंदी के प्रचार प्रसार में संलग्न है। अंक में डाॅ. एस. कृष्णबाबू, जसविंदर शर्मा, बिंदु त्रिपाठी, बी. वेंकटेश्वरा, प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, अभिनव तैलंग, ओम कुमारी, डाॅ. अनिल कुमार शर्मा, डाॅ. अमरनाथ, बद्री नारायण तिवारी, अजय एवं दिलीप भाटिया के उपयोगी व संग्रह योग्य आलेखों का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका में नंदलाल भारती, डाॅ. रामनिवास मानव, डाॅ. गीता गुप्ता, आर.सी. शर्मा आरसी, निर्मल चंद निर्मल की कविताएं प्रभावशाली हैं।

Friday, May 28, 2010

साहित्य का ‘पुष्पक’

पत्रिका: पुष्पक, अंक: 03, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 112, मूल्य:75रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 040.23703708, सम्पर्क: 93सी, राजसदन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद 500.038 आंध्रप्रदेश
पत्रिका का यह अंक देशभर के प्रतिभावान रचनाकारांे की रचनाओं से स्मृद्ध है। अंक में शांति अग्रवाल, डाॅ. गुणमाला सोमाणी, पवित्रा अग्रवाल, कृष्ण कुमार यादव, की कहानियां प्रकाशित की गई हैं। लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, डाॅ .अंजना अनिल, श्रीवत्स जिज्ञासु, विनोदिनी गोयनका, सुरेन्द्र मिश्र, पंकज शर्मा एवं संजय चतुर्वेदी की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। कविताओं में नयापन है उनमें प्रमुख हैं - डाॅ. रमा चतुर्वेदी, डाॅ. अहिल्या मिश्र, अमरनाथ मिश्र, यासमीन सुल्ताना नकवी, सरिता सुराणा जैन, मीना मूथा, ज्ञानेन्द्र साज, डाॅ. परमलाल गुप्त, करण सिंह ऊठवाल, हीरालाल प्रसाद जनकवि तथा कृपाशंकर शर्मा अचूक शामिल हैं। इसके अतिरिक्त डाॅ .अहिल्या मिश्र, डाॅ. सुनील सूद, दिलीप भाटिया, प्रो. एस. शेषारत्नम, डाॅ. गणेशदत्त सारस्वत, डाॅ. गोरखनाथ तिवारी, अर्पणा दीप्ति, संपत देवी मुरारका एवं डाॅ.सीता मिश्रा के लेख प्रभावशाली व पठनीय हैं। अन्य रचनाएं भी अपनी पाठक पर अपनी छाप छोड़ती है। दक्षिण भारत में हिंदी पर इतना अधिक उल्लेखनीय व शोधपरक कार्य प्रशंसनीय हैं।

