Thursday, September 30, 2010

गहन विमर्श की गंभीर पत्रिका-‘पूर्वग्रह’

पत्रिका: पूर्वग्रह, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ: 132, मूल्य:30रू.(.वार्षिक 100रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bharatbhavan.org/ , फोन/मो. 0755.2660239, सम्पर्क: भारत भवन न्यास, जे. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स भोपाल म.प्र.

पत्रिका पूर्वग्रह ने संपादक श्री प्रभाकर श्रोत्रिय के मार्गदर्शन में नया आकार ग्रहण किया है। जिससे इसकी रचनात्मकता के साथ साथ पाठकों के द्वारा स्वीकार्यरता में वृद्धि हुई है। अंक में स्मरण के अंतर्गत ख्यात साहित्यकार संपादक विजय बहादुर सिंह का आलेख शमशेर की शमशेरियत तथा प्रयाग शुक्ल जी का लेख मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता(ख्यात कवि केदारनाथ अग्रवाल के समग्र पर एकाग्र) पत्रिका की अत्यंत महत्वपूर्ण व संग्रह योग्य रचनाएं हैं। अन्य आलेखों में कबीर काव्य की उत्तर मीमांसा(श्रीकांत उपाध्याय), भाषिक संप्रेषण और कविता की संप्रेषणीयता(कृपाशंकर सिंह) एवं छद्म प्रगतिशीलता और तीसरी भक्ति का्रंति(विनोद शाही) में विषयों पर गहन गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। कृति विमर्श के अंतर्गत प्रकाशित आलेख संबंधित कृतियांे का विश्लेषण करने के साथ साथ उनकी पाठकों के लिए उपयोगिता भी स्पष्ट करते हैं जिसकी आज अत्यधिक आवश्यकता है। इसके अंतर्गत अपने अपने अजनबी(रमेश दवे), कबीर अध्ययन की एक नई दिशा(प्रभात त्रिपाठी), एक रक्षिता के जीवन में नारीवादी हस्तक्षेप(मोहन कृष्ण वोहरा), साम्राराज्यवादी शक्तियों के प्रतिरोध की दो क्लासिक्स(पुष्पपाल सिंह) एवं कभी अकेले में मुक्ति नहीं(कुमार विश्वबंधु) में वह सब कुछ है जो हिंदी के शोध छात्र से लेकर गंभीर पाठक के लिए उपयोगी है। ध्रुव शुक्ल, अनामिका, कुमार वीरेन्द्र एवं विस्वाव शिम्बोसर्का की कविताएं बदलते समाज की जरूरतों पर अपने विचार रखती हुई कुछ नया करने की अपेक्षा करती है। क्षमा कौल की कहानी, कमल वशिष्ठ का रंगमंच पर आलेख एवं वसंग निरगुणे का लोक कथाओें पर आलेख पत्रिका की उपलब्धि कही जा सकती है। अन्य रचनाएं एवं पुस्तक समीक्षाएं पठनीय होने के साथ साथ जानकारीपरक भी हैं।

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