Sunday, February 28, 2010

‘सदी का दूसरा दशक और साहित्य’(संपादकीय)-समावर्तन

पत्रिका: समावर्तन, अंक: फरवरी.10, स्वरूप: मासिक, संस्थापक: प्रभात कुमार भट्टाचार्य, प्रधान संपादक: मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 90, मूल्य: 20रू.(वार्षिकः 240), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0734-2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
पत्रिका समावर्तन का समीक्षित अंक ख्यात कवि लीलाधर मंडलोई पर एकाग्र है। पत्रिका में उनकी कुछ कालजयी कविताएं जैसे सूत, नदी, आग, तितलियां, कालाहांडी, कबाड़खाना आज के वातावरण में व्यप्त संताप से जीवन में पे्ररणा देने के प्रति उत्सुक दिखाई देती हैं। हमारी पाठशाला, तोड़ल मौसिया की पंगत, टपके का डर पढ़कर उनकी गद्य पर पकड़ को जाना समझा जा सकता है। इन आलेखों में आम बोलचाल की भाषा, स्थानीय मुहावरों तथा संदर्भो का बड़ी कुशलता से प्रयोग किया गया है। ख्यात आलोचक डाॅ. नामवर सिंह ने मंडलोई जी की गद्य पुस्तक ‘दानापानी’ पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है, ‘मंडलोई की भाषा की क्षमता को देखकर अच्छा लगा।’ मंडलोई जी भाषा के साथ साथ उसके अंदर छिपे यथार्थ को खींचकर बाहर लाने में सफल रहे हैं। यह उनकी कविताओं से स्पष्ट होता है। महाश्वेता देवी व अरविंद त्रिपाठी ने मंडलोई जी की सरलता, सहजता व उनकी काव्यगत विशेषताओं को अपने आलेखों में स्पष्ट किया है।उनसे हरिभटनागर की बातचीत में उनका यह स्वीकारना कि, ‘मैं फ़िजूल का बड़ा ख़्वाब नहीं देखता जो कुव्वत से बाहर हो’ उनका बड़प्पन दर्शाता है। यह किसी भी व्यक्ति के लिए एक आदर्श वाक्य के समान है। ख्वाब देखने को वे अन्यथा नहीं लेते पर फ़िजूल के ख्वाब को देखना गैरजरूरी मानते हैं। वक्रोक्ति के अंतर्गत ख्यात व्यंग्यकार व पत्रिका व्यंग्ययात्रा के संपादक डाॅ. प्रेम जनमेजय पर कुछ सार्थक व उपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। उनका व्यंग्य ‘राजधानी में गंवार’, लधुकथा देश भक्ति तथा ज्ञान चतुर्वेदी से मित्रता व उसपर गौरव पढ़ने योग्य रचनाएं हैं। वंचितों पर व्यंग्य करना वे उचित नहीं मानते हैं। उनका यह कहना बिलकुल सही है कि, ‘कोई विधा किसी रचना को श्रेष्ठ नहीं बनाती है अपितु श्रेष्ठ रचनाएं ही किसी विधा को श्रेष्ठ बनाती है। अन्य रचनाओं में राजकुमार कुंभज, रमेश चंद्र शर्मा, शशांक दुबे पठनीय हैं। आर. के. लक्ष्मण पर देवेन्द्र जी तथा हरिओम तिवारी के आलेख व साक्षात्कार उनके संबंध में काफी कुछ कहते हैं। इकबाल मजीद, रामकुमार तिवारी, रमेश दुबे की कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। सुरेश गर्ग एवं सुरेश शर्मा की लघुकथा भी अच्छे केनवास पर लिखी गई कथाएं हैं। डाॅ पुरू दधीच के बारे में जानकर उनके बारे में और अधिक पढ़ने की इच्छा होती है। पत्रिका की सामग्री सहेज कर रखने योग्य है। इतनी अच्छी पत्रिका के प्रस्तुतिकरण व संपादन के लिए पूरी टीम बधाई की पात्र है। और अंत मंे श्रीराम दवे का ‘मैं हूं न’ आप अवश्य पढ़ना चाहेंगे।

Saturday, February 27, 2010

एंहचली, हार और झेड़े-‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: जनवरी.10, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य: 5रू.(वार्षिकः 50), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं , फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला-5
हिमप्रदेश से निकलने वाली यह पत्रिका हर अंक में विशिष्ट आलेखों का प्रकाशन करती है। इस अंक के आलेखों में - अमृता शेरगिल और शिमला का आकर्षण(सुदर्शन वशिष्ट), श्रव्य कथाओं की किस्सागोई(श्रीनिवास श्रीकांत), सांस्कृतिक समन्वय केे लिए ग़़ज़ल(डाॅ. तारादत्त निर्विरोध) एवं राजयोग और संगीत(डाॅ. जीवराज शर्मा) प्रमुख हैं। इस अंक में दो समसामयिक कहानियां यह भी सत्य है(डाॅ. सरला अग्रवाल) तथा साॅरी(देवांशु पाल) प्रकाशित की गई है। लघुकथाओं में जितेन्द्र कुमार की प्यास आकर्षक व सार्थक रचना है। नरेश कुमार उदास , डाॅ. दिनेश चमौला ‘शैलेश’, प्रियंका भारद्वाज एंव पीयुष गुलेरी की कविताएं आज के समय में परिवर्तन की इच्छुक दिखाई देती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व्यंग्य तथा समीक्षाएं भी इसे सार्थक साहित्य की अच्छी पत्रिका बनाते हैं।