Thursday, May 27, 2010

क्यों हों साहित्य कला के सरोकार-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: मई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू. (वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: www.pakhi.in , फोन/मो. (0120)4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोयड़ा उ.प्र.
पाखी का समीक्षित अंक अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान समसामयिक व पठनीय रचनाओं से युक्त है। अंक में दलित विमर्श पर नए सिरे से विचार किया गया है। दलित व उनको लेकर राजनीति पर गहन विमर्श युक्त पत्रिका का यह भाग संग्रह योग्य होने के साथ साथ समय सापेक्ष भी है। इस भाग में अनिल चमडिया, गुरूदयाल सिंह, मित्तरसेन मीत, रत्नकुमार सांभरिया, कृष्ण प्रताप सिंह, राजेन्द्र यादव, कंवल भारती, उदित राज, आशीष नंदी, प्रो. तुलसीराम, चन्द्रभान प्रसाद एवं रामबहादुर राय के विचार प्रकाशित किए गए हैं। पत्रिका की कहानियां ो पीढ़ियों के मध्य संवाद स्थापित करती हुई दिखाई देती हैं। इनमें प्रमुख हैं - कथा(जितेन्द्र ठाकुर), उन्होंने कहा था(सोनाली सिंह), मास्टर साहब की डायरी(अरविंद शेष), हरि मुस्कानों वाला कोलाज(गौतम राजरिशी) एवं इंतजार पांचवे सपने का(प्रेम भारद्वाज)। प्रेम भारद्वाज की कहानी के साथ टिप्पणी प्रकाशित की गई है जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यह रचना दो ख्यात पत्रिकाओं से लौट आई है। किसी रचना का पत्रिकाआंे से लौटना यह कभी नहीं दर्शाता कि वह रचना अनुपयोगी है अथवा उसका कोई औचित्य नहीं है। एक ख्यात पत्रिका के संपादक को यह कहते हुए मैंने सुना है कि अमुक कथाकार बहुत सुंदर है उनकी कहानी तो इस अंक में जाना ही चाहिए। जब किसी रचना के प्रकाशन संबंधी इस तरह के मानदण्ड स्थापित होने लगेंगे तो मेरे जैसे कुरूप व असंदुर रचनाकार को शायद प्रकाशन के लिए पुनर्जन्म लेना पडे़गा। दूसरी ओर आजकल रचनाओं का प्रकाशित होना न होना आपसी संबंधों व सम्पर्को पर निर्भर होता जा रहा है। इसलिए आप किसी भी ख्यात पत्रिका को उठाकर देख लीजिए एक न एक रचना बेकार व लचर मिल ही जाएगी। अंक में भारत भारद्वाज, अरविंद अवस्थी, डाॅ. रंजना जायसवाल एवं संतोष कुमार तिवारी की कविताएं सिद्ध करती है कि कविता विधा का अस्तित्व अनंत काल तक बना रहेगा भले ही कोई कुछ भी कहता रहे। राधेश्याम व कुमार विनोद के गीत ग़ज़ल प्रभावशाली है। देवेन्द्र कुमार पाठक, डाॅ. वेदप्रकाश अमिताभ व श्रीभगवान सिंह के आलेख पत्रिका के विविध स्परूप को अधिक स्पष्ट करते हैं। राजीव रंजन गिरि, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद अनुपम रवीन्द्र त्रिपाठी, प्रेम भारद्वाज एवं प्रतिभा कुशवाहा के स्तंभ अधिक गंभीरता से तो नहीं पढ़ सका लेकिन इतना अवश्य है कि इनमें इतना कुछ है जो साहित्य तो क्या हिंदी भाषा की किसी दूसरी पत्रिका में भी नहीं मिलेगा (ब्लाग के पाठक यह न समझे कि मुझे अतिरिक्त प्रशंसा का कोई भुगतान किया गया है।) पत्रिका की समीक्षाएं व लघुकथाएं भी पत्र तथा साहित्यिक समाचारों के साथ रचना पढ़ने का आनंद देती है। पत्रिका का संपादकीय हमेशा की तरह धारयुक्त व प्रहारक है। बधाई

Wednesday, May 26, 2010

मार्कण्डेय जी पर विशेष सामग्री युक्त ‘वागर्थ’ का मई 10 अंक

पत्रिका: वागर्थ, अंक: मई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 126, मूल्य:20रू. (वार्षिक 200रू.), ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in , वेबसाईट: http://www.bhartiyabhashaparishad.com/ , फोन/मो. (033)22817476, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36ए, शेक्सपियर सरणि, कोलकाता 700.017
पत्रिका वागर्थ का समीक्षित अंक आंशिक रूप से ख्यात कथाकार मार्कण्डेय जी को याद करता है। अंक में उन पर सम्पादकीय के साथ साथ कमलेश्वर, दुष्यंत कुमार व सरजू प्रसाद मिश्र के आलेख प्रकाशित किए गए हैं। मई दिवस को याद करते हुए नरेन्द्र जैन, एकान्त श्रीवास्तव, विनय कुमार पटैल, अमित मनोज व पुष्पराज के आलेख उल्लेखनीय हैं। देवेन्द्र कुमार देवेश का आलेख तथा रमेश दवे की रचनाएं ध्यान देने योग्य हैं। किशन पटनायक व गिरीश मिश्र का चिंतन अनेक बार मनन करने योग्य है। राजीव कुमार थेपड़ा, से.रा. यात्री व जया स्नोवा की लम्बी कहानी समय सापेक्ष रचनाएं हैं। गुजराती कविताओं के अनुवाद विशेष रूप से रमेश शाह का अनुवाद सामने होते हैं प्रभावित करता है। सिनेमा पर शशांक दुबे का आलेख आमिर तो आमिर है में लगता है कुछ अधिक ही प्रशंसा की गई है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व पत्र साहित्यक समाचार आदि भी इसे पठनीय व संग्रह योग्य बनाते हैं।

