Thursday, April 29, 2010

कथा प्रधान पत्रिका ‘कथाबिंब’

पत्रिका: कथाबिंब, अंक: जनवरी-मार्च10, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रधान संपादक:माधव सक्सेना ‘अरविंद’, संपादक: मंजूश्री, पृष्ठ: 52, मूल्य:15रू.(वार्षिक 50रू.), ई मेल: kathabimb@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.kathabimb.com/ , फोन/मो. 2551.5541, सम्पर्क: ए-10, बसेरा, आॅफ दिन-क्वारी रोड़, देवनार मुम्बई 400.088
click here कथा प्रधान साहित्यिक पत्रिका कथाबिंब के इस अंक में सार्थक व समाजउपयोगी कथाओं को स्थान दिया गया है। इसमें प्रकाशित कहानियों में प्रमुख हैं- वह कल नहीं आएगा(ज्ञान शर्मा), वादियों का दर्द(डाॅ. तारिक असलम ‘तस्लीम’), समर्पण(जसविंदर शर्मा), खिसकते विराम का इंतजार(अमर स्नेह) एवं मुन्नी(के वरलक्ष्मी-तेलुगु कहानी ) है। पत्रिका की लघुकथाएं भी एक विचार को जीवंत करती हुई सार्थक प्रस्तुति है। इनमें नरेन्द्र कोर छाबड़ा, संजय पुरोहित, ज्ञानदेव मुकेश व डाॅ. रामनिवास मानव प्रमुख हैं। पंकज शर्मा, देवेन्द्र कुमार पाठक, डाॅ. रंजना वर्मा एवं केवल गोस्वामी की कविताएं यथार्थ के धरातल को स्पर्श करती हुई शिल्प से जुगलबंदी करती हुई दिखाई देती है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं व रचनाएं भी स्वागत योग्य हैं।

Sunday, April 25, 2010

हम सबकी ज़बान-‘हिंदुस्तानी ज़बान’

पत्रिका: हिन्दुस्तानी ज़बान, अंक: अपै्रल-जून10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ: 52, मूल्य:10(वार्षिक: उपलब्ध नहीं), ई मेल: hp.sabha@hotmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 22812871, सम्पर्क: महात्मा गांधी मेमोरियल रिसर्च सेन्टर, महात्मा गांधी बिल्डिंग, 7-नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई 400.002 (महाराष्ट्र)
हिंदी और उर्दू ज़बान में एकसाथ प्रकाशित होने वाली पत्रिका का हिंदुस्तानी ज़बान का यह अंक गांधी साहित्य से जुड़ी कुछ पाठकोउपयोगी सामग्री संजोए हुए है। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में हमारे फलक का एक सिताराःधु्रवतारा(कनक तिवारी), कबहंुक हौं यहि रहनि रहौगौ(डाॅ. सुशीला गुप्ता), साहित्यिक आलोचना और महिला रचनाकार(डाॅ.अमर सिंह वधान) एवं शब्दों के संबंधी(डाॅ. सुरेन्द्र वर्मा) प्रमुख है। इन आलेखों का मूल स्वर गांधीवाद व गांधी विचारधारा है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व अभय मुकाशी का आलेख आकर्षित करता है। उर्दू भाग में प्रकाशित रचनाएं भी गांधीवादी साहित्य से जुड़ी सामग्री से सजी हुई है।

Friday, April 23, 2010

कलाओं का खबरनामा-‘इप्टा वार्ता’

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: दिसम्बर.09, स्वरूप: मासिक, संपादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 08, मूल्य:उपलब्ध नहीं, ई मेल: iptavarta@hotmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://iptavartahindi.blogspot.com/ , फोन/मो. 0761.2417711, सम्पर्क: पी.डी. 4 परफेक्ट एन्कलेव, स्नेह नगर, जबलपुर 02 (म.प्र.)
कलाओं संस्कृति की वार्ता पत्रिका इप्टा वार्ता का यह अंक नाट्य जगत के समाचारों को अपने कलेवर में समेटे हुए है। मुखपृष्ठ पर आदि विद्रोही नाटय समारोह की रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। रजनीकांत यादव का आलेख ‘नर्मदा प्रवाह और घाटी में जनजीवन’ नर्मदा क्षेत्र के कलाधर्मी व सांस्कृतिक महत्व को प्रतिपादित करता है। मामिक जौनपुरी जनजागरण सांस्कृतिक यात्रा का वर्णन नाटक में रूचि रखने वाले पाठक की जानकारी में काफी अधिक वृद्धि करता है। अन्य समाचारों में ‘धोबीघाट से मसान घाट तक’, ‘इब्सन उत्सव’ एवं ‘फट जा पंचर’ देश भर के नाट्य जगत की जानकारी प्रदान करते हैं।