Friday, February 26, 2010

बुद्धिवादी नाटकों की रौनक क्यों शेक्सपियर के नाटकों की तुलना मंे फीकी पड़ती दिखाई दे रही है-वागर्थ

पत्रिका: वागर्थ, अंक: फरवरी.10, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 134, मूल्य: 20रू.(वार्षिकः 200), ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in , वेबसाईट: http://www.bharatiyabhashaparishad.com/ , फोन/मो. (033)32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद्, 36ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017
वागर्थ के समीक्षित अंक में संस्कृत के प्रकांड विद्वान डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी एवं शलभ श्रीराम सिंह की कविताएं जन भावनाओं की उत्कृष्ट प्रस्तुति है। दिलीप शाक्य व कुमार विश्वबंधु की कविताएं आज के संदर्भ में भारतीय युवा को विश्व समुदाय से जोड़ती है। सुधा अरोरा, अष्टभुजा शुक्ल, वेणु गोपाल, विनोद तिवारी, अरूण कुमार पानीबाबा अपने अपने आलेखों में पाठक को भारतीयता से जोड़े रखने में सफल रहे हैं। कहानियों में झड़ीलाल की बात(विवेकानंद) एवं तुम मर क्यों गए जान मोहम्मद(कैलास चंद्र) विचारणीय रचनाएं हैं। अमृतलाल बेगड़, गोविन्द मिश्र के यात्रा वृतांत तथा राम मेश्राम व खुर्शीद अकबर की ग़ज़लें नई सदी की आहट में हमारे संस्कारों से जोड़े रखने का प्रयास करती दिखाई देती हैं। कंचन सिंह चैहान की नज़्म ‘तुम्हारी मुस्कुराहटें हैं आस-पास वहीं’ अपने आसपास के वातावरण को सजीव कर उससे बातें करती जान पड़ती हैं। पत्रिका की अन्य समीक्षाएं रचनाएं व पत्र आदि भी साहित्य पर अच्छी जानकारी संजोकर लाए हैं। पत्रिका का नाट्य विधा पर संपादकीय नाटक के लिए वर्तमान चुनौतियों व संभावनाओं पर अच्छी तरह प्रकाश डालता है।

Thursday, February 25, 2010

छोटे पत्र बड़े सवाल-‘शुभ तारिका’

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: फरवरी.10, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 34, मूल्य: 12(120), ईमेलः वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो.ः(0171)2610483, सम्पर्क: कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी अम्बाला छावनी 330001 हरियाणा
पत्रिका के इस अंक में देशपाल सिंह सेंगर, नीति अग्निहोत्री तथा अनिल शर्मा ‘अनिल’ की कहानियों का प्रकाशन किया गया है। इन कहानियों की विषय वस्तु आकर्षित करती है। वसंत पर रामचरण ‘युयुत्सु’ का आलेख अच्छा व जानकारीपरक है। दिनेश पाराशर, निर्मला जोहरी, अक्षय गोजा व अर्पणा चतुर्वेदी की कविताएं अपने प्रस्तुतिकरण में प्रभावशाली हैं। आकांक्षा यादव व लेखराम शर्मा की लघुकथाओं में नवीनता व परिपूर्णता है। पत्रिका के अन्य स्तंभ, समाचार तथा समीक्षाएं भी पाठकोपयोगी हैं। उर्मि कृष्ण जी का संपादकीय हर लघु पत्रिका की आवश्यकता व उपयोगिता पर प्रकाश डालता है।

कलाओं का खबरनामा-इप्टावार्ता

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: नवम्बर.09, स्वरूप: मासिक, संपादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 10, मूल्य: उपलब्ध नहीं(वार्षिकः उपलब्ध नहीं), ई मेल: iptavarta@rediffmail.com, वेबसाईट: http://iptavarta.blogspot.com/ , फोन/मो. (9425387580), सम्पर्क: पी.डी. 4 परफेक्ट एन्कलेव, स्नेह नगर जबलपुर .02
नाट्य विधा पर एकाग्र इप्टावार्ता के इस 35 वें अंक में नाट्य आधारित रचनात्मक सामग्री प्रकाशित की गई है। जबलपुर की ख्यात कलासंस्था विवेचना के सोलहवें राष्ट्रीय नाट्य समारोह के अवसर पर मंचित नाटक ‘मित्र’ के प्रभावी प्रस्तुतिकरण का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। दुर्दिन में लोकविधा(रोहित कौशिक) आलेख में नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति व उसकी कठिनाईयों पर विस्तार से लिखा है। विवेचना जबलपुर के समारोह की जानकारी आकर्षित करती है। रंग खबर के अंतर्गत प्रकाशित समाचार तथा जानकारियां पाठकों के ज्ञान में आशातीत वृद्धि करते हैं।