Monday, May 24, 2010

उनके बिना उनके साथ-‘शुभ तारिका’

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: मई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 92, मूल्य:25रू.यह अंक(वार्षिक 120रू.), ई मेल: not avilable , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप , ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी हरियाणा
पत्रिका शुभ तारिका का समीक्षित अंक ख्यात कथाकार, साहित्यकार लेखक व विचारक महाराज कृष्ण जी को समर्पित है। उन पर पत्रिका में गंभीरतापूर्वक आलेख लिखे गए हैं। इनमें कमलेश ठाकुर, आशा शैली, प्रबोध कुमार गोविल, नरेन्द्र कौर छाबड़ा, डाॅ. रूखसाना सिद्दकी, रमेश प्रसून, ज्ञाननंद मिश्र, दिलीप भाटिया, पंकज शर्मा, किशन लाल शर्मा, कमलेश भारतीय, प्रदुमन पासवान अमित, इंदिरा किसलय, विजया गुप्ता, प्रमीला गुप्ता, शराफत अली खान, बालाजी तिवारी, प्रताप अरनोट, अरूण कुमार भट्ट, हेमंत यादव शशि, गीता जैन, सुरेन्द्र प्रसाद गिरि, मंजु चन्द्रमोहन नागोरी, लेखराम शर्मा, सुरेन्द्र गुप्त, स्नेह बंसल, डाॅ. चन्द्र भूषणमिश्र, अरशाद नकवी, देशपाल सिंह सेंगर, सुभाष बंसल, उर्मि कृष्ण प्रमुख हैं। पत्रिका में उनकी ख्यात रचनाओं सहित कुछ प्रतिनिधि रचनाओं का समावेश किया गया है। इनमें धर्मनिरपेक्षता का महाकुंभ, स्वर्ग और नर्क, विद्वता के सााि विनम्रता तथा कहानी विधा पर आलोचनात्मक समीक्षात्मक आलेख नई कहानी: कुछ और नये लेखकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी व संग्रह योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समीक्षाएं, कविताएं भी प्रभावित करती हैं।

Sunday, May 23, 2010

5रू. में इतना कुछ?

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: अप्रैल 10, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य:5रू.(वार्षिक 50रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घौड़ा चैकी, शिमला-5
पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित महत्वपूर्ण आलेखों में सृष्टि सृजन स्थान हिमाचल प्रदेश(डाॅ. शमी शर्मा), पहाड़ी चित्रकला के मर्मज्ञ..(डाॅ. तुलसी रमण), भारतीय समाज और महिला लेखिकाएं(डाॅ. दीनदयाल वर्मा), सदा याद रहेगा वह यायावर(आचार्य भगवान देव चैतन्य), संगीत में वाद्यों का महत्व(प्रियंका शर्मा) एवं भाषा सुसंस्कारों की जननी(डाॅ. रमेश सोबती) प्रमुख हैं। कहानियों में आंखें मूंद ली मैंने(डाॅ. मदन मोहन वर्मा), वापिसी(देवराज संजू) एवं बड़ी बहन(भानुप्रताप) प्रभावित करती हैं। प्रो. विश्वंभ्र अरूण, विपाशा शर्मा पंकज शर्मा एवं डाॅ. लीला मोदी की लघुकथाएं पत्रिका के स्तर में वृद्धि करती हैं। संतोष साहनी, तेजराम शर्मा, नीरज मैथानी, डाॅ. दरवेश भारती की कविताएं आज के समाज की दशा व्यक्त करती है। डाॅ. कुणाल कुमार का चिंतन, ओम प्रकाश शर्मा की एकांकी व डाॅ. दिनेश चमौला ‘शैलेष’ का व्यंग्य पाठक अवश्य ही पसंद करेंगे। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी स्तरीय व संग्रह योग्य हैं।