Thursday, April 22, 2010

सैमसुंगःयह भी कोई मुद्दा है(संपादकीय)-वागर्थ

पत्रिका: वागर्थ, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संपादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 122, मूल्य:20रू.(वार्षिक 200रू.), ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bharatiyabhashaparishad.com/ , फोन/मो. 033.32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद्, 36ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017
पत्रिका वागर्थ से प्रत्येक पाठक जिसे हिंदी साहित्य में रूचि है भलिभांति परिचित है। पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रकाशित आलेखों में - क्या कोसंबी नस्लवादी थे?(भगवान सिंह), मृत्यु बिना जीवन(गिरीश मिश्र) एवं ध्वंस तो जारी है(कृष्ण प्रताप सिंह) पाठकों के मस्तिष्क को काफी हद तक झकझोरते हैं। ख्यात कथाकार निर्मल वर्मा पर स्वयंप्रकाश जी का संस्मरण उन्हें फिर से स्मृति मंे ला देता है। शरण कुमा लिंबाले द्वारा लिखित उपन्यास(मराठी) के अनुदित अंश इस रचना को समझने में काफी अधिक सहायक हैं। आयशा खातून की बंग्ला लघुकथाएं पाठक के मन में गहराई तक जाकर प्रभावित करती हैं। दादूराम शर्मा का ललित निबंध इस विधा की अन्य रचनाएं पढ़ने की रूचि जाग्रत करता है। कहानियों में द्विजेन्द्र नाथ सैगल, हरिओम की कहानियों में सरसता अंत तक बनी हुई है। इनमें आख्यान का प्रभाव देखा जा सकता है। सविता भार्गव, सतीश अग्रवाल, विनीता जोशी एवं समीरा नईम की कविताएं आज के समाज का चित्र खींचती हुई उसे अतीत तक ले जाती हैं। प्रधानमंत्री को पसीना, पुरूष की स्मृति में बूढ़ी नहीं होती लड़कियां जैसी कविताएं उमाशंकर चैधरी को कथाकार के साथ साथ एक कवि के रूप में जानने समझने का पर्याप्त अवसर प्रदान करती हैं। राजेश् रेड्डी एवं सुधीर कुशवाह की ग़ज़ल तथा राकेश कुमार सिंह का भोजपुरी गीत पढ़ने की अपेक्षा सुनने योग्य अधक है। पत्रिका का संपादकीय इसका आईना है जिसे पढ़कर गैर हिंद भाषी पाठक हिंदी साहित्य की गहन सोच समझ से रूबरू हो सकता है।