Wednesday, February 24, 2010

नाटको के लिए अनोखा ‘रंग अभियान’

पत्रिका: रंग अभियान, अंक: 16-17, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: अनिल पतंग, पृष्ठ: 112, मूल्य: 25(उपलब्ध नहीं), वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो.ः 09430416408, सम्पर्क: नाट्य विद्यालय, वाद्या, पो. एस. नगर, बेंगूसराय(बिहार)
पत्रिका नाट्य विधा पर एकाग्र सामग्री का प्रकाशन करती है। प्रकाशित रचनाओं का स्तर उत्कृष्ट है। प्रकाशित रचनाओं में बिहार राज्य के मूल नाट्य स्वरूप(प्रो. नरनारायण राव), नटरंग विवेक: राय की राय(ब्रजरतन जोशी), डाॅ. राय: नाट्य समीक्षक(डाॅ. सुरेश चंद्र शुक्ल चंद्र), हिंदी नुक्कड़ नाटक का विकास एवं संभावनाएं(प्रो. कृष्णनंदन सिंह) सहेज कर रखने योग्य रचनाएं हैं। इन रचनाओं को नाट्य शास्त्र में शोध कर रहे विद्यार्थियों को अवश्य पढ़ना चाहिए। प्रकाशित नाटकों में नाटक अनाटक(डाॅ. श्याम संुदर घोष) एवं विजय जुलूस(महेन्द्र नारायण पंकज, ना. रू. नूतन आनंद) पाठक की चेतना आंदोलित करते दिखाई देते हैं। पत्रिका की अन्य समीक्षाएं व साहित्यिक समाचार भी इसे नाट्य शास्त्र की अग्रणी पत्रिका बनाते हैं।

Tuesday, February 23, 2010

भारतीय भाषाओं के लिए आशा भरी ‘राजभाषा किरण’

पत्रिका: राजभाषा किरण, अंक: फरवरी.10, स्वरूप: मासिक, संपादक: अनंत कुमार साहू, पृष्ठ: 42, मूल्य: 15 (वार्षिकः 180), ई मेल: rajbhasa2_kiran@hotmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोनः (0250)2344717, सम्पर्क: जी.02, सुखमणि अपार्टमेंट्स, नवधर रोड़, बसई,(पश्चिम) जिला ठाणे, महाराष्ट्र
राजभाषा के लिए समर्पित पत्रिका का समीक्षित अंक पाठकों के दैनिक जीवन के लिए उपयोगी सामग्री से परिपूर्ण है। अंक में समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। इनमें -एक से तीन भाषा फार्मला अच्छा है। हिंदी राष्ट्रीय चेतना की भाषा, अंतराष्ट्रीय भाषा है भोजपुरी आदि जानकारीप्रद हैं। आॅफिस में बास हो जब वूमन, कम्प्यूटर की दुनिया में नई क्रांति, पैसे को कैसे करें मेनेज, बाबा नागार्जुन, माखनलाल चतुवेर्दी, व्यंग्य नालायक होने का सुख(शास्त्री नित्यगोपाल कटारे) अच्छी रचनाएं हैं। एक समाजउपयोगी विविधआयामी पत्रिका का स्वागत किया जाना चाहिए।

Monday, February 22, 2010

बच्चों के लिए, बच्चों के द्वारा बच्चों से-‘हलचल’

पत्रिका: हलचल(बाल पत्रिका), अंक: जुलाई-अगस्त.09, स्वरूप: उपलब्ध नहीं, संपादक: ज्योति दीवान, पृष्ठ: 16, मूल्य: उपलब्ध नहीं, ई मेल: उपलब्ध नहीं , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोनः (07572)236191, सम्पर्क: जीवोदय, जनता टाकिज के पीछे, नेहरूगंज, इटारसी म.प्र.
इटारसी प्लेटफार्म के अनाथ बच्चों के लिए कार्य कर रही संस्था ‘जीवोदय’ द्वारा उनके आश्रम में रह रहे बच्चों के लिए यह पत्रिका निकाली जाती है। वहां के बच्चों की रचनाएं इस पत्रिका में प्रकाशित की जा रही है। यह एक सराहनीय प्रयास है। संध्या व शोभा की कविताओं को उन छोटे बच्चों द्वारा किए गए प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। कहानियों में पूजा ठाकुर, मुनीर खान, मनीष, रीता सराठे का प्रयास प्रभावित करता है। मुर्गे की बांग तथा एक कहानी ऐसी भी में भी बच्चों ने अपनी प्रतिभा के दर्शन कराए हैं।