Wednesday, May 19, 2010

‘कथादेश’ का मई 2010 अंक

पत्रिका: कथादेश, अंक: मई10, स्वरूप: मासिक, संपादक: हरिनारायण, पृष्ठ: 98, मूल्य:20रू.(वार्षिक 200रू.), ई मेल: kathadeshnew@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 011.22570252, सम्पर्क: सी-52, जेड़-3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110.095
प्रधान मासिक पत्रिका कथादेश का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनायुक्त है। प्रकाशित कहानियों में गांधी रोज बिकता है(राजेश मलिक), बेटियों का घर(रामकुमार सिंह), धूप के टुकड़े(मनीष वैद्य), कस्बाई कनेशंस एण्ड फील्ड मैसेज(अनुराग शुक्ला), डेन्यूब के पत्थर(वरूण), प्रेम की उपकथा(डाॅ. दुष्यंत) एवं हत्या(किरण सिंह) शामिल हैं। कहानी गांधी रोज बिकता है में क्रिकेट के मार्फत देश में नैतिकता के अवमूल्यन पर विचार किया गया है। डाॅ. दुष्यंत की कहानी प्रेम की उपकथा अलौकिक, अवास्तविक प्रेम के स्थान पर यथार्थ को प्रेम अभिव्यक्ति का माध्यम बनाती है। संपादक लेखिका रमणिका गुप्ता व वीरेन्द्र कुमार वरनवाल अपने अपने आलेखों में गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। रंगमंच पर हषीकेश सुलभ व देवेन्द्र राज अंकुर मोबाईल संस्कृति से परे हटकर विचार करते दिखाई देते हैं। समीर वरण नंदी, विष्णु खरे, रवीन्द्र त्रिपाठी एवं विश्वनाथ त्रिपाठी के आलेख कुछ अधिक विस्तार पा गए हैं ये बातें कम शब्दों में बेहतर तरीके से कही जा सकती थी। निरर्थक विस्तार से पाठकों में एक उब तथा खींज उत्पन्न होती है। सत्यनारायण जी की डायरी, अविनाश का इंटरनेट मोहल्ला एवं अन्य समीक्षाएं इस पत्रिका को साहित्येत्तर रूप प्रदान करती हैं। बजरंग बिहारी तिवारी जी का मलयालम दलित कविताओं को अनुवाद इस पत्रिका की एक अविस्मरणीय प्रस्तुति है जिसे प्रत्येक पाठक अवश्य ही पसंद करेगा। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी इस पत्रिका के गंभीर पाठक के रसास्वादन की पूर्ति करती है।

Monday, May 17, 2010

साहित्य का सागर-‘साहित्य सागर’

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: मई10, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य:20रू.(वार्षिक 240रू.), ई मेल: kksaxenasahityasagar@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.

साहित्य सागर के समीक्षित अंक में डाॅ. सुरेश गौतम, स्वामी श्यामानंद सरस्वती, कमलकांत सक्सेना, दिवाकर शर्मा डाॅ. वीरेन्द्र कुमार दुबे व अनीता गुप्ता की रचनाएं प्रमुखता से प्रकाशित की गई हैं। आकलन के अंतर्गत ख्यात साहित्यकार श्री राकेश कुमार शर्मा ‘हैरत’ का जीवन वृत काफी कुछ जानकारी प्रदान करता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ व पत्र समाचार आदि भी इसे उपयोगी बनाते हैं।