Tuesday, April 20, 2010

‘समावर्तन’ का रजत प्रवेश

पत्रिका: समावर्तन, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संस्थापक: प्रभात कुमार भट्टाचार्य, अध्यक्ष संपादक: रमेश दवे, प्रधान संपादक: मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 98, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान उज्जैन म.प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक अज्ञेय जी के तार सप्तक के प्रमुख कवि व साहित्य मर्मज्ञ नंद किशोर आचार्य जी पर एकाग्र है। उनके समग्र व्यक्तित्व पर कलात्मक ढंग से विचार किया है। उनकी कविताएं, संस्मरण, समकालीन सर्जक व रंग-परंपरा की प्रासंगिकता में पाठक की साहित्य के प्रति रूचि जाग्रत करने पूरी तरह सक्षम है। शैलेन्द्र कुमार शर्मा व अनिरूद्ध उमठ ने उनके नाटकों व कथासाहित्य पर आलोचनात्मक ढंग से दृष्टिपात किया है। वे राजाराम भादू से बातचीत में स्पष्ट करते है कि ‘‘सृजन के इतिहास में चुनौतियां सदैव रही हैं।’ पत्रिका दूसरा खण्ड फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे अजीम तरीन अदबी पर गौर फरमाता है। इस खण्ड में धनंजय वर्मा ग़ज़लों, नज़्म व कतअ पर तनकीदी नज़रिए से विचार करते हैं। संजय माथुर, श्याम संुदर दुबे तथा ुमार सुरेश की कविताएं कलात्मकता के साथ साथ वास्तविकता लिए हुए हैं। ख्यात संस्मरणकार कांतिकुमार जैन का संस्मरण ‘बैकुंठपुर कहां है?’ पढ़कर पाठक उनके अनुगामी हो जाएगा। के.पी. सक्सेना दूसरे, रमेश चंद्र शाह की लघुकथाएं व अमर गोस्वामी का रमानाथ राय की बंग्ला कहानी ‘अश्रुबिंदु’ का तजुर्मा लाजबाव है। सागर शहर के साहित्यिक वातावरण को विस्तार देता खण्ड इस नगर की विरासत के दर्शन कराता है। सागर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति शिवकुमार श्रीवास्तव, ख्यात कवि अशोक वाजपेयी, प्रसिद्ध कवि रमेश दत्त दुबे व ध्रुव शुक्ल को आज साहित्य जगत में कौन नहीं जानता? जग प्रसिद्ध फीचर फ़िल्म बाॅबी का गीता ‘‘झूठ बोले कौवा काटे, कालेे कौवे से डरियो ....... के माध्यम से रातों रात शिखर पर पहंुचे गीताकार विठ्ठल भाई पटेल से सरोकार व उनकी कविताएं अच्छी लगीं। सत्यमोहन वर्मा से बातचीत मंे वे साहित्य की चुनौतियों पर अपनी बात पुरजोर तरीके से रखते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, गीत, ग़ज़लें व समीक्षाएं इसे सर्वस्वीकार पत्रिका का दर्जा दिलाते हैं।

Monday, April 19, 2010

क्रांतिवीर नहीं हो सकते रामदेव(संपादकीय)-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू.(वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेंडेंट मीडिया इनीशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोयडा 201303 उ.प्र.
साहित्य सरोकारों से जुड़ी पत्रिका पाखी का यह समीक्षित अंक पठनीय व मनन योग्य रचनाओं से भरपूर है। अंक में प्रकाशित कहानियों में चोट(बलराम), मां(दिनेश भटट), परछाइयों का नाच(शिवकुमार यादव) एवं डिपैशन(सुरिंदर कौर) प्रमुख हैं। इन कहानियों में देश की समस्याओं के साथ साथ सामाजिक परिवर्तन की सौधी सी महक महसूस की जा सकती है। कवितओं में उपेन्द्र कुमार, दिनेश श्रीवास्तव, उत्तिमा केशरी तथा शशिकला राय ने नए ढंग से कविता के शिल्प को सजाया है। अशोक विश्वकर्मा एवं छगनलाल सोनी की ग़ज़लें , ग़ज़ल के पैरामीटर पर पूरी तरह खरी उतरती हैं। जाहिद खान, राकेश बिहारी के आलेख तथा आकाश नागर की रपट में नवीनता है। कुमार अरविंद, भरत प्रसाद एवं अजय मेहताब ‘बीच बहस में’ बहस को न छोड़कर उसे किनारे तक ला सके हैं। राजीव रंजन गिरि एवं पुण्य प्रसून वाजपेयी हमेशा की तरह एक नया विचार, नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। विनोद अनुपम, रवीन्द्र त्रिपाठी एवं पे्रम भारद्वाज के स्तंभ अपनी अपनी विषय वस्तु को खंगालने के लिए आतुर दिखाई पड़ते हैं। इसमें वे कुछ हद तक सफल भी रहे हैं। प्रतिभा कुशवाहा ने भारतीय हिंदी ब्लाॅगजगत की ध्यान देने योग्य सामग्री अच्छी तरह से चुनकर प्रस्तुत की है। ख्यात कथाकार ज्ञान प्रकाश विवेक का संस्मरण तथा कंचना सक्सेना की लघुकथाएं पत्रिका को विस्तार देती हैं। पत्रिका पढ़कर कहीं से भी नहीं लगता है कि यह मात्र दो वर्ष पुरानी पत्रिका है। पत्रिका के संपादक अपूर्व जोशी ने ख्यात योग गुरू रामदेव के राजनीति में आगमन को लेकर जो चिंताएं जाहिर की हैं वे किसी भी गंभीर पाठक के लिए विचारणीय हैं।