Sunday, February 21, 2010

साहित्य के ‘सूर्य का उजाला’

पत्रिका: सूर्य का उजाला, अंक: 25 दिसम्बर .09, स्वरूप: साप्ताहिक, संपादक: उपेन्द्र पाल सिंह, पृष्ठ: 04, मूल्य: 1 रू.(वार्षिक 52रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो.:9319981821, सम्पर्क: 19/138, के.पी. स्कूल के पीछे, कृष्णापुरी अलीगढ़, उ.प्र.
साप्ताहिक साहित्यिक समाचार पत्र का यह अंक लोक कवि रामचरण गुप्त विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक मंे उनकी कविताओं को प्रमुखता से प्रकाशित करने के साथ साथ आलेखों से उनके व्यक्तित्व की जानकारी भी मिलती है। डाॅ. वेदप्रकाश अभिताभ, गोपाल बाबू शर्मा, इंजी. अशोक कुमार गुप्त के आलेखों से श्री रामचरण गुप्त के व्यक्तित्व की जानकारी प्राप्त होती है।

साहित्य से परिचय ‘रवीन्द्र ज्योति’ द्वारा

पत्रिका: रवीन्द्र ज्योति, अंक: जनवरी.फरवरी 10, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. केवल कृष्ण पाठक, पृष्ठ: 20, मूल्य: 2 रू.(वार्षिक 24रू.), ई मेल: उपलब्ध नहीं , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोनः 259158, सम्पर्क: 343/19, आनंद निवास, गीता कालोनी, जींद हरियाणा 126102
इस उपयोगी पत्रिका में भगवतशरण अग्रवाल के आलेख ‘कवि क्या लिखे?’ के साथ साथ अन्य साहित्यिक समाचार, सम्मान पुरस्कारों की जानकारी व अन्य रचनाएं प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका ने इस अंक में साहित्यिक पत्रिकाआंे व संग्रह/पुस्तकों का परिचय संुदर ढंग से दिया है।

Friday, February 19, 2010

समकालीन साहित्य, संस्कृति, कला और विचार का मासिक--‘उत्तर प्रदेश’

पत्रिका: उत्तर प्रदेश, अंक: जनवरी10, स्वरूप: मासिक, संपादक: सुरेश उजाला, पृष्ठ: 36, मूल्य: 10 रू.(वार्षिक 110रू.), phone : 2239132, 2239135, ई मेल: upinfo@satyam.net.in , वेबसाईट: http://www.upgovt.nic.in/ , सम्पर्क: संपादक उत्तर प्रदेश, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पार्क रोड़, लखनऊ
प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका उत्तर प्रदेश के इस अंक में कहानियों के साथ साथ अच्छे आलेखों का प्रकाशन भी किया गया है। अंक में प्रगतिवादी काव्य में व्यक्त प्रवृत्तिमार्गी जीवन दर्शन(प्रा. संतोष कुमार लक्ष्मण यशवंतकर), अनुभूतियां अभिव्यक्ति चाहती हैं(डाॅ. गिरीश कुमार शर्मा) एवं व्यक्तिपरक चेतना के अग्रणी मनीषी श्रीकांत वर्मा(जगदीश यादव) आलेखों में संबंधित विषय विशेष पर एकाग्र किया गया है। अखिलेश शुक्ल की कहानी टेªन से उतरा वह आदमी ग्रामीण जीवन की सोच में आ रहे बदलाव की ओर संकेेत करती है। डाॅ. स्वाती तिवारी की कहानी समाज सेवा एक तथ्यपरक रचना है। दया पवार से रतीलाल शाहनी की बातचीत ‘आज भी मुझे कविता अच्छी लगती है’ में कविता के प्रति उनका अनुराग पाठकों को पुनः कविता की ओर आकर्षित करने में सफल होगा। हरपाल सिंह अरूण, डाॅ. स्वर्णलता, रमाकांत मिश्र व अशोक अंजुम की कविताएं एक नई सोच के साथ आगे ले जाने के लिए तत्पर हैं।रावेन्द्र कुमार रवि की कविता ‘नए वर्ष’ आम आदमी के आसपास के यथार्थ पर गहन दृष्टि डालती हुई कुछ नया पाने की लालसा लिए हुए है। डाॅ. सुरेन्द्र कुमार शर्मा का संस्मरण ‘हिंदी पत्रकारिता के स्तंभ रामवृक्ष बेनीपुरी’ रचनाकार के व्यक्तित्व पर समग्र रूप से प्रकाश डालता है। अन्य रचनाएं आलेख, पत्र आदि भी इस पत्रिका को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं।