Sunday, May 16, 2010

‘हंस’ नहीं राजहंस कहिए

पत्रिका: हंस, अंक: मई10, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.hansmonthly.in/ , फोन/मो. 011.23270377, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 3/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110.002
कथा प्रधान मासिक हंस का प्रत्येक अंक सामाजिक व विचारोत्तेजक रचनाओं से परिपूर्ण होता है। इस अंक में देश की वर्तमान परिस्थिति, आर्थिक सामाजिक दशा व्यक्त करती कहानियां प्रकाशित की गई है। इनमें चिडिया ऐसे मरती है(मधु कांकरिया), एक अकेली इस जंगल में(सलिल सुधाकर), शहर की मौत(प्रेम भारद्वाज), अनिणीत(निरूपमा अग्रवाल) एवं चांद अभी ढला नहीं(अहमद निसार) शामिल है। इस बार हंस में कविताओं का चयन बहुत सोच समझ कर किया गया है। अनामिका, सविता भारद्वाज, पूनम नुसामड, कुमार विश्वबंधु एवं रामप्रकाश कुशवाह की कविताएं पढ़कर आज के वातावरण व उसकी नियति जानी समझी जा सकती है। मो. आरिफ दगिया का आलेख वर्तमान में विश्व भर में आतंकवाद का शिकार हो रहे मुस्लिमों का दर्द सामने लाता है। क्षमा शर्मा ने बहुत ही संतुलित ढंग से अपने आलेख मायावती की मालाएं में विचार श्रंृखला प्रस्तुत की है। अभय कुमार दुबे का कानू सान्याल पर आलेख व राजेन्द्र कसवा का लेख इस तरह बिगाड़ा मुझे किताबों ने वर्तमान में सामाजिक विश्लेषण सामने रखती है। नूर मोहम्मद नूर की ग़ज़लें, सभी लघुकथाएं भी पत्रिका के स्तर के अनुरूप है। शीबा असलम फहमी व भारत दोषी अपने अपने विचारों के माध्यम से संतुलित व सार्थक विश्लेषण करने में सफल हैं। सुधा अरोड़ा का संस्मरण दीवारों में चिनी चीखों का महाप्रयाण बार बार पढ़ने योग्य रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं, पत्र व संपादकीय भी अद्वितीय व अपने आप में में विशिष्ठ है।

Saturday, May 15, 2010

‘केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका’- अब आपके लिए

पत्रिका: केरल हिंदी साहित्य अकादमी शोध पत्रिका, अंक: 54, वर्ष 15, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. एन. चंद्रशेखर नायर, पृष्ठ: 22, मूल्य:20 रू.(आजीवन 1000 रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं, वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0471.2542355, सम्पर्क: लक्ष्मी नगर, पट्टम पालस, तिरूवनन्तपुरम 695004 केरल
केरल राज्य से हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए इस प्रयास की जितनी भी सराहना की जाए कम है। पत्रिका का कलेवर व रचनाएं किसी हिंदी भाषी प्रदेश की पत्रिका से कमतर नहीं है। अंक में हिंदी के अंतराष्ट्रीय परिपे्रक्ष्य पर बच्चूप्रसाद सिंह का आलेख ध्यान देने योग्य हैै। देवेन्द्र चरण मिश्र ने भारत की राजभाषा नीति व उसके कार्यान्वयन पर विस्तार से लिखा है। विश्व में हिंदी के स्थान पर परिचयात्मक आलेख डाॅ. रामजीलाल जांगिड द्वारा लिखा गया है। हिंदी की समस्याओं, संभावनाओं एवं भविष्य पर मनोहर धरफले का लेख पठनीय है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

Thursday, May 13, 2010

साहित्य की प्रगति के लिए ‘प्रगति वार्ता’

पत्रिका: प्रगति वार्ता, अंक: 48, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सच्चिदानन्द’, पृष्ठ: 80, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: pragativarta@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 06436222467, सम्पर्क: प्रगति भवन, चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज, 816109(झारखण्ड
साहित्य की प्रगति के लिए प्रतिबद्ध पत्रिका का यह अंक समसामयिक रचनाओं से परिपूर्ण है। अंक में भारत यायावर, के.एम. चैटलिया, डाॅ. जर्नादन यादव, डाॅ. संजीव कुमार, कन्हैया सिंह सदब, सीमा दुबे एवं विनोद कुमार राज के आलेख इसे एक प्रगतिशील पत्रिका का दर्जा प्रदान करते हैं। रामदरश मिश्र का उपन्यास अंश व फादर कामिल बुल्के का संस्मरण पढ़ने योग्य रचनाएं हैं। सीला मोदी, सुदामा सिंह व श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी के व्यंग्यों में नयापन है। कविताओं की बुनावट समयानुकूल है जो आज की जरूरतों पर खरी उतरती हैं। इनमें प्रतिभा प्रसाद, डाॅ. प्रभा दीक्षित, पूर्णिमा केडिया व जयंत कुमार थोरान प्रमुखह हैं। सुरेन्द्र दीप, अनिता रश्मि एवं मनीष कुमार सिंह की कहानियां पठनीय हैं व उनका कथ्य सार्थक है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र समाचार आदि भी इसे प्रगति के पथ पर ले जाने में सक्षम है।