Saturday, April 17, 2010

क्या आपके पास ‘शब्द शिल्पियों के आसपास’

पत्रिका: आसपास, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजुरकर राज, पृष्ठ: 24, मूल्य:5रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: shabdashilpi@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 07552951, सम्पर्क: एच.3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर , भोपाल म.प्र. रचनाकारों की सम्पर्क पत्रिका का समीक्षित अंक हर बार नए समाचार प्रकाशित करती है। पत्रिका के इस अंक में प्रमुख आलेख करूणा राजुरकर ने लिखा है। आलेख शरद जोशी की रचना राग भोपाली के लोकार्पण से संबंधित है। अन्य समाचारों में नेहा ने दी संग्रहालय को धरोहर, नरहरि पटेल को मिला श्रीनिवास सम्मान, गिरीमोहन गुरू सम्मानित एवं ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कारों के समाचार प्रमुख हैं। पत्रिका में दलित अस्मिता का साहित्य, व अभिनेता राजीव वर्मा ने देखा संग्रहालय अच्छी व सूचनापरक जानकारी है। देश भर के साहित्यकार आन लाईन होने का समाचार सुखद है। पत्रिका के स्तंभ हालचाल, लोकार्पण, श्रद्धांजलि आदि स्तंभ भी लेखकों के मध्य संवाद स्थापित करने में पूरी तरह सफल रहे हैं। click here

Friday, April 16, 2010

आत्मीयता और अपनेपन के पाथेय की ‘साहित्य परिक्रमा’

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: अपै्रल-जून10, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मुरारीलाल गुप्त ‘गीतेश’, पृष्ठ: 92, मूल्य:15(दो वर्ष:100 रू.), ई मेल:shridhargovind@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0751.2422942, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क ग्वालियर म.प्र.
साहित्य परिक्रमा का 41 वां अंक पंजाबी लेखक विशेषांक है। अधिकांश रचनाएं पंजाबी की हैै जिनका कुशलतापूर्वक अनुवाद श्री अश्विनी गुप्ता ने किया है। अंक में पंजाबी भाषा एवं साहित्य से जुड़े लेखकों को स्थान दिया गया है। पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं की पठनीयता व सहज सरल संरचना मनमोहक है। अंक में प्रकाशित कहानियों में धर्मसंकट(बलबीर सिंह राणा), कला कंुज(विश्व ज्योति धीर), आलू खोजी(गुरमीत कडियालवी), मौत के पल(ओम वर्मा), कासनी के फूल(सांवल धामी), गिरती दीवारें(जतिन्द्र सिंह हांस) एवं रावत(जसवीर कलसी) शामिल हैं। पत्रिका में विवेक, इंद्रजीत चंदन एवं डाॅ. राजेन्द्र साहिल की लघुकथाएं भी उल्लेखनीय है। पत्रिका के व्यंग्य समाज व उसकी उदासीनत पर प्रहार करते दिखाई पड़ते हैं। मंगत कुलजिंदर एवं हरी कारीयान के व्यंग्यों में देखा जा सकता है। जतिनदर परवाज, हरविंदर राणा, त्रैलोचन लोसी, अनु बाला, कुलविंदर कुलाह, कविंद्र चांद, डाॅ. हरप्रीत रूबी, सुशील रहेजा की काव्य रचनाएं एवं ग़ज़लें आज के संदर्भो से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समीक्षाएं भी आकर्षक है। संपादकीय आत्मीय और अपनेपन का पाथेय पत्रिका का सार तत्व प्रस्तुत करता है।

Thursday, April 15, 2010

‘साहित्य सागर’ और नई कहानी

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 50, मूल्य:20, ई मेल: kksaxenasahityasagar@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल 462.043 (म.प्र.)
पाठकों के मध्य लोकप्रिय पत्रिका साहित्य सागर का समीक्षित अंक कहानी विशेषांक है। पत्रिका में उच्च कोटि की पठनीय कहानियांे का प्रकाशन किया गया है। इनमंे प्रमुख है- बिना बिछिंया वाला पांव(नवल जायसवाल), सिंदूर की लाज(सनातन कुमार वाजपेयी ‘सनातन’), घृणाक्त विष(जसवंत सिंह विरदी), ममता की भूख(श्रीमती प्रभा पांडे), अम्मा(देवेन्द्र कुमार मिश्र) एवं टांेनी(प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र)। पत्रिका के आकलन स्तंभ के अंतर्गत ख्यात साहित्यकार श्री शंकर सक्सेना पर विशेष पठनीय सामग्री का प्रकाशन किया गया है। उन पर जीवन इंदु, देवेन्द्र शर्मा, अुनुराग किशोर, गगन मालपानी हरिवल्लभ श्रीवास्तव, डाॅ. ओमप्रकाश सिंह एवं डाॅ. शंकर मुनि राय के आलेख शामिल हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं, रचनाएं भी उपयोगी व जानकारीप्रद हैं।

