Sunday, November 14, 2010

हिंदी साहित्य के ‘हिमाचल मित्र’

पत्रिका: हिमाचल मित्र, अंक: जून-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कुशल कुमार, सलाहकार संपादक: अनूप सेठी, पृष्ठ: 108, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80 रू.), ई मेल: himachalmittra@gmail.com , वेबसाईट: http://www.himachalmittra.com/ , फोन/मो. 09869244269, सम्पर्क: डी-46/16, साई संगम, सेक्टर 48, नेरूल, नयी मुम्बई 400.706
आज देश भर में विभिन्न प्रादेशिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। यह वह समय है जब बढ़ती साक्षरता व सामाजिक जाग्रति की वजह से देश के साथ साथ विश्व का आम जन एक दूसरे के समीप आ चुका है। इस समय में हिंदी साहित्य जगत की पत्रिकाएं अपनी तरह से योगदान कर रही हैं। इस पुनीत कार्य में हिमाचल मित्र का योगदान उल्लेखनीय है। पत्रिका हिमाचल ही नहीं देशभर के साहित्य व कला जगत का प्रतिनिधित्व करती है। समीक्षित अंक में ख्यात बांसरी वादक राजेन्द्र सिंह गुरंग से बातचीत कला जगत के विस्तारित होते स्वरूप पर एक गंभीर चर्चा है। लोक संस्कृति के अंतर्गत हिमाचली लोक साहित्य में मुक्तक गीत(कृष्ण चंद्र महादेविया), हिमाचली कोकिलाःवर्षा कटोच(अशोक जेरथ) तथा लाहौल स्पिति के जनजातीय लोगों का विवाह समारोह(उरज्ञान छैरिंग मैलगपा) प्रकाशित लेख हिमाचल की लोक कला की विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। छत्तीसगढ़ की परंपरा व संस्कृति पर ख्यात कवि शरद कोकास का लेख ‘देश की हर शहर में एक छत्तीसगढ़ है’ लेख विचार योग्य व पठनीय आलेख है। ‘सतखसमी’ भले ही पहाड़ी गाली हो पर कहानी पढ़कर इसके कथ्य व शिल्प से भलीभांति परिचित हुआ जा सकता है। संुदर लोहिया एक ऐसे कहानीकार हैं जो अपने आसपास के समाज से कथानक लेकर उसे कथा में ढालने में सिद्धहस्त हैं। कुलदीप शर्मा, भास्कर चैधुरी, हंसराज भारती, सिद्धेश्वर सिंह की कविताएं विश्वास दिलाती हैं कि भले ही कविता विधा को लेकर कूुछ भी कहा जाए पर यह चिर अमर विधा है। यह बरसों पहले थी और कई साल बाद तक अस्तित्व में रहेगी। बद्री सिंह भाटिया की कहानियों में समाज के निचले तबके तथा कमजोर लोगों को मुख्य धारा में लाने का जज्बा दिखाई देता है। उनकी कहानी लाजवन्ती पढ़कर आप उक्त विचार की प्रासंगिकता समझ सकते हैं। एच.आर. हरनोट से बातचीत कथा विधा के साथ साथ साहित्य के विभिन्न पहलूओं पर विचार करती है। पहाड़ी कलम के अंतर्गत यश मालवीय, केशो ज्ञानी, धौलाधार की कविताएं व रेखा ढडवाल के गीत प्रभावित करते हैं। अनूप सेठी, गप्पी बरैबर, केशव चंद्र, की रचनाएं पहाड़ी जीवन से आम जन को जोड़ने में पूर्णतः सफल रहे हैं। शैलेन्द्र सिहं का हिमालय दर्शन व पत्रिका ने पहाड़ी लेखकों डाॅ. गौतम व्यथित तथा डाॅ. प्रत्यूष गुलेरी से सार्थक व सारगर्भित बातचीत की है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

3 comments:

  1. तमाम पत्र-पत्रिकाओं के बारे में सार्थक जानकारियां...आभार.
    _________________
    'शब्द-शिखर' पर पढ़िए भारत की प्रथम महिला बैरिस्टर के बारे में...

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  2. 'धरती' (अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका),
    अंक-14, साम्राज्यवादी संस्कृति बनाम जनपदीय संस्कृति,
    संपादक : शैलेन्द्र चौहान,
    34/242, प्रतापनगर, सेक्टर-3, जयपुर, (राजस्थान)-303033, मो.-09419173960,
    EMail : dharati@indiatimes.com
    एक प्रति-25 रु., पृष्ठ-120 ।
    संप्रेषण-शैलेन्द्र चौहान। आलेख-शिवराम,डॉ.क्षमाशंकर पांडेय, सोहन शर्मा, सुरेश पंडित, महेन्द्र नेह, सुल्तान अहमद, विजेन्द्र, प्रकाश मनु, डॉ.जीवनसिंह। कविता-अभिज्ञात, शैलेन्द्र,
    बालकृष्ण काबरा, दिनकर कुमार, आनंद बहादुर, जिलेदारसिंह, मोहन कुमार
    डहेरिया। समीक्षा-शिवबाबू मिश्र।

    *आप जितना बेहतर और वैज्ञानिक ढ़ंग से प्रिंट टैक्नोलॉजी के इतिहास से वाकिफ होंगे। उतने ही बेहतर ढ़ंग से
    लघुपत्रिका प्रकाशन को समझ सकते हैं। लघुपत्रिकाओं की आवश्यकता हमारे यहां आज भी है, कल भी थी,
    भविष्य में भी होगी।
    लघुपत्रिका का सबसे बड़ा गुण है कि इसने संपादक और लेखक की अस्मिता को
    सुरक्षित रखा है।लघुपत्रिकाएं पिछलग्गू विमर्श का मंच नहीं हैं।
    लघु पत्रिका का चरित्र सत्ता के चरित्र से भिन्न होता है, ये पत्रिकाएं मौलिक सृजन का
    मंच हैं। साम्प्रदायिकता का सवाल हो या धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न हो अथवा
    ग्लोबलाईजेशन का प्रश्न हो हमारी नियमित तथा बड़ी पत्रिकाएं सत्ता विमर्श को ही परोसती रही
    हैं।
    जगदीश्वईर चतुर्वेदी

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  3. Nice to have view on the text of patrika 'HIMACHAL MITTRA'. Thanks.

    'Hasrat' Narevli.

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