Saturday, September 18, 2010

हिंदी राजभाषा कब बन पाएगी-दूर्वादल

पत्रिका: दूर्वादल, अंक: मई-अक्टूबर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादकः परमात्मानाथ द्विवेदी, पृष्ठ: 80, मूल्य:30रू.(.वार्षिक 1200रू.), ई मेल: durvadal@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 05542.284691, सम्पर्क: 703, रामबाग, गांधी नगर, बस्ती 272.001(उ.प्र.)
पत्रिका का समीक्षित अंक अच्छे व आकर्षक कलेवर के साथ पुनप्रकाशित हुआ है। पत्रिका का स्वरूप, रचनाएं तथा संपादन प्रभावित करता है। इस अंक में प्रकाशित साहित्यिक रचनाएं वर्तमान के संदर्भ तथा प्राचीन भारतीय साहित्य को अच्छी तरह से अभिव्यक्ति दे सकी है। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में नक्सली आतंवादः विहगावलोकन(कुलदीप नाथ शुक्ल), समसामयिक कविता का सामान्य परिदृश्य(स्व. हरिशंकर मिश्र), सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के नाटकों में राष्ट्रबोध(प्रो. मंजु त्रिपाठी), सूख रहा लोक संस्कृति का रस(माताप्रसाद त्रिपाठी) एवं हिंदी राजभाषा कब बन पाएगी(त्रिलोकी नाथ सिंह) में नवीनता के साथ साथ पठनीयता भी है। प्रकाशित कहानियों में लर्न एटीकेट(श्याम सुंदर चैधरी), लकीर(शिवकुमार यादव), नेम प्लेट(प्रमिला मजेजी) तथा लघुकथा डर(सुनीता जोशी) में आमजन के प्रति गहरी संवेदनाओं के दर्शन होते हैं। हरीश दरवेश, विभूतिधर द्विवेदी की ग़ज़लें, नज़्में तथा रामयज्ञ मोर्य के दोहे भी अच्छी रचनाएं हैं। किरन अग्रवाल, सुनीता जोशी, मंजूषा मिश्रा, संतोष कुमार तिवारी एवं सुशीला पुरी की कविताओं में जनचेतना का स्वर है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी प्रभावित करते हैं।

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