Thursday, February 18, 2010

पाखी में इस बार ‘पीढ़ियां आमने सामने’

पत्रिका: पाखी, अंक: फरवरी 10, स्वरूप: मासिक, संपादक: अर्पूव जोशी, पृष्ठ: 114, मूल्य: 20 रू.(वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , सम्पर्क: इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशियटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएडा 201303 पाखी का समीक्षित अंक अपने अन्य अंक विचारणीय रचनाओं के साथ प्रकाशित हुआ है। इसे ‘विचार अंक’ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अंक में प्रकाशित कहानियों के केन्द्र में भी एक विचार हैै जिसपर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। चोट(योगेन्द्र दत्त शर्मा), डाॅक्टर आॅफ दा क्रास(सेराज खान बातिश), एक और हीरा मोती(दया हीत) तथा बरफ में खड़ा सलीब(शीला इन्द्र) पढ़कर उस विचार की गहराई तक पहुंचा जा सकता है जिसके लिए इन कहानियों को लिखा गया है। ख्यात कथाकार सूर्यबाला की संस्मरणात्मक कहानी मटियाला तीतर करूणा से उपजी रचना है यह दया की अपेक्षा सहानुभूति केन्द्रित रचना हैं। सभी कविताएं अपनी समकालीनता के लिए याद रखने योग्य हैं। विशेष रूप से ज्योति चावला, सुरेश सेन व अरूण शीतांश की कविताओं में समाज विच्छेपित होकर अलग अलग रंगों की आभा विखेरता है। मुर्शरफ आलम जौक़ी, राजीव रंजन गिरि, हिमांशु शेखर के आलेख पाठक की सोच बदलने का प्रयास करते दिखते हैं। पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद अनुपम, पे्रम भारद्वाज तथा प्रतिभा कुशवाहा अपने अपने स्तंभों में गहराई के साथ अपनी बात रखते हुए पाठक की सोच में परिवर्तन लाने के लिए तत्पर जान पड़ते हैं। प्रतिभा कुशवाहा तथा प्रेम भारद्वाज के स्तंभ विषय प्रधान होते हुए भी विषयी प्रधान है यह पत्रिका के भविष्य के लिए सुखद है। सभी समीक्षाएं तथा रचनाएं उल्लेखनीय व पठनीय है। लेकिन पत्रिका का प्रमुख आकर्षण ‘पीढ़ियां आमने सामने’ हैं। इसमे पत्रिका के संपादक अपूर्व जोशी तथा पे्रम भारद्वाज ने दो पीढ़ियों को सामने रखा है। चर्चा में पुरानी पीढी से प्रो. निर्मला जैन, मैत्रेयी पुष्पा, ममता कालिया जैसी ख्यात तथा लब्धप्रतिष्ठित लेखिकाओं के विचार जानने का सुअवसर पाठकों को मिला है। नई पीढ़ी से वंदना राग, तथा कविता जैसी प्रसिद्ध एवं स्थापित लेखिकाओं ने अपने अपने विचार रखे हैं। देश काल परिस्थिति के अनुसार महिलाओं की समस्याएं नए रूप में सामने आती रहीं हैं। हिंदी साहित्य में महिला लेखिकाएं स्त्री की उन समस्याओं को भी उठाती रही हैं जिन पर अधिक गंभीरतापूर्वक कभी सोचा ही नहीं गया था। भारतीय महिला लेखिकाओं में महाश्वेता देवी (पुरानी पीढ़ी से) तथा अरूंधती राय (नई पीढ़ी) का लेखन (भले ही वे उपन्यासकार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हों) महिला केन्द्रित न होते हुए भी कहीं न कहीं महिला की समस्याओं से जुड़ हुआ है। अतः इस चर्चा में यदि अन्य भारतीय भाषाओं की लेखिकाओं को भी शामिल किया जाता तो परिचर्चा और भी रोचक जानकारीप्रद होती। इस परिचर्चा से स्पष्ट होता है कि हिंदी साहित्य में महिला लेखिका ‘स्त्री’ की समस्याओं को लेकर जागरूक हैं। व उसे हल करवाने के लिए वचनबद्ध भी है। इतनी अच्छी परिचर्चा के लिए अपूर्व जोशी व प्रेम भारद्वाज बधाई के पात्र हैं।

Tuesday, February 16, 2010

ग़ज़ल विधा पर एकाग्र ॔साहित्य सागर’

