Wednesday, July 28, 2010

जनतंत्र की सौगंध तुमको-‘साहित्य परिक्रमा’

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रबंध संपादकः जीत सिंह जीत, संपादकः मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 64, मूल्य:15रू.(.द्विवार्षिक 100रू.), ई मेलः shridhargovind@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोनः 0751.2422942, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क ग्वालियर
साहित्य की ख्यात पत्रिका साहित्य परिक्रमा के 42 वें इस अंक में पाठकों की रूचि को ध्यान मंे रखते हुए सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित आलेखांेे में गोस्वामी तुलसीदास(सोहनलाल रामरंग), आलोचना का सौन्दर्य विमर्श(डाॅ. कन्हैया सिंह), साहित्य संस्कृति का अंश है(डाॅ. विपिन आशर), काव्य लेखन में पसरी संवेदनशीलता(डाॅ. कृष्णमोहन पाण्डेय), प्रमुख हैं। प्रायः सभी कहानियां बाजारवाद की अपेक्षा पुरानी पीढी को वरीयता देने के साथ साथ नई पीढ़ी का भी पर्याप्त रूप से मार्गदर्शन करती हैं। इन रचनाओं में अइया(डाॅ. कामिनी), ढलान से गुजरते हुए(कुंदा जोगेलकर) एवं आशंकाओं के घेरे(कुंवर किशोर टण्डन) को शामिल किया जा सकता है। राधेलाल नवचक्र व सनत कुमार जैन की लघुकथाएं भी मनोरंजन के साथ साथ कुछ नया देते हुए मार्गदर्शन करती हैै। नरेन्द्र कोहली, डाॅ. बद्री प्रसाद पंचोली एवं राज चड्ढ़ा के व्यंग्य स्तरीय व विचार योग्य हैं। मधुर गंज मुरादाबादी सहित दयाकृष्ण विजयवर्गीय, शत्रुध्न प्रसाद, डाॅ. नसीमा निशा, सलीम अश्क, द्वारकालाल गुप्त, रमेश चंद्र शर्मा चंद्र, तनय चित्रांश, सुनीति वैस, राजकिशोर वाजपेयी, जगन्नाथ विश्व, डाॅ. ओम प्रकाश भाटिया की कविताएं प्रभावशाली व मनन योग्य हंै। श्री कैलाश चंद्र पंत का आलेख शंकर शरण की पुस्तक बुद्धिजीवियों की अफीम साम्यवार कुछ गहन विमर्श सामने लाता है। पत्रिका में प्रकाशित पुस्तक/संग्रह समीक्षा सहित अन्य रचनाएं भी उपयोगी व विचार योग्य हैं। जनतंत्र पर नए सिरे से विचार करता हुआ संपादकीय विशेष रूप से पढ़ने योग्य है।

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