Wednesday, April 14, 2010

क्या आपने पढ़ा है?-‘नया ज्ञानोदय’ का भारत भारती विशेषांक

पत्रिका: नया ज्ञानोदय, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संपादक: रवीन्द्र कालिया, पृष्ठ: 120, मूल्य:30, ई मेल: nayagyanodaya@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.jnanipith.net/ , फोन/मो. 011.24626467, सम्पर्क: भारतीय ज्ञानपीठ 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड़, नई दिल्ली 110003(भारत)
नया ज्ञानोदय का यह अंक भारत भारती विशेषांक है। पत्रिका में मराठी कवि विन्दा करंदीकर, हिंदी के ख्यात कथाकार मार्कण्डेय, सन्तोखसिंह धीर को श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। विन्दा करंदीकर पर पुष्पा भारती ने अपने आलेख में उनके समग्र लेखन पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है। संपादक श्री रवीन्द्र कालिया जी ने मार्कण्डेय पर अपने स्मरण में उनकी सहजता व सरलता का उल्लेख विशेष रूप से किया है। भारत भारद्वाज ने हंसा जाई अकेला कहानी को आधार बनाकर मार्कण्डेय जी के शिल्प व जीवन शैली को अपनी विचारदृष्टि दी है। संतोखसिंह धीर की ख्यात कहानी ‘कोई एक सवार’ के मार्फत रवीन्द्र कालिया ने कथापात्र तांगेवाले की विवशता व उसकी जीवन यापन की समस्या पर विचार किया है। अंक में प्रमुखता से बांग्ला, ओडिया व पंजाबी कहानी के तजुर्मे साए किए गए हैं। इन तजुर्मे में कथारस ज्यांे का त्यों बना हुआ है यही इसकी विशेषता है। इनमें प्रमुख हैं- हंसा जाई अकेला(मार्कण्डेय), कोई एक सवार(संतोखसिंह धीर-अनुवादःकेवल गोस्वामी), लंगड़ा कुक्कड़(बलविंदर सिंह बराड़-पंजाबी से अनुवादःसुभाष नीरव), अजातसुंदरी(मनमोहन बावा), कीर्तिनाश के दो किनारे(सुनील गंगोपाध्याय-अनुवादःलिपिका साहा), नन्द भौजाई की रसोई(तिलोत्तमा मजूमदार-अनुवादःजलज भादुडी), एक अजाने जनपद की उपकथा(जय भद्र-अनुवादःसुशील गुप्ता), झूठी(रमाकांत रथ-अनुवादःसुजाता शिवेन), रूद्रावतार(प्रतिभा राय-अनुवादःराजेन्द्र प्रसाद मिश्र) एवं वही लड़की(दाशरथि भूर्या-अनुवादःरजनी पंडा)।
प्रकाशित कविताओं में शून्य संहिता(सीताकांत महापात्र-अनुवादःमहेन्द्र शर्मा), कवि की मां, कहां है मेघ कहां प्रिय(मनोरमा विश्वाल महापात्र-अनुवादःराजेन्द्र प्रसाद मिश्र), मां के जाने का समय, बातचीत(प्रतिभा शतपथी-अनुवादःराजेन्द्र प्रसाद मिश्र) एवं दाम्पत्य, प्रेम,जीवन, मृत्यु(दुर्गाप्रसाद पंडा-अनुवादःसुजाता शिवेन) प्रमुख हैं।
पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं एवं यात्रा वर्णन एवं स्मरण भी संग्रह योग्य व पठ्नीय है।

Tuesday, April 13, 2010

कर्नाटक से प्रकाशित-‘मैसूर हिंदी प्रचार परिषद्र पत्रिका’