पत्रिका : साहित्य सागर, अंक : फरवरी 10, स्वरूप : मासिक, संपादक : कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ : 52, मूल्य : 20 रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल : kksaxenasahityasagar@rediffmail.com , सम्पर्क : 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
पत्रिका का समीक्षित अंक डॉ. महेश भार्गव पर एकाग्र हैं। अंक में उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला गया है। अन्य रचनाएं ग़ज़ल विधा पर विचार करती दिखाई देती हैं। इनमें डॉ. ब्रहमजीत गौतम, डॉ. दरवेश भारती, भवेश दिलशाद के लेख ग़ज़लों पर अपनी विशिष्ट शैली में विश्लेषण करते है। डॉ. महेन्द्र अग्रवाल, भवेश दिलशाद, संयोगिता देसाई, रामस्नेहीलाल शर्मा तथा चन्द्रसेन विराट की ग़ज़लें अच्छी व संग्रह योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व स्तंभ भी भी पाठक को आकर्षित करते हैं।

लघुकथा का हमसफर

पत्रिका हमसफर, अंक जनवरी10, स्वरूप मासिक, संपादक डॉ. तारिक असलम तस्नीम, पृष्ठ08, मूल्यउपलब्ध नहीं (वार्षिक 50रू.), ई मेलः , सम्पर्क प्लाट 6, सेक्टर 2, हारून नगर कालोनी, फुलवारी शरीफ, पटना बिहार 801.505
लघु पत्रिका हमसफर का दूसरे वर्ष का यह पहला अंक है। अंक साहित्य की लघुकथा विधा पर एकाग्र किया गया है। इसमें प्रताप सिंह सो़ी, अखिलेश निगम, सुरेन्द्र मंथन, डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल, अनिल शूर आजाद, डॉ. रामकुमार घोटड, तारिक असलम तस्नीम एवं कमल चोपड़ा की विशिष्ट लघुकथाओं का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रताप सिंह सोी की असली जहर, योगेन्द्र नाथ शुक्ल की कथा अपनी अपनी सोच एवं कमल चोपड़ा की लघुकथा फर्क उल्लेखनीय हैं।

Sunday, February 14, 2010

क्या रचनाधर्मियों की संवाद पत्रिका आपके ‘आसपास’ है?

पत्रिका-आसपास, अंक-फरवरी10, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, पृष्ठ-32, मूल्य-5रू.(वार्षिक 60रू.), फोन-(0755)2772051,
ई मेलः shabdashilpi@yahoo.com , सम्पर्क-एच.03, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल म.प्र.
साहित्यकारों के मध्य संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई पत्रिका आसपास अब खासी लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। पत्रिका का हर अंक नई नई जानकारी लेकर आता है। समीक्षित अंक में दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय के दो दिवसीय स्थापना पर्व का समाचार प्रमुख रूप से प्रकाशित किया गया है। सम्मान/पुरस्कार स्तंभ के अंतर्गत विकल जी का अमृत महोत्सव, विक्रम कालीदास पुरस्कार, करवट का सम्मान समारोह, शताब्दी वर्ष पुरस्कार, काका हाथरसी पुरस्कार, कादम्बरी व पाथेय सम्मान, शमशेर सम्मान, व्यंग्य लेखन प्रतियोगिता आदि विस्तृत रूप से प्रकाशित किए गए हैं। प्रख्यात सिने गीताकार विट्ठल भाई पटेल का अमृत महोत्सव मनाने का संग्रहालय ने निर्णय लिया है। इस समाचार को पत्रिका ने विशेष तौर पर प्रकाशित किया है। ख्यात गीतकार डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र एवं श्री अभिलाष जी केे अभिनंदन समारोह पढ़कर अधिक खुशी हुई। क्योंकि वर्तमान मंे गीतकारों का कोई खैरख्वाह नहीं है। अन्य साहित्यिक विधाएं कहानी, कविता, संस्मरण, रेखाचित्र, जीवनी को महत्व दिए जाने के कारण गीत अत्यंत लोकप्रिय होते हुए भी साहित्य की मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। पत्रिका में प्रकाशन लोकापर्ण, श्रद्धांजलि रचनाकारों के मध्य संवाद स्थापित करने में सहायक हैं।

