Friday, August 13, 2010

हिंदी-उर्दू का साहित्यिक मंच-सुख़नवर’

पत्रिका: सुख़नवर, अंक: मई-जून10, स्वरूप: द्विमासिक, संपादकः अनवारे इस्लाम, पृष्ठ: 48, मूल्य:25रू.(.वार्षिक 170रू.), ई मेलः mehra.kailash@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोनः 0755.2555789, सम्पर्क: सी-16, सम्राट कालोनी, अशोका गार्डन, भोपाल 462023 म.प्र.
धरोहर हिंदी उर्दू ज़बान में प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका इस मायने में अद्वितीय है कि पत्रिका में प्रकाशित रचनाएं दोनों भाषाओं व उसके साहित्य का अनुमोदन व समर्थन करती है। पत्रिका में प्रकाशित कहानियां आज की अपसंस्कृति तथा भोगवादी मानसिकता से लोगों को बचाती हुई दिखाई देती है। प्रमुख कहानियों में बर्फ़ में आग(शमोएल अहमद), कहीं कुछ खो गया है(प्रो. अजहर राही), कथाएं खत्म नहीं होतीं(प्रेेम कुमार गौतम) तथा गौरा मां(रेणुश्री आस्थाना) को शामिल किया जा सकता है। नुसरत मेंहदी, अक़ील नोमानी, इक़बाल मसूद, शाहिर सागरी, श्यामनंद सरस्वती, ख़ुर्शीद नवाब, दीपक दानीश, मनोज अबोध, सीमा गुप्ता, कमर रईस बहराइची, शाहजहां खान शाद, अर्श सहबाई, कुंदन सिंह सहगल, सुनीति बैस, सलीम अंसारी, कु. रूचि जैबा एवं विजय लक्ष्मी विभा की ग़ज़लें प्रभावित तो करती ही हैं साथ ही समाज को जोड़कर रखने के लिए संदेश भी देती दिखाई देती हैं। नज़्मों में अशफ़ाक़ अहमद सिद्दकी, हसीब सोज़ कुछ नया कर सके हैं। तेलुगु कविता स्त्री पुरूष का अनुवाद कुछ अधूरा सा लगता है। पत्रिका की लघुकथाएं भी उस स्तर की नहीं लगीं जिस स्तर की कहानियां व ग़ज़लें हैं। पत्रिका की समीक्षाएं व अन्य रचनाएं भी पढ़ने योग्य हैं। एक अच्छी पत्रिका का इसलिए भी स्वागत किया जाना चाहिए कि इसका स्वर देश को जोड़ने का है जो अधिक महत्वपूर्ण है।

2 comments:

  1. वाह जि बहुत अच्छी समीक्षा की आप ने धन्यवाद

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  2. विवरण देते सी तटस्‍थता के साथ विश्‍लेषण और सहज व्‍याख्‍या की यह शैली आम तौर पर देखने को नहीं मिलती. सार्थक स्‍तंभ. बधाई और धन्‍यवाद.

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