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: मार्च10, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक-डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 48, मूल्य: 05रू.(वार्षिकः 50रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 080.23404892, सम्पर्क: 59, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर बेंगलूर 560010
कर्नाटक से विगत 41 वर्ष से निरंतर प्रकाशित यह पत्रिका हिंदी भाषा एवं साहित्य के लिए समर्पित है। अंक में जनउपयोगी रचनाओं का प्रमुखता से स्थान दिया जाता है। समीक्षित अंक में रामशरण युयुत्सु, गणेश गुप्त, डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव, डाॅ. अमर सिंह वधान, कांति अयैर, विनोद चंद्र पाण्डेय, चैधरी गनपत भाई आर, गोकुलानंद शर्मा एवं प्रो. बी. वै. ललिताम्बा के विविध विषयक आलेखों का प्रकाशन किया गया है। राजकिशोर सक्सेना ‘राज’ की कहानी व बी. गोविंद शैनाय लघुकथा अच्छी बन पड़ी है। अंक में डाॅ. मित्रेश कुमार गुप्त, सीताराम शेरपुरी, देवेन्द्र पाठक ‘महरूम’ हितेश कुमार शर्मा एवं कमल सिंह चैहान की कविताएं प्रभावशाली हैं।

Sunday, April 11, 2010

महाकवि कालीदास और रामटेक-‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: मार्च10, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य: 05रू.(वार्षिकः 50रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला .05
हिमप्रदेश की पत्रिका हिमप्रस्थ का समीक्षित अंक समसामयिक आलेखों से समृद्ध है। अंक में हिंदी कहानी में भाषा व शिल्प के नए प्रयोग(राजेन्द्र राजन), नागार्जुन के काव्य में स्त्री(डाॅ. प्रभा दीक्षित), नई कविता के कबीरःभवानी प्रसाद मिश्र(डाॅ. रामसिंह यादव), हिमाचल प्रदेश में पत्रकारिता(नारायण शिवशक्ति ठाकुर) एवं महाकवि कालीदास और रामटेक(डाॅ. सुरेन्द्र शर्मा) प्रमुख आलेख हैं। इन आलेखों में पाठक बहुत ही उपयोगी व संग्रह करने योग्य सामग्री प्राप्त करता है। कहानियों में सुरक्षा(डाॅ. ओमप्रकाश सारस्वत), आंचल(तिलकान) एवं खेल जारी है(जसविंदर शर्मा) प्रभावशाली हैं। आकांक्षा यादव व अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं आज के वातावरण में व्यप्त भ्रष्टाचार पर प्रकाश डालती है। डाॅ.जयपाल ठाकुर, अनंत आलोक, रूचि शर्मा, डाॅ. सुरेश उजाला व वीरेन्द्र गोयल की कविताएं नई कविता होते हुए भी हमारी से संस्कृति से जोड़े रखने में सफल रही हैं। पत्रिका में दो अति महत्वपूर्ण व्यंग्य भी प्रकाशित किए गए हैं। चीडे की पाठशाल(अशोक गौतम) व कलयुगी नौनिहाल(राजेन्द्र परदेसी)। व्यंग्य कलयुगी नौनिहाल आज के बच्चों द्वारा माता पिता से की जा रही अपेक्षाओं पर कटाक्ष करता है। इसमे परदेसी जी ने पालकों की लाचारी को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। पत्रिका के अन्य स्तंभ, समीक्षाएं व रचनाएं भी उपयोगी व संग्रह योग्य हैं।