Saturday, February 13, 2010

चैनलों में आरूषि(संपादकीय)-‘सनद’ पत्रिका

पत्रिका-सनद, अंक-10, वर्षः02, स्वरूप-त्रैमासिक, संस्थापक संपादक-फ़ज़ल इमाम मलिक, संपादक-मंजु मलिक मनु, पृष्ठ-76, मूल्य-20रू.(वार्षिक 125रू.), मो. 09868018472, 09350102013, ई मेलः manumallick@rediffmail.com , sanadpatrika@gmail.com , वेबसाईटः http://www.janadesh.in/ सम्पर्क-4.बी, फ्रेन्डस अपार्टमेंट्स, मधु विहार गुरूद्वारा के पास, पटपड़गंज, दिल्ली 110.092 साहित्य संस्कृति की संवाहक पत्रिका सनद ने दो वर्ष के अल्प समय में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित की है। पत्रिका का स्वरूप, कलेवर तथा सामग्री चयन आकर्षित करता है। समीक्षित अंक में समकालीन कहानियों को स्थान दिया गया है। इनमें प्रमुख हैं- उल्टी गिनती(हसन जमाल), मेरे शहर की मिस यूनिवर्स(प्रताप दीक्षित), कफ़र््यू(पुष्पलता कश्यप), बेजबान का फैसला(डाॅ .जहीर आफाक) एवं गणित, हस्तक्षेप(सतीश उपाध्याय)। इन कहानियों में आज की परितिथियों में मनुष्य की तड़प को व्यक्त किया गया है। कविताओं में अशोक आनन, सत्येन्द्र कुमार, केशव शरण, जसवीर चावला, प्रेमशंकर रघुवंशी, अशोक अंजुम तथा भगवान दास जैन प्रभावित करते हैं। इन कविताओं का स्वर न तो अति प्रगतिवादी है, और न ही ये अतिवाद का शिकार हैं। इसलिए इन्हें पाठक अवश्य ही पसंद करेंगे। पत्रिका का सबसे अधिक पठ्नीय व संग्रह योग्य आलेख डाॅ. वीरेन्द सिंह यादव का लेख ‘इस्लाम में मानवतावाद’ है। जिसमें लेखक ने इस्लाम से संबंधित उन भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है जिसे आम गैर मुस्लिम इस्लाम का एक अहम हिस्सा मानता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं पुस्तक समीक्षा तथा पत्र आदि भी इसे उत्कृष्ट बनाते हैं।

Friday, February 12, 2010

दक्षिण भारत से प्रकाशित पत्रिका ‘अहल्या’

पत्रिका-अहल्या, अंक-जनवरी.10, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती आशा देवी सोमाणी, पृष्ठ-64, मूल्य-20रू.(वार्षिक 225रू.), फोनः (040)24804000 http://www.ahalyahindimagazine.com/ वेबसाईटः सम्पर्क-14-1-498 ए, ज्ञानबाग रोड़, पान मण्डी के पास, हैदराबाद (आंध्रप्रदेश)
पारिवारिक पत्रिका अहल्या का यह समीक्षित अंक अपनी विविधतापूर्ण सामग्री के कारण उल्लेखनीय है। अंक में परिवार के लिए उपयोगी व पठ्नीय आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें सत्यनारायण पवार, प्रो. शामलाल कौशल, सावित्री देवी, दुर्गाचरण मिश्र, ओमप्रकाश बजाज तथा डाॅ ए. कीर्तिवर्धन प्रमुख हैं। प्रकाशित कहानियां भी भारतीय समाज व आम जन का प्रतिनिधित्व करती है। भवानी सिंह, अंजु दुआ जैमिनी, कृष्ण शंकर सोनाने की कहानियां अपने काल व स्थान विशेष की पृष्ठभूमि को समेटते हुए आज जन से जुड़ती हैं। मुन्ना मोहन, अखिलेश शुक्ल एवं सुभाष सोनी की लघुकथाएं मानव की दैनिक चिंताओं से जुड़ी हुई हैं। दिवाकर पाण्डेय, रामनिवास मानव, भगवत दुबे एवं दरवेश भारती की कविताएं विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। अन्य रचनाएं समीक्षाएं व पत्र आदि पत्रिका को स्तरीय बनाते हैं।

Wednesday, February 10, 2010

साहित्य के लिए शुभ-‘शुभ तारिका’

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-जनवरी 10, स्वरूप-मासिक, संपादक-उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-39, मूल्य-12रू.(वार्षिक 120रू.), फोनः (0171)2610483, ई मेलः ,सम्पर्क-कृष्णदीप, ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी, हरियाणा 1330001 पत्रिका के समीक्षित अंक में आज के संदर्भ युक्त कहानियों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- मैं तो नहीं हूं(इंदिरा किसलय) तथा ऋण(संतोष शर्मा)। पत्रिका मंे गोव की ख्यात रचनाकार जयश्री राय पर प्रकाशित परिशिष्ट उनके समग्र साहित्य व लेखन पर पर्याप्त प्र्रकाश डालता है। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, बाल कृष्ण मिश्र व संतोष कुमार की कविताएं अच्छी हैं। दोनों लघुकथाएं व महाराजकृष्ण जैन का आलेख पत्रिका को समृद्ध बनाता है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं भी उपयोगी व जानकारीप्रद हैं।

Tuesday, February 9, 2010

समकालीन साहित्य की ‘समकालीन अभिव्यक्ति’