Wednesday, May 12, 2010

आदिवासी कल्याण के लिए ‘अरावली उद्घोष’

पत्रिका: अरावली उद्घोष, अंक: 86, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बी.पी. वर्मा ‘पथिक’, पृष्ठ: 80, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं, वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0294.2431742, सम्पर्क: 448, टीचर्स कालोनी, अम्बा माता स्कीम, उदयपुर 313004(राजस्थान)
देश के आदिवासियों के उत्थान के लिए समर्पित पत्रिका अरावली उद्घोष के इस अंक में समाज के लिए प्रेरक व मार्गदर्शक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। बहुजन डायवर्सिटी पर सुरेश पंडित, बुद्धशरण हंस एवं डाॅ. कुसुम मेघवाल के आलेख इस विषय की अद्यतन व ध्यान देने योग्य प्रस्तुति है। भागीरथ, रामपुनियानी एवं डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव ने अपने विषय पर साधिकार लिखा है। पत्रिका की सवार्धिक उल्लेखनीय रचना ख्यात लेखक व संपादक हरिराम मीणा का आदिवासी विर्मश आलेख है। इस लेख में उन्होंने आदिवासी संस्कृति के संरक्षण में आ रही चुनौतियों का सार्थक विश्लेषण किया है। स्वामी वाहिद काज़मी का आलेख अंधेरे में आदिवासी अच्छी व पठनीय रचना है। महिला आरक्षण पर राममूर्ति यादव आलेख नए ढंग से विचार करता है। भावसिंह हिरवानी, असफाक कादरी, चरणसिंह पथिक एवं प्रभात जी की कहानियां आदिवासी उत्थान के साथ साथ उन्हें देश की मुख्य धारा में लाने का प्रयास करती दिखाई देती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व आलेख भी पत्रिका की उपयोगिता सिद्ध करते हैं। पत्रिका के अतिथि संपादक भागीरथ एवं संपादक पथिक वर्मा के लेख संपादकीय के साथ साथ सामाजिक चिंतन का स्वर लिए हुए हैं। अच्छे अंक के लिए बधाई।

Monday, May 10, 2010

महिलाओं के लिए ‘उत्तरा’

पत्रिका: उत्तरा, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर.09, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: उमा भट्ट, शीला रजवार, कमला पंत, वसंती पाठक, पृष्ठ: 48, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: uttara12@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 236191, सम्पर्क: परिक्रमा तल्ला डांडा, तल्ली ताल, नैनीताल 263.002
महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित पत्रिका उत्तरा के इस अंक में महिलाओं की समस्याओं पर विचार किया गया है। यह विचारधारा के रूप में पत्रिकाओं की रचनाओं से झलकता है। अंक में मीरा कुमार के बहाने(राम शिव मूर्ति यादव), क्रांतिकारी महिलाःदुर्गाभाभी(आकांक्षा यादव), शिक्षिका की व्यथा(प्रमिला नौटियाल), निर्मला दीदी(श्रद्धांजलि-राधा भट्ट) रचनाएं पढने योग्य हैं। शशिप्रभा रावत, की लघुकथा एवं शशि शर्मा प्रभा की कहानी भी पत्रिका को स्वर प्रदान करती है। बसन्ती बिष्ट से बातचीत एवं घूमर नाचंु हूं कमल कुमार का राजस्थान की पृष्ट भूमि पर लिखा गया उपन्यास निश्चय ही श्रेष्ठ रचना होगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी प्रभावशाली व महिलाओं की समस्याओं को प्रकाश में लाने वाली हैं।
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Sunday, May 9, 2010