Saturday, April 10, 2010

साहित्य-संस्कृति की पत्रिका-सनद

पत्रिका: सनद, अंक: 08 , स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: मंजु मल्लिक मंजु, पृष्ठ: 79, मूल्य: 20रू.(वार्षिकः 125रू.), ई मेल: manjumallick@rediffmail.com , sanadpatrika@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.sanad.in/ , फोन/मोबाईल: 9868018472, सम्पर्क: 4-बी, फ्रेंडस अपार्टमेंट, मधु विहार गुरूद्वारा के पास, पटपड़गंज दिल्ली 110092
साहित्य संस्कृति के सरोकारों से जुड़ी पत्रिका सनद का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं को अपने कलेवर समेटे हुए है। प्रकाशित कहानियों में रास्ते बंद है(रहमान शाही), मोतिहारी वाली(डाॅ. इंदु सिन्हा), तवायफ(महेश अनघ), आखिरी रात(डाॅ. प्रमोद कुमार सिंह), संकल्प(महेन्द्र नारायण पंकज) प्रमुख है। इन कहानियों में वर्तमान के प्रति प्राचीन के दर्द को विस्तार के साथ व्यक्त किया गया है। लघुकथाओं में नरेन्द्र नाथ लाहा, निशा भोसले व महेश राजा ने कथा शिल्प का कुशलतापूर्वक निर्वाहन किया है। डाॅ. नरेश, विज्ञान वृत, राजेन्द्र नागदेव, रश्मि खेरिया, रश्मि बड़थ्वाल, सुनीता भारत व जय चक्रवर्ती के साथ साथ उर्मिला जैन व नंद किशोर अपनी बात कविता के माध्यम से पाठकों के सामने रख सके हैं। महेन्द्र राजा जैन का आलोचनात्मक आलेख ‘नामवर जी जरा...’ कुछ अधिक तल्ख हो गया है। इंतिजार हुसैन पर डाॅ. प्रेम कुमार का संस्मरण जानकारीप्रद व पठनीय है। पत्रिका का मुद्रण व साज सज्जा प्रभावित करती है।

Thursday, April 8, 2010

समकालीन कहानी एवं ‘समय के साखी’

पत्रिका: समय के साखी(कहानी विशेषांक), अंक: जनवरी-फरवरी10, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. आरती, पृष्ठ: 208, मूल्य: 100रू.यह अंक(वार्षिकः 220रू.), ई मेल: samaysakhi@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://samaykesakhi.in/ , फोन/मोबाईल: 9713035330, सम्पर्क: बी-308, सोनिया गांधी काम्प्लेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल म.प्र. 462003
पत्रिका समय के साखी का समीक्षित अंक कहानी विशेषांक है। पत्रिका में देश विदेश के लगभग हर परिवेश की कहानी को प्रकाशित करने का सफल प्रयास किया गया है। इस अंक में बाज़ावाद, भूमंडलीकरण, अर्थव्यवस्था, प्रजातंत्रिक मूल्य, विदेशी संस्कृति, समाज, प्रगति, मानव मूल्य व मर्यादाएं जैसे विषय कहानी के विषय बने हैं। इन कहानियांे मंे संवेदनात्मक अनुभव जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट करता है। प्रकाशित कहानियों में तबादला(सूर्यकांत नागर), सुखांत(डाॅ.अनिल सुदर्शन गौड़), एक भला मानस(मोहनदास नैमिशराय), हिमनद(मनीष सिंह), ज़िस्मफरोशी का अड्डा(कृष्ण कुमार राय), ग्राहक(पुन्नी सिंह), सुलगते सवाल(कमल कपूर), मृगतृष्णा(डाॅ. स्वाति तिवारी), संशयात्मा(कैलाश पचैरी), ममी(डाॅ. रंजन जैदी), और सजा भी कैसी(तरनजीत), रिश्तों का बंधन(डाॅ. शील कौशिक), गांधी या गोली(डाॅ. निहारिका रश्मि), माॅफी(अखिलेश शुक्ल), शहरो(नरेन्द्र कुमार गौड), तिनके(अंजु दुआ जैमिनी), सफेद लाल कमल के फूल(डाॅ. अहिल्या मिश्र), समाधान(रेणु व्यास), अस्तित्व(लता अग्रवाल), अम्मा की ममता(कमल किशोर दुबे), आॅनी(देवांशु पाल), टेलीफोन की घंटी(अमरजीत कौके), कौन सी जमीन अपनी(डाॅ. सुधा ओम ढीगरा), एक लड़ाई स्वयं से(रेणु राजवंशी गुप्ता) वर्तमान समय का प्रतिनिधित्व करती हैं। समकालीन कहानी पर डाॅ. पल्लव, राजेन्द्र परदेसी, डाॅ.प्रभा दीक्षित व डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव के आलेख पूरी सजगता से विश्लेषण करते हैं। कहानी उसके शिल्प व विशेषताओं पर परिचर्चा के अंतर्गत बहुपयोगी जानकारी का समावेश किया गया है। गाोविंद मिश्र, चित्रा मुदगल उर्मिला शिरीष एवं डाॅ वीरेन्द्र सक्सेना से बातचीत कहानी विधा के भविष्य व उसके बदलते स्वरूप पर पर्याप्त प्रकाश डालती है। एक अच्छे उपयोगी व सार्थक अंक के लिए बधाई।