पत्रिका-समकालीन अभिव्यक्ति, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ-64,मूल्य-15रू.(वार्षिक 50रू.),फोनः (011)26645001, ई मेलः samkaleen999@gmail.com ,सम्पर्क-नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली-30 भारत
समकालीन साहित्य के लिए समर्पित पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक रचनात्मक रूप से अत्यधिक समृद्ध है। अंक में विश्वमोहन तिवारी, भुवनेश्वर प्रसाद, कृष्ण कुमार यादव एवं कमलिनी पशीने के उपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। कहानियों में सुमन सिंह की कहानी चूक एवं रामबाबू नीरव की रचना तुम धन्य हो अनुपमा ध्यान देने योग्य हैं। इच्छित की लघुकथा तोहफा अच्छा संदेश देती है। रामगुलाम रावत, श्रीमती सुर्वणा दीक्षित एवं ओम प्रकाश मिश्र की कविताएं आज के समाज को एक दूसरे से जोडने का संदेश देती है। पत्रिका के अन्य स्तंभ व रचनाएं भी पाठक अवश्य ही पसंद करेंगे।

Monday, February 8, 2010

उत्तम साहित्य की ‘मैसूर प्रचार परिषद पत्रिका’

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-जनवरी10, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. बी. रामसंजीवैया, पृष्ठ-48, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), फोनः (080)23404892, ई मेलः brsmhpp@yahoo.co.in ,सम्पर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 कर्नाटक पत्रिका का समीक्षित अंक राजभाषा से संबंधित सामग्री से परिपूर्ण है। अंक में भाषा से संबंधित कुछ उपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- राजभाषा हिंदी और संसदीय राजभाषा समिति(कृष्ण कुमार ग्रोवर), भाषायी दासता सेे मुक्ति कैसे मिले(मित्रेश कुमार गुप्त), प्रयोजनामूलक हिंदी(ए.एम. रामचंद्र), प्रयोजनामूलक हिंदी के विविध आयाम(राकेश कुमार शर्मा), प्रयोजनामूलक हिंदी खण्ड.01(प्रो. बी. वै. ललिताम्बा)। अन्य रचनाओं में प्रगतिवादी काव्य में व्यक्त प्रवृत्तिमार्गी जीवन दर्शन(संतोष कुमार लक्ष्मण यशवंतकर), कन्नड़ साहित्य(डाॅ. टी. जी. प्रभाशंकर ‘पे्रमी’) प्रभावित करती है। देवेन्द्र कुमार मिश्र की कहानी दीदी तथा अखिलेश शुक्ल एवं बी. गोविंद शेनाय की लघुकथा भी पत्रिका को स्मृद्ध बनाती है। हितेश कुमार शर्मा, प्रदीप निगम एवं गया प्रसाद विश्वकर्मा की कविता अपनी नवीनता के कारण ध्यान देने योग्य हैं।

Friday, February 5, 2010

‘भारत के पर्यावरण आंदोलन जन-आंदोलन बनने के बजाए व्यक्ति केन्द्रित बनकर रह जाते हैं’-कथन

पत्रिका-कथन, अंक-जनवरी-मार्च10, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.(वार्षिक 100रू.), फोनः (011)25268341, ई मेलः kathanpatrika@hotmail.com ,सम्पर्क-107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063
पत्रिका कथन का प्रत्येक अंक विशेषांक होता है जिसमें किसी समसामयिक विषय पर चर्चा व संवाद को स्थान दिया जाता है। समीक्षित अंक में पर्यावरण पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है। प्रायः सभी रचनाओं मं पर्यावरण के प्रति जनचेतना का स्वर सुनाई देता है। प्रकाशित कहानियों में- शहर संुदर है(रमेश उपाध्याय), इल्तिजा(जावेद हुसैन) एवं एक जुलूस के साथ साथ(नीला प्रसाद) में पर्यावरण के प्रति चिंता दिखाई देती है। प्रमुख आलेखों में पर्यावरण की संस्कृति(पुष्पम् ए कुमार), पर्यावरण की रक्षा और सामाजिक न्याय का सवाल(अमिता बावीसकर) में भविष्य में पर्यावरण से होने वाले दुष्प्रभाव व इसके प्रदूषण से मनुष्य को जाग्रत करने का प्रयास किया गया है। हरीश भदानी ज्ञानेन्द्रपति, अरूण आदित्य, अमित मनोज की कविताएं आज के बदलते समाज को अपने मूल्यों व संस्कृति के प्रति सचेत करती हैं। नीलेश रघुवंशी की कविताएं उस आम आदमी की कविताएं हैं जिसे भुला विसरा दिया गया है। आमजन से संबंधित विषयों को उठाने का सार्थक प्रयास कवयित्री ने किया है। मुकुल शर्मा से बातचीत में पर्यावरण संरक्षण के लिए जमीनी प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया गया है। दरअसल आज पर्यावरण सम्पन्न वर्ग ने अपने लाभ के लिए हथिया लिया है। जिसे उससे शीघ्र ही मुक्त किए जाने की आवश्यकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व आलेख भी उपयोगी हैं।