आप भी करें ‘परिकथा’ के साथ समय और समाज की परिक्रमा

पत्रिका: परिकथा, अंक: मार्च-अपै्रल10, स्वरूप: द्वैमासिक, संपादक: शंकर, पृष्ठ: 104, मूल्य:25रू.(वार्षिक 275रू.), ई मेल: parikatha.hindi@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.parikathahindi.com/ , फोन/मो. 0129.4116726, सम्पर्क: 96, बेसमेंट, फेज 3, इरोज गार्डन, सूरज कुंड़ रोड़, नई दिल्ली 110.044
समाज के लिए उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित करने वाली यह पत्रिका नवीन होते हुए भी गंभीर व समकालीन साहित्य का प्रकाशन कर रही है। समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण रचनाएं पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। पत्रिका में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में- नई सदी में राजनीतिक व सामाजिक सोच(ब्रज कुमार पाण्डेय), हमारे समय के साहित्यिक शहीद(जितेन्द्र भाटिया), बाबा का गुस्सा(संस्मरण-रूपसिंह चंदेल) एवं लेखक के साथ साथ पाठक की भी...(संवाद-शंभू गुप्त) शामिल हैं। इन आलेखों में समय के सापेक्ष व वर्तमान सदी के संदर्भ में लेखकों ने अपने विचारों को व्यक्त किया है। वर्तमान में नए लेखकों द्वारा किए जा रहे लेखन जिसे नवलेखन कहा जा रहा है। यह लेखन उतना ही गंभीर व साहित्य के प्रति उत्तरदायी है जितनी अनुभवी पीढ़ी है। ख्यात आलोचक डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव, लेखक व रचनाकार खगेन्द्र ठाकुर एवं अशोक कुमार पाण्डेय की रचनाएं युवा लेखन का विश्लेषण करती हुई अपनी बात पुरजोर तरीके से रखती है। पत्रिका की प्रत्येक कहानी स्तरीय व पठनीय है। प्रकाशित कहानियों में बाज़ारवाद की अपेक्षा हमारी संस्कृति के संरक्षण का विशेष ध्यान रखा गया है। इसकी आज के संदर्भ में आवश्यकता भी है। कहानी प्लेसमेंट एजेंसी(पुन्नी सिंह), मकोड़ा(महेन्द्र सिंह सरना), राजीव बाबू की खेती(जयप्रकाश), कोसी सतलुज एक्सप्रेस(अमिताभ शंकर राय चैधरी), एक दिन(शुक्ला चैधरी) एवं पराए समय में(विद्या सिंह) में हमारी मान्यताओं केे संरक्षण का स्वर सुनाई देता है। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की कविताएं विशेष रूप से वसंत, शब्द व ओ वाग्देवी आज की युवा पीढ़ी को स्वयं के बारे में पुनः विचारने के लिए प्रेरित करती दिखाई देती है। विमल कुमार, प्रताप राव कदम, शहंशाह आलम, महादवे टोप्पो एवं मनीषा झा की कविताएं भी भारतीयता का स्वर लिए हुए हैं। मुर्शरफ आलम जौकी का आलेख उर्दू के इतिहास को सफलतापूर्वक प्रस्तुत कर सका है। कुमार हसन की ओडिया कहानी डूब(अनुवाद-अरूण होता) बांध बनने के पहले विस्थापितों का दर्द बयान करने में पूर्णतः सफल रही है। परिकथा में वीरेन्द्र कुमार गौतम, नीरज खरे, विवेक श्रीवास्तव, ज्योति किरण एवं वसंत त्रिपाठी द्वारा की समीक्षाएं आलोचनात्मक ढंग से संग्रह/पुस्तकों का विश्लेषण करती है। सारा राय का उपन्यास अंश चील वाली कोठी इस रचना को विस्तार से पढ़ने की इच्छा जाग्रत करता है। परिकथा की अन्य रचनाएं भी आकर्षक व पठनीय है। इतने कम समय में साहित्य जगत की प्रथम पंक्ति में शामिल होने के लिए परिकथा बधाई की पात्र है।