Sunday, April 4, 2010

हिंदी साहित्य की ‘पंजाबी संस्कृति’

पत्रिका: पंजाबी संस्कृति, अंक: जनवरी-मार्च10, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. राम आहूजा, पृष्ठ: 64, मूल्य: 20रू.(त्रैवार्षिकः 200रू.), ई मेल: ram_ahu@hotmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मोबाईल: 01244227455,सम्पर्क: एन-115, साउथ सिटी, गुड़गांव 122001 (हरियाण)
पत्रिका के समीक्षित अंक मंे सामाजिक चेतना जाग्रत करने वाली राष्ट्रीय एकता से ओतप्रोत रचनाओं का प्रकाशन किया जाता है। इस अंक में डाॅ. सादिका नबाव सहर, निशा रिहाल एवं नीतू पंजाबी के आलेखों का प्रकाशन किया गया है। कहानियों में ‘बिना बैसाखी के’(डाॅ. सुरेन्द्र मंथन) एवं अमन ही अमन(डाॅ. संतोष गोयल) पठनीय व विचार योग्य रचनाएं हैं। रमेश प्रसून, पंकज शर्मा, रमेश कुमार सोनी, कृपाशंकर शर्मा ‘अचूक’, इब्राहीम अश्क, श्याम खरे, सागर सूद, श्याम सखा श्याम, कंुदन सिंह सजल एवं अन्य कवियों की कविताएं स्तरीय व पढ़ने योग्य हैं। रूप देवगुण, संतोष सुपेकर, अशफाक कादरी एवं डाॅ. लीला मोदी की लघुकथाएं वर्तमान समाज की कुरीतियों एवं आडंबरों से समाज को जाग्रत करने में सफल रही हैं। पत्रिका का सिरायकी खण्ड भी उपयोगी व संग्रह योग्य है। अन्य रचनाएं, स्तंभ व पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

Thursday, April 1, 2010

साहित्य की मुक्त कंठ गाथा-‘सृजन गाथा’

पत्रिका: सृजनगाथा(ई-पत्रिका), अंक: मार्च10, स्वरूप: मासिक, संपादक: जयप्रकाश मानस, पृष्ठ: आॅनलाईन उपलब्ध, मूल्य अमूल्य(वार्षिकः दुर्लभ), ई मेल: srijangatha@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.srijangatha.com/ , साहित्य संस्कृति एवं भाषा का वैश्विक मंच के इस नए निखरे रूप ने बहुत अधिक प्रभावित किया। पत्रिका का प्रथम आलेख भारतीय प्रादेशिक साहित्य के जर्मन अनुवाद की जानकारी देता है। सूरज प्रकाश की कहानी अल्बर्ट आज के परिवेश की एक अच्छी सार्थक रचना है। समाचार गौरीनाथ को खगेन्द्र ठाकुर का कानूनी नोटिस साहित्य जगत की हलचल से रूबरू कराता है। हेमंत शेष को वर्ष .09 का बिहारी पुरस्कार व पंजाबी कवि डाॅ. जगतार के देहावसान के समाचार अभी तक कहीं पढ़ने में नहीं आए हैं। ‘वाज इट अ ड्रीम’(फ्रांसिसी कहानी) का द्विजेन्द्र जी द्वारा किया गया अनुवाद कथारस से पाठक को बांधे रखने में सफल रहा हैै। डाॅ. अभिजात का आत्मकथ्य ‘इश्क ने लिखना सिखाया’ व मनोज सिंह का मूल्यांकन ‘रूसी साहित्य में गूढ़ रहस्यवाद का आगमन’ समीक्षा से बढ़कर बेहतर विश्लेषण है। संजय पुरोहित की कहानी ‘फियादीन’ न्यूज चेनलों पर बढ़ते बाजारवाद व उससे उत्पन्न खतरों के प्रति आगाह करती हे। संपादक जयप्रकाश मानस जी की बात वर्तमान समाज में व्याप्त घृणा व व्यवस्था के प्रति जन आक्रोश की गहन पड़ताल करता है। पत्रिका के निखरे सुंदर रूप को हार्दिक